पुराने वक्तों की बात है। गुलरेजपुर नामी एक बस्ती में एक फकीर रहता था जिसका नाम उस्ताद बशीरुद्दीन था। वह मांगने के फन में तो माहिर था ही लेकिन अक्लोफम में भी किसी से कम ना था। उसकी बातों में दाना होती और वह हालात को बड़ी बारीकी से समझता था। उस्ताद बशीरुद्दीन के साथ एक नौजवान शागिर्द रहता था जिसका नाम नोमान अली था। नोमान अली दिल का बुरा नहीं था मगर सादा लॉ और कुछ नासमझ जरूर था। भीख मांगने का हुनर उसने अपने उस्ताद ही से सीखा था। लेकिन अभी तक उसमें वह पुख्तगी पैदा नहीं हुई थी जो उस्ताद [संगीत] मैं थी। दुनिया में इन दोनों का कोई सहारा ना था। इसलिए वह एक दूसरे का आसरा बनकर रहते थे। खुशी हो या गम दोनों बराबर के शरीक होते। वक्त गुजरता गया और उस्ताद बशीरुद्दीन बुढ़ापे की दहलीज [संगीत] पर जा पहुंचा। जबकि नोमान अली जवानी की ताकत से भरपूर था। एक साल बारिशें इस कदर हुई कि दरिया बिपिर गया और देखते [संगीत] ही देखते सैलाब ने गुलरेज पुर को अपनी लपेट में ले लिया। कुच्चे पक्के सभी मकान पानी में बह गए। उस्ताद और शागिर्द की झोपड़ी भी इस तबाही से ना बच सकी। चंद ही घंटों में [संगीत] पूरी बस्ती वीरान हो गई। मजबूर होकर दोनों ने फैसला किया कि [संगीत] अब इस उजड़ी बस्ती को छोड़ देना चाहिए। अगली सुबह वह अपना थोड़ा सा सामान समेट कर रवाना हो गए। जब उन्होंने मुड़कर आखिरी बार गुलरेजपुर [संगीत] को देखा तो उनकी आंखें नम हो गई। वहां उनकी जिंदगी के बेशुमार दिन और यादें वाबस्ता [संगीत] थी। रास्ते भर वह एक दूसरे को दिलासा देते और आइंदा के हालात पर गुफ्तगू करते रहे। लंबा सफर तय करने के बाद दूर अफक पर उन्हें एक बड़े शहर के आसार दिखाई दिए। उस्ताद जी लगता है किस्मत हम पर मेहरबान हो गई। आगे कोई शहर नजर आ रहा है। नोमान अली ने खुशी से कहा। उस्ताद बशीरुद्दीन ने आसमान की तरफ देखकर जवाब दिया। अल्लाह का शुक्र है। शायद वहीं हमारे लिए कोई नया दरवाजा खुले। वो दोनों तेज कदमों से चलने लगे। ताकि सूरज डूबने से पहले शहर पहुंच जाए और रात के लिए कुछ खानेपीने का बंदोबस्त हो सके। ऐन गुरूबे आफताब के वक्त वो शहर नसीम के दरवाजे पर दाखिल हुए। शहर की रौनकें देखकर नोमान अली तो हैरान रह गया मगर लंबे सफर ने उसे निढाल कर दिया था। उसने हापते हुए कहा उस्ताद अब मुझ में एक कदम चलने की भी हिम्मत नहीं रही। नहीं उस्ताद, मुझ में अब बिल्कुल ताकत नहीं रही। खुदा के लिए कुछ खाने का बंदोबस्त करें। उस्ताद बशीरुद्दीन ने नरमी से कहा, "अच्छा बेटा तुम यहीं ठहरो। मैं किसी घर से कुछ मांग कर लाता हूं।" [संगीत] यह कहकर वो शहर नसीम की गलियों में चले गए। कुछ ही देर बाद वह चंद रोटियां लेकर वापस आए। दोनों ने सब्रो शुक्र के साथ रोटियां खाई। करीब के कुएं [संगीत] से पानी पिया और एक गिने दरख्त के नीचे लेट कर सो गए। सुबह हुई तो उस्ताद बशीरुद्दीन ने कहा आज हम शहर में निकलकर कुछ रकम जमा करते हैं। फिर आइंदा का सोें। दोनों सारा दिन