दूसरे दिन का आगाज इस असीम सेवा दल रैली के साथ हुआ। जहां खाकी व नीली वर्दियों में यह बहन व भाई देश विदेश के हर एक कोने से आकर मानवता के प्रति समर्पित हुए। सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज व राजपिता रमेश जी को अपने बीच पाकर इन सभी ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। सद्गुरु ने सेवा का यह परचम लहराया और सभी सेवादारों ने प्रार्थना का यही भाव दर्शाया। हे सतगुरु हे भगवान मुझको तेरे पे है दाता मान तू ही मान मेरी तू ही शान मेरी तू ही जीवन है तू ही पराण हे सतगुरु हे भगवान मुझको को तेरे पे है दाता मान तू ही आन मेरी तू ही शान मेरी तू ही जीवन है तू ही पराण सेवा से सुसज्जित नाटक खेल व अन्य प्रस्तुतियों से मानवता का अमर संदेश सभी तक पहुंचाते हुए इन सभी भक्तों ने यही प्रण लिया ना हिंदू ना सिख ईसाई ना हम मुसलमान है मानवता है धर्म हमारा हम केवल इंसान है हम है सेवादार हम है सेवादार हम है सेवादार हम है सेवादार ना हिंदू ना सिख ईसाई ना हम मुसलमान है मानवता है धर्म हमारा हम केवल इंसान इंसान है हम है सेवादार हम है सेवादार हम है सेवादार हम है सेवादार सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने सेवा के इस भाव को सराहते हुए यही फरमाया सेवा तो हम एक भक्त हैं तो 24ों घंटों की सेवा कर रहे हैं। पर जब यह वर्दी रूप आता है तो एक रिस्पांसिबिलिटी लाखों गुना बढ़ जाती है। फिर एक उसके साथ-साथ यह रिस्पांसिबिलिटी यह जिम्मेवारी इस तरह भी हो जाती है कि सिर्फ वह सेवा हम अपने लिए नहीं वो एक संगत के लिए या जहां पर भी ड्यूटी पॉइंट है वहां कोई ना कोई एक दूसरे महापुरुषों से भी जुड़ी बात आ जाती है। तो हर एक के यह मन के भाव इसी तरह समर्पित रहेंगे तो वाकई ही यह कंट्रीब्यूशन यह मानवता के लिए होती जाएगी और इसीलिए यह आत्म मंथन यहां भी हर एक सेवादार को भी करना है कि यह दिखावा मात्र ही सेवा चल रही है या वाक्य ही सेवा को सेवा के भाव से हर कोई करता जा रहा है। एक ओर सेवा दल रैली का यह सुंदर रूप और दूसरी ओर इन मैदानों के हर कोने में इसका वास्तविक भाव भी देखने को मिला। धनका संतो दास मा शो आयरलैंड से दास का नाम सनी आयरलैंड से आने का मौका मिला है। महाराज जो यहां पर आकर आई फील सो ब्लेस्ड आई फील सो ग्रेट इस एक्सपीरियंस का हिस्सा बनने के लिए वो जो एक पल-पल का एक्सपीरियंस है। ऐसा नहीं कि श्री खड़े हो के बोल रहे हैं तो एक एक्सपीरियंस है। एक महात्मा ने एक चावल का दाना भी सर्व किया। किसी ने प्लेट में खाना नहीं छोड़ा। किसी ने टॉयलेट्स के अंदर पानी भर दिया। किसी ने भाग के आके पोछा लगा दिया। किसी ने आपके लिए रास्ते बना दिए। किसी ने आपके लिए रस्सी बांध दी। यह सतगुरु के जो आदेश के अंदर अपने आप को बेहतर करते हुए साध संगत एक-एक महात्मा अपना जीवन जी रहा है। यह साध संगत देखने के लिए दास यहां तक पहुंचा है। इसी इसी भाव से मन के अंदर भाव आता है सेवा का कि कैसे ये महात्मा गुरु के एक-एक वचन को एक-एक आदेश को पालन करके अपने जीवन को अपनाते चले जा रहे हैं। बस यही सीखने का ध्यान इसी भाव से पूरी संगत यहां मानवता के लिए आई है। एक ओर सेवा का जीवंत रूप तो दूसरी ओर ज्ञान व सद्भाव को जन-जन तक पहुंचाती यह पब्लिकेशंस सत्य और मानवता का संदेश हर किसी तक पहुंचा रही थी। संत निरंकारी मिशन के प्रकाशन विभाग की ओर से 78वें वार्षिक संत समागम के अवसर पर अनेकोंने पुस्तकें और पत्रिकाएं और अन्य वस्तुएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं संतों के लिए। चाहे वो पुस्तकें हैं लगभग 11 पुस्तकें इस बार नई उनका विमोचन हुआ स्मारिका है एक नजर विशेषांक है और अंग्रेजी की पुस्तक है बीइंग बाउंडलेस और अनेकों पुस्तकें और हर पुस्तक का एक ही उद्देश्य कि इस संसार के अंदर संदेश भक्ति का आत्म मंथन का पहुंचे ताकि इंसान ये जो खोखली सी जिंदगी जी रहा है जो सुपरफिशियल लाइफ हम जी रहे हैं उससे हटकर के एक स्थिर मन सहज जीवन वाला जीवन जिया जाए और लाखों लाखों का जो समाज यहां पर आया है। संत महात्मा आए हैं। वह सभी इन वस्तुओं को प्राप्त करके आनंदित भी हैं और पूरा विश्वास है कि सतगुरु का संदेश लेकर के सारा साल स्वयं भी जागृत रहेंगे और इस रोशनी को संसार में फैलाते भी रहेंगे। इन सभी विभागों में हो रही सेवाओं का समर्पित रूप देखने के बाद आइए चलते हैं सत्संग पंडाल की ओर। जहां संत महात्मा अपने भाव व्यक्त कर रहे हैं। सत्संगत आज इस 78 वें निरंकारी संत समागम के दूसरे दिन जहां अनेकों अनेकों संत जन हमने उनकी भावनाएं कल श्रवण की। आज उसी लड़ी में आगे बढ़ते हुए अनेकों अनेकों महात्मा आज भी आपके सम्मुख सतगुरु की दी हुई दाद का जहां बखान करेंगे। आत्म मंथन जिसका हम जिक्र सुन रहे हैं। अनेकों अनेकों महात्माओं ने इस संदर्भ में अपने अपने भाव व्यक्त किए। जो सतगुरु की बखशीश से जिनको एक दिशा मिली आप देख रहे हैं मंच पर विराजमान हैं डिंपल जी और साथी संपूर्ण अवतार वाणी का सहारा लेकर फिरोजपुर पंजाब से यह परिवार हमारे बीच में है। अभी हम इनसे यह भक्ति भरे भाव श्रवण करें। जिसने बशी जिसने बशी सुंदर रूप जवानी इस तू एक चू एक चना खुल जा जिसने बशी ओ सतगुरु और दिखा दे मंगे कोई ले जाना ऐसे ही अब की मंजिल कैसे देना जिस बशी जिसु सुंदर रूप जितना देशी अभी हमने महात्माओं से श्रवण किए संपूर्ण वाणी का यह शब्द और 78वा वार्षिक निरंकारी संत समागम और हम सभी सद्गुरु की कृपा से यहां एकत्रित हुए हैं। इस सेलिब्रेशन इस उत्सव को मनाने के लिए यह एक महान उत्सव इसलिए कहलाता है कि इस महान प्रभु परमात्मा निराकार का गुणगान इसकी याद करने के लिए हम सभी हर साल इस तरह एकत्रित होते हैं। उसकी याद जिसे दासी को लगता है कि सबसे जल्दी सबसे आसानी से यह मन भुला देता है। शायद एक सेकंड की भी देरी नहीं लगती इसके एहसास से दूर होने में। इसीलिए सद्गुरु यह उपकार करते हैं। सत्संग का समागम का यह रूप अपने भक्तों को बखशकर दया और रहम करते हैं कि इस निरंकार प्रभु परमात्मा की याद हर पल बनी रहे। तो अब दासी प्रार्थना करेगी आदरणीय महात्मा महेश जी और साथ ही रेवाड़ी हरियाणा के यह महात्मा संपूर्ण हरदेव वाणी के एक पावन शब्द के माध्यम से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। इनके बाद प्रार्थना करूंगी। आदरणीय महात्मा सुनील सोरेन जी जमीरा पश्चिम बंगाल के यह महात्मा इनसे हम इनके भाव श्रवण करेंगे। अभी आदरणीय महेश जी और साथ ही साज की संगत करने से मन निर्मल हो सहज अवस्था प्राप्त होती सहज अवस्था प्राप्त होती सुख दुख से उठ जाता है साध की संगत से मन निर्मल हो काम क्रोध लालच जन सत्संग में जब आएगा काम क्रोध लाल जी जन सत्संग में आएगा भक्ति में लग जाएगा भक्ति में लग जाएगा भक्ति में लग जाएगा वो मुक्ति पावन पाएगा साथ की संगत करने से मन निर्मल हो पाता है। सा की संगत करने से मन निर्मल को पाता है। सत्संगत