पुराने वक्तों की बात है। एक शहर था जिसका नाम था नवाबगंज। यह शहर बहुत बड़ा और आबाद था। इस शहर में तरह-तरह के लोग रहते थे। अमीर भी थे और गरीब भी। सौदागर भी थे और मजदूर भी। लेकिन इस शहर के आसपास जो गांव बसे हुए थे, उनमें ज्यादातर किसान रहते थे। यह किसान अपने खेतों में दिन रात मेहनत करते और अनाज उगाते थे। नवाबगंज शहर से कोई पांच कोस दूर एक गांव था जिसका नाम था फैजाबाद। यह गांव बहुत हराभरा और खुशहाल था। इस गांव के चारों तरफ खेत ही खेत थे। गेहूं, धान, गन्ना, सब्जियां हर किस्म की फसलें वहां उगाई जाती थी। गांव के बीचों-बीच एक पक्का कुआं था जिससे सारे गांव वाले पानी भरते थे। कुएं के पास ही एक नीम का बहुत पुराना और बड़ा दरख्त था। गर्मियों में लोग उस दरख्त की छांव में बैठकर आराम किया करते थे और अपनी बातें किया करते थे। इस गांव में तकरीबन 100 घर थे। हर घर में चार-प लोग रहते थे। गांव के ज्यादातर लोग मेहनती और नेक दिल थे। वह एक दूसरे के दुख सुख में शरीक होते थे। अगर किसी के घर कोई खुशी की बात होती तो सारा गांव मिलकर जश्न मनाता और अगर किसी के घर कोई मुसीबत आ जाती तो सब मिलकर उसकी मदद करते। लेकिन इस गांव की एक बहुत बड़ी परेशानी थी और वह परेशानी था एक जमींदार जिसका नाम था नवाब इकबाल खान। यह नवाब बहुत जालिम और सख्त दिल इंसान था। गांव की ज्यादातर जमीन इसी नवाब की थी। गांव के किसान इस जमीन पर खेती करते थे और फसल का एक बड़ा हिस्सा इस नवाब को दे देते थे। इसे लगान कहते थे। नवाब इकबाल खान गांव में नहीं रहता था। वह शहर में एक बड़ी हवेली में रहता था। उसकी हवेली में 10-12 नौकर जाकर काम करते थे। हवेली के बाहर दो-तीन पहरेदार हमेशा बंदूकें लिए खड़े रहते थे। नवाब साहब के पास पांच छह घोड़े थे और दो बैलगाड़ियां भी थी। वह बहुत अमीर था। लेकिन उसका दिल बहुत छोटा और तंग था। नवाब साहब महीने में एक दो बार गांव आते थे। जब वह आते थे तो उनके साथ उनके तीन-चार मुनीम और पहरेदार भी आते थे। मुनीम वो लोग होते थे जो किसानों से लगान वसूल करते थे और नवाब साहब के खेतों का हिसाब किताब रखते थे। इन मुनीमों में सबसे बड़ा मुनीम था मियां जमील अहमद। यह मियां बहुत चालाक और बेईमान आदमी था। यह किसानों से जरूरत से ज्यादा लगान वसूल करता और बाकी पैसे अपनी जेब में डाल लेता था। नवाब साहब जब भी गांव आते तो गांव में डर का माहौल छा जाता। बच्चे अपने घरों में छुप जाते। औरतें अपने घरों के अंदर चली जाती और मर्द लोग सिर झुकाकर नवाब साहब को सलाम करते। अगर कोई ठीक से सलाम नहीं करता तो नवाब साहब के पहरेदार उसे डांटते और कभी-कभी मारते भी थे। नवाब साहब की एक खास आदत थी जो सबसे बुरी थी। अगर किसी किसान के घर कोई खूबसूरत लड़की या बहू होती तो नवाब साहब उस पर बुरी नजर डालते। वह अपने मुनीमों को भेजकर उस परिवार को डराते धमकाते। कई बार तो उन्होंने गांव की लड़कियों के साथ बहुत बुरा सलूक भी किया था। लेकिन कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता था क्योंकि नवाब साहब बहुत ताकतवर थे। उनकी शहर के अंग्रेज अफसरों से भी जान पहचान थी। गांव के लोग नवाब साहब से बहुत डरते थे। लेकिन उनके खिलाफ कुछ कर नहीं सकते थे। वह चुपचाप अपनी जिंदगी जीते रहते और खुदा से दुआ करते कि किसी तरह उनका पीछा छूटे। इसी गांव में एक बूढ़ा किसान रहता था जिसका नाम था अब्दुल रहमान। लोग उसे प्यार से रहमान चाचा बुलाते थे। रहमान चाचा की उम्र तकरीबन 60 65 साल थी। उसकी दाढ़ी सफेद हो चुकी थी और चेहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी थी। लेकिन अभी भी वह मजबूत था और अपने खेत में काम कर सकता था। रहमान चाचा के तीन बेटे थे। बड़े बेटे का नाम था करीम बख्श, बीच वाले का नाम था इब्राहिम और सबसे छोटे का नाम था इस्माइल। करीम बख्श की शादी हो चुकी थी। उसकी बीवी का नाम था फातिमा। फातिमा बहुत नेक और मेहनती औरत थी। वह घर का सारा काम संभालती थी। खाना बनाती, कपड़े धोती, खेत में भी हाथ पटाती। करीम बख्श और फातिमा के दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। बेटे का नाम था अली और बेटी का नाम था आमना। इब्राहिम और इस्माइल अभी कुंवारे थे। दोनों भाई अपने बड़े भाई के साथ खेतों में काम करते थे। रहमान चाचा की बीवी का इंतकाल कई साल पहले हो चुका था। अब घर में फातिमा ही सबकी देखभाल करती थी। वह रहमान चाचा को भी अपने बाप की तरह इज्जत देती थी। रहमान चाचा के पास अपनी थोड़ी सी जमीन थी। बाकी जमीन पर वह नवाब साहब के लिए खेती करता था। हर साल फसल काटने के बाद उसे नवाब साहब को लगा देना पड़ता था। लगान की रकम बहुत ज्यादा होती थी। कभी-कभी तो पूरी फसल का आधा हिस्सा नवाब साहब ले लेते थे। एक साल ऐसा हुआ कि बारिश बहुत कम हुई। खेतों में पानी की कमी हो गई। फसल ठीक से नहीं उगी। जो फसल उगी भी वह बहुत कम थी। रहमान चाचा और उसके बेटों ने दिन रात मेहनत की। वह दूर से पानी लाकर खेतों में डालते लेकिन फिर भी फसल अच्छी नहीं हुई। जब फसल काटने का वक्त आया तो रहमान चाचा बहुत परेशान हो गया। उसे पता था कि इस साल की फसल से उसके परिवार के लिए ही काफी नहीं होगी। फिर नवाब साहब को लगान कहां से देगा? लेकिन करता भी क्या? उसने जो कुछ उगाया था उसे इकट्ठा किया और उसमें से आधा हिस्सा अलग रख दिया नवाब साहब के लिए। कुछ दिनों बाद नवाब साहब गांव आए। उनके साथ मियां जमील अहमद और दो-तीन पहरेदार थे। मियां जमील ने हर किसान के घर जाकर लगान वसूल करना शुरू किया। जब वह रहमान चाचा के घर पहुंचा तो रहमान चाचा ने जो अनाज उसके लिए रखा था वह उसके सामने रख दिया। मियां जमील ने अनाज को देखा और मुंह बनाते हुए बोला बस इतना ही यह तो बहुत कम है रहमान नवाब साहब नाराज हो जाएंगे। रहमान चाचा ने हाथ जोड़कर कहा मियान साहब इस साल बारिश बहुत कम हुई थी। फसल अच्छी नहीं हुई। मैंने जो कुछ उगाया उसका आधा हिस्सा यहां रखा है। इससे ज्यादा मेरे पास कुछ नहीं है। मियां जमील अहमद ने गुस्से से कहा, "यह सब बहाने हैं। तुम लोग चोरी करते हो, अनाज छुपा देते हो। नवाब साहब को पूरा लगान चाहिए। वरना तुम्हारी खैर नहीं।" रहमान चाचा की आंखों में आंसू आ गए। उसने फिर से विनती की। मियां साहब अल्लाह की कसम मेरे पास इससे ज्यादा कुछ नहीं है। अगर यह भी दे दूंगा तो मेरे बच्चे भूखे मर जाएंगे। लेकिन मियां जमील अहमद का दिल बहुत सख्त था। उसने रहमान चाचा की एक ना सुनी। उसने अपने साथ आए पहरेदारों को इशारा किया और बोला इसके घर में जाकर देखो जरूर कहीं अनाज छुपाया होगा। पहरेदार रहमान चाचा के छोटे से घर में घुस गए। उन्होंने हर कोने को खंगाला। बर्तन उलट-पुलट दिए। बोरे खोल कर देखे लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। घर में बस इतना ही अनाज था जो रहमान चाचा के परिवार के कुछ महीनों के लिए काफी था। जब पहरेदारों को कुछ नहीं मिला तो मियां जमील अहमद और भी गुस्सा हो गया। उसने रहमान चाचा से कहा तुमने कहीं और छुपाया होगा। लेकिन याद रखो अगले महीने