[संगीत] लुट हमारी संस्कृति हमारे संस्कार मैं सदा रहे हो कि भारत के महान ग्रंथों और काव्यों का संप को सब्सक्राइब करें तिलक कई तरह की ढिलाई आपके घर ऑफिस के लिए रिलाई इट्स इंडिया प्राइस के शव मन तो चंचल है कि जिस प्रकार बहती हुई हवा पर काबू पाना संभव है इसी प्रकार इस चंचल मन को अपने अधीन करना अति दुष्कर काम है हेयर जूनून तुम्हारे यह कहना सत्य है कि मन अति चंचल है उसे अपने वश में करना बहुत मुश्किल है मुश्किल है जनार्दन असंभव नहीं चुनना मुश्किल अवश्य है परंतु असंभव नहीं है तुम्हारा कहना है कि मन को वश में करने का कोई तरीका कोई साधन भी है में अवश्य है कि क्या है वह तरीके से में ही अर्जुन मनुष्य को मैं के घमंड की मदिरा पिला कर मदहोश करने वाला पाखंडी केवल मन है उसके हाथों में मोह माया पहचान है जिसे वह मनुष्य के कामनाओं पटाता रहता है और उसे अपने वश में करता रहता है कि यह मन शरीर से भी बहुत करता है अपनी खुशियों से भी रिमूव करता है और अपने दुखों से भी खुशियों में खुशियों से भरे गीत गाता है तो दुख में दुख भरे गीत गुनगुनाता है अपने दुख हुए दूसरों को शामिल करके उसे खुशी होती है कि किसी भी प्राणी को उसका मन जीवन के अंत तक अपने जाल से निकलने नहीं देता रस्सी में बांधकर उसे तरह-तरह के नाच नचा आता रहता है है उसी को इतनी फुरसत ही नहीं देता है कि वह अपने अंतर में झांककर अपनी आत्मा को पहचाने और हाथों के अंदर चीज परमात्मा का प्रकाश है उस परमात्मा का साक्षात्कार करें [संगीत] में ही पार्थ हटाने के लिए आवश्यक है कि प्राणी अपने मन को काबू में करके अपने अंतर में छात्र आत्मा को देखिए है तब उस आत्मा के अंदर उसे परमात्मा का प्रकाश स्पष्ट दिखाई देगा है उसी को परमात्मा का साक्षात्कार कहते हैं हां तुम तो कहते हो कि अपने अंतर में झांककर आत्मा को और आत्मा में प्रकाशित परमात्मा को पहचान लो 98 आत्मा से अलग कोई और है जो आत्मा को पहचाने गा यह किसको कह रहे हो क्या आत्मा को पहचान कौन पहचान शांत किया उत्पात तुम्हारा मन मा यन हां तुम्हारा मन धन प्राण तुम तो कहते हो कि मन माया के भ्रम जाल में फंसाकर प्राणी को बहुत नाच नचाता है फिर वह आत्मा और परमात्मा क्यों हो जाएगा तुमने ठीक प्रश्न किया अर्जुन उसका उत्तर यह है कि जब तक तुम अपने आप को मन और विचारों के अधीन रहने दोगे तब तक हो तुम्हें नाच नचाता रहेगा हे पार्थ यह शरीर एक व्यक्ति के बाद तय है कर दो कि सूरज के घोड़े हैं वह मनुष्य की इंद्रियां समझो जैसे आंख कि नाग के कान ए मुख [संगीत] हां जी वाह उंगलियों को घोड़ों को जो साथी चलाता है वह साथ ही मन है है और उस रथ में बैठा हुआ जो इस व्रत का स्वामी है वही आत्मा मनुष्य के इंपीरियल अपने विषयों की ओर आकर्षित होते रहते हैं हुआ है है और उसका मन इंद्रियों को उनके विषयों की ओर ही दौड़ाता रहता है कि जिस अभी तक हो सकता है जब तक जीवात्मा अपने मन को अपने काबू में न लाए थे और जब तक मन काबू में नहीं आएगा वह इंद्रियों को उनके विषयों की ओर ही थोड़ा सा रहेगा विषय उनको बुलाते हैं इंद्रियां उनकी तरफ भागती हैं है और मन है जीवात्मा की परवाह किए बगैर तड़प को उस और लिए जाता है कि पंड्या तुम स्वयं मन के अधीन रहकर मन को अपने अधीन कर लोगे तो वहीं एक अच्छे सारथी की तरह तुम्हारे शरीर रूपी रथ को सीधा प्रभु के चरणों में ले जाएगा तो का मन है शरीर के रथ का सारथी रथ को चाहे जिधर ले जाए इंद्रिय हैं इस प्रकार के घोड़े घोड़ों को विषयों की ओर भगाएं आत्मा और शरीर के मध्य यह मन अपने खेल दिखाए ओ कर दो कि अ हुआ है MP3 और सुनाओ शो मोर अपने मन को वश में कर लें जो योग भी हो किसी रखे भूखे कुतों जाएं मन को वश में कर ले जो प्राणी कोई सी रचना अनंत हो जाए [संगीत] इसलिए मैंने कहा था कि मनुष्याणां कारणं बंध अर्थात तुम्हारा स्वामी है और उसके अधीन तो वह माया के बंधनों में जकड़ता रहेगा और मन पर काबू पा लोगे और उसके स्वभाव हो जाओगे तो वहीं तुम्हें मोक्ष के द्वार तक ले जाएगा हे मधुसूदन हे कि यह कहना तो बहुत आसान है कि तुम मन पर काबू पा लो मन के स्वामी बन जाओ परंतु यही तो सबसे