जी ते सगुरु दया और आशीर्वाद ते ज्ञान कहते ते मन मिल का मन में उपदा से मन गुण और मानवी गुण बन त खातिर ते नवा ज्ञान मान पदा ज न पाती परमात्मा जना स मान सवा सृष्टि रे मान दो आर्मी मान सह तैयार माना अवतार बरे ले एक ज्योति है शब्द अंदर नर है चाहे नारी है ब्राह्मण क्षत्रिय वजन एक ही सारी है से नाना हुनर भाषा जाति वर्ण मान हजनीय मरो सजन कथा के सगुरु ले पना से नया हया जज सृष्टि करता ते सया बा बया सम सृष्टि पुर रे धरती पुर आप ज सृष्टि सृष्टि आत्मा तो आत्मा हर भाषा हर देश के मानव अपने ही तो सारे हैं कि एक यह जो प्रेम है जो हम सबको फिर बांध देता है कि ऊपर से दिखने में लगता है कि भाषाएं अलग हैं। लेकिन जहां पर अभी इस भाषा का हमने आनंद लिया वहीं छत्तीसगढ़ से आए यह महात्मा यह हमारे बीच में मौजूद हैं। तो इनसे इनके मधुर भाव हम श्रवण करेंगे। दूजराम जी और साथी और इनके उपरांत दास निवेदन करेगा बहन सोम्या जी तेलुगु भाषा का सहारा लेकर यह बहन भी सद्गुरु के संदेश को हम तक पहुंचाएं और सांझा करें। अभी मिलजुलकर हम इन महात्माओं से इनके भाव श्रवण करते हैं। प्रेम से कहिए दान रंग का ज्ञान पाके निरंकारी होगेगा तो ज्ञान पाके निरंकारी होगेगा कण माय हसी जानकारी होगा हसी जानकारी होगा हसी जानकारी होगेगा। ना तो कोई रूपवे ना तो कोई रंग रे बगल बगल आजू बाजू रहता सबके संग रे ना तो कोई रूप हवे ना तो कोई रंग रे अगर बगल आजू बाजू रहता सबके संग सतगुरु तो दया के सतगुरु तो दया के मैं आभारी होंगा सतगुरु दया के मैं आभारी होगेगा जानकारी होगा जानकारी हो सतगुरु दरबार लो सगुरु कृपा वना इन मंद महात्म दर्शन लंडम दासी की यतो आनंदा महात्मा डब्ब वार्षिक संत समागम की सद्गुरु माता जी मन की प्रसाद शीर्षिका थीम आत्म मंथन आत्मविचारणा स्पिरिचुअल इंट्रोस्पेक्शन साधु महापुरुष लारा देयर वाज़ अ यंग मक हु अप्रोच्चेड ह स्टूड हिज मास्टर एंड आस्क्ड मास्टर आई फॉलो योर टीचिंग्स एंड लिव सिंपली येट आई फील आई एम नॉट प्रोग्रेसिंग हाउ कैन आई ट्रूली नो मसेल्फ देन द मास्टर हैंडेड ओवर हिम ए मिरर एंड आस्क्ड व्हाट कैन यू सी इन द मिरर द स्टूडेंट रिप्लाई आई कैन सी माय फेस देन द मास्टर आस्क्ड व्हाट इफ द मिरर इज कवर्ड विथ डस्ट देन द स्टूडेंट रिप्लाई दैट ही कैन नॉट सी हिज रिफ्लेक्शन विद क्लेरिटी देन द गुरु एक्सप्लेंस द मिरर फिल्ड विथ डस्ट कैन नॉट गिव योर इमेज ओर रिफ्लेक्शन विथ क्लैरिटी इन द सेम वे हार्ट फिल्ड विथ अननेसेसरी आर यूजलेस थॉट्स कैन नोट हेल्प अस टू इंट्रोस्पेक्ट आवरसेल्व्स वी कैन ओनली नो आवर ट्रू सेल्व्स बाय रिमूविंग दी अननेसेसरी थॉट्स एंड बाय फोकसिंग ऑन स्पिरिचुअल इंट्रोस्पेक्शन बाय मैनिफेस्टिंग दिस स्पिरिचुअल इंट्रोस्पेक्शन इनू आवर डे टू डे लाइफ इट रिजल्ट्स इन प्रैक्टिकल स्पिरिचुअलिटी दैट माताजी स्ट्रेसेस ऑन साधु महापुरुष लारा सद्गुरु यो अपार कृपा वलना मरी इनटी सुंदर आध्यात्मिक मार्ग मन की लं महात्मा इनका पूर्ति समर्पणा भाव तो परिपूर्ण विश्वासम तो सगुरु चरण लो सगुरु चे प्रति वचन श्रवण चेसी द प विचारसी मन मर मरिगु पर मुंद सा महात्मा दासी प्रार्थना करेगी सुरलाडी जी और साथी जयतो पंजाब से यह महात्मा एक पंजाबी सामूहिक गीत के माध्यम से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे और इनके उपरांत हम श्रवण करेंगे बहन दिव्य ज्योति तालुकदार जी को अभी आदरणीय सुरलाडी जी और साथी सच आ मेरे मुर्शद ने मेनु रब दे ना छया सच आखा मेरे मुर्शद ने सच आखा मेरे मुर्शद ने सच आखा मेरे मेरे मुर्शद ने सिया मेरे मुर्शद ने मेनु रब ना मिला छया मेनु रब मिला च विदे रब सी विदे मुख दर पे शीश झुकाया है इश्क ह की पाया है रब लुक सी विच परदे ने मुख करके इशारा मेरे इशारा दो सीनु रब दया सी दे जिनकी अर्श दस देु दिखाया जिन अरिश देने का रासा तेरा नाम दिए हर साम मंथन जो आदम मंथन जो आदम मंथन जो आदम मंथन जो अपना दिखाया तू साम मंथन जो अपना आप कांग आत्म मंथन शब्द तो आए अर्थ मन और विचार मन और भाव अंतर पर की को विचार करो हे तो अर्थ तो बुझाए एटाना है कि आत्म मंथन की हो आत्म मंथन के बाद क्या होगा निरंतर प्रैक्टिस के बाद निरंतर प्रैक्टिस आत्म ज्ञान प्राप्त हो आत्म ज्ञान ए की वस्तु मोने को ए की वस्तु आत्मा को जी स्थिर बुद्धि हो जाो आत्म ज्ञान ए स्टेज होबो जो गुरु हम एक्सपेक्टेशंस करे गुरु हमसे एक्सपेक्टेशन रखता है हमसे उम्मीद रखता है वह आत्मज्ञान के द्वारा स्थिर बुद्धि सरल सहज शांत कभी गुरु से सवाल नहीं करता सत वचन करता है। निरंतर आत्म मंथन से गुरु ज्ञान मिलता है। उसके बाद कभी बोलने का यह अवसर नहीं आता कि संगत में जाना है। सेवा करनी है। अपने आप ही आत्मबोध होकर अपने आप ही गुरु की तरफ चल जाता है। इसी धारा को आगे बढ़ाते हुए जैसे निवेदन किया बहन प्रिया सोनी जी प्रयागराज उत्तर प्रदेश से यह बहन अभी आशीर्वाद प्राप्त करें और इनके उपरांत स्नेहा बोधांदे जी कन्नड़ भाषा का सहारा लेकर इनके बाद हम इनकी भावना श्रवण करेंगे। प्रेम से कहिए ध्यान रंकार अपने दिल में विचार कर है कभी बार-बार करना है अपने दिल में विचार करना है दूसरों को बहुत सुधार लिया। दूसरों को बहुत सुधार लिया। दूसरों को बहुत सुधार लिया। अब तो अपना सुधार करना है। अब तो अपना सुधार करना है। कब बार-बार करना है? अपने दिल में विचार करना है। आत्म मंथ धन इसी को कहते हैं। आत्म मंथन इसी को कहते हैं। आत्म मंथन इसी को कहते हैं। खुद से साक्षात्कार करना है। खुद से साक्षात्कार करना है। कभी बार-बार करना है। अपने दिल में विचार करना है ना बाला बाल सत्संग बाल समागम मावी इ ना त नम क्वेश्चन बे आगिना कालद् चिकस भक्त प्रहलाद जी मत मार जी भक्ति मारती ईना कालद्ली साक्षात माता जी अवरणगे ब्रह्मान मूलका परमात्मा नु तोरारे यल लक्ष जीव राशि गो तपिसिक को यमन पा नाशवा दनु तपिसिको मानस पूज निरतरागी देवालय हंगु तपिसिकोित्रा गुप्त लेकाचार तपिसिको परमात्मा उल धर्म परिकल्पने तपसिक को लोक भजने भक्ति सुकी मानसिका मत द तपिसिक को पूर्ण सद्गुरु चरणद्ली बंधु पूर्ण सद्गुरु चरणद्ली बंधु ब्रह्म ज्ञानदि परमात्मा नुरत जनन मरण चक्र तपसिक को रूपा बन्ना आकारा असीमा निसीमा सादा के नोदा शस्त्र कसदा बंद सुगदा नीर तो लादा गि वगसदा निर्गुणा गुणातीता सूक्ष्मा ब्रह्म बागिल ज्ञान रंद्रिंदा कानुवा निराकार परमात्मा ननु अरे तू ही मानव जन्मा सार्थक माडिको माडिको माडिको अंदर संत महात्मा रे नम्मा जीवन प्रक्रिया तप्स बेरे पूर्ण सद्गुरु चरणद्ली बंधु ब्रह्म ज्ञानदि परमात्मा नुरत अरे इल्ला प्रक्रिया तप्स के साध्य सब दुनिया में बोलते हैं सबका मालिक एक है सब दुनिया में बोलते हैं सबका मालिक एक हमारे निरंकारी मिशन में माताजी बोलते हैं पहले उसको देख क्या बोलते हैं पहले उसको देख हम सबने यह करिश्मा देख ही लिया और अक्सर देखते हैं जब अगर हम दुनियावी दृष्टि से देखें तो इतनी छोटी सी ये