तक पूरा लगान देना होगा। वरना नवाब साहब तुम्हारी जमीन छीन लेंगे और तुम्हें गांव से बाहर निकाल देंगे। यह कहकर मियां जमील अहमद वहां से चला गया। रहमान चाचा वहीं जमीन पर बैठकर रो पड़ा। उसकी बहू फातिमा भी रो रही थी। तीनों बेटे गुस्से से कांप रहे थे, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकते थे। उस रात रहमान चाचा के घर में किसी ने खाना नहीं खाया। सब परेशान थे कि अब क्या होगा। एक तरफ परिवार तीन की भूख थी और दूसरी तरफ नवाब साहब का डर। रहमान चाचा सारी रात सोच-सच कर परेशान होता रहा। अगली सुबह जब रहमान चाचा उठा तो उसने फैसला किया कि वह शहर जाकर नवाब साहब से खुद मिलेगा। शायद नवाब साहब उसकी बात सुनकर उस पर रहम कर दें। उसने अपने बड़े बेटे करीम बख्श से कहा कि वह उसके साथ चले। दोनों बाप बेटे पैदल ही शहर की तरफ निकल पड़े। नवाबगंज शहर गांव से पांच कोस दूर था। पैदल चलने में उन्हें तकरीबन दो-ती घंटे लग गए। जब वह शहर पहुंचे तो उन्होंने कुछ लोगों से पूछकर नवाब साहब की हवेली का पता लगाया। हवेली बहुत बड़ी और भव्य थी। ऊंची ऊंची दीवारें थी और बड़ा सा लोहे का गेट था। रहमान चाचा और करीम बख्श गेट के पास पहुंचे तो वहां एक पहरेदार खड़ा था। पहरेदार ने उन्हें रोकते हुए पूछा, "कौन हो तुम लोग? यहां क्यों आए हो? रहमान चाचा ने हाथ जोड़कर कहा, "हम फैजाबाद गांव से आए हैं। हम नवाब साहब से मिलना चाहते हैं।" पहरेदार ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। उनके फटे पुराने कपड़े और धूल मिट्टी से भरे पैर देखकर उसने तिरस्कार कहा। नवाब साहब तुम जैसे गंदे मैले लोगों से नहीं मिलते। भाग जाओ यहां से। रहमान चाचा ने फिर से विनती की। भाई साहब बहुत जरूरी काम है। बस दो मिनट के लिए मिल लें। मेरी पूरी जिंदगी का सवाल है। लेकिन पहरेदार ने उन्हें भगा दिया। रहमान चाचा और करीम बख्श निराश होकर गेट के पास ही बैठ गए। वह सोच रहे थे कि अब क्या करें? तभी हवेली के अंदर से एक बूढ़ा नौकर बाहर आया। वह नौकर बाजार से सामान लाने जा रहा था। उसका नाम था रहीम मियां। रहमान चाचा ने रहीम मियां को देखा तो उसे लगा कि शायद यह आदमी नेक दिल होगा। उसने रहीम मियां को रोका और हाथ जोड़कर कहा, चाचा मैं फैजाबाद गांव से आया हूं। मुझे नवाब साहब से बहुत जरूरी बात करनी है। क्या उपाय क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं? रहीम मियां ने रहमान चाचा की आंखों में दर्द देखा। उसे रहमान चाचा पर तरस आ गया। उसने पूछा क्या बात है भाई? तुम इतने परेशान क्यों हो? रहमान चाचा ने अपनी पूरी कहानी रहीम मियां को सुना दी। कैसे इस साल फसल खराब हुई? कैसे मियां जमील अहमद उससे ज्यादा लगान मांग रहा है और कैसे उसके परिवार के सामने भूखे मरने का खतरा है। रहीम मियां सब सुनकर बहुत दुखी हुआ। उसने रहमान चाचा से कहा भाई मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं। लेकिन नवाब साहब बहुत सख्त दिल इंसान है। वह किसी की नहीं सुनते। फिर भी मैं कोशिश करता हूं। तुम यहां बैठो। मैं अंदर जाकर देखता हूं। रहीम मियां अंदर चला गया। रहमान चाचा और करीम बख्श बाहर बैठकर इंतजार करने लगे। घंटे बीत गए लेकिन रहीम मियां वापस नहीं आया। धूप तेज हो गई थी। दोनों बाप बेटे प्यासे और थके हुए थे। लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि शायद नवाब साहब उन्हें बुला लें। दोपहर हो गई। तभी रहीम मियां फिर से बाहर आया। उसके चेहरे पर उदासी थी। उसने रहमान चाचा से कहा भाई मैंने बहुत कोशिश की लेकिन नवाब साहब ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर लगान नहीं दिया तो जमीन छीन लेंगे। उन्हें किसी की मजबूरी से कोई फर्क नहीं पड़ता। रहमान चाचा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने अपना सिर अपने हाथों में पकड़ लिया। करीम बख्श भी रो पड़ा। रहीम मियां ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और रहमान चाचा को देते हुए कहा, "भाई, यह थोड़े से पैसे हैं। मेरी तनख्वाह से बचे हैं। तुम इन्हें ले लो। शायद कुछ काम आ जाए। रहमान चाचा ने उस नेक दिल रहीम मियां का शुक्रिया अदा किया और वह पैसे लेकर अपने बेटे के साथ वापस गांव की तरफ चल पड़ा। रास्ते भर वह सोचता रहा कि अब क्या होगा? उसके दिल में गुस्सा भी था और बेबसी भी। वह सोच रहा था कि यह कैसा इंसाफ है कि एक आदमी इतना जालिम हो सकता है। जब वह गांव पहुंचे तो शाम हो चुकी थी। घर में फातिमा और छोटे बेटे इंतजार कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि रहमान चाचा खाली हाथ और उदास चेहरे के साथ लौटा है तो सब समझ गए कि कुछ नहीं हुआ। उस रात भी रहमान चाचा के घर में खामोशी छाई रही। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सब अपने-अपने सोचों में गुम थे। रहमान चाचा रात भर जागता रहा। वह सोच रहा था कि उसके पास अब दो ही रास्ते हैं। या तो वह अपने परिवार को भूखा रखे और नवाब साहब को लगान दे दे या फिर परिवार को खिलाए और नवाब साहब के गुस्से का सामना करें। रहमान चाचा को यह फैसला करना था कि वह किस रास्ते पर चलेगा। लेकिन दोनों ही रास्ते उसके लिए बहुत मुश्किल थे। एक तरफ अपने खून का प्यार था और दूसरी तरफ जालिम जमींदार का डर। इसी उधेड़बुन में रहमान चाचा की रात गुजर गई। सुबह जब उठा तो उसने एक फैसला किया। उसने सोचा कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन वह अपने बच्चों को भूखा नहीं रहने देगा। अगर नवाब साहब जमीन छीन भी लेते हैं तो वह मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल लेगा। लेकिन वह अपनी फसल नवाब साहब को नहीं देगा। रहमान चाचा ने अपने बेटों को बुलाया और उन्हें अपना फैसला सुनाया। तीनों बेटे अपने बाप के साथ खड़े थे। उन्होंने कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपने बाप का साथ देंगे। लेकिन रहमान चाचा नहीं जानता था कि उसके इस फैसले से आगे चलकर उसकी जिंदगी में क्या-क्या मुसीबतें आने वाली थी। नवाब इकबाल खान जैसे जालिम आदमी से टक्कर लेना आसान नहीं था और यह कहानी अभी शुरू ही हुई थी। एक महीना गुजर गया। रहमान चाचा ने अपने परिवार को खिलाया पिलाया। उसने अपनी फसल से अपने बच्चों का पेट भरा। लेकिन नवाब साहब को लगान नहीं दिया। हर रोज रहमान चाचा के दिल में एक खौफ रहता था कि ना जाने कब नवाब साहब के आदमी आ जाए। एक दिन सुबह-सुबह गांव में हलचल मच गई। किसी ने देखा कि नवाब साहब की बैलगाड़ी गांव की तरफ आ रही है। साथ में घोड़े पर सवार कई पहरेदार भी थे। सब समझ गए कि आज कुछ बड़ा होने वाला है। बैलगाड़ी सीधे रहमान चाचा के घर के सामने आकर रुकी। मियां जमील अहमद गाड़ी से उतरा। उसके पीछे चार पांच मोटे तगड़े पहरेदार भी उतरे। उनके हाथों में लाठियां थी। मियां जमील ने जोर से आवाज लगाई, रहमान बाहर निकल। रहमान चाचा घर के अंदर बैठा था। उसने आवाज सुनी तो उसका दिल बैठ गया। लेकिन वह हिम्मत करके बाहर आया। उसके तीनों बेटे भी उसके पीछे-पीछे आए। फातिमा घर