क्या वाकई एक गरीब कुम्हार की मां की एक नसीहत उसकी तकदीर बदल सकती है? यह कहानी है एक ऐसे शख्स की जिसने गुर्बत में भी अल्लाह की राह में देना नहीं छोड़ा और फिर उसके साथ ऐसा कुछ हुआ जिसने सबको हैरान कर दिया। पुराने जमाने की बात है। यमन के एक गांव में एक कुम्हार रहता था जिसका नाम हारिस था। हारिस की जिंदगी, गुरबत और मेहनत की पहचान समझी जाती थी। उसकी झोपड़ी गांव से बाहर एक दरिया के किनारे बनी हुई थी। हारिस के वालिद का साया उसके बचपन ही में उठ गया था। यतीमी ने उसे शुरू ही से जिंदगी की सख्तियां सिखा दी थी। घर के एक कोने में रखी पुरानी चारपाई पर जब नन्हा सा हारिस अपनी मां को चाक पर [संगीत] मिट्टी के बर्तन बनाते देखता, तो उसके दिल में एक अजीब सी कसक उठ थी। उसकी मासूम आंखें कई बार सवाल करती कि आखिर दूसरे बच्चों की तरह उसके वालिद क्यों नहीं है? लेकिन उसकी मां हर बार उसे प्यार से थपकाती और कहती बेटा अल्लाह जिसे आजमाता है उसके नसीब में कुछ खास रखता है। तुम मेहनत करो अल्लाह बरकत देगा। उसकी मां ने बड़ी मेहनत और मशक्कत से उसे पाला। वो खुद भी कुम्हारनी थी। दिन भर मिट्टी [संगीत] गूंदती, चाक पर बर्तन बनाती, उन्हें धूप में सुखाती और फिर बाजार में बेचने के [संगीत] लिए ले जाती। जिंदगी की मुश्किल राहों में ही हारिस ने होश संभाला। वक्त गुजरता गया और वह जवान हो गया। फिर उसकी शादी हो गई। शादी के बाद उसके घर एक नन्हा सा बच्चा आया। झोपड़ी में गुर्बत के बावजूद खुशी की रोशनी फैल गई। हारिस सुबह सवेरे उठता, मट्टी खोदता, उसमें पानी मिलाकर उसे नरम करता। फिर चाक पर रखकर प्याले, हांडिया, घड़े और दूसरे बर्तन बनाता। जब धूप [संगीत] तेज होती तो वह इन्हें बाहर रख देता ताकि अच्छी तरह सूख जाए और फिर इन्हें बाजार में बेचने ले जाता। हारिस अपनी मेहनत में ही खुश रहता था। उसका ईमान था कि सुकून सिर्फ मेहनत में है। लेकिन दिल के एक कोने में बाप की कमी हमेशा महसूस होती रहती थी। एक दिन शाम के वक्त जब वो चाक पर काम कर रहा था। उसकी बीवी घबराई हुई आई और बोली, हारिस, अम्मा की तबीयत बहुत खराब है। वो बार-बार तुम्हें बुला रही है। यह सुनकर हारिस ने फौरन हाथ धोए और मां के पास पहुंच गया। मां एक पुरानी चारपाई पर लेटी हुई थी। चेहरा कमजोरी से जर्द था लेकिन आंखों में अजीब सा नूर था। उसने मोहब्बत से कहा बेटा मेरा वक्त करीब है। मैंने तुम्हें यतीमी में पाला लेकिन अब शायद ज्यादा देर तुम्हारे साथ ना [संगीत] रह सकूं। यह सुनकर हारिस की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा अम्मा ऐसी बातें ना [संगीत] करें। अल्लाह आपको सेहत देगा। मां ने आह भरी और कहा बेटा जिंदगी और मौत अल्लाह [संगीत] के हाथ में है। मेरी एक नसीहत याद रखना हालात जैसे भी हो अल्लाह की राह में खर्च करते रहना सदका माल को कम [संगीत] नहीं करता बल्कि बढ़ाता है। और इसमें इतनी ताकत है कि यह तकदीर [संगीत] भी बदल देता है। यह सुनकर हारिस जारो कतार रोने लगा। उसने मां के हाथ चूमे और कहा अम्मा आप फिक्र [संगीत] ना करें मैं हमेशा अल्लाह की राह में खर्च करता रहूंगा। मां ने मुस्कुराकर [संगीत] दुआ दी और कुछ ही देर