शेर नसीम की गलियों में घूमते रहे। शाम तक उनके पास कुछ सिक्के जमा [संगीत] हो चुके थे। वो अपने उसी दरख्त के नीचे वापस आ गए जो अब उनका आरजी [संगीत] ठिकाना बन चुका था। उस्ताद बशीरुद्दीन ने सुकून को गुन कर कहा नोमान अली अब हमारे पास इतनी रकम हो गई है कि कुछ जरूरी सामान खरीद सकें। मेरा ख्याल है कि शहर से बाहर जंगल के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी बना लें और वहीं बाकी जिंदगी गुजार दें। नोमान अली खुश होकर बोला जी उस्ताद मैं अभी बाजार से सामान ले आता हूं। वो सिक्के लेकर बाजार की तरफ रवाना हो गया। बाजार में बड़ी चहलपहल थी। दुकानें सजी हुई थी और हर तरफ खरीदारों का हुजूम था। नोमान अली ने सोचा कई दिन हो गए कुछ मीठा नहीं खाया। क्यों ना थोड़ी सी मिठाई भी ले लूं। यह सोचकर वह एक हलवाई की दुकान पर जा पहुंचा। रंगरंगी मिठाइयां सजी हुई थी। उसने पूछा भाईजान मिठाई का क्या भाव है? हलवाई ने जवाब दिया दो पैसे सैर। नोमान अली हैरान होकर बोला। क्या कहा? 2 पैसे सैर और बर्फी का क्या रेट है? हलवाई हंसकर बोला, हर चीज 2 पैसे सैर है। नोमान अली की आंखें खुशी से चमक उठी। अच्छा तुम मिलाजुलाकर एक सैर तोल दीजिए। हलवाई ने एक सैर मिठाई तोल कर दे दी। नोमान अली ने दो पैसे दिए और खुशी-खुशी आगे बढ़ गया। अब वह सब्जी वाले के पास पहुंचा। भाईजान गोभी का क्या भाव है? दो पैसे सैर। सब्जी वाले ने जवाब दिया और आलू वो भी दो पैसे सैर। यहां हर चीज एक ही भाव मिलती है। यह सुनकर नोमान अली हैरान रह गया। वो सामान लेना भूल गया और दौड़ता हुआ हांपता कांपता अपने उस्ताद के पास पहुंचा। उस्ताद बशीरुद्दीन ने उसे इस हाल में देखा तो पूछा क्या हुआ बेटा? इस तरह क्यों भाग रहे [संगीत] हो? नोमान अली खुशी से फूले ना समाता था। उस्ताद मजे आ गए। इस शहर में तो हर चीज 2 पैसे सैर मिलती है। [संगीत] यह देखें मिठाई भी सिर्फ दो पैसे की। दालें, सब्जियां सब कुछ एक ही दाम। अब तो जिंदगी बन गई। हम सारी उम्र यहीं रहेंगे। उस्ताद बशीरुद्दीन खामोश हो गए। उनके चेहरे पर फिक्र के आसार नुमाया थे। नोमान अली ने पूछा, "क्या बात है उस्ताद आप खुश नहीं हुए?" उस्ताद बशीरुद्दीन ने गहरी सांस ली और बोले, नहीं बेटा मुझे इस बात से खुशी नहीं हुई। मगर क्यों उस्ताद जी? अब हमें ना पकाने की जरूरत ना मेहनत की। बाजार से पक्की पकाई चीजें लाएंगे और आराम से खाएंगे। उस्ताद बशीरुद्दीन ने संजीदगी से कहा नोमान अली तुम नासमझ हो। जहां हर चीज एक ही दाम मिले वहां इंसाफ नहीं होता। यह जगह ठीक नहीं। यहां ठहरना खतरनाक है। उस्ताद आप क्या कह रहे हैं? मैं तो यहां से हरगिज़ नहीं जाऊंगा। ऐसी सुस्ती जगह और कहां मिलेगी? उस्ताद बशीरुद्दीन ने आ भरी और कहा इसीलिए कह रहा हूं बेटा यह अंधेर निगरी है। यहां कुछ भी हो सकता है। तुम कुछ भी कहो। उस्ताद बशीरुद्दीन मगर मैं यहां से नहीं जाऊंगा। उस्ताद ने संजीदगी से पूछा। और अगर मैं चला जाऊं तो? नोमान अली