के दरवाजे पर खड़ी होकर डर से देख रही थी। मियान जमील अहमद ने गुस्से से पूछा। रहमान एक महीना हो गया। लगान कहां है? नवाब साहब बहुत नाराज हैं। रहमान चाचा ने हाथ जोड़कर कहा, "मियां साहब, मेरे पास अभी कुछ नहीं है। अगले मौसम में फसल अच्छी होगी तो मैं दोगुना लगान दे दूंगा। फिलहाल मेरे बच्चों के खाने के लिए ही कुछ बचा है।" मियां जमील ने तमाचा जड़ते हुए कहा, नालायक, तूने नवाब साहब की बेइज्जती की है। तुझे सबक सिखाना पड़ेगा। उसने पहरेदारों को इशारा किया। इसे पकड़ो और मारो। दो पहरेदार आगे बढ़े और उन्होंने रहमान चाचा को पकड़ लिया। एक पहरेदार ने लाठी उठाई और रहमान चाचा की पीठ पर मारी। रहमान चाचा दर्द से चीख उठा। फिर दूसरी लाठी पड़ी। फिर तीसरी रहमान चाचा जमीन पर गिर गया। करीम बख्श यह देखकर बर्दाश्त नहीं कर सका। वह चीखा। अपने बाप को मत मारो और वह आगे बढ़ा। लेकिन दूसरे पहरेदारों ने उसे और उसके भाइयों को भी पकड़ लिया। उन्हें भी मारना शुरू कर दिया। फातिमा रोती हुई दौड़ी और मियां जमील के पैरों में गिर गई। मियां साहब रहम करो। हमारे पास सच में कुछ नहीं है। अल्लाह के वास्ते इन्हें मत मारो। लेकिन मियां जमील का दिल पत्थर की तरह सख्त था। उसने फातिमा को धक्का देकर गिरा दिया और बोला, चुप रहे औरत वरना तुझे भी मार पड़ेगी। गांव के लोग यह सब देख रहे थे। सब अपने घरों से बाहर आ गए थे। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह आगे बढ़े और रहमान चाचा को बचाएं। सब नवाब साहब के पहरेदारों से डरते थे। आखिर एक बूढ़ा आदमी आगे बढ़ा। उसका नाम था हाजी अब्दुल्लाह। वह गांव का सबसे बुजुर्ग आदमी था और सब उसकी इज्जत करते थे। हाजी साहब ने मियां जमील से कहा, "मियां जी, यह क्या जुल्म है? रहमान का कोई कसूर नहीं। इस साल फसल खराब हुई है। पूरे गांव को पता है। आप थोड़ा सब्र करें। अगले मौसम में वह लगान दे देगा। मियां जमील ने हाजी साहब की तरफ घूरते हुए कहा, हाजी साहब, आप बीच में मत पड़े। यह नवाब साहब का हुक्म है। जो लगान नहीं देगा, उसकी यही सजा है। हाजी साहब ने फिर कहा, लेकिन यह इंसाफ नहीं है। इस्लाम में भी कहा गया है कि मजबूर पर रहम करो। मियां जमील गुस्से में आ गया। हाजी साहब, अगर आप बीच में बोलते रहे तो आपको भी इसी की तरह सजा मिलेगी। चुपचाप अपने घर जाइए। हाजी साहब की आंखों में आंसू आ गए। वह बेबस होकर वहीं खड़े रह गए। उन्हें अपनी कमजोरी पर शर्म आई लेकिन वह कुछ कर नहीं सकते थे। पहरेदारों ने रहमान चाचा और उसके बेटों को इतना मारा कि वह सब जमीन पर पड़े करा रहे थे। उनके शरीर पर लाल नीले निशान पड़ गए थे। कपड़े फट गए थे। खून बह रहा था। मियां जमील ने फिर हुक्म दिया। अब इनके घर में जाओ और जो कुछ भी अनाज बचा है, सब निकाल लाओ। यह नवाब साहब का हक है। पहरेदार घर के अंदर घुस गए। उन्होंने वह सारा अनाज निकाला जो रहमान चाचा ने अपने परिवार के लिए बचा कर रखा था। गेहूं के बोरे, चावल की बोरियां, दालें सब कुछ बैलगाड़ी में लाद दिया गया। फातिमा रोती रही लेकिन कोई उसकी नहीं सुनी। जब सारा अनाज निकाल लिया गया तो मियां जमील ने रहमान चाचा से कहा, "यह तो बस शुरुआत है। अभी भी तुम पर काफी लगान बाकी है। अगले हफ्ते तक पूरा लगान चुकाना होगा। वरना नवाब साहब तुम्हारी जमीन छीन लेंगे और तुम्हें गांव से बाहर निकाल देंगे। समझे रहमान चाचा दर्द से करहते हुए बोला मियां साहब मेरे पास अब कुछ नहीं बचा आपने सब ले लिया मियां जमील ने ठंडी हंसी हंसते हुए कहा यह तुम्हारी फिक्र है कहीं से भी लाओ कर्जा लो चोरी करो भीख मांगो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता बस पूरा लगान चाहिए यह कहकर मियां जमील और पहरेदार बैलगाड़ी में बैठ गए और वहां से चले गए। रहमान चाचा और उसके बेटे जमीन पर पड़े थे। गांव के कुछ लोग आगे आए और उन्हें उठाकर घर के अंदर ले गए। हाजी अब्दुल्लाह ने अपनी बीवी से कहलवाया कि वह दवा दारू और पट्टियां लेकर आए। गांव की कुछ औरतें भी फातिमा की मदद के लिए आई। सब ने मिलकर रहमान चाचा और उसके बेटों के जख्मों पर मरहम लगाया और पट्टियां बांधी। रहमान चाचा का बड़ा बेटा करीम बख्श बहुत गुस्से में था। उसने कहा, अब्बू, यह जुल्म बर्दाश्त नहीं होगा। मैं नवाब साहब के पास जाऊंगा और उनसे इंसाफ मांगूंगा। रहमान चाचा ने कमजोर आवाज में कहा बेटा नवाब साहब से कोई इंसाफ नहीं मिलेगा वह खुद ही जालिम है। उसके दरबार में इंसाफ नहीं मिल सकता। इब्राहिम बोला तो फिर क्या करें अब्बू? हम चुपचाप इस जुल्म को सहते रहें। रहमान चाचा ने गहरी सांस ली। अल्लाह ही मालिक है बेटा। वही हमारी मदद करेगा। हमें सब्र रखना होगा। लेकिन इस्माइल सबसे छोटा बेटा चुप नहीं रह सका। अब्बू सब्र की भी एक हद होती है। हम रोज-रोज इस तरह मार नहीं खा सकते। हमारे घर में अब खाने को कुछ नहीं बचा। कल सुबह हम क्या खाएंगे? यह सच था। घर में अब एक दाने अनाज नहीं बचा था। फातिमा रसोई में गई और देखा तो वहां सिर्फ खाली बर्तन पड़े थे। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने सोचा कि अपने बच्चों को वो कल क्या खिलाएगी? छोटी बच्ची आमना और बेटा अली भूख से रो रहे थे। आमना ने अपनी अम्मी से पूछा अम्मी खाना कब मिलेगा? मुझे बहुत भूख लगी है। फातिमा ने बच्ची को गले से लगा लिया और रोने लगी। वह नहीं जानती थी कि अपने बच्चों को क्या जवाब दें। रात हुई पूरे घर में खामोशी छाई हुई थी। सब भूखे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा था। छोटे बच्चे रोते-रोते थक कर सो गए। रहमान चाचा दर्द से कराह रहा था। उसके शरीर पर हर जगह चोट के निशान थे। हाजी अब्दुल्लाह रात को फिर से आए। उनके हाथ में एक पोटली थी। उन्होंने फातिमा को वह पोटली दी और कहा, बेटी इसमें थोड़ा सा आटा और दाल है। अपने बच्चों को खिला देना। कल मैं और सामान भेज दूंगा। फातिमा ने हाजी साहब के पैर पकड़ लिए। अल्लाह आपको जज्जा खैर दे। हाजी साहब। आप हमारे लिए फरिश्ते की तरह हैं। हाजी साहब की आंखों में भी आंसू आ गए। बेटी यह तो मेरा फर्ज है। हम सब एक ही उम्मत के लोग हैं। एक दूसरे की मदद करना हमारा धर्म है। अगले कुछ दिनों में गांव के कई लोग रहमान चाचा के घर आए। किसी ने थोड़ा आटा दिया, किसी ने दाल दी, किसी ने सब्जियां दी। सबको रहमान चाचा पर तरस आ रहा था। लेकिन सबके पास खुद भी बहुत कम था। उन्होंने जो कुछ दिया वह बहुत कम था। एक हफ्ता बीत गया। रहमान चाचा के जख्म भरने लगे थे। लेकिन अब एक और बड़ी मुसीबत सामने थी। मियां जमील ने कहा था कि एक हफ्ते में पूरा लगान चुकाना होगा। लेकिन रहमान चाचा के पास एक पैसा नहीं था। करीम बख्श ने कहा अब्बू मैं शहर जाऊंगा और वहां मजदूरी करूंगा। शायद कुछ पैसे कमा लूं। इब्राहिम बोला मैं भी साथ चलूंगा। हम दोनों मिलकर कुछ ना कुछ कमा लेंगे। रहमान चाचा ने कहा बेटो शहर में काम मिलना आसान नहीं है और अगर मिल भी गया तो इतनी जल्दी इतने पैसे नहीं कमा सकते कि लगान चुका सके। इस्माइल ने कहा तो फिर क्या करें अब्बू? क्या