उम्र जहां पर जिंदगी की शुरुआत ही हुई है और बिल्कुल बेसिक्स ही अभी स्कूल्स स्कूल्स में भी घरों में भी सिखाया पढ़ाया जाता है। और इस उम्र में इतनी कन्विक्शन वो बॉडी लैंग्वेज ही बता रही थी कि किस तरह इस परमात्मा पर इतना विश्वास है तो यह सद्गुरु का ही उपकार है। इन्हीं का करिश्मा है। और अब जैसे प्रार्थना की गई बहन श्रद्धा जी और साथ ही रूपी नगर महाराष्ट्र से यह बहने अंग्रेजी भाषा का सहारा लेते हुए एक ग्रुप सॉन्ग सद्गुरु के चरणों में रखने जा रहे हैं और इनके बाद हम श्रवण करेंगे बहन अश्मिता जी को अभी बहन श्रद्धा जी और साथी एंटायर ह्यूमैनिटी इज माय डियर फैमिली द एंटायर ह्यूमैनिटी इज माय डियर फैमिली एंड एवरीवन बिलोंग्स टू मी द प्लेनेट अ कॉमन होम द प्लेनेट अ कॉमन हो फॉर एवरीवन टू लिव हैप्पीली एंड पीसफुली द एंटायर ह्यूमैनिटी इज माय डियर फैमिली एंटायर ह्यूमैनिटी जी आ फादर गॉड इज वन द सेम ऑलवेज अ फादर गड इज वन से ऑलवेज ही इज द सो लाइक द सन ऑल ऑफ अस आर लाइक द रे ऑल ऑफ अस आर लाइक द रे एंटायर ह्यूमैनिटी इज माय डियर फैमिली द एंजाय ह्यूमैनिटी माय डियरेस्ट सेंट्स हाउ एब्सोलुटली मार्वलस दैट ऑल ऑफ़ अस आर एक्सपीरियंसिंग दिस दिस इनकंपास अ लॉट ऑफ़ थिंग्स आर इंडिविजुअल लाइफ्स हाउ वी गो थ्रू थिंग्स बिग एंड स्मॉल। व्हाट आनंद मीन्स फॉर अस एंड आर यूनिक रिलेशनशिप्स वि गॉड। द पायलट दैट स्टयर्स अस थ्रू इट ऑल इज द माइंड। नाउ वेयर डू वी इवन गेट स्टार्टेड विद द माइंड? एट टाइम्स इट कैन बी नॉइजी लाइक ओल्ड टेलीविज़न स्टैटिक और ऑन दी अदर हैंड इट कैन बी अ मेंशन ऑफ़ साइलेंस। इदर वेज़ इट कैन बी हार्ड नेविगेटिंग थ्रू दिस ह्यूमन एक्सपीरियंस। बट वी मस्ट पर्सिस्ट लर्न एंड इंप्रूव। सेल्फ एनालिसिस, सेल्फ इंट्रोस्पेक्शन इज नॉन नेगोशिएबल इन आवर जर्नीज, आवर स्पिरिचुअल जर्नीज़ टुवर्ड्स द इनफिनिट। सेंस देयर आर अ लॉट ऑफ लेसंस एंड चॉइससेस दैट कम अलोंग द वेरी ऑफन एंड इट इज़ अपॉन अस टू एंप्लॉय आवर माइंड्स टू एनालाइज एवरीथिंग। सो दैट वी आर स्ट्राइविंग टुवर्ड्स सद्गुरु माताजीस टीचिंग्स बिकमिंग आवर हैबिट आवर नेचर सिंस फॉर इंस्टेंस लेट्स से दैट आई वांट टू बाय अ पैकेज्ड फूड आइटम एंड आई एम ट्राइंग टू बी माइंडफुल अबाउट माय मैक्रोस एंड माइक्रोस सो सिंस नाउ मेनी मून्स एगो व्हाइल आई वाज़ अ स्कूल स्टूडेंट आई हैव बीन सप्लाइड विथ दिस इनफार्मेशन रिगार्डिंग व्हाट इज गुड और बैड फॉर माय बॉडी माय हेल्थ फूड वाइज सो नेचुरली द नेक्स्ट कोर्स ऑफ़ एक्शन वुड बी मी गोइंग थ्रू द न्यूट्रिशनल इनेशन एट द बैक ऑफ दैट प्रोडक्ट टू मेक माय डिसीजन सिंस सिमिलरली वी हैव बीन डिस्टर्ड विथ द डिवाइन नॉलेज लकी इज़ एन अंडरस्टेटमेंट सो सिंस वी आल्सो हैव टू सेट क्लियर पैरामीटर्स बेंचमार्क्स टू इवैल्यूएट माय मन एंड देन डायरेक्ट माय वचन एंड कर्म सेंस इट चेक ऑन द माइंड इज अ मोस्टेंस वी शुड ट्राई टू अपलिफ्ट आवरसेल्व्स एंड नॉट द ऑोजिट बिकॉज़ द माइंड कैन बी बोथ अ फ्रेंड एंड एन एनिमी सो सेंट्स आई नीड टू अंडरस्टैंड दैट देयर इज ऑलवेज रूम फॉर इंप्रूवमेंट इन मी देयर आर सो मेनी थिंग्स दैट आई कैन बी डूइंग बेटर एज़ अ डिवोटी एंड सेंस सेल्फ एनालिसिस, सेल्फ इंट्रोस्पेक्शन विल हेल्प मी इन रियलाइजिंग द थिंग्स दैट आई हैव बीन डूइंग रोंग एंड देन रिमाइंडिंग मसेल्फ नॉट टू डू द सेम इफ ओर व्हेन अ सिमिलर सिचुएशन अराइज़ेस एंड सिंस दिस रियलाइजेशन इट ऑकर्स थ्रू द ग्रेस ऑफ गॉड ऑलमाइटी। तो अभी सत्संगति ये महात्मा हमारे बीच में डॉक्टर सुशांत जी और साथी यह सभी मिलजुलकर भोजपुरी भाषा का सहारा लेंगे शिवांग से आए महात्मा तो यह अभी अपनी भक्ति भरी रचना व्यक्त करेंगे और इनके उपरांत दास निवेदन करेगा बहन डॉक्टर रुक्मणी भदोरिया जी हिंदी भाषा का सहारा लेकर उज्जैन मध्य प्रदेश से आई बहन इनके बाद इनके भक्ति भरे भाव श्रवण करेंगे। अभी डॉक्टर सुशांत जी और साथी सतगुरु के चरणिया से प्यार जा हो सतगुरु के चरणिया से प्यार जाला अंग संगे प्रभु के दीदार का होला अंग संग प्रभु के दीदार का होला अंग संग प्रभु के दीदार का होला मिले सतगुरु ता हरि मिल जा मिले सतगुरु ता हरि मिल जा मिले सतगुरु ता हरी जामा फुलेखा सब दूर होई जामा फुले सब दूर होई जामा सब दूर होई जा मिले सतगुरु हरी मिल जामा भूलेखा सब दूर होई जागा मन से रूह जागता होला आगा मन से दाब होला हो दीदार जाला सगे दीदार जागे दीदार जाला सतगुरु के चरणिया से प्यार जाला सतगुरु के चरणिया से प्यार जाला सभी प्रभु के दीदार हो, सभी प्रभु के दीदार हो। ओम अस्तो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर गमया मृत्युर मा अमृतम गमया साध संगत जी जब जीवन में यह ब्रह्म ज्ञान की दात मिल जाती है तो साध संगत ये संतों के मन में जिज्ञासा होती है प्रार्थना होती है कि हे प्रभु मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलिए साध संगत जी लेकिन यह चंचल मन फिर यह प्रश्न कर उठता है कि वह कौन असत्य है और कौन सा सत्य है कि साध संगत जी तब यह तत्ववेता सद्गुरु पूर्ण सद्गुरु आप जी बताते हैं कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या कि यह ब्रह्म ही सत्य है कि परमपिता परमात्मा जो कालातीत है चिरंतर है और साध संगत सार्वभौमिक है केवल और केवल यही सत्य है बाकी सब कुछ असत्य है कि साध संगत फिर एक जिज्ञासा एक प्रार्थना इस सद्गुरु से परमात्मा से कि तमसोर मा ज्योतिर गमया कि हे परमात्मा मुझे इस अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए कि साध संगत फिर यह चंचल मन पूछ उठता है प्रश्न कि कौन सा अंधकार और कैसा प्रकाश कि साध संगत जी फिर इधर पूर्ण सद्गुरु की तरफ से इशारा आता है कि यह जो भी ब्रह्म माया है जो भी जगत है यह सब कुछ अंधकार है और केवल और केवल यह ईश्वर ही प्रकाश है कि साध संगत जी फिर आगे संतों की यह जिज्ञासा प्रार्थना कि मृत्यु मा अमृतम गमया कि मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए और साध संगत यही जाकर फिर यह प्रश्न बन जाता है कि क्या है मृत्यु और क्या है अमृत तत्व कि साध संगत ये जटिलतम प्रश्न संसार के सामने घूम रहा है और हम देखते हैं कि युगों युगों से इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए समय-समय पर साध संगत जी पूर्ण सद्गुरु का आगमन हुआ है और आज भी समय के रहबर सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज इस जनजन की इस जिज्ञासा को शांत करते हुए बताते हैं कि संसार सागर दुखम तस्मात जाग जाग्रह कि हे संतो यह संसार सागर जो है यह केवल दुख देने वाला है। दुख का ही सागर है कि जहां जन्म का दुख है, बुढ़ापे का दुख है और मृत्यु का दुख है। हे मानव तू जाग जा और जहां यह जागने की बात आती है कि साध संगत जी फिर वो जागने की अवस्था से ही साध संगत हमारा आत्म मंथन शुरू हो जाता है। साध संगत टोरंटो, कनाडा के यह संत अपने हाथों