ने जिद्दी लहजे में जवाब दिया। तब भी मैं नहीं जाऊंगा। बल्कि मैं तो आपसे भी कहता हूं कि यहीं रुक जाएं। बाकी जिंदगी आराम और ऐश से यहीं गुजरेगी। उस्ताद बशीरुद्दीन भी अपनी बात पर कायम रहे। नहीं बेटा मैं यहां हरगिज़ नहीं रह सकता। नोमान अली बोला तो फिर मैं अकेला ही यहीं रहूंगा। उस्ताद ने आ भरी। यह तुम्हारी मर्जी है। यह सुनकर उस्ताद बशीरुद्दीन को बहुत सदमा हुआ। उन्होंने नोमान अली को औलाद की तरह चाहा था। वो सोच [संगीत] भी ना सकते थे कि एक दिन वह इसी बेरुखी से पेश आएगा। खैर दोनों ने वही मिठाई खाई और रात गुजार [संगीत] दी। सुबह होते ही उस्ताद बशीरुद्दीन उठ खड़े हुए। नोमान [संगीत] अली ने पूछा कहां जा रहे हैं उस्ताद? उस्ताद ने कहा मैंने कहा था ना कि मैं यहां नहीं ठहर सकता। क्या अभी जा रहे हैं? हां बेटा मुझे इस जगह से खौफ आता है। नोमान अली ने आखिरी कोशिश की। मान जाए उस्ताद वो में कहीं ऐसा आराम नहीं मिलेगा जैसा यहां है। अगर जाना ही है तो चंद दिन मजे लेकर चले जाएं। उस्ताद ने मजबूत लहजे में कहा। मैं सिर्फ दिन निकलने तक ठहरा था। अब एक लम्हा भी नहीं रुक सकता। उन्होंने अपना झूला कंधे पर डाला और शहर नसीम से बाहर जाने वाले रास्ते पर चल पड़े। नोमान अली भी साथ हो लिया। रास्ते में नोमान अली बोला मैं हैरान हूं उस्ताद आपको यहां किस बात का खतरा है हमारा काम तो भीख मांगना है हमें किससे डर उस्ताद बशीरुद्दीन ने गहरी नजर से उसे देखा और कहा अभी तुम नहीं समझोगे लेकिन एक दिन आएगा जब तुम मेरी बात याद करोगे और कहोगे काश मैंने उस्ताद की बात मान ली होती मैं अब भी कहता हूं मेरे साथ चलो लालच में ना आओ हरगिज़ नहीं नोमान अली ने दो टोक जवाब दिया। उस्ताद ने आखिरी नसीहत की। अच्छा सुनो। अगर कभी किसी मुसीबत में गिरफ्तार हो जाओ तो दिल ही दिल में अपने उस्ताद को याद कर लेना। शायद कुदरत मुझे तुम्हारी मदद के लिए भेज दे। नोमान अली हंसकर बोला, "आप बिला वजह फिक्र कर रहे हैं। [संगीत] यहां मुझे कुछ नहीं होगा।" मायूस होकर उस्ताद बशीरुद्दीन रवाना हो गए। और नोमान अली शेर नसीम वापस आ गया। नोमान अली की नई जिंदगी। नोमान अली ने भूसे और मिट्टी की एक झोपड़ी बना ली। अब वो हर फिक्र से आजाद था। सुबह निकलता दो-चार सिक्के हासिल करता और चूंकि हर चीज [संगीत] दो पैसे शेर मिलती थी इसलिए थोड़ी सी रकम में ढेर सारा खाना ले आता। मिठाइयां, घी, दूध हर चीज खूब मजे से खाता और अपने उस्ताद [संगीत] को दिल ही दिल में नासमझ कहकर हंसता। आहिस्ता-आहिस्ता उसने मेहनत करना भी छोड़ दिया। कई-कई दिन भीख मांगने ना जाता क्योंकि झोपड़ी में खाने-पीने का ढेर लगा रहता था। बेफिक्री, आराम और हद से ज्यादा खाने की वजह से उसका जिस्म तेजी से मोटा होने लगा। वो अपने बढ़ते हुए पेट को देखकर खुश होता। दिन बदन उसका वजन बढ़ता गया। यहां तक कि चलना भी मुश्किल हो गया। जब कभी पैसे खत्म होते तो बाजार के कोने में बैठ जाता। लोग उसके गैर मामूली मोटापे