हम बस यहां बैठे और नवाब साहब हमारी जमीन छीन लें। रहमान चाचा के पास कोई जवाब नहीं था। वह बस चुपचाप बैठा रहा। उसके दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। क्या वह कहीं से कर्जा ले लेकिन किससे? गांव में सबके पास कम था। और अगर कर्जा मिल भी गया तो उसे चुकाएगा कैसे? उस रात रहमान चाचा ने बहुत देर तक नमाज पढ़ी। उसने अल्लाह से दुआ मांगी कि वह उसे कोई रास्ता दिखाए। वह अल्लाह से इंसाफ मांग रहा था। वह कह रहा था कि या अल्लाह तूने ही कहा है कि जालिमों को सजा मिलेगी। नवाब इकबाल खान जैसे जालिमों को कब तक छूट मिलती रहेगी? अगली सुबह जब रहमान चाचा उठा तो उसने एक फैसला किया। उसने अपने बेटों से कहा, बेटों, मैं एक काम करता हूं। मैं काजी साहब के पास जाऊंगा। वह शहर में रहते हैं और बहुत इज्जतदार आदमी हैं। शायद वह नवाब साहब से बात करके हमें इंसाफ दिला सकें। करीम बख्श ने कहा अब्बू मैं भी साथ चलूंगा। रहमान चाचा ने मना कर दिया। नहीं बेटा तुम घर पर रहो परिवार की देखभाल करो। मैं अकेला जाऊंगा। रहमान चाचा ने थोड़ा पानी पिया और फिर शहर की तरफ निकल पड़ा। उसके शरीर पर अभी भी चोटों के निशान थे। चलने में दर्द हो रहा था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। शहर पहुंचकर उसने काजी साहब का घर तलाश किया। काजी साहब का नाम था मौलाना हाफिज अहमद। वह बहुत नेक और इंसाफ पसंद आदमी थे। उनकी दाढ़ी लंबी और सफेद थी। वह हमेशा सफेद कुर्ता पायजामा पहनते थे। रहमान चाचा ने काजी साहब के घर का दरवाजा खटखटाया। एक नौकर ने दरवाजा खोला। रहमान चाचा ने कहा, "मुझे काजी साहब से मिलना है। बहुत जरूरी काम है।" नौकर ने अंदर जाकर काजी साहब को इत्तला दी। काजी साहब बाहर आए। उन्होंने रहमान चाचा को देखा तो पूछा क्या बात है भाई तुम बहुत परेशान लग रहे हो रहमान चाचा ने आंसू भरी आंखों से अपनी पूरी कहानी सुनाई कैसे नवाब इकबाल खान उस पर जुल्म कर रहा है कैसे मियां जमील अहमद ने उसे और उसके बेटों को मारा कैसे उसके घर से सारा अनाज छीन लिया गया और कैसे अब उसकी जमीन छीनने की धमकी दी जा रही है काजी साहब ने सब सुना तो उनका दिल पिघल गया उन्होंने कहा बेटा यह तो बहुत बड़ा जुल्म है नवाब साहब आपको यह करने का कोई हक नहीं। इस्लाम में इस तरह के जुल्म की कोई इजाजत नहीं है। रहमान चाचा ने हाथ जोड़कर कहा, हुजूर, मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि आप नवाब साहब से बात करें। शायद आपकी बात वह सुन ले। आप इस शहर के सबसे इज्जतदार आलिम हैं। काजी साहब ने गहरी सांस ली। बेटा मैं कोशिश करूंगा। लेकिन सच बताऊं तो नवाब इकबाल खान बहुत सख्त दिल इंसान है। उसे दीन धर्म की कोई परवाह नहीं। वह सिर्फ अपने फायदे की सोचता है। फिर भी मैं तुम्हारे लिए उससे बात करूंगा। रहमान चाचा के दिल में थोड़ी उम्मीद जगी। उसने काजी साहब का शुक्रिया अदा किया और वहां से चला गया। काजी साहब ने उसी दिन नवाब इकबाल खान की हवेली का रुख किया। जब वह हवेली पहुंचे तो पहरेदार ने उन्हें तुरंत अंदर जाने दिया। काजी साहब की इतनी इज्जत थी कि नवाब साहब भी उन्हें मना नहीं कर सकते थे। नवाब इकबाल खान अपने दीवानखाने में बैठा हुक्का पी रहा था। जब काजी साहब अंदर आए तो नवाब साहब उठ खड़ा हुआ। आइए काजी साहब बैठिए। आपके आने से मेरी हवेली रोशन हो गई। काजी साहब बैठ गए। उन्होंने सीधे बात पर आते हुए कहा नवाब साहब मैं आपसे एक अहम बात करने आया हूं। फैजाबाद गांव में रहमान नाम का एक किसान है। सुना है कि आप उस पर बहुत जुल्म कर रहे हैं। नवाब साहब का चेहरा सख्त हो गया। काजी साहब, यह जुल्म नहीं है। वह मेरा लगान नहीं दे रहा। मुझे अपना हक लेने का पूरा अधिकार है। काजी साहब ने कहा, नवाब साहब, इस साल फसल खराब हुई है। वह गरीब आदमी है। उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है। आपने उसके घर से सारा अनाज छीन लिया। अब उसके बच्चे भूखे मर रहे हैं। क्या यह इंसाफ है? नवाब साहब ने ठंडे लहजे में कहा। काजी साहब, यह दुनिया का तरीका है। जो ताकतवर होता है, वही जीतता है। कमजोर को दबना पड़ता है। काजी साहब गुस्से में आ गए। नवाब साहब यह दुनिया का नहीं शैतान का तरीका है। इस्लाम हमें सिखाता है कि कमजोरों पर रहम करो। गरीबों की मदद करो। आप एक मुसलमान हैं। क्या आपको अल्लाह का डर नहीं? नवाब साहब की आंखों में गुस्सा चमका। लेकिन वह काजी साहब का बहुत अदब करता था। इसलिए उसने अपने गुस्से को दबाया और कहा, काजी साहब, मैं अल्लाह से डरता हूं। लेकिन मुझे अपना कारोबार भी चलाना है। अगर मैं एक किसान को माफ कर दूं, तो बाकी सब भी यही करने लगेंगे। फिर मेरा लगान कौन देगा? काजी साहब ने फिर कहा, नवाब साहब, आप बहुत अमीर हैं। आपके पास इतना माल है कि सात पुश्तें आराम से गुजर जाए। एक गरीब किसान को माफ करने से आपका क्या बिगड़ जाएगा? नवाब साहब चुप रहा। काजी साहब ने फिर कहा, "याद रखिए नवाब साहब, एक दिन हम सबको अल्लाह के सामने जवाब देना होगा। उस दिन ना आपकी दौलत काम आएगी, ना आपकी ताकत। सिर्फ आपके इन अच्छे और बुरे काम ही काम आएंगे। नवाब साहब को काजी साहब की बातें अच्छी नहीं लग रही थी लेकिन वह सीधे मना भी नहीं कर सकता था। उसने कहा काजी साहब मैं आपकी बात का अदब करता हूं लेकिन मैं बुआ ही अभी कुछ नहीं कह सकता। मुझे सोचने का वक्त चाहिए। काजी साहब समझ गए कि नवाब साहब मानने वाला नहीं है। उन्होंने एक आखिरी कोशिश की। नवाब साहब कम से कम इतना कर दीजिए कि उस गरीब किसान को थोड़ा वक्त दे दीजिए। उसे अपनी जमीन से मत निकालिए। नवाब साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, ठीक है काजी साहब आपकी खातिर मैं उसे थोड़ा और वक्त दे दूंगा लेकिन लगान तो उसे देना ही पड़ेगा। काजी साहब जानते थे कि यह सिर्फ एक खोखला वादा था। नवाब साहब ने सिर्फ उन्हें खुश करने के लिए ऐसा कहा था। लेकिन वह और कुछ नहीं कर सकते थे। वह उठे और नवाब साहब को सलाम करके चले गए। जब काजी साहब हवेली से निकले तो उनके दिल में बहुत दुख था। वह सोच रहे थे कि कैसे एक इंसान इतना बेरहम हो सकता है। वह रहमान चाचा को तलाश करने लगे लेकिन वह मिला नहीं। रहमान चाचा गांव वापस चला गया था। अगले दिन फिर से मियां जमील अहमद गांव पहुंचा। इस बार उसके साथ और भी ज्यादा पहरेदार थे। गांव के लोगों को देखकर ही समझ आ गया कि आज कुछ बहुत बुरा होने वाला है। मियां जमील सीधे रहमान चाचा के घर गया। उसने जोर से दरवाजा पीटा और चिल्लाया। रहमान बाहर निकल। रहमान चाचा बाहर आया। उसके चेहरे पर थकान और मायूसी साफ दिख रही थी। मियां जमील ने पूछा तो लगान तैयार है? रहमान चाचा ने कांपती आवाज में कहा। मियां साहब मेरे पास अभी भी कुछ नहीं है। मैं काजी साहब से मिलकर आया हूं। उन्होंने कहा कि वह नवाब साहब से बात करेंगे। मियां जमील ने बीच में ही टोकते हुए कहा। काजी साहब से मिले? बहुत अच्छा। लेकिन काजी साहब तुम्हें पैसे तो नहीं दे सकते ना। उसने ठहाका लगाया। उसके पीछे खड़े पहरेदार भी हंसने लगे। मियान