में साज और मन में सद्गुरु के प्रति अथाह प्रेम लिए हाजिर हैं। तो अब हम इनसे एक ग्रुप सॉन्ग श्रवण करेंगे। इनके बाद दासी निवेदन करेगी। आदरणीय महात्मा नवनीत पाठक जी यह भी अपने शुभभाव रखकर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। अभी टोरंटो से आए यह संत। आती जाती सांसों की है इल्तजा बरकरार रखना रहमतों का सिलसिला आती जाती सांसों की है इल्तजा बरकरार रखना रहमतों का सिलसिला मांगे तेरी नजरें करम तेरी बाके मिले दम बदम मांगे तेरी नजरें करम तेरी खा के पा मिले दम बदम है पाक साइलम तू ही तो है दैरो हरम है पाक जिक्रेम तू ही तो है दैरो हरम दरिया रहमत खुदाई अजमत बेइतेहा मोहब्बत दरिया रहमत खुदाई अजमत बेइतेहा मोहब्बत साहिबे मेहरबान साहिबे मेहरबान तू है मेहर साहिब मेहरबान साहिब मेहरबान है मेरे साहि मेहरबान साहिब मेहरबान कुल मखलूक है तेरे दम से मालिक दो जहान हो मालिक के दो जहान हो हम चैन है हासिल तुमसे प्यार की तुम अजान हो प्यार की तुम अजान हो गुल बनके खुद महक रहे हो गुल बनके खुद रहे और खुद ही गुलिस्तान हो और खुद ही गुलिस्तान हो और खुद ही गुलिस्तान हो दिल अजीज हो वाहिद हफीज तुम हो मेहरबान तुम हो मेहरबान तुम हो मेहरबान शलवा हो हाजिर खुदा तुम हो मेहरबान तुम होन तुम होन कुल आलम जो रोशन कर दे ऐसा है नूर तेरा ऐसा है नूर तेरा ऐसा है नूर तेरा रूहे सफर को महका दे जो ऐसा जरूर तेरा ऐसा जरूर तेरा ऐसा जरूर तेरा कर नवाजी हुई है आपकी कर्म नवाजी हुई है आपकी जो ये दीदार है हुआ जो ये दीदार है हुआ जो ये दीदार है हुआ जो ये दीदारों से हुए आजाद हम लायों से हुए आजाद हम तेरा ही अपकार है तेरा ही अपकार है तेरा ही अपकार है तेरा ही उपकार है आप सारे सुकून हो आपसे विस्तार है आपसे विस्तार है आपसे विस्तार है आप सारे सुकून हो आपसे विस्तार है आपसे विस्तार है आपसे विस्तार है आत्म मंथन का भी मौला आत्म मंथन का भी मौला तू ही आधार है। साहिब मेहरबान साहिब मेहरबान साहिब मेहरबान साहिब मेहरबान साध संगत जी सतगुरु मेहरबान है। आप सभी ब्रह्म ज्ञानी जानते हो कि यह जो ज्ञान सतगुरु ने हमारे को बख्शा है इस परम सत्ता के साथ जोड़कर के ब्रह्म ज्ञान के साथ जोड़कर के इसकी दुनिया में कोई कीमत नहीं। अगर कोई कहे कि सारी दुनिया की दौलत मैं देता हूं। मेरे को भी ब्रह्म ज्ञान दे दो तो वह भी इसकी कीमत नहीं। गुरु गोविंद सिंह महाराज के वक्त में उनके अनन्य भक्त भाई नंदलाल जी सिरमूर कवि भी थे। वह भी सतगुरु को विनती करते हैं। कहते हैं सद्गुरु दिल चाहता है कि आपसे जान न्योछावर कर दूं। कहते हैं कि गुफ्तम के जा हम इज़ यक निगाहे तो है। सदगुरु दिल करता है आपसे जान न्योछावर कर दूं। बस एक मेहर कर दो। मेरे को ज्ञान बखश दो। एक ऐसी नजर मेरे पर डालो कि मेरे को ब्रह्म ज्ञान हो जाए। तो सतगुरु मुस्कुरा के कहते हैं कि भाई नंदलाल ज्ञान की कोई कीमत नहीं होती। अगर कोई जान देता जाए, ज्ञान लेता जाए, जान देता जाए, ज्ञान लेता जाए तो फिर ज्ञान का तो मोल पड़ गया। तो ये इसका कोई मोल नहीं। ये तो गुरु की बख्शीश है। दे दे तो दे दे, ना दे तो ना दे। इसलिए कहते हैं कि बेपरवाही देख सजन दी जिे किसी दी पेश ना जावे इन्ह ताजा वाले दरदर रोले मंगते तख्त बहाले आजम किसी नु करजा मिल ही कोई म्यो खाली जावे कोई तो सारी दुनिया का भ्रमण करते रहे ज्ञान नहीं होता प्रभु नहीं मिलता और दास अपनी बात करे कि आजम किसी नु कर्जा मिल पर और हम देखते हैं कि किसी के घर में ही महापुरुष आकर के कहते हैं कि ब्रह्म ज्ञान ले को और फिर उनको कन्विंस कर देते हैं कि आपका ब्रह्म ज्ञान लेना कितना जरूरी है। और ब्रह्म ज्ञान के बाद फिर बात आती है आत्म मंथन की। तो आत्म मंथन हर पल होता है। इसका कोई वक्त नहीं है कि आज आत्म मंथन करूंगा या कल करूंगा। हर वक्त जब ब्रह्म ज्ञान लेने के बाद हर वक्त जो है वो आत्म मंथन करना जरूरी है। कुछ साल पहले हमने गाड़ी निकाली और समागम की तरफ रवाना हो गए। अब रास्ते में जब ब्रह्म ज्ञानी साथ हो तो कुछ ना कुछ चर्चा तो परमात्मा की होगी या गुरुसिखी की होगी। तो वह बातें चलते चलते वो बात शुरू हो गई। आपने भी सुनी होगी वो थड़ो वाली बात कि सतगुरु ने कहा दो गुरुसखों को बुलाकर के कि थड़े बना दो और थड़े गिरा दो। दोनों ने बनाने शुरू कर दिए। दोनों ने गिराने शुरू कर दिए। और जो इतिहास कहता है कि एकदा बनाता गया और दो चार बार बनाया और फिर कहता है मैं ठीक बनाता हूं थोड़ा ठीक बनाता हूं जिसको चबूतरा भी बोलते हैं बिल्कुल उसकी ऊंचाई नपाई लंबाई सब ठीक है सतगुरु पता नहीं कहते हैं गिरा दो फिर गिरा देता है लेकिन तीन चार बार ही गिराने के बाद कहता है कि मेरे से नहीं बनता सतगुरु को समझ नहीं लगती मैं तो ठीक बनाता हूं अब उसका जो ध्यान था वह भटक गया अब दूसरा जो गुरु सिख है वो गिराता रहा बनाता रहा गिराता रहा बनाता रहा सत कहते ठीक नहीं बना गिरा दो तो गिरा देता बनाओ तो फिर बना देता और जब 12 14 बार हो गया तो फिर डंडोत नमस्कार करके कहता है सद्गुरु बहुत शर्मिंदगीगी महसूस होती है एक छोटा सा काम आपने कहा था कि थड़ा बनाओ तो मैं बनाता हूं लेकिन वैसा नहीं बना पाता जैसे आप चाहते हो तो कृपा करो शक्ति दो विवेक दो बुद्धि दो कि जैसा आप चाहते हो वैसा बना सको अब उसके बाद सतगुरु ने गले लगा लिया बात थो की नहीं थी। उसका देखना था कि इसके अंदर कितनी पेशेंस है। कितना इसके अंदर समर्पण है। वह चीज देख रही थी। और उसके बाद कितने आशीर्वाद दिए यह इतिहास बताता है। बातें करते-करते हम दिल्ली पहुंच गए। जब बुराड़ी रोड पर पहुंचे तो दास ने गाड़ी जाकर के संतोषक सरोवर के सामने लगा दी। और उतने में ही एक महापुरुष आए। वो कहते भाई साहब गाड़ी थोड़ी पीछे लगा लो। अब नए-नए गए थे अंदर जोश था बातें भी कर रहे थे गुरुखी की दास जी सतवचन जैसा आपका हुक्म है वैसा ही कर लेते हैं दास जी उसी वक्त चाबी लगाई गाड़ी को थोड़ा सा पीछे कर लिया और इतने में दूसरे वर्दी वाले महापुरुष आ गए सेवा दल के अब उनकी जैसे ड्यूटी है तो उन्होंने कहा कि भाई साहब गाड़ी थोड़ी सी और पीछे कर लो तो दास ने कहा कि गाड़ियां तो पार्किंग तो तकरीबन खाली पड़ी है यह बार-बार कहते हैं चलो ठीक है कर लेते हैं लेकिन अब उतना जोश नहीं था उतना समर्पण नहीं था। दूसरी बार बोला गया था और उसके बाद दास ने सबसे पीछे जाकर गाड़ी लगा दी। जहां हैज है वहां जाकर गाड़ी लगा दी और देखता है कि इतने में तीसरे महापुरुष वर्दी वाले आ गए और वह कहते हैं कि भाई साहब गाड़ी को थोड़ा सीधे करके लगा लो। अब जब उन्होंने फिर कहा तो दास देखता है कि पता नहीं क्यों ऐसे बार-बार कहते हैं यह कृष्णा होता है गुरु का तो साथ वाले महापुरुष फिर मुस्कुरा के कहते हैं उन्होंने देख लिया कि थोड़ा सा मन उचाट हो गया है तो कहते कोई बात नहीं भाई साहब एक थड़ा और बना लेते हैं जैसे ही उन्होंने यह बात कही दास अपनी गलती महसूस कर गया समझ गया कि यह तो