दुष्कर कार्य है के शव मंत्र वायु की तरह चंचल है कि जिस प्रकार बहती हुई हवा पर काबू पाना संभव है इसी प्रकार इस चंचल मन को अपने अधीन करना अति दुष्कर काम है हेयर जूनून तुम्हारे यह कहना सत्य है कि मन अति चंचल है उसे अपने वश में करना बहुत मुश्किल है मुश्किल है जनार्दन असंभव नहीं चुनना मुश्किल अवश्य है परंतु असंभव नहीं है तुम्हारा कहना है कि मन को वश में करने का कोई तरीका कोई साधन भी है में अवश्य है ए क्या है वह तरीके से कि असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते [संगीत] है अर्थात् मन को वश में करने के लिए उस पर दो तलवार से प्रहार करना पड़ता है एक तलवार अभ्यास की है और दूसरी तलवार है वैरागी का अभ्यास और वैराग्य और अभ्यास और वैराग्य और अभ्यास का अर्थ है निरंतर अभ्यास अपने मन को एक काम पर लगा दो वहां से भाग लेगा उसे पकड़कर लाओ अ प्रभाव देगा उसे फिर पकड़ो ऐसा बार-बार करना पड़ेगा जैसे घोड़े का नवजात शिशु एक क्षण के लिए स्थिर नहीं रहता क्षण-क्षण में इधर-उधर भटकता रहता है अजय को है उसी प्रकार मन भी क्षण में इधर-उधर भटकता रहता है के नीचे घोड़े की तरह मन भी बड़ा चंचल होता है है और ऐसे चंचल मन को काबू करना उतना ही कठिन है जैसे किसी मुंहजोर घोड़े को काबू करना [संगीत] है ऐसे घोड़े को काबू करने के लिए सवार जितना जोर लगाता है घोड़ा उतना ही विरोध करता है हैं और बार-बार सवार को ही गिरा देता है है परंतु यदि सवार दृढ़ संकल्प हो तो अंत में में उतर कर घोड़े पर सवार हो जाता है पर है है वहीं घोड़ा था में सवार के इशारे पर चलता है उसी प्रकार मनुष्य को भी नियंत्रण की रस्सी में बांधकर बार-बार अपने रास्ते पर लाया जाता है तो अंत में वह अपने स्वामी का कहना मानना शुरू कर देता है इसी को कहते हैं अब व्यास की तलवार चलाना मैं जब आज की तलवार से ही मन ठीक रास्ते पर आ जाए कि तिब्बत दूसरी बैरागी तलवार कि क्या हो सकता है उसकी आवश्यकता इसलिए है कि एक बार ठीक रास्ते पर आ जाने के बाद मन फिर इसे उल्टे रास्ते पर न चला जाए क्योंकि उड़ते रास्ते पर इंद्रियों के विषय उसे सदा ही आकर्षित करते रहेंगे है के मुख्य भोग-विलास और काम की तृष्णा और फिर अपनी ओर खींच सकती है इसलिए मन को यह समझना जरूरी है कि वह सारे विषय भोग मिथ्या पसार योग माया के द्वारा उत्पन्न होने वाले मुंह का भ्रम है में मन जब इस सत्य को समझ लेगा तुमसे विश्व से मोर नहीं रहेगा बल्कि उससे बैरागी हो जाएगा और यही वैरागी की तलवार का काम है कि वह विषयों के मोह को काट के मन कुछ संन्यासी बना देती है वह इससे भी मुनि प्रभ की तेरी भलीभांति हो और इधर दल को पार कर जाएगी लोक-परलोक से संबंधित विभागों के प्रति तब तेरे मन में विरत कि भरी जाएंगी आत्मा की वापस ना रहेगी तेरे पास तन मन स्थिर हो जाएगा ताम्र जाएगी रे अयोध्या मंदिर के स्थिर होने पर आत्मा व परमात्मा रूपी सागर ले उतर जाएगी परमात्मा रूपी सागर में उतर जाओगे देखिए यह जो तुम बात करते हो सकता है प्राणी को आप इस बात पर विश्वास हो कि यह सारा जगत वास्तव में नश्वर है परंतु की माया के प्रभाव से वह सत्य इस परम सत्य पर विश्वास हो तो बिल्कुल मनुष्य के हृदय में नाराजगी पैदा कर सकता है है और वही सच्चा ज्ञान महत्व प्रदान कर रहा हूं तुम तो प्रदान कर रहे हो कि परंतु मेरा बंद उसको ग्रहण क्यों नहीं कर रहा है है क्योंकि अभी तक तुम मोह अब हम के अंधकार से बाहर नहीं निकले है इसलिए तुम उस ज्ञान को ग्रहण करने में असमर्थ हो कि वह प्रभु वाह बहती रहेगी थरा आरजू निकेतन गुप्त गंगा धाम में करता रहा त्न उजड़ सारा झाला यह सब धर्मों के उद्देश भुला के एक मेरा शरणागत हुआ था कि मैं मैं इसमें भी आर्थिक खोज आइज ओं नजीर वे अभिनय गोल झाल धर्म अधीर विकेटों से यू आर यू कि मीडिया थे कि श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे मे हुआ था आओगे व फिर दिमाग छानी सथान हमारे कुमावत पानी रख यह मेज़ नाथ नारायण बासुदेव हे कृष्ण गोविंद हरे हरे हरे लुट कर दो अ कृष्ण हुआ है [संगीत] लुट लो [संगीत]
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