जमील की हंसी बंद हुई तो उसने गंभीर होकर कहा, सुनो रहमान नवाब साहब ने हुक्म दिया है। तुम्हारी जमीन अब नवाब साहब की है और तुम्हें इस घर से भी निकलना होगा। यह घर भी नवाब साहब की जमीन पर बना है। रहमान चाचा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने विनती की। मियां साहब, यह ना करें। यह घर मेरे बाप दादा का है। मैं यहां पैदा हुआ हूं। मेरे बच्चे यहां पैदा हुए हैं। हमें यहां से मत निकालिए। लेकिन मियां जमील का दिल पत्थर की तरह सख्त था। उसने पहरेदारों को हुक्म दिया इन लोगों को घर से बाहर निकालो और सारा सामान भी बाहर फेंक दो। पहरेदार घर में घुस गए। उन्होंने फातिमा और बच्चों को बाहर धक्का दे दिया। फिर घर के सारे सामान को बाहर फेंकना शुरू कर दिया। पुराने बर्तन, फटे पुराने कपड़े, टूटी घाट सब कुछ बाहर आ गया। फातिमा रो रही थी। बच्चे डर से चीख रहे थे। करीम बख्श और उसके भाई गुस्से से कांप रहे थे लेकिन वह कुछ नहीं कर सकते थे। पहरेदारों के पास लाठियां और तलवारें थी। आखिर में मियां जमील ने कहा, अब तुम लोगों को शाम तक गांव छोड़ना होगा। अगर शाम तक तुम यहां दिखे तो तुम्हें जेल में डाल दिया जाएगा। समझे? रहमान चाचा रोने लगा। उसके तीनों बेटे भी रो रहे थे। पूरा गांव यह देख रहा था। हाजी अब्दुल्लाह और कुछ दूसरे बुजुर्ग लोग आगे आए। हाजी साहब ने मियां जमील से कहा, "मियां जी, यह बहुत बड़ा जुल्म है। इन बेचारों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। कम से कम इन्हें कुछ दिन की मोहलत तो दे दीजिए। मियां जमील ने गुस्से से कहा, हाजी साहब, आप फिर बीच में मत पड़िए। यह नवाब साहब का हुक्म है। और नवाब साहब के हुक्म के खिलाफ कोई नहीं जा सकता। हाजी साहब ने फिर कहा, लेकिन अल्लाह के हुक्म के खिलाफ तो आप जा रहे हैं। अल्लाह ने कहा है कि मजबूरों पर रहम करो। क्या आप अल्लाह से नहीं डरते? मियां जमील छिड़ गया। हाजी साहब मुझे अल्लाह के बारे में मत सिखाइए। मैं पांचों वक्त की नमाज पढ़ता हूं। रोजे रखता हूं। लेकिन दुनियादारी अलग चीज है। अब आप चुपचाप अपने घर जाइए वरना आपको भी इसी की तरह सबक सिखाना पड़ेगा। हाजी साहब की आंखों में आंसू आ गए। वह बेबस होकर वहीं खड़े रह गए। मियां जमील और पहरेदार वहां से चले गए। रहमान चाचा और उसका परिवार सड़क पर बैठा रो रहा था। उनके चारों तरफ उनका सारा सामान बिखरा पड़ा था। गांव के कुछ लोग आगे आए। उन्होंने रहमान चाचा को हिम्मत दिलाई। एक आदमी ने कहा, रहमान भाई, तुम लोग मेरे घर चलो। मेरे पास एक छोटा सा कमरा खाली है। तुम वहां रह सकते हो। उस आदमी का नाम था यूसुफ अली। वह भी एक गरीब किसान था। उसके पास खुद बहुत कम था। लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। रहमान चाचा ने यूसुफ अली का शुक्रिया अदा किया। अल्लाह तुम्हें जज जा भाई। तुमने हमारी बहुत बड़ी मदद की। यूसुफ अली ने कहा भाई यह तो मेरा फर्ज था। हम सब एक हैं। एक दूसरे की मदद करना हमारा धर्म है। रहमान चाचा के बेटों ने अपना सामान उठाया और वह सब यूसुफ अली के घर की तरफ चल पड़े। यूसुफ अली का घर बहुत छोटा था। उसमें सिर्फ दो कमरे थे। एक कमरा यूसुफ अली और उसके परिवार का था। दूसरा कमरा एक छोटा सा स्टोर रूम था जिसमें कुछ सामान रखा हुआ था। यूसुफ अली ने वह कमरा खाली करवाया और रहमान चाचा के परिवार को वहां रहने के लिए दे दिया। कमरा बहुत छोटा था। सात लोगों के लिए काफी तंग था लेकिन कम से कम उनके सिर पर छत तो थी। उस रात रहमान चाचा के परिवार ने बहुत मुश्किल से वक्त गुजारा। कमरे में इतनी जगह नहीं थी कि सब ठीक से लेट सके। कोई बैठा रहा, कोई अधलेटा बच्चे रोते रहे। अगली सुबह करीम बख्श ने कहा, "अब्बू, अब हमें कुछ करना होगा। हम यहां इस तरह नहीं रह सकते। मैं शहर जाऊंगा और वहां काम ढूंढूंगा। रहमान चाचा ने कहा, बेटा तुम शहर में अकेले क्या करोगे? वहां काम मिलना बहुत मुश्किल है। इब्राहिम ने कहा अब्बू मैं भी भाई के साथ जाऊंगा। हम दोनों मिलकर कुछ ना कुछ काम ढूंढ लेंगे। इस्माइल भी बोला यहां गांव में मजदूरी करूंगा। कुछ ना कुछ तो कमाऊंगा। रहमान चाचा की आंखों में आंसू आ गए। उसने अपने बेटों को देखा। उसे अपने बेटों पर गर्व हुआ। मुसीबत में भी वह हिम्मत नहीं हार रहे थे। उसने कहा, ठीक है बेटों, अल्लाह तुम्हारा साथ दे। करीम और इब्राहिम, तुम दोनों शहर जाओ, लेकिन खबरदार अगर कोई गलत काम किया, हमेशा हलाल की कमाई करना। चाहे भूखे मरना पड़े लेकिन हराम का एक पैसा भी मत छूना। दोनों भाइयों ने अपने अब्बू को वादा किया। उसी दिन वह शहर की तरफ निकल पड़े। उनके पास कुछ नहीं था। ना पैसे, ना खाना, ना कपड़े। बस एक जज्बा था कि अपने परिवार की मदद करनी है। शहर में उन्होंने कई जगह काम ढूंढा लेकिन कहीं काम नहीं मिला। दो-तीन दिन तक वह भूखे प्यासे भटकते रहे। रात को किसी मस्जिद के बाहर या किसी दुकान के सामने सो जाते। आखिर चौथे दिन उन्हें एक ठेले वाले के पास काम मिल गया। वह ठेला वाला फल बेचता था। उसका नाम था शेख हसन। उसने करीम और इब्राहिम को अपने साथ काम पर रख लिया। काम यह था कि वह सुबह-सुबह बाजार से फल लाते। फिर उसे ठेले पर सजाते और शेख हसन के साथ फल बेचते। मेहनत बहुत थी लेकिन पैसे बहुत कम मिलते थे। दोनों भाइयों को मिलाकर दिन के सिर्फ ₹2 मिलते थे। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वह दिन रात मेहनत करते और जो पैसे बचते उसे बचा कर रखते ताकि अपने परिवार को भेज सकें। इधर गांव में इस्माइल भी मजदूरी करने लगा। वह खेतों में काम करता। कभी किसी के खेत में हल चलाता, कभी किसी के यहां फसल काटता। उसे भी बहुत कम पैसे मिलते थे। लेकिन कुछ तो मिलता था। रहमान चाचा अब बूढ़ा हो चुका था और उसके शरीर पर चोटों के निशान अभी भी थे। वह ज्यादा मेहनत का काम नहीं कर सकता था। लेकिन वह छोटे-मोटे काम करता रहता। किसी की मदद करता किसी के लिए सामान उठाता। जो भी कुछ मिल जाता उससे परिवार चलाने की कोशिश करता। फातिमा दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा करने लगी। वह सुबह से शाम तक काम करती। उसके हाथों में छाले पड़ गए। पीठ दर्द करने लगी। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। छोटे बच्चे अली और आमना अक्सर भूखे रहते। कभी-कभी दिन में सिर्फ एक बार खाना मिलता। वह रोते भी थे, लेकिन उन्हें समझ आने लगा था कि घर की हालत अच्छी नहीं है। ऐसे ही दो-ती महीने गुजर गए। रहमान चाचा का परिवार किसी तरह जिंदा था। लेकिन हर रोज संघर्ष करना पड़ता था। हर रोज भूख से लड़ना पड़ता था। हर रोज अपनी इज्जत को बचाना पड़ता था। एक दिन यूसुफ अली ने रहमान चाचा से कहा भाई मुझे बहुत अफसोस है लेकिन मेरी हालत भी अच्छी नहीं है। मुझे भी अपने परिवार का पेट पालना है। तुम लोग कितने दिनों तक यहां रहोगे? रहमान चाचा समझ गया। यूसुफ अली को भी तकलीफ हो रही थी। सात लोगों का बोझ उठाना आसान नहीं था। उसने कहा भाई मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगा। तुमने बहुत मदद की। अब हम कोई दूसरी जगह ढूंढ लेंगे। लेकिन जगह ढूंढना आसान नहीं था। गांव में कोई भी उन्हें जगह नहीं दे रहा था। सबको नवाब साहब का डर था। अगर किसी ने रहमान चाचा को पनाह दी तो नवाब साहब नाराज हो जाएगा। आखिर हाजी अब्दुल्लाह ने फिर से मदद की। उन्होंने कहा रहमान भाई तुम लोग मेरे यहां आ जाओ। मेरे पास एक पुरानी झोपड़ी है जो गांव के बाहर है। वह काफी वक्त से खाली पड़ी है। तुम उसमें रह सकते हो। रहमान चाचा हाजी साहब के पैरों में गिर पड़ा। हाजी साहब अल्लाह आपको जन्नत नसीब करे। आप हमारे लिए फरिश्ते की तरह हैं। हाजी साहब ने रहमान चाचा को उठाया। उठो भाई यह सब अल्लाह की मर्जी है। वही हर किसी को उसका हिस्सा देता है। मैं तो बस उसका वसीला बना हूं। रहमान चाचा का परिवार उस झोपड़ी में रहने चला गया। झोपड़ी बहुत पुरानी थी। दीवारें टूटी हुई थी। छत में से बारिश का पानी टपकता था। लेकिन कम से कम वह उनका अपना ठिकाना था। किसी का एहसान नहीं था। रहमान चाचा ने अपने बेटों के साथ मिलकर झोपड़ी की मरम्मत की। दीवारों को पांटा, छत को ठीक किया। धीरे-धीरे झोपड़ी रहने लायक हो गई। लेकिन अब भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ था। खाने की दिक्कत थी। कपों की दिक्कत थी। हर चीज की दिक्कत थी। लेकिन रहमान चाचा और उसके बेटों ने हिम्मत नहीं हारी। वह जानते थे कि एक दिन जरूर उनके दिन बदलेंगे। रहमान चाचा हर रोज नमाज पढ़ता और अल्लाह से दुआ मांगता। या अल्लाह तूने हमें इतनी मुसीबत में डाला है। लेकिन मैं तुझ पर भरोसा रखता हूं। मुझे यकीन है कि एक दिन तू हमें इंसाफ दिलाएगा। नवाब इकबाल खान जैसे जालिमों को सजा जरूर मिलेगी। बस मुझे और मेरे परिवार को हिम्मत दे कि हम इस मुसीबत का सामना कर सकें। और फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने रहमान चाचा की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। लेकिन वह कहानी अभी आगे बाकी है। कई महीने गुजर चुके थे। रहमान चाचा और उसका परिवार अपनी झोपड़ी में किसी तरह गुजारा कर रहे थे। करीम बख्श और इब्राहिम अब भी शहर में मेहनत मजदूरी कर रहे थे। धीरे-धीरे उनकी कमाई थोड़ी बढ़ गई थी। अब उन्हें दिन के तीन मिलने लगे थे। वह हर हफ्ते कुछ पैसे अपने घर भेज देते थे। इस्माय भी गांव में काम कर रहा था। फातिमा अब भी लोगों के घरों में काम करती थी। रहमान चाचा छोटे-मोटे काम करके जो कुछ कमा पाता वह करता था। हालत बहुत बुरी थी लेकिन वह सब जिंदा थे और हिम्मत नहीं हारी थी। एक दिन की बात है नवाबगंज शहर में एक बड़ा हादसा हुआ। शहर के एक बड़े सौदागर का घर रात को आग लग गई। आग इतनी भयानक थी कि पूरा घर झलकर राख हो गया। उस घर में सौदागर की बीवी और दो छोटे बच्चे भी थे। वह सब आग में फंस गए थे। करीम बख्श और इब्राहिम उस वक्त पास में ही थे। उन्होंने जब आग देखी तो वह भागकर वहां पहुंचे। बाकी लोग दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे। सब डर से कांप रहे थे। कोई अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था। लेकिन करीम बख्श और इब्राहिम ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। उन्होंने अपने कपड़े पानी में भिगोए और सिर पर डाल लिए। फिर दोनों भाई आग में कूद पड़े। अंदर धुआं और आग का तांडव मचा हुआ था। सांस लेना मुश्किल हो रहा था। लेकिन दोनों भाइयों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सौदागर की बीवी और दोनों बच्चों को ढूंढा। बच्चे एक कमरे में रो रहे थे। उनकी अम्मी बेहोश पड़ी थी। करीम बख्श ने बीवी को उठाया और इब्राहिम ने दोनों बच्चों को। फिर वह दोनों तेजी से बाहर की तरफ भागे। आग की लपटें उनके शरीर को झुलसा रही थी। धुआं उनका दम घोट रहा था। लेकिन वह रुके नहीं। आखिर वह तीनों को सुरक्षित बाहर निकाल लाए। बाहर खड़े लोगों ने तालियां बजाई। सब उन दोनों भाइयों की बहादुरी की तारीफ कर रहे थे। सौदागर साहब उस वक्त बाहर गए हुए थे। जब उन्हें खबर मिली कि उनके घर में आग लगी है तो वह दौड़े-दौड़े वापस आए। जब उन्होंने देखा कि उनकी बीवी और बच्चे सुरक्षित हैं तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने पूछा किसने मेरे परिवार को बचाया? लोगों ने करीम बख्श और इब्राहिम की तरफ इशारा किया। सौदागर साहब उन दोनों के पास गए। उन्होंने देखा कि दोनों भाइयों के हाथों और चेहरे पर जलने के निशान थे। उनके कपड़े अ जल गए थे। सौदागर साहब ने दोनों भाइयों को गले से लगा लिया। मेरे बेटों तुमने मेरी पूरी दुनिया बचा ली। मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा। बताओ मैं तुम्हें क्या इनाम दूं? करीम बख्श ने विनम्रता से कहा, साहब, हमने कोई इनाम के लिए यह नहीं किया। यह तो हमारा फर्ज था। जब किसी की जान खतरे में हो, तो उसे बचाना हर इंसान का फर्ज है। सौदागर साहब और भी प्रभावित हुए। तुम बहुत नेक दिल लड़के हो। अपना परिचय तो दो। तुम्हारे अब्बू अम्मी कौन है? कहां रहते हो? करीम बख्श ने अपना पूरा परिचय दिया। उसने अपने अब्बू रहमान चाचा के बारे में बताया। नवाब इकबाल खान के जुल्म के बारे में बताया। कैसे उन्हें अपनी जमीन और घर से बेदखल किया गया। कैसे अब वह एक टूटी फूटी झोपड़ी में रहते हैं। सौदागर साहब ने सब कुछ ध्यान से सुना। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा बेटे तुम्हारे साथ बहुत बड़ा जुल्म हुआ है। लेकिन अल्लाह ने तुम्हारी नेकी देखी। आज उसी नेकी की वजह से मेरा परिवार बच गया। सौदागर साहब का नाम था हाजी अब्दुल करीम अंसारी। वह शहर के सबसे बड़े और इज्जतदार सौदागरों में से एक थे। उनका कारोबार कपड़े का था। उनके पास बड़ी-बड़ी दुकानें थी और गोदाम थे। वह बहुत अमीर थे, लेकिन उनका दिल बहुत साफ और नेक था। हाजी अंसारी ने कहा बेटो अब से तुम मेरे साथ काम करोगे मैं तुम्हें अपनी दुकान में रखूंगा और तुम्हारे अब्बू को भी मैं कुछ काम दूंगा तुम्हारे परिवार को अब किसी चीज की कमी नहीं होगी करीम बख्श और इब्राहिम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा उन्होंने हाजी अंसारी के पैर छू लिए साहब अल्लाह आपको जज्जा दे आप हमारे लिए फरिश्ते की तरह हैं। हाजी अंसारी ने दोनों भाइयों को अपने घर ले जाकर उनके जख्मों का इलाज करवाया। उन्हें नए कपड़े दिए। अच्छा खाना खिलाया। फिर उन्हें अपनी दुकान में काम पर रख लिया। करीम बख्श और इब्राहिम अब हाजी अंसारी की कपड़े की दुकान में काम करने लगे। उन्हें पहले से बहुत ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी। दोनों भाइयों को मिलाकर ₹50 महीना मिलता था। यह उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी। दोनों भाइयों ने अपने अब्बू को खत लिखा और सारी बात बताई। जब रहमान चाचा को यह खत मिला, तो उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया। यान अल्लाह तूने हमारी सुन ली। मैं जानता था कि तू अपने बंदों को कभी मायूस नहीं करता। कुछ ही दिनों में हाजी अंसारी खुद फैजाबाद गांव आए। वह