गलती हो गई दास से जब हम बात करते हैं कि थड़ा बना दो तो बना दो गिरा दो तो गिरा दो बना दो तो बना दो। तो अब दो-तीन बार ही महापुरुषों ने कहा कि गाड़ी इधर से इधर कर दो। तो मन परेशान हो गया। उसी वक्त अंदर से जैसे कहते हैं आत्म मंथन वाली बात है। जो कहते हैं वो करना भी है। इसलिए हर पल जो है हर वक्त जो है अपने अंदर झांक के देखना है कि मैं क्या कहता हूं वो मैं करता भी हूं कि नहीं कहता। इसलिए कहते हैं कि मैं इन्हें नामों से पहचानता हूं। मेरे दुश्मन मेरे अंदर खड़े हैं। जितने भी मेरी बुराइयां हैं, जितने मेरे अवगुण है, वह तो मेरे अंदर खड़े हैं। जब मैं आत्म मंथन करूंगा तो फिर मैं हाथ आत्म हृदय परिवर्तन भी करूं तभी उसका लाभ होगा। तभी उसका फायदा होगा। देश काल ते समय मुताबिक सतगुरु ज चलांदा है हुकुमदा सिर मत्थे तर के गुरु सिख चलदा है सत संगत गुरु सिख अपने सतगुरु का मुरीद होता है वो किसी घड़ी का मोहताज नहीं है कि वो आज इस वक्त में जो सतगुरु का ख्याल है जो सतगुरु का ध्यान है उसके लिए गुरुख अपने आप को पेश करता चला जाता है कवाली के माध्यम से यह सभी महात्मा त्मा मिलजुलकर विनीत खान जी और साथी यह अभी भक्ति भरे रस में अपना योगदान दे रहे हैं और इनके उपरांत कवि दरबार के लिए कवि महात्माओं के चरणों में विनती है आप भी तैयार रहें इनके उपरांत हम कवि दरबार का आनंद लेंगे प्रेम से कहिए जिनु बाहर जा अंदर अपने बाहर जा अंदर अपने लब जिनु बाहर जाओ अंदरों अपने लब जिनु बाहर जाओ अंदरों अपने लब जिनु बाहर है जिनु बाहर जाु बाहर जा बाहर जा अंदरों अपने लबु अंदरों अपने लबु अंदरों अपने लब तू करके आ मंथन तू करके आदम अंतर में तेरे अंदर बस रब तू करके आंतर में तेरे अंदर बस रब में तू करके आदम बंधन में तेरे अंदर बस रब तू करके आदम बंधन में तेरे अंदर बसदा रब तू दिल ना किसी ना दुखाया कर तू दिल ना किसी ना दुखाया कर बेदबी तू घबराया कर बेदबी तू घबराया कर बेदबी तू घबराया कर बेदबी तो घबराया कर गुरमत पे चलना गुरत पे चलना है गुरमत चलना है गुरत पे चलना है गुरमत पे चलना है गुरमत पे चलना है तू हस्ती मार मुकाया कर तू हस्ती मार मुकाया कर तू हस्ती मार मुकाया करू हस्ती मार मुकाया कर नादान ते होई मेहर दीदान ते होई मेहर दी बड़े गजब ने कर नादान से होई मेरे बड़े गजब ने करना हो मेरे बड़े बज घर के आ मंथन में तू करके आ मंथन में तेरे अंदर बसदा रघु बंदया तू करके आ मंथन में तेरे अंदर बसदा रब बंद तो आज भी सतगुरु की कृपा से एक और सुंदर रूप कवि दरबार का फिर से सजने जा रहा है। जिसमें दासी सर्वप्रथम आमंत्रित करना चाहेगी आदरणीय महात्मा जतिन शेरगिल जी को पदमपुर राजस्थान के ये महात्मा आए और काव्य पाठ रख कर आशीर्वाद प्राप्त करें। इनके बाद हम श्रवण करेंगे एक कविता आदरणीय महात्मा बलविंदर निमाना जी से अभी जतिन शेर गिल जी अगर हर शय जमाने की तेरी नेमत नहीं होती जी अगर हर शय जमाने की तेरी नेमत नहीं होती किसी भी शय में फिर हरगिज़ छिपी बरकत नहीं होती किसी भी शय में फिर हरगिज़ छिपी बरकत नहीं होती और शेर देखिए जी जी जुबान पर प्यार की बातें हैं तो किरदार में भी हो में भी जुबान पर प्यार की बातें हैं तो किरदार में भी हो गुरु दर पर फकत बातों की ही कीमत नहीं होती क्या बात है गुरु दर पर फकत बातों की ही कीमत नहीं होती और ख्याल है जी जी ऐ मन गुमराह होकर क्यों भटकता फिर रहा है तू तू गुमराह होकर ऐ मन गुमराह होकर क्यों भटकता फिर रहा है तू अगर मंथन किया होता तो यह हालत नहीं होती अगर मंथन किया होता तो ये हालत नहीं होती बनाना चाहता है बूंद को सागर ये मुर्शिद पर बनाना चाहता है बूंद को सागर ये मुर्शिद पर कुएं से बाहर आने की मेरी नियत नहीं होती। कुएं से बाहर आने की बात है। मैं सबको प्यार करने की नसीहत देता हूं। लेकिन नसीहत देता हूं। मैं सबको प्यार करने की नसीहत देता हूं। लेकिन ना जाने मन से मेरे खत्म क्यों नफरत नहीं होती। क्या बात है। ना जाने मन से मेरे खत्म क्यों नफरत नहीं होती। और म अ कर रहा हूं। जी जी जिस दिन फिर मंजिल मकसूद तक पहुंचेगा तू कैसे? गुरु के हुक्म से अगर ये समझ सहमत नहीं होती। गुरु के हुक्म से अगर ये समझ सहमत नहीं होती। अगर हर शय जमाने की तेरी नेमत नहीं होती। किसी भी शय में फिर हरगिज़ छिपी बरकत नहीं होती। किसी भी में फिर हरगिज़ छिपी बरकत नहीं होती। आत्म मंथन समस्या नहीं ये विषय है पचोल दा आत्म मंथन समस्या नहीं ये विषय है पचोलंदा जो ब्रह्म ज्ञानी जो ब्रह्म ज्ञानी मंदा बोल ना बोलदा जो वाणी उसदी मिश्री वर्गी वाणी उसदी मिश्री रसना विच कोलदा खुशियां विच शुक्राना कर है खुशिया शुक्राना कर है दुखा विच ना डोलदा तोड़ ननी सतगुरुनी तोड़नी सतगुरु दुनिया तेरी सारी है आत्म मंथन जेकर करिए चढ़ चढ़ नाम है आत्म मंथन जेकर करिए चढ़दी नाम है अपने नाल ज की गल लब गया मसले हल अपने नाल ज की गल लब गया मसले हल सबनु मुरे लाई फिर पाके केवल शेर दी खल सब लाई पाके केवल शेर दी गल मैं आत्म मंथन अपना करना मैं आत्म मंथन अपना करना गुरु ने ये समझाई गल गुरु ने निया जीती बाजी हार जाना ना बाजी हार जा निती बाजी हार जा ना आखरी होने बारी है आत्म मंथन जे करिए चढ़ नाम कुमारी है आत्म मंथन जे करिए चढ़ नाम कुमारी है द जर्नी विद इन इंट्रोस्पेक्शन इंट्रोस्पेक्शन ऑफ द सेल्फ माय सेक्रेड ड्यूटी इंट्रोस्पेक्शन ऑफ द सेल्फ माय सेक्रेड ड्यूटी थ्रू आत्म मंथन शाइन शाइन लाइफ ट्रू ब्यूटी शाइन लाइफ ट्रू ब्यूटी टू सीक टू सीक विद इन द प्यरेस्ट आर्ट सो लेट मी जर्नी थ्रू माय हार्ट सो लेट मी जर्नी थ्रू माय हार्ट ब्यूटीफुल एम्ब्रेस इन आवर पीस एम्ब्रेस इनवर पीस लेट केओस रिलीज थ्रू सेल्फ रिफ्लेक्शन द सोल फाइन पीस थ्रू सेल्फ रिफ्लेक्शन द सोल फाइन पीस लव एवरीवन एंड जज नो अदर वि कंपैशन लिव एंड सी ऑल एस ब्रदर ऑल एस ब्रदर सतगुरुस वचन आई आई फॉलो वि ट्रस्ट सतगुरु वचन आई फॉलो वि ट्रस्ट इन सेवा सिमरन सत्संग आई मस्ट स्टे काम स्टे काम स्टे स्ट्रांग वॉक स्टेडी वॉक लॉन्ग स्टे काम स्टे स्ट्रांग वॉक स्टेडी वॉक लॉन्ग ओ सतगुरु ब्लेस मी ओ सतगुरु ब्लेस ब्लेस मी गाइड समता अलोंग ओ सगुरु ब्लेस मी गाइड समता अलोंग भाई किंतु परंतु ऐसे कैसे किंतु परंतु ऐसे कैसे यो मन का खेल पुराना से और कितना इसने समझा लो ये तो बनता हंडा साना से कितना इसने समझा लो यो बनता साना से देख के देख के मन भरना से और अपने आप पे फोकस रखूं ना और पे उंगली उठाना से अपने आप पे फोकस रखूं ना और पे उंगली उठाना से हर पल सब्र शुक्र में रह के हर पल सब्र सुकर में रह के जीवन सुखी बनाना से आत्म मंथन अपना विश्लेषण पल पल करते जाना मंथन अपना विश्लेषण पल पल करते जाना से और भाई ज्ञान का अमृत पिए पाे ज्ञान का अमृत पिए पाे के चेंज आया व्यवहार में निरंकार में जी रहे से या जीरे से अहंकार में निरंकार में जी रहे से या जीरे से अहंकार में नुक्ता चीनी में कट रही जिंदगी नुक्ता चीनी में