को देखकर हंसते और तरस खाकर उसे कुछ दे देते। वह फिर वही पैसे लेकर खाने की चीजें खरीदता और झोपड़ी में जमा कर लेता। अब यही उसकी जिंदगी थी। खाना, सोना और मोटा होना। अंधेर निगरी का इंसाफ। अब इसी मुल्क के बादशाह का हाल सुनिए। एक दिन वो अपने तख्त पर बैठा दरबार लगाए हुए था। अचानक सिपाही एक शख्स को पकड़ कर लाए। बादशाह ने पूछा यह कौन है? सिपाही ने अर्ज किया हुजूर इसे बाजार से पकड़ा गया है। इसने एक शख्स की जेब काटी है। बादशाह ने कहा जिसकी जेब काटी गई है उसे पेश करो। वो शख्स हाजिर हुआ। बादशाह ने पूछा क्या इसने तुम्हारी जेब काटी है? उसने जवाब दिया जी हुजूर। बादशाह ने गुस्से से पूछा। तुमने अपनी जेब कटने ही क्यों दी? वो शख्स घबरा गया। बादशाह ने ऐलान किया तुम्हें तुम्हारी गफलत की सजा मिलेगी। जेब काटने वाले को छोड़ दो क्योंकि उसने लोगों को खबरदार करने का फर्ज अदा किया है और जिसकी जेब कटी है उसे कैद कर लो। कल सुबह उसे शहर के चौराहे पर फांसी दे दी जाएगी। हुक्म मिलते [संगीत] ही जेब कतरे को आजाद कर दिया गया और बेचारे गाफिल शख्स को कैब में डाल दिया [संगीत] गया। जीभ कटने वाले को तो छोड़ दिया गया और जिस बेचारे की जेब कटी थी उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अगले दिन शहर नसीम के चौराहे पर पांव रखने की जगह ना थी। लोग तमाशा देखने के लिए जमा थे। इस गरीब आदमी को रस्सियों से बांधकर चौराहे पर लाया गया। वो थर-थर कांप रहा था। एक तो उसकी जेब कटी। ऊपर से उसे फांसी दी जा रही थी। मजमा लम्हा ब लम्हा बढ़ता जा रहा था। कुछ देर बादशाह भी वहां आ पहुंचा और इशारा किया कि सजा पर अमल किया जाए। जल्लाद आगे बढ़ा और उसके गले में रस्सी का फंदा डाल दिया। मगर वो शख्स दुबला पतला था और फंदा बहुत ढीला। जल्लाद में इतनी अकल कहां थी कि गिरे किस देता? कभी फंदे को देखता कभी उस शख्स की गर्दन को। बादशाह ने गुस्से से पूछा, क्या बात है? उसे फांसी क्यों नहीं देते? जल्लाद ने अर्ज किया हुजूर यह शख्स बहुत दुबला है और फंदा बहुत ढीला। यह उसके गले में फिट ही नहीं होता। अब मैं उसे फांसी कैसे दूं? यह सुनकर बादशाह सोच में पड़ गया। दरबारी भी परेशान खड़े रहे। मगर किसी के ज़हन में यह ना आया कि फंदे की गिरे तंग कर दी जाए। अचानक बादशाह खुश होकर बोला, "तुम सब नादान हो। इतनी सी बात नहीं समझ सकते। अगर उसके गले में फंदा नहीं आता तो उसे छोड़ दो और पूरे शहर में जिस आदमी के गले में यह फंदा पूरा आ जाए उसे फांसी दे दो। लेकिन सजा देने से पहले मुझे खबर कर देना। मैं यह मंजर अपनी आंखों से देखना चाहता हूं। दरबारी बादशाह की दानिशमंदी पर दाद देने लगे। हुकुम के मुताबिक उस बेगुनाह को छोड़ दिया गया। और सिपाही फंदा लेकर ऐसे शख्स की तलाश में निकल पड़े जिसकी गर्दन [संगीत] में वह ठीक बैठ जाए। फंदे की तलाश सबसे पहले वह एक हलवाई की दुकान पर पहुंचे। उन्होंने सोचा शायद यह मुनासिब [संगीत] हो। हलवाई को बुलाया गया। वो