अपने साथ दो बैलगाड़ियां लेकर आए जो सामान से भरी हुई थी। उन्होंने रहमान चाचा की झोपड़ी का पता पूछा और वहां पहुंचे। जब रहमान चाचा ने हाजी अंसारी को देखा तो वह चौंक गए। हाजी अंसारी ने रहमान चाचा को गले लगाया। भाई तुम्हारे बेटों ने मेरे परिवार की जान बचाई। मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भुला सकता। रहमान चाचा ने कहा, "साह, यह तो मेरे बेटों का फर्ज था। आप इसे एहसान मत समझिए।" हाजी अंसारी ने कहा, नहीं भाई, यह बहुत बड़ा एहसान है और मैं चाहता हूं कि इस एहसान का बदला चुकाऊं। फिर हाजी अंसारी ने अपने नौकरों को इशारा किया। नौकर बैलगाड़ियों से सामान उतारने लगे। उसमें अनाज के लिए अनाज के बोरे थे, कपड़े थे, बर्तन थे और बहुत सारी जरूरी चीजें थी। रहमान चाचा और उसका परिवार यह देखकर हैरान रह गया। फातिमा रो पड़ी। छोटे बच्चे खुशी से उछलने लगे। इस्माइल की आंखों में भी आंसू आ गए। हाजी अंसारी ने कहा, "यह तो बस शुरुआत है भाई। मैं तुम्हारे लिए एक पक्का मकान बनवाऊंगा और तुम्हारे लिए कुछ जमीन भी खरीदूंगा ताकि तुम फिर से खेती कर सको।" रहमान चाचा ने हाथ जोड़कर कहा, साहब, आप बहुत मेहरबानी कर रहे हैं लेकिन मैं इतना बड़ा एहसान नहीं ले सकता। हाजी अंसारी ने मुस्कुराते हुए कहा, भाई, यह एहसान नहीं है। तुम्हारे बेटों ने मेरे बच्चों की जान बचाई। उनकी कीमत क्या है? कितने पैसे, कितनी जमीन उनके बराबर हो सकती है? जो मैं कर रहा हूं, वह तो कुछ भी नहीं है। रहमान चाचा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया। हाजी अंसारी ने अपना वादा पूरा किया। उन्होंने रहमान चाचा के लिए एक पक्का मकान बनवाया। चार कमरों का अच्छा घर। आंगन भी था और एक छोटा सा बगीचा भी। घर में सारा सामान भी रखवा दिया। खाट, बर्तन, कपड़े सब कुछ। फिर उन्होंने पांच बीघा जमीन खरीदी और रहमान चाचा के नाम करवा दी। साथ में खेती के लिए बैल भी दिलवाए और बीज और खाद का इंतजाम भी किया। रहमान चाचा का परिवार अब एक नई जिंदगी शुरू कर रहा था। करीम बख्श और इब्राहिम शहर में हाजी अंसारी की दुकान में काम कर रहे थे। इस्माइल और रहमान चाचा खेती कर रहे थे। फातिमा अब घर में आराम से रहती थी। उसे अब दूसरों के घरों में काम करने की जरूरत नहीं थी। बच्चे अली और आमना अब अच्छे कपड़े पहनते थे। पेट भरकर खाना खाते थे। वह खुश थे। गांव के लोग भी रहमान चाचा की किस्मत देखकर हैरान थे। सब कहते थे कि अल्लाह ने रहमान चाचा पर रहम किया है। लेकिन एक आदमी था जो यह सब देखकर बहुत चल रहा था। और वह था मियां जमील अहमद। जब उसे पता चला कि रहमान चाचा के हालात अच्छे हो गए हैं तो उसे बहुत गुस्सा आया। उसने नवाब इकबाल खान को सारी बात बताई। नवाब साहब को भी यह बात अच्छी नहीं लगी। वह नहीं चाहता था कि रहमान चाचा फिर से खड़ा हो जाए। उसने मियां जमील से कहा। यह रहमान बहुत चालाक निकला। किसी तरह उसने एक अमीर आदमी को फंसा लिया। लेकिन मैं उसे यूं आराम से नहीं रहने दूंगा। मियां जमील ने कहा हुजूर हम कुछ कर सकते हैं। हम उसकी नई जमीन पर भी अपना हक जता सकते हैं। नवाब साहब ने सोचा फिर बोला नहीं अभी नहीं। अभी वह हाजी अंसारी की पनाह में है। हाजी अंसारी बहुत ताकतवर आदमी है। उससे पंगा लेना ठीक नहीं। अभी हम इंतजार करते हैं। देखते हैं कि आगे क्या होता है। इधर रहमान चाचा अपनी नई जिंदगी में खुश था। लेकिन वह नवाब साहब को नहीं भूला था। उसके दिल में अभी भी नवाब साहब के खिलाफ गुस्सा था। वह सोचता था कि एक दिन जरूर उसे इंसाफ मिलेगा। एक दिन हाजी अंसारी फिर से गांव आए। वह रहमान चाचा से मिलने आए थे। दोनों बैठकर बातें कर रहे थे। रहमान चाचा ने हाजी साहब से कहा, साहब इहऊ आपने मुझ पर बहुत एहसान किया है। मेरे पास इसका बदला चुकाने के लिए कुछ नहीं है। बस अल्लाह से दुआ करता हूं कि वह आपको खुश रखें। हाजी अंसारी ने कहा भाई मैंने पहले भी कहा है यह कोई एहसान नहीं है। तुम्हारे बेटों ने मेरे परिवार की जान बचाई। मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वह तो बस एक छोटी सी शुक्रगुजारी है। फिर हाजी अंसारी ने पूछा भाई तुम्हें नवाब इकबाल खान से कोई और परेशानी तो नहीं हो रही? रहमान चाचा ने कहा नहीं साहब अभी तक तो कुछ नहीं हुआ लेकिन मुझे डर लगता है। नवाब साहब बहुत जालिम आदमी हैं। फिर से कोई मुसीबत खड़ी कर दें। हाजी अंसारी ने हिम्मत बंधाते हुए कहा घबराओ मत भाई अब तुम अकेले नहीं हूं। मैं तुम्हारे साथ हूं। अगर नवाब साहब ने तुम्हें परेशान करने की कोशिश की तो मैं उससे निपट लूंगा। रहमान चाचा को थोड़ी तसल्ली मिली। लेकिन उसके दिल में अभी भी एक खौफ था। वह जानता था कि नवाब इकबाल खान आसानी से हार मानने वाला नहीं था और सच में नवाब साहब कोई योजना बना रहा था। वह रहमान चाचा को फिर से नीचा दिखाना चाहता था। लेकिन इस बार उसे ज्यादा सावधानी से काम करना था क्योंकि अब रहमान चाचा के पीछे हाजी अंसारी जैसा ताकतवर आदमी था। नवाब साहब और मियां जमील रात-रात भर बैठकर योजनाएं बनाते। वह सोच रहे थे कि किस तरह से रहमान चाचा को फिर से बर्बाद किया जाए। लेकिन खुदा की मर्जी कुछ और ही थी। अभी तकदीर में बहुत कुछ लिखा था और वह सब कुछ जल्द ही होने वाला था। कुछ महीने और गुजर गए। रहमान चाचा का परिवार खुशहाली से जी रहा था। खेती अच्छी हो रही थी। करीम बख्श और इब्राहिम शहर में मेहनत से काम कर रहे थे। सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन नवाब इकबाल खान का दिल अभी भी जल रहा था। एक दिन उसने मियां जमील को बुलाया। मैंने एक योजना बनाई है। इस बार हम रहमान को सीधे नहीं बल्कि उसके कुत्ते शेरू के जरिए मारेंगे। मियां जमील ने पूछा वह कैसे हुजूर? नवाब साहब ने कहा हम शेरों को जहर देंगे। जब वह मरेगा तो रहमान को बहुत तकलीफ होगी। वो कुत्ता उसे बहुत प्यारा है। मियां जमील मुस्कुराया। बहुत अच्छी योजना है हुजूर। अगले दिन मियां जमील ने एक नौकर को रहमान चाचा के घर भेजा। नौकर के पास जहर मिला हुआ रोटी का टुकड़ा था। उसने वह टुकड़ा शेरू के सामने फेंक दिया। शेरू ने वह रोटी खा ली। लेकिन शेरू कोई साधारण कुत्ता नहीं था। उसे कुछ अजीब लगा। वह भौंकने लगा और रहमान चाचा के पास भागा। उसने रहमान चाचा की धोती को मुंह में पकड़ लिया और खींचने लगा। रहमान चाचा समझ गया कि कुछ गड़बड़ है। वह शेरू के साथ बाहर गया। वहां उसने मियां जमील के नौकर को भागते हुए देखा। रहमान चाचा को सब कुछ समझ आ गया। वह तुरंत शेरू को पशु वैद्य के पास ले गया। वैद्य ने शेरू का इलाज किया और उसकी जान बच गई। लेकिन अब रहमान चाचा को पूरा यकीन हो गया कि नवाब साहब अभी भी उसके पीछे पड़ा हुआ है। उसने यह बात हाजी अंसारी को बताई। हाजी अंसारी बहुत गुस्से में आ गए। यह नवाब इकबाल खान हद से ज्यादा बढ़ गया है। अब मैं चुप नहीं रहूंगा। मैं इस मामले को कोर्ट तक ले जाऊंगा। हाजी अंसारी ने अपने वकील को बुलाया। उन्होंने नवाब इकबाल खान के खिलाफ मुकदमा दायर करने की तैयारी शुरू की। सारे सबूत इकट्ठे