कटरी जिंदगी या कट रही शुक्र गुजार में मनमत मन हावी से या गुरमत से किरदार में मनमत मन पे हावी से या गुरमत से किरदार में अरे भाई जब पानी में मानी चलेगी तो पानी में मानी चलेगी तो अरे मक्खन को ना थना से आत्म मंथन अपना विश्लेषण पल पल करते जाना आत्म मंथन अपना विश्लेषण पलपल करते जाना से मैं ही पर्दा बन गई मैं ही पर्दा बन गई रब फिर नजर आता कहां क्या बात है मैं ही पर्दा बन गई रब फिर नजर आता कहां आत्म मंथन कर तो लूं पर मन मेरी सुनता कहां आत्म मंथन कर तो लूं तो पर मन मेरी सुनता कहां पर्दे लाखों दरमियां थे जब तलक थी मैं मिली मैं मिटी तो मैंने जाना तू नहीं रहता कहां मैं मिटी तो मैंने जाना तू नहीं रहता कहां रूह की गहराइयों में जब समाया ज्ञान ये तब लगा यह बोलता है मैं ही सुनता था कहां तब लगा ये बोलता है मैं ही सुनता था कहां आत्म मंथन साधना है मन को गुरु के वचनों पर देखना सब में खुदा को इसके बिन दूजा कहां देखना सब में खुदा को इसके बिन दूजा कहां तू ही माली तू ही खुशबू तू ही माली तू ही खुशबू फूल भी तो तू ही है बिन इशारे के भला ये सब समझ आता कहां बिन इशारे के भला ये सब समझ आता कहां अपने आपनु जांच परख के दुनिया विच विचरना है अपने अपने आपनु जांच परख के दुनिया विचरना है दूजु समझा तो पहला आत्म मंथन करना हैु समझा तो पहला आत्म मंथन करना है बाहर बेशक सादगी होवे बेशक सादगी होवे अंदर सोच सुहापन वाली रखिए कर्म ने फिर निखरना है जी प्यार मोहब्बत सा मजहब जी प्यार मोहब्बत स मजहब अ इबादत एक रब दी बनके हवा सुकून दी सबने दुनिया वि पसरना है पर उपकार दी फितरत होवे परो उपकार दी फितरत होवे रहम दिली दी दौलत होवे क्या बात है ये चीज ने बहुत जरूरी जरूरी बाज ना सरना है बाज ना सरना है कार चज अचार दी कोमल सोजी पाके फिर दुख सुख सब दुनिया नल साझे हर दिल विच करना है सतगुरु सानु खास बनाया सावधानियां बोल ना जाइए साडी छोटी जी गलती ने जगनु बड़ा अखरना है साडी छोटी जी गलती ने जगन बड़ा अखरना है तेरी जिस पर इनायत हो गई है तेरी जिस पर इनायत हो गई है उसे सबसे मोहब्बत हो गई है क्या बात है बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया बदल कर देखा है जब से नजरिया बदल कर देखा है बदल कर देखा है जब से नजरिया ये खलकत खूबसूरत हो गई है क्या बात बहुत अगरचे मान मिट जाए तो समझूं अगर मान अगर अगरचे मान मिट जाए तो समझूं बड़ी आसान इबादत हो गई है बहुत वो खुशकिस्मत है जिनको वक्त रहते वक्त रहते वो खुशकिस्मत है जिनको वक्त रहते खुदा पाने की चाहत हो गई है क्या बात है क्या बात है। बहुत खूब क्या बात है। गिरा कर दूसरों को शाद होना। गिरा गिराकर गिरा कर दूसरों को शाद होना मेरी ये कैसी फितरत हो गई है। क्या बात है। गलतियां दूसरों में ढूंढती हूं। यही मुझसे हिमाकत हो गई है। और खास ख्याल जी इलाज इस मैं का मुर्शिद आप कर दो। क्या बात है। क्या बात है। इलाज इस मैं का मुर्शिद आप कर दो। खराब इससे ही सेहत हो गई है। स्पेशलिस्ट बहुत बढ़िया। इलाज इस मैं का मुर्शिद आप कर दो। खराब से ही सेहत हो गई है। तेरा दीदार करके साहिबा हम तेरा दीदार करके साहिबा हम सभी की रूह को राहत हो गई है। ना लफ्जों तक रहे महदूद हो किरदार जीवन में। गुरु के शब्द बन पाए मेरा आधार जीवन में। क्या बात है गुरु के शब्द बन पाए मेरा आधार जीवन में मिटा के अपनी हस्ती को कभी उस पार चल ए मन मिटा के अपनी हस्ती को कभी उस पार चल ए मन कि शायद देख ले तू भी नया संसार जीवन में कि शायद देख ले तू भी नया संसार जीवन में अभी भी देखती आंखें है घर हम छोटा बड़ा कोई अभी भी देखती आंखें है घर छोटा बड़ा कोई यकीनन है मुझे मंथन की अब दरकार जीवन में यकीनन है मुझे मंथन की अब दरकार जीवन में अभी भी वक्त है बाकी संभल जा ए दिल नादान अभी भी वक्त है बाकी संभल जा ऐ दिल नादान नहीं मौके मिला करते यू हर बार जीवन में नहीं मौके मिला करते हैं यू हर बार जीवन में कदर तू जान ले इनकी मेरे गुस्ताख मन वरना कदर तू जान ले इनकी मेरे गुस्ताख मन वरना बड़ी रहमत से मिलता है कभी साकार जीवन में बड़ी रहमत से मिलता है कभी साकार जीवन में और म देखिएगा गुनाहों से बचे रहते हैं केवल वो बशर चंदन सदा जो जोड़ कर रखते गुरु से तार जीवन में सदा जो जोड़ कर रखते गुरु से तार जीवन में ना लफ्जों तक रहे महदूद हो किरदार जीवन में गुरु के शब्द बन पाए मेरा आधार जीवन में गुरु के शब्द बन पाए मेरा आधार जीवन में अभी अभंग के माध्यम से यह महात्मा कृपा कृपा करेंगे। मुंबई महाराष्ट्र से आए संत जन हम सभी जानते हैं भक्ति में अभंग कितना कितना सत्संगत महात्माओं ने अपना आनंद महसूस किया। ऐसे पाठ से आइए मिलजुलकर हम इनके साथ भक्ति भरे इस माहौल में और अपना ध्यान जोड़ते रहते हैं और आगे दास निवेदन करेगा कृष्ण कन्हैया पाठक जी नेपाल से यह महात्मा नेपाली भाषा का सहारा लेते हुए इनके बाद हम इनसे इनके भाव श्रवण करेंगे। अभी अभंग का हम सब हिस्सा बनते हैं और भक्ति का आनंद ले। रेणु पासुरी ब्रह्मा वरुण पासुनी ब्रह्मांडला तो माला के पाला स्थावर जंगम भरुनी उरला स्थावर जंगम वरुण उरला दृष्टि ने पाला रेणु पासु ब्रह्मांडला विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल सा संगत जी यह सदा ही एहसास दास लस कि दास को अस्तित्व छ ना सा संगत जी भटा बहद आरण्य को उपनिषद को पंचम अध्याय को पहो ब्राह्मण को श्लोक छु था होला ओम पूर्णमदः पूर्णमदम पूर्णत पूर्णमदच्छते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ओम पूर्णमः यो निराकार पूर्ण छ पूर्णदम सतगुरु यो संसार यो पनी पूर्ण छ किन भने पूर्ण बाटा निष्के को जो पनी पूर्ण नहीं हुछ र साध संगत जी हाम्रो ध्यान संसार तरफ ना जाओस त ले ऋषि ले उपनिषद ले महापुरुष ले यो संसार नश्वर छ ना जाओ यो परब्रह्म परमात्मा सद्गुरु को तरफ जाओ इस कारण ले संसार लाइ नश्वर बनो ध्यान ना जाओ सामरो वरना पूर्ण छयो परमात्मा तो उसको रचना प पूर्ण छ सद्गुरु पनी पूर्ण छ साक्षात परबह्म छ सा संगत जी अंश मात्र होना प्रत्येक मानो पूर्ण छ एहसास सद्गुरु लेकर आ यो ज्ञान दिएरा कि हा वास्तव मा यो पूर्ण को अंश हो हामी पनी पूर्ण छ यो संसार नश्वर छ हमरो ध्यान यथा तेरा ना जास नश्वर बन सा संगत जी य तरफ हमरो ध्यान जास र श्रीमद् भागवत महापुराण को प श्लोक दास यहां राह त प स्कंध को 20ो अध्याय को सों श्लोक मा भगवान श्री कृष्ण ले उद्धव को प्रश्न मा यो उल्लेख गर्न भयो निर्देह माध्यम सुलभम सुदुर्लभम प्लव सुकल्पम गुरुक धमम मया अनुकूलन न भतेतम उमान भवािम नतरे सयात्मा नरदेह नदे नर को शरीर पायरा मानव को शरीर पायरा यो मानव को शरीर जो कि वास्तव में आपनो पुरुषार्थ हो ना सुलभम सुदुर्भम अति दुर्लभ चीज थियो यो निराकार परबह्म परमात्मा को कृपा ले यो सुलभ भयो दासी निवेदन करना चाहेगी आदरणीय बहन संप्रीति जी बहन समीपता जी बहन वंदिता जी, बहन अभिन्नति जी, बहन भावनी जी और बहन अगम्या जी यह सभी बहने