बाद वो आंखें जो बरसों से उस पर जान न्योछावर करती थी हमेशा के लिए बंद हो गई। झोपड़ी के आंगन में गम की चादर बिछ गई। हारिस मां की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। लेकिन उसके दिल में मां की नसीहत मुसलसल गूंज रही थी। अल्लाह की राह में खर्च करते रहना। यही नसीहत उसकी जिंदगी का चिराग बनने वाली थी। [संगीत] वो जानता था कि मां के अल्फाज कभी बेईमानी नहीं हो सकते। मां की कब्र पर फातिहा पढ़कर जब वह वापस आया तो उसके चेहरे पर आंसुओं के साथ एक नया अज्म भी था। मां की वफात के बाद दिल में गम जरूर था। लेकिन साथ ही एक मजबूत इरादा भी जाग चुका था। उसने अपने आप से वादा किया चाहे कुछ भी हो जाए मैं अल्लाह की राह में जरूर खर्च करूंगा। गुरबत के बावजूद यही रास्ता बरकत लाएगा। अब हारिस ने दिन रात मजीद मेहनत शुरू कर दी। सुबह होते ही वह अपने छोटे से गधे को तैयार करता। उसकी पीठ पर पुरानी मगर मजबूत टोकरियां बांधता और जंगल की तरफ निकल जाता। वहां एक जगह नरम और जरखेज मिट्टी मिलती थी जो बर्तन बनाने के काम आती थी। वो बेलचे से मिट्टी खोदता और गधे पर लाद लेता। सूरज की तेज धूप, [संगीत] बहता हुआ पसीना और हाथों के छाले भी उसे ना रोक पाते। उसके लबों पर कभी शिकायत नहीं आती थी। वो हमेशा यही सोचता यह मेहनत मेरी आजमाइश है और अल्लाह अपने बंदे की मेहनत को कभी जाया नहीं करता। [संगीत] मिट्टी लेकर वह वापस झोपड़ी आता। आंगन के एक कोने में उसका चाक रखा होता। वह मिट्टी में पानी डालकर उसे नरम करता। फिर खूब गूंदता ताकि उसमें लचक [संगीत] आ जाए। इस दौरान उसके हाथ और कपड़े मिट्टी से भर जाते। लेकिन उसे इसमें भी सुकून महसूस [संगीत] होता। जब मिट्टी तैयार हो जाती तो वह उसे चाक पर रखता और हाथ से चाक घुमाता। देखते ही देखते मिट्टी एक प्याले की शक्ल इख्तियार कर लेती। फिर दूसरा टुकड़ा रखता तो वह घड़ा बन जाता। तीसरा सुराही और चौथा हांडी में बदल जाता। यह हुनर उसे बचपन से आता था। क्योंकि वह अपनी मां के साथ यही काम सीखता आया था। अब यही फन उसकी रोजी का जरिया था। जब बर्तन धूप में खुश होकर तैयार हो जाते तो वह उन्हें एहतियात से गधे पर लाता। टूटने के डर से वह उन्हें तिनकों और बोरियों से ढांप देता और फिर बाजार की तरफ रवाना हो जाता। बाजार में एक कोने में बैठकर वह अपने बर्तन सजा लेता। उसके बर्तन सादा होते लेकिन उनमें मेहनत और सच्चाई साफ झलकती थी। गांव की औरतें प्याले, हांडियां और घड़े खरीदने आती और यूं दिन के इख्तताम पर हारिस के हाथ में कुछ सिक्के आ जाते थे। और अक्सर कहती हारिस के बर्तन मजबूत होते हैं। यह जल्दी नहीं टूटते। घर वापस आते हुए उसके दिल में सबसे पहला ख्याल यही होता कि घर के लिए कुछ खाने-पीने का सामान ले ले। वह थोड़ा बहुत सामान खरीद लेता ताकि अपनी बीवी और नन्हे बेटे के साथ पेट भरकर खाना खा सके। लेकिन जो पैसे बचते [संगीत] उनमें से वह लाजिमन सदका निकाल देता। अक्सर ऐसा होता कि रास्ते में उसे कोई यतीम बच्चा मिल जाता। फटे [संगीत] पुराने कपड़ों में वह उसकी तरफ देखता तो हारिस फौरन अपनी जेब से सिक्के निकालकर उसके हाथ पर रख देता। कभी किसी बूढ़ी औरत को देखता [संगीत] जो