किए गए रहमान चाचा की जमीन छीनने के कागजात, गवाहों के बयान और शेरू को जहर देने की कोशिश की गवाही। जब नवाब इकबाल खान को कोर्ट का नोटिस मिला तो वह घबरा गया। हाजी अंसारी जैसे ताकतवर आदमी से पंगा लेना आसान नहीं था। उसने अपने वकीलों को बुलाया। मुकदमा शुरू हुआ। कोर्ट में दोनों पक्षों की पेशी हुई। रहमान चाचा ने अपनी पूरी कहानी सुनाई। कैसे नवाब साहब ने उसकी जमीन हथिया ली। कैसे ठेकेदार ने उसकी झोपड़ी तोड़ दी। कैसे उसे और उसके परिवार को बेघर कर दिया गया। गांव के कई लोगों ने गवाही दी। सबने नवाब साहब के जुल्म की कहानियां सुनाई। मियां जमील की साजिशों का भी खुलासा हुआ। नवाब साहब के वकीलों ने बचाव की कोशिश की। लेकिन सबूत इतने मजबूत थे कि कुछ काम नहीं आया। हाजी अंसारी के वकील बहुत होशियार थे। उन्होंने एक-एक करके नवाब साहब के सारे दामपेंच को बेनकाब कर दिया। कई महीने तक मुकदमा चला। हर पेशी में नए सबूत सामने आते। नवाब साहब की बेईमानी और क्रूरता साफ होती जा रही थी। आखिर वह दिन आया जब जज साहब ने अपना फैसला सुनाया। इस अदालत ने सारे सबूतों और गवाहियों को सुना है। यह साफ है कि नवाब इकबाल खान ने रहमान अली के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। उसने धोखे से रहमान अली की जमीन हथिया ली। उसने उन्हें बेघर कर दिया और फिर उनकी जान लेने की कोशिश भी की। कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। सब लोग जज साहब की तरफ देख रहे थे। जज साहब ने आगे कहा, "इस यह अदालत फैसला करती है कि नवाब इकबाल खान को रहमान अली की सारी जमीन वापस करनी होगी। साथ ही उन्हें ₹00 मुआवजा भी देना होगा। और नवाब इकबाल खान को 2 साल की सजा भी सुनाई जाती है। यह सुनकर रहमान चाचा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया। हाजी अंसारी ने उसे गले लगा लिया। नवाब साहब का चेहरा उतर गया। मियान जमील भी घबरा गया। उन्हें अपने किए का फल मिल गया था। कोर्ट के बाहर भीड़ इकट्ठी थी। जब लोगों को फैसले के बारे में पता चला तो सब खुशी से नाचने लगे। इंसाफ की जीत हुई। जुल्म हारा। रहमान चाचा को अपनी जमीन वापस मिल गई। नवाब साहब को मुआवजा भी देना पड़ा। वह जेल चला गया। अब रहमान चाचा के पास दो घर थे। एक हाजी अंसारी का दिया हुआ और एक उसका पुरा से पुराना मकान जो उसे वापस मिल गया था। उसके पास पहले से ज्यादा जमीन हो गई थी। रहमान चाचा ने अपनी पुरानी जमीन पर खेती शुरू की। करीम बख्श और इब्राहिम शहर से वापस आ गए। अब उन्हें वहां काम करने की जरूरत नहीं थी। तीनों बेटे मिलकर खेती करने लगे। फातिमा अपने घर में खुशी-खुशी रहने लगी। बच्चे अली और आमना पढ़ाई में लग गए। हाजी अंसारी ने उनके लिए एक अच्छे मदरसे का इंतजाम किया। शेरू भी अब पूरी तरह से ठीक हो गया था। वह रहमान चाचा के साथ-साथ घूमता रहता। उसकी नेकी का फल उसे मिल गया था। उसने अपने मालिक की जान बचाई थी और अब उसे बहुत प्यार और आराम मिल रहा था। गांव के लोग रहमान चाचा का बहुत सम्मान करने लगे। सब उसकी मेहनत और सच्चाई की मिसाल देते थे। मियां जमील अहमद को भी अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने रहमान चाचा से माफी मांगी। चाचा मैंने बहुत बड़ी गलती की। मैं नवाब साहब के बहकावे में आ गया। मुझे माफ कर दो। रहमान चाचा का दिल बहुत बड़ा था। उसने मियां जमील को माफ कर दिया। बेटा हम सब इंसान हैं। गलतियां हो जाती हैं। अल्लाह तौबा करने वालों को बहुत पसंद करता है। तुम अपनी जिंदगी सुधार लो। एक दिन हाजी अंसारी फिर से गांव आए। रहमान चाचा ने उनकी बहुत खातिरदारी की। दोनों बैठकर बातें कर रहे थे। हाजी अंसारी ने कहा भाई रहमान तुम्हारी कहानी बहुत प्रेरणादायक है। तुमने कितनी भी मुसीबतें आई लेकिन तुमने हार नहीं मानी। तुमने हमेशा नेकी और सच्चाई का रास्ता अपनाया और देखो अल्लाह ने तुम्हें क्या-क्या दिया। रहमान चाचा ने जवाब दिया साहब यह सब अल्लाह की मेहरबानी है और आपका एहसान है। अगर आप नहीं होते तो मैं कभी इंसाफ नहीं पा सकता था। हाजी अंसारी ने कहा, नहीं भाई, यह तुम्हारे और तुम्हारे बेटों के नेक कामों का नतीजा है। तुम्हारे बेटों ने मेरे परिवार की जान बचाई। यह तो बस उसी नेकी का फल था। कुछ समय बाद जेल में नवाब इकबाल खान को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह रोज रोता रहता था। उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हो रहा था। 2 साल बाद जब वो जेल से बाहर आया तो बदला हुआ इंसान था। उसने सीधे रहमान चाचा के घर जाने का फैसला किया। जब नवाब साहब रहमान चाचा के घर पहुंचा तो सब चौंक गए। नवाब साहब के कपड़े साधारण थे। उसके चेहरे पर अब वह घमंड नहीं था। उसकी आंखों में पश्चाताप था। नवाब साहब रहमान चाचा के सामने घुटनों के बल बैठ गया। रहमान भाई मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा जुल्म किया। मैंने अपने घमंड और लालच में आकर तुम्हारी जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की। मुझे बहुत पछतावा है। रहमान चाचा ने नवाब साहब को उठाया। उसकी आंखों में भी आंसू थे। नवाब साहब उठिए। मैं आपको माफ करता हूं। अल्लाह बहुत मेहरबान है। वह हम सबको माफ कर देता है। जब हम सच्चे दिल से तौबा करते हैं। नवाब इकबाल खान ने कहा, रहमान भाई, मैं अब एक नई जिंदगी शुरू करना चाहता हूं। क्या आप मुझे अपना दोस्त बनाओगे? रहमान चाचा ने उसे गले लगा लिया। हां नवाब साहब, हम दोस्त हैं। उस दिन के बाद से नवाब इकबाल खान एक नेक इंसान बन गया। उसने अपनी बाकी बची दौलत गरीबों में बांट दी। वह रहमान चाचा का अच्छा दोस्त बन गया। शाम को जब रहमान चाचा अपने खेतों में घूम रहा था, तो शेरू उसके साथ-साथ दौड़ रहा था। रहमान चाचा ने शेरू के सिर पर हाथ फेरा। शेरू तूने मेरी जान बचाई। तेरी वफादारी ने सब कुछ बदल दिया। शेरू खुशी से पूंछ हिलाने लगा। रहमान चाचा ने आसमान की तरफ देखा। सूरज डूब रहा था। पूरा आसमान लाल और सुनहरे रंगों से भरा था। उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया। या अल्लाह तूने मुझे बहुत कुछ दिया। मुझे परेशानियां भी दी और खुशियां भी। तूने मुझे सब्र करना सिखाया। और अंत में तूने मुझे इंसाफ दिलाया। तेरा शुक्र है। वह घर की तरफ चल पड़ा। फातिमा दरवाजे पर खड़ी थी। तीनों बेटे खेत से वापस आ रहे थे। छोटे बच्चे खेल रहे थे। सब खुश थे। सब साथ थे। रहमान चाचा ने सोचा जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी खुशी होती है तो कभी गम। लेकिन अगर इंसान नेकी का रास्ता अपनाए, सच्चाई से जिए और अल्लाह पर भरोसा रखे तो अंत में जरूर अच्छाई की जीत होती है। यही तो इस कहानी की सीख थी। बूढ़े की नेकी ने उसे फल दिया। कुत्ते की वफादारी ने उसकी जान बचाई। ठेकेदार की क्रूरता ने उसे मुसीबत में डाला। लेकिन पश्चाताप ने सबको बचा लिया। और सबसे बड़ी बात सच्चाई और नेकी कभी हारती नहीं। देर से ही सही लेकिन इंसाफ जरूर मिलता
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