सरकारी सिपाहियों को देखकर घबरा गया मगर मजबूरन [संगीत] आगे आया। सिपाहियों ने उसके गले में फंदा डाला। मगर वो भी ढीला [संगीत] नुकला। मायूस होकर बोले जाओ तुम फांसी के लायक [संगीत] नहीं तुम्हारी गर्दन इतनी मोटी नहीं यूं वो बाजार में हर शख्स के गले में फंदा डालकर देखते रहे मगर चूंकि फंदा बहुत बड़ा था किसी के गले में पूरा ना आता था अचानक उनकी नजर एक निहायत मोटे आदमी पर पड़ी वो उसे देखकर खुश हो गए और तेजी से उसकी तरफ बढ़े वो मोटा आदमी और कोई नहीं बल्कि नोमान अली था| नोमान अली का अंजाम करीब। कई दिनों से नोमान अली बाजार ना गया था। झोपड़ी में जमाशुदा खाना खत्म हो चुका था और सुके भी खत्म हो गए थे। मजबूरन वो बाजार की तरफ निकला और रास्ते में भीख मांगता हुआ चला। बाजार पहुंचते-पहुंचते उसे चंद आने मिल रहे। सबसे पहले वह हस््ब आदत मिठाई की दुकान पर गया और बोला, पांच शहर मिठाई तोल दो। हलवाई ने तराजू उठाया ही था कि अचानक उसके हाथ से तराजू गिर पड़ा। नोमान अली ने गुस्से से कहा क्या बात है हाथों में जान नहीं? हलवाई कांपती आवाज में बोला वो वो आ रहे हैं। नोमान अली ने हैरान होकर पूछा कौन आ रहे हैं? तुम इस कदर खौफजदा क्यों हो? नोमान अली ने हैरान होकर पूछा। इतने में सिपाही फंदा लेकर वहां आ पहुंचे। उनकी नजर जैसे ही नोमान अली पर पड़ी वो खुश हो गए। एक सिपाही बोला पहलवान जरा अपनी गर्दन इधर लाओ। क्यों? क्या बात है? नोमान अली ने घबरा कर पूछा। सिपाही ने कहा एक शख्स को फांसी दी जानी थी। मगर फंदा उसके गले में पूरा नहीं आया। बादशाह का हुकुम है कि जिसके गले में यह फंदा पूरा आ जाए, उसे फांसी दे दी जाए। [संगीत] सुबह से हम ऐसे ही किसी शख्स की तलाश में हैं। और लगता है तुम हमारे काम [संगीत] के आदमी हो। यह कैसा इंसाफ है? नोमान अली चीख उठा। सिपाही ने सख्त लहजे में कहा, "यह हमारे बादशाह का इंसाफ है। यहां हर चीज दो पैसे सैर उसी के हुक्म से मिलती है।" इतना कहकर सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। जब फंदा उसके गले में डाला गया तो वह बिल्कुल ठीक बैठ गया। सिपाही खुश हो गए और उसे जंजीरों में जकड़ कर कैदखाने ले गए। और नोमान अली को शिद्दत से याद आया कि उस्ताद बशीरुद्दीन उसे यहां रुकने से क्यों मना करते थे। उस्ताद की वापसी दूसरी तरफ उस्ताद बशीरुद्दीन शहर नसीन छोड़कर बहुत उदास निकले थे। वो शहर-शहर गांव-गांव फिरते रहे। जो रोका सूखा मिल जाता खा लेते और खुदा का शुक्र अदा करते। एक दिन अचानक उन्हें नोमान अली का ख्याल आया। दिल बेचैन हो उठा। उन्होंने सोचा जाने मेरा शागिर्द किस हाल में हो। यह सोचकर वह वापस शेर नसीम की तरफ चल पड़े। शाम तक सफर करके शहर पहुंचे और उस जगह गए जहां वो दोनों ठहरा करते थे। झोपड़ी तो मौजूद थी मगर नोमान अली ना था। लोगों का हुजूम चौराहे की तरफ जा रहा था। उस्ताद बशीरुद्दीन ने एक शख्स से पूछा तो मालूम हुआ कि आज किसी को फांसी दी जाएगी। उस्ताद भी चौराहे