हाथ फैलाए बैठी होती तो वो अपने पास बचे हुए पैसों में से कुछ उसकी हथेली पर रख देता। एक दिन वो बाजार से वापस आ रहा था कि उसे एक बेवा औरत मिली। उसके साथ एक छोटा सा बच्चा था और उनके पास कुछ भी नहीं था। उस वक्त हारिस के पास एक हांडी [संगीत] बची हुई थी जो वो बेच ना सका था। उसने वो हांडी उठाकर उस औरत के सामने रख दी और कहा बहन [संगीत] यह रख लो। इसमें तुम खाना पका सकोगी। औरत की आंखों में आंसू आ गए और [संगीत] उसने दुआ देते हुए कहा, "अल्लाह तुम्हारे रिज़्क में बरकत दे। भाई, यह सुनकर हारिस के दिल को एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ। क्योंकि वह जानता था कि मां की नसीहत पर अमल करने से माल [संगीत] कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। घर आकर वह अपनी बीवी और बेटे के साथ खाना खाता। खाने में ज्यादा कुछ नहीं होता। बस थोड़ा सा सालन और दो-तीन रोटियां। लेकिन हारिस के लिए यह किसी बादशाह के दस्तरखान से कम ना था। क्योंकि यह सब उसकी मेहनत और बरकत का नतीजा था। खाने के बाद वो अपने बेटे को कुरान पढ़ाता और रात को देर तक अल्लाह से दुआ मांगता रहता। ऐ अल्लाह मुझे अपनी राह में खर्च करने वाला बंदा बना। मुझे मुश्किलात में सब्र अता फरमा और मेरे बेटे को नेक बना। यूं दिन गुजरते गए और हारिस की मेहनत ने उसके घर में सुकून की फिजा कायम कर दी। गुरबत अपनी जगह थी लेकिन उसके दिल की दौलत ने उसकी जिंदगी को कीमती बना दिया था। हारिस की जिंदगी सुकून और मेहनत के साथ गुजर रही थी। वो बर्तन बनाता, बाजार में बेचता, घर का खर्च भी चलाता और साथ-साथ सदका भी करता। लेकिन एक दिन उस पर आजमाइश के बादल छा गए। कई दिन गुजर गए और आसमान पर स्याह बादल छाए रहे। सूरज जैसे जमीन से रूठ गया था और धूप के बगैर बर्तनों का सूखना नामुमकिन हो गया। हारिस ने जितने भी बर्तन बनाए वो सब आंगन में कच्चे [संगीत] ही रह गए। वो जानता था कि अगर धूप ना निकली तो सारी मेहनत जाया हो जाएगी। एक दिन वह जंगल गया और कुछ लकड़ियां [संगीत] काट लाया। उसने झोपड़ी के बाहर एक छोटा सा चूल्हा बनाया और उसमें आग जला दी। वो बर्तनों को आग के करीब रखकर उन्हें खुश करने लगा। आग की गर्मी से उसके माथे पर पसीना बहने लगा। लेकिन उसने हिम्मत ना हारी। वो बार-बार दुआ करता या अल्लाह मेरी मदद फरमा। मैं अपनी मां की नसीहत पर कायम रहना चाहता हूं। मुझे हिम्मत दे। लेकिन आग की गर्मी धूप का बदल कहां बन सकती थी? बर्तन कभी टूट जाते और कभी कच्चे रह जाते। यूं एक पूरे हफ्ते की मेहनत का बहुत थोड़ा सा नतीजा उसके हाथ आया। जब वह बाजार गया तो उसके पास बहुत कम बर्तन थे। ग्राहक भी कम आए क्योंकि बारिश और बादलों की वजह से लोग घरों से कम निकलते थे। यूं उसकी आमदनी भी कम हो गई। लेकिन वो अपनी आदत पर कायम रहा। [संगीत] जो कुछ पैसे मिले उनमें से खाने का सामान खरीदा और फिर भी सदका किया। जब उसके पास देने के लिए बर्तन ना बचे तो उसने सोचा सदका सिर्फ चीजें देने का नाम नहीं मैं पैसे भी दे सकता हूं। अल्लाह नियत देखता है चीज नहीं। शाम के वक्त जब वह घर लौट रहा था रास्ते में उसे गांव का एक आदमी मिला। वो उसे देखकर कहने लगा