मिलजुलकर सद्गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे और इनके बाद निवेदन करूंगी मलाड मुंबई से आए महात्मा आदरणीय बकुलरीवाला जी भी अपने भाव साध संगत के समक्ष रख के सद्गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। अभी आदरणीय बहन संप्रीति जी हाउ मेनी टाइम्स आई स्टमबल्ड येट लव स्टिल नेवर वि हाउ मेनी स्टर्म्स आई क्रिएटेड येट पीस केप्ट शाइनिंग थ्रू ग्रेटट्यूड राइेस लाइक डॉन फॉर द अनसीन गाइडिंग हैंड दैट स्टडीड माय ट्रेंबलिंग हार्ट एंड हेल्प मी अंडरस्टैंड दिस जर्नी डीप विद इन इज द ग्रेटेस्ट ब्लेसिंग आई नोन रिटर्न टूटर्नल ट्रुथ टू द वन निरंकार माय ओन हु हेल्प मी क्लोज व्हेन आई फॉरगॉट टू केयर एंड विस्पर्ड इन द साइलेंस माय चाइल्ड आई एम ऑलवेज देर सा संगत जी प्यार से कहना धन जी तक डोले है तेरा उड़ तक डोले नहीं उपकार है तेरा मेनु खंगो आने मेनु खंगो आने उपकार है तेरा गुण तक डोले नहीं उपकार है ये तेरा अलाो है आो कई बारु लगाया अकला देो कई बार तेु लगाया तू जवाब सी हर गल फिर भी सवाल उठाया फिर भी सवाल उठाया फिर भी सवाल उठाया मुख फिर भी मोड़िया नहीं उपकार है ये तेरा ऐ है ये तेरा बेगर है तेरी उल्फत निस्बत है तेरी प्यारी बेदर है तेरी उल्फत निस्बत है तेरी प्यारी कच्चे गुनाह तू अंत तक जिंदगी मेरी सवारी जिंदगी मेरी मेरी सवारी जिंदगी मेरी सवारी इश्क के तू तो लेने उपकार है तेरा इश्क के नु तो नहीं उपकार है ये तेरा मेनु खंगो आने मेनु खंगो आने उपकार है तेरा हु तक डोले नहीं उपकार है ये तेरा गुण तक डोल नहीं उपकार है ये तेरा किसी को जन्नत की तलब है कोई अपने गम से है परेशान जरूरत सजदा करवाती है आजकल इबादत करता कौन है मानव ने अपनी एक फितरत बना रखी है कि परमात्मा की ईश्वर की जरूरत तब ही महसूस होती है जब तक कि मेरा काम चल रहा है या जब तक कि मेरा काम चल जाए फिर उसके लिए चाहे शायर कहता है कि आज तक खुदा बदल ना पाया इंसान को पर आज तक इंसान ने कई खुदा बदल डाले और फिर ऐसे भूले भटके मानव को समझाने के लिए जगाने के लिए यह प्रकट होते हैं और आत्म मंथन का नारा देते हैं जिनके लिए 325 नंबर पर शहंशाह बाबा अवतार सिंह महाराज जी ने लिखा लिखा संपूर्ण अवतार वाणी में कि रब मायादा पर्दा पा के सतगुरु बन के है होता तो रब ही है स्वयं त्रैलोकीनाथ है पारबह्म होता है बट शारीरिक चोला लेकर के प्रकट होता है रब मायादा पर्दा पा के सतगुरु बन के है उद्देश्य क्या है एकमात्र उद्देश्य लेकर के कहे अवतार ये रूह ते रब दा हाथी मेल कर आंदा है जो भटकन है वह इस कारण से है क्योंकि क्योंकि जिसके साथ में जुड़ना है उससे नहीं जुड़ा है। इसलिए ये आत्म मंथन आत्मचिंतन का नारा देते हैं। और फिर आकर के आप हमें जी करके भी समझाते हैं दिखाते हैं। मेरा आत्मचिंतन आत्म मनन तो तब होगा कि जब मैं यहां से चलूं अपने वतन की तरफ अपने राज्य की तरफ अपने शहर गांव कस्बे की तरफ और कोई संत जो है समागम पर नहीं आए होंगे। इस साकार रूप में दर्शन नहीं किए होंगे। जिन्होंने सतगुरु के समागम में यहां पंडाल में मौजूद नहीं हुए होंगे। और वह अगर मुझसे आकर के मिले तो मुझसे मिलकर के उसका वहीं पर समागम हो जाना चाहिए। फिर मुझसे मिलकर के उसको मेरे अंदर ही सतगुरुदेव आपके दर्शन हो जाने चाहिए। तब जाकर के कोई बात है। तब तो मेरा समागम है। वरना यह फिर एक विषय हो जाएगा जो पिछले 77 इयर्स से चल रहा है। हम कुछ विषय है उस पर कुछ बोलना है। नहीं अब बात यह नहीं है। अब तो यह दरबार है जिसके लिए बताते हैं श्री रामचरितमानस जी में कि कोटि विप्रवद ला गई जाऊं। जिसके ऊपर अगर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्याओं का भी पाप क्यों ना चढ़ा हो ऐसा भी पापी अगर मेरी शरण में आता है आई शरण तजव नहीं ताऊ उसको भी मैं गले से लगा लेता हूं सनुख होए जीव मोहे जब ही जैसे 63 हम लिखते हैं हिंदी में सामने सामने सनुख होए जीव मोहे जब ही उसका फल यह मिलता है कि जन्म कोटि अग नाश तभी उसी क्षण में उसके करोड़ों जन्मों के अग माने पाप को नष्ट कर देता हूं मेरे पर तो इनकी कितनी कितनी बार निगाहें पड़ती है, पड़ी है। कितनी बार सर पर हाथ रखते हैं? तो आत्मा का एमआरआई सिटी स्कैन हो जाना चाहिए था कि नहीं हो जाना चाहिए था अभी तक? फिर कहने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए थी कि मैं इनका भगत हूं। फिर मेरे अंदर देख के जिस तरह से किसी उपवन में कोई फूल खिलता है तो किसी को निमंत्रण थोड़ी देता है WhatsApp पर या Facebook पर कि मैं खिल गया हूं। जैसे कहीं-कहीं सूर्योदय होता है तो किसी को थोड़ी मैसेज आता है, टेक्स्ट आता है। उसके अंदर से निकलने वाली गंध इस बात का प्रमाण होती है कि कहीं कोई महक आ रही है। जिस तरह से सूर्योदय होता है तो उसके अंदर से निकलने वाला प्रकाश इस बात का प्रमाण होता है कि कहीं सूर्योदय हो गया है। मेरा समागम तो तब है जब जिनके संपर्क में मैं आ जाऊं। सच्चे पाशाह ने कल भी कहा फिर वो ढोंग नहीं फिर वास्तविकता में मेरा आत्म मंथन अगर हुआ है तो मेरे रोम रोम से फिर इनकी शिक्षाएं बहेगी फिर मेरी आंखों से प्रेम बहेगा फिर मेरी जुबान से मिठास बहेगी फिर मेरे व्यवहार में इनकी झलक दिखाई देगी फिर किसी को कहने की आवश्यकता नहीं है कि भाई साहब आप सात आठ दिन थे नहीं कहीं गए थे क्या हां जी हम समागम पर गए थे फिर वो पूछता है भाई साहब ये समागम क्या होता है यकीन जानना हम में से बहुतों के पास ठीक-ठीक उत्तर नहीं होता है फिर मैं कह देता हूं की विशाल प्रांगण था। जी लंगर में जो दाल बनी थी लाजवाब थी। प्रदर्शनी तो 3D की थी। ओ पब्लिकेशन में कमाल की टीशर्टें बोतलें आई हुई थी। फिर वो पूछता है भाई साहब ये समागम क्या होता है। यकीन जाना मेरे पास ठीक-ठीक जवाब नहीं होता। क्योंकि मैंने आत्म मंथन मेरा किया ही नहीं कि मैं क्यों यहां आया? इन्होंने क्यों मुझे अपने चरणों से जोड़ा। रब माया दा पर्दा पा के सतगुरु बनके आंदा है एक मात्र उद्देश्य को लेकर कहे अवतार ए रूह ते रब दा हती मेल करंदा है सच्चे पाशाह मेहर करो दया करो ना गरज किसी से वास्ता मुझे काम अपने ही काम से तेरे जिक्र से तेरी फिक्र से तेरी याद से तेरे नाम से सच्चे पाशाह मेहर करो अपनी याद दो अपना एहसास दो अपना सिमरन दो जो जीवन आप चाहते हैं आप तो जी कर दिखाई रहे हमारे भी सर पर हाथ रखिए कि जब हमसे कोई मिले तो हमारे अंदर उनको आपकी झलक दिखाई। यह ऐसी दात है, यह ऐसी देन है मेरे सतगुरु की कि जहां रोशनी के साथ रोशन किया वहीं साथ की साथ हर तरह से महका दिया। फिर जहां भी गया वो महक साथ-साथ चलती चली गई। ऐसा एक स्वर्ग, ऐसा एक संसार सतगुरु बनाना चाह रहे हैं और जो निरंतर बनता चला जा रहा है। एक, दो, तीन, चार, अब लाखों का यह परिवार जहां-जहां यह है एक से न जाने कहां-कहां पर वह एक स्वर्गीय नजारा बन जाता है। अभी जैसे प्रार्थना की थी जगत जी और साथी यह सभी मिलजुलकर