की तरफ बढ़े। अचानक उन्होंने देखा कि चंद सिपाही एक निहायत मोटे आदमी को जंजीरों में जकड़ कर ला रहे हैं। पहले तो वह पहचान ना सके। मगर जब उस मोटे आदमी ने चीख कर कहा उस्ताद तो उस्ताद बशीरुद्दीन चूंक उठे। गौर से देखा तो वो नोमान अली था। यह तुम हो। तुम इस हाल को कैसे पहुंचे? उन्होंने हैरत से पूछा। नोमान अली ने सारा माजरा सुना दिया। उस्ताद कुछ लम्हे सोच में पड़ गए। फिर शागिर के कान के करीब होकर बोले, तुम्हें बचाने की एक ही तरकीब है। जब तुम्हें फांसी देने लगे तो मैं कहूंगा कि फांसी मुझे दो। और तुम भी [संगीत] यही कहना कि मुझे दो। बाकी काम मुझ पर छोड़ दो। अंजाम अंधेर नगरी नोमान अली को फांसी [संगीत] के तख्ते पर खड़ा कर दिया गया। फंदा उसकी आंखों के सामने झूल रहा था। वो खौफजदा था कि कहीं उस्ताद नाकाम ना हो जाए। कुछ देर बादशाह आया। उसने मजमा को मुखातिब करके ऐलान किया। आखिरकार हमें वह शख्स मिल गया जिसके गले में यह फंदा पूरा आया है। हुकुम देता हूं कि उसे फांसी दे दी जाए। जल्लाद ने फंदा उठाया ही था कि ऐन इस लम्हे उस्ताद बशीरुद्दीन चीख उठे। ठहरो उसे नहीं मुझे फांसी दो। मजमा पर सन्नाटा छा गया। नोमान अली भी चला आया। नहीं खांसी मुझे दी जाए। लोग हैरान रह गए। बादशाह भी शिस्तर था। तुम दोनों क्यों मरना चाहते हो? उस्ताद बशीरुद्दीन बोले बादशाह सलामत आज का दिन बड़ा मुबारक है। जो आज फांसी पाएगा सीधा जन्नत में जाएगा। मरना तो सबको है। बेहतर है यह शहादत मुझे मिले। यह सुनना था कि मजमा में शोर मच गया। मजीद चलाया, मैं वजीर हूं। मुझे फांसी दी जाए ताकि मैं जन्नत में जाऊं। दूसरे लोग भी चीखने लगे। फांसी मुझे दो। मुझे दो। बादशाह हैरान और परेशान हो गया। फिर उसने हाथ उठाकर सबको खामोश किया और बोला, "सब हक तो मेरा है। मैं तुम्हारा बादशाह हूं।" जन्नत में सबसे पहले मैं जाऊंगा। कोई उसके आगे बोल ना सका। बादशाह खुद तख्तेदार पर चढ़ गया। नोमान अली को नीचे उतरने का इशारा किया गया। उसने दिल ही दिल में खुदा का शुक्र अदा किया। बादशाह के हुकुम पर जल्लाद ने उसके [संगीत] गले में फंदा डाला और यूं अंधेर नगरी का बादशाह अपने ही हुकुम का शिकार हो गया। लोग समझ रहे थे कि वह जन्नत जा [संगीत] रहा है। मगर उस्ताद बशीरुद्दीन और नोमान अली मौके पाकर मजमा से निकल गए। और इस मुल्क से बहुत दूर चले गए। रास्ते में नोमान [संगीत] अली ने शर्मिंदगीगी से कहा, उस्ताद आप सच कहते थे। यह वाकई अंधेरी निगरी थी। उस्ताद बशीरुद्दीन मुस्कुराए और दोनों आगे बढ़ गए। प्यारे दोस्तों, उम्मीद करता हूं कि आपको कहानी पसंद आई होगी। अगर कहानी अच्छी लगी हो तो हमारे चैनल एक किस्से को सब्सक्राइब कर दें और बेल आइकॉन दबा दें। ताकि हर हर आने वाली सबका खामोस कहानी आप तक बरव पहुंच सके। कमेंट में अपनी कीमती राय का इजहार जरूर कीजिएगा। वीडियो देखने का बहुत-बहुत शुक्रिया। अल्लाह हाफिज।
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