भाई हारिस मैं तुम्हारी मेहनत भी देखता हूं और तुम्हारी कम आमदनी [संगीत] भी। लेकिन फिर भी तुम इसमें से सदका करते रहते हो। तुम अपने घर वालों के लिए ज्यादा क्यों नहीं बचाते? हारिस ने मुस्कुराकर जवाब दिया, भाई, जो रिज़्क मेरे नसीब में है, वह मुझे जरूर मिलेगा। सदका करने से रिज़्क कम नहीं होता बल्कि बरकत भरती है। मेरी मां ने आखिरी वक्त में मुझे यही नसीहत की थी। मैं इसे कैसे छोड़ सकता हूं? वो आदमी हैरत से उसे देखता रह गया और खामोश हो गया। जब हारिस [संगीत] घर पहुंचा तो उसकी बीवी ने खाने की थाली सामने रखते हुए कहा हारिस [संगीत] हमारे हालात पहले जैसे नहीं रहे आमदनी कम हो गई है और [संगीत] आप फिर भी इसमें से सदका करते हैं। कहीं ऐसा ना हो कि हमारे बुरे दिन शुरू हो जाए। हारिस ने उसकी बात सुनी। उसमें वजन था। लेकिन उसके दिल में मां की नसीहत गूंज रही थी। वो आहिस्ता से बोला मैं सदका देना नहीं छोड़ सकता। अगर हम अल्लाह की राह में खर्च करेंगे तो वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। मां ने कहा था कि सदका मुसीबतों को टालता है और रिज़्क में बरकत देता है। यह सुनकर उसकी बीवी खामोश हो गई लेकिन उसकी आंखों में फिक्र साफ नजर आ रही थी। उस रात हारिस देर तक जागता रहा। उसने जाए नमाज बिछाई और सजदे में गिर गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और वो गिड़गिड़ा कर दुआ करने लगा। ए मेरे रब तू जानता है कि मैंने अपनी मां की नसीहत कभी नहीं छोड़ी। तू जानता है कि मेरे पास ज्यादा कुछ नहीं। फिर भी मैं तेरी राह में खर्च करता हूं। या अल्लाह मेरी मदद फरमा। मेरे रिज़्क में [संगीत] बरकत दे। मेरे घर वालों पर अपनी रहमत नाजिल फरमा और हमें इस आजमाइश से निकाल। रात की खामोशी झोपड़ी पर छा गई थी और बाहर हल्कीहल्की बारिश हो रही थी। हारिस के आंसू सजदे की जमीन पर गिरे और उसके दिल में एक अजीब सा सुकून उतर आया। वो जानता [संगीत] था कि अल्लाह अपने बंदों को आजमाता जरूर है लेकिन सब्र करने वालों के लिए आसानियां भी पैदा करता है। जब हारिस सुबह उठा तो उसके दिल में एक अजीब सा सुकून था। हर रोज जब वो घर से निकलता तो आसमान पर स्याह बादल छाए होते और दिल पर उदासी का बोझ [संगीत] डाल देते। बर्तन सूखते नहीं थे। रोजगार कम हो गया था और बीवी की फिक्र भरी बातें उसके दिल पर मजीद [संगीत] बोझ डाल देती थी। मगर आज जैसे ही उसने खिड़की खोली, धूप की किरणें उसके चेहरे पर पड़ी। उसके दिल से बेख्तियार शुक्र के अल्फाज निकले। या अल्लाह तेरा शुक्र है कि तूने अपनी रहमत का दरवाजा खोल दिया। उसने वजू किया और दो नफ्ल अदा किए। उसका दिल इत्मीनान से भर गया था। उसने दुआ मांगी ऐ अल्लाह मेरी मेहनत में बरकत दे। मुझे सदका करने की तौफीक से महरूम ना करना और मेरे बच्चों के लिए खैरो बरकत अता फरमा। नमाज के बाद उसने खुशी से बीवी और बच्चे को बताया कि आज सूरज निकल आया है और वह जंगल से मिट्टी लेने जा रहा है। बीवी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। उसने अपने गधे को तैयार किया। बेलचा और टोकरियां संभाली और जंगल की तरफ रवाना हो गया। जंगल में दाखिल होते ही उसे महसूस हुआ कि सब कुछ निखर गया है। कई दिनों की बारिश के बाद मिट्टी नर्म हो चुकी थी। उसने मुख्तलिफ जगहों पर बेलचा मारा मगर कहीं मिट्टी सख्त थी और कहीं खुरदरी। अचानक उसकी नजर एक छोटे से टीले पर पड़ी। वो जगह बाकी जगहों से मुख्तलिफ लग रही थी। मिट्टी ज्यादा नरम, हमार और रंग में भी निराली महसूस हो रही थी। हारिस के दिल में तजसुस पैदा हुआ। यह जगह बाकी जगहों से अलग क्यों है? उसने बेलचा मारा। पहली जरब के साथ ही मिट्टी बिखर गई। वो खुश हुआ और जोर से बेलचा चलाने लगा। अचानक उसका बेलचा किसी सख्त चीज से टकराया। आवाज ऐसी थी जैसे लोहे से टक्कर हुई हो। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने इर्द-गिर्द की मट्टी हटाई तो सामने एक पुराना लोहे का संदूक जाहिर हुआ। उसके हाथ कांपने लगे। यह क्या है? किसी ने इसे दफन किया था या यह कोई पुराना राज है? बड़ी मुश्किल से उसने संदूक बाहर निकाला और गधे के करीब रख दिया। संदूक भारी था। मगर इसके दिल की धड़कन इससे भी ज्यादा तेज हो चुकी थी। वो बार-बार अल्लाह का नाम लेता रहा। या अल्लाह खैर फरमा। जब उसने संदूक [संगीत] खोला तो हैरत से उसकी आंखें खुल गई। अंदर सोने के सिक्के, चांदी के टुकड़े, कीमती जेवरात और बेशुमार खजाना मौजूद था। वो लम्हा इसके लिए ख्वाब से भी ज्यादा कीमती था। इसके हाथ कांपने लगे। आंखों से आंसू बहने लगे और वो वहीं सजदे में गिर गया। ऐ अल्लाह, यह तेरा करम है। मैं कुछ भी नहीं था। मेरी मेहनत भी मामूली थी। लेकिन तूने सदके की बरकत से मुझे यह अता फरमाया। हारिस संदूक गधे पर लादकर घर ले आया। बीवी और बच्चा यह देखकर हैरान रह गए। बीवी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। हारिस ने कहा, "यह ना तुम्हारी ताकत है, ना मेरी। यह सब अल्लाह का फजलल और उसकी बरकत है। उस दिन के बाद हारिस की जिंदगी बदल गई। गुरबत की जगह खुशहाली और सुकून ने ले ली। मगर एक चीज वैसी ही रही और वह था उसका सदका। अब वो पहले से भी ज्यादा सदका करने लगा। यतीम बच्चों को कपड़े और खाना देता। बेवा औरतों की मदद करता। मुसाफिरों को खाना खिलाता और बेसहारा लोगों के लिए आसानियां पैदा करता। लोग उससे पूछते [संगीत] हारिस भाई अब तो अल्लाह ने आपको बहुत कुछ दे दिया है। क्या आप सदका कम नहीं कर सकते? वो मुस्कुरा कर जवाब देता नहीं भाई मैं अपनी मां की नसीहत नहीं भूल सकता। मैं सदका कभी कम नहीं [संगीत] करूंगा। सदका माल को कम नहीं करता बल्कि उसमें बरकत बढ़ाता है। अगर मुझे यह खजाना मिला है तो वह भी सदके की बरकत से मिला है। और यूं हारिस की जिंदगी बदल गई। वो खुशहाल हो गया। मगर आजजी कभी ना छोड़ी। उसके घर में [संगीत] सुकून था। दिल में मोहब्बत और जुबान पर हमेशा अल्लाह का शुक्र। कभी-कभी इंसान मुश्किल हालात में सोचता है कि अब देने [संगीत] का वक्त नहीं। लेकिन हकीकत यह है कि असल बरकत उसी वक्त आती है [संगीत] जब इंसान तंगी में भी देता है। सदका कभी माल कम नहीं करता बल्कि वो ऐसे दरवाजे खोल देता है जिनका इंसान तसवुर भी नहीं कर सकता। अगर आपको यह बात दिल को लगी हो तो वीडियो को लाइक करें। कमेंट में अपनी 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