एक गीत द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करेंगे और इनके उपरांत दास निवेदन करेगा दीपक बिष्ट जी यह महात्मा भी कृपा करेंगे दिल्ली से दीपक बिष्ट जी इनके बाद कृपा करें तेरा ही तो अंश हूं मैं तेरा तेरा ही तो वंश हूं मैं। तेरा ही तो अंश हूं मैं। तेरा ही तो अंश हूं मैं। ना मैं मिट्टी ना मैं पानी आग हूं हवा हूं मैं इनसे बनाए पुतला लेकिन इन सब से ना बनाऊं मैं ना मैं मुख हूं ना मैं सर हूं कान हूं ना आंख हूं हूं मैं ना मैं बुद्धि ना मैं मन हूं और नहीं ये नाग हूं मैं ना मैं बूढ़ा ना मैं बच्चा और नहीं मैं नौजवान हूं इस तन के अंदर रहता हूं। लेकिन मैं ये तन कहां हूं? तेरा ही तो अंश हूं मैं। तेरा ही तो वंश हूं मैं। तेरा ही तो अंश हूं मैं। तेरा ही तो वंश हूं मैं। सत्संगत धर्म ग्रंथों में बाणियां जो लिखी गई उसके अनुसार यही पता चला कि सागर मंथन हुआ था। देवता और दैत्य दोनों ने उसमें पार्टिसिपेट किया। मगर यह इस बात का प्रमाण है कि उस वक्त भी नारायण साक्षात मौजूद था। मंथन कभी पदार्थों में किया गया। मगर आज जो इतिहास है आज जो वर्तमान चल रहा है। आज सतगुरु जो चाहता है वह जो मंथन हो वह विचारों के द्वारा हो कर्मों के द्वारा हो शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी ने भी मंथन किया फोके कर्म कमाई जाना सिर्फ रेड का पानी दा मक्खन तो दूध चो निकलना फिरना कम मदानी दा इसीलिए शहन शाह बाबा अवतार सिंह जी ने फिर लिखा आप कदे कोई पार नहीं होया कोई प्राणी सोचे मैं अपने आप पार हो जाऊं हो ही नहीं सकता आप कदे कोई पार नहीं होया ए चाहे ता बेड़ा पार इनकी कृपा हो तो हम इस भवसागर से पार हो सकते हैं। यह तो बार-बार हमको झंझोर रहे हैं। आज विचारों के द्वारा मथा जा रहा है। यह जीता जागता प्रमाण है। इतने लोग इतने भगत महात्मा एक साथ बैठे हैं। और जिसका मन सत्संग में नहीं लग रहा इसका मतलब विष धीरे-धीरे बाहर जा रहा है। और जो यह एकांत भाव से शांत भाव से इतनी भीड़ के अंदर भी अपने मन को स्थिर करके बैठा है। इसका मतलब वो कुछ मथने का प्रयास कर रहा है। मथने का प्रयास कर रहा है और उसे जरूर निकलेगा। इन्होंने आशीर्वाद दिया है निकलेगा जरूर निकलेगा और क्या निकलेगा इतनी भीड़ के बावजूद क्या निकलेगा स्थिर मन जो शांत होकर के बैठेगा उसका मन शांत हो जाएगा स्थिर मन सहज जीवन वो शांत शांत शांत होता चला जाएगा इसीलिए तो निकारी मिशन बार-बार कहता है मानव को मानव हो प्यारा एक दूजे का बने सहारा। आप ही तो वह भगत महात्मा हो जो एक दूसरे को सहयोग कर रहे हो। साध संगत संसार में ऐसी प्रवृत्ति देखने को नहीं मिलती। शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी फिर इंसान को झकोड़ रहे हैं। एक पासे ने दुख दुनिया दे एक पासे सुख सारे ने उधर नो ओ दुनिया वाले इधर रब दे प्यारे ने होधर है हरे हरदम पर इधर लशकारे ने उधर होंदे रोने धोने इधर नवे नजारे ने उधर बैर ईरखा झगड़ा ए दुनिया है प्यारा दी ओधर रुत खजा दी हरदम इधर रुत बहारा जी दुनिया दा ते इको कम है ओना रोला पाना है कहे अवतार डूबदा बेड़ा संता बनने लौना है आपके ऊपर सतगुरु ने उम्मीद करी है सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी भी फरमा रहे हैं दुनिया में गिनती हो अपनी अरे गिनती तो होगी कहीं ना कहीं तो गिने जाएंगे मगर बाबा हरदेव सिंह जी उम्मीद करते हैं गुरु सिख से दुनिया में गिनती हो अपनी आग बुझाने वालों में कहे हरदेव ना शामिल होना आग लगाने वालों में फिर समझाया गया ये तो बार-बार समझा रहे हैं हमारे को अरे आग का क्या है आग का क्या है पल दो पल में लग जाती है अरे सदियां लग जाती है बुझाने में सदियां लग जाती है बुझाने गाने में वो मंथन हुआ था। आज भी मंथन हो रहा है। इधर से उधर से विष निकल रहा है। मगर बाद में अमृत ही निकलेगा। जो बैठा रहेगा शांत भाव से आराम से बैठा रहेगा। यहां से अमृत लेकर ही जाएगा। जैसे निवेदन किया था आदरणीय बहन दिव्या भारती जी बटोत जम्मू कश्मीर की यह बहन महफिलें रूहानियत की एक पंजाबी रचना लेकर आप जी के समक्ष आए हैं। तो इनके बाद दासी प्रार्थना करेगी परम आदरणीय बहन समता जी भी आकर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। लिखी अर्जी चरणच करी मंजूर सतगुरु निब जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु निब जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु लिखे ऐसी चरण करे मंजूर सतगुरु निभ जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु निब जाए दर तेरे मेरे हजूर सतग भी देखिए बालों भी नेकी इस मार्ग चलना है ओखे गुरु सिख ठंडियों भी देखी बालों भी इस मार्ग चलना ओखे गुरु सेखिए जिन सिर पे तू हाथ रखे उठ के हजूर सतगुरु निभ जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु निभ जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु माया ते संता ने कदे आस ना लाई सेवा गुरु सिखा दी की असल कमाई माया ते संता ने कद आस ना लाई सेवा गुरु से दी असल कमाई सेवा करते ही निबे हजूर सतगुरु निब जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु निब जाए दर तेरे मेरे हजूर सतगुरु सबसे पहले दासी सदगुरु माता जी का थैंक यू करना चाहती है। लगभग 5 महीने पहले इनसे ही आशीर्वाद लेके जो दासी ने एक संगत के सामने एक प्रॉमिस किया था वो इन्होंने उसकी लाज रखी और आज आप सबके सामने स्वस्थ हेल्थी बैठे हैं। आप सबको आशीर्वाद देने के लिए थैंक यू माता जी साध संगत जी पिछले पांच महीने दासी के लिए बहुत एक्सपीरियंस और लर्निंग वाले महीने थे जहां एक पारिवारिक रूप में देखें तो एक दो बहनों की तरह शायद बचपन के बाद अब दासी ने दिन रात एक घर में सदगुरु माता जी के साथ ये पांच महीने बिता आए इनकी सेवा करते हुए इनसे प्यार लेते हुए वहीं यह पांच महीने जो लर्निंग जो एक्सपीरियंसेस हुए वो दासी के लिए लाइफ टाइम की लर्निंग है। साध संगत जी जैसे सद्गुरु माता जी ने अपनी प्रार्थना दिवस वाली विचार में बताया संगत को कि कैसे ऑनलाइन सत्संग बैठ के देखते थे तो दासी भी साथ होती थी। तो माता जी ने कई बार अपनी आंखें नम कर लेनी और जब पूछना दासी ने कि आप जी ठीक हो ना तो यही बोलना कि साध संगत की बहुत याद आ रही है तो दिल उदास भी हो जाना कई बार और यही ध्यान में आना कि सच्ची सतगुरु जितना संतें सद्गुरु को प्यार और मिस करती हैं शायद शायद उससे ज्यादा ही गुरु संगत को मिस कर रहे थे। तो दासी साथ ही यही फील करती रही कि जो हमेशा सुना कि सद्गुरु एक तप त्याग की मूरत होता है। दासी ने यही देखा कि जब ऐसे हेल्थ का थोड़ा सा हुआ और उस समय भी जो सद्गुरु माता जी ने और राजपिता जी ने डिसीजन लिया कि यह पांच महीने जब सद्गुरु माता जी नहीं होंगे स्टेज पर विराजमान तो उनका यही ध्यान बना कि राजपिता जी जाएं और सारी साध संगत को अपना आशीर्वाद दें और सदगुरु माता जी का भी प्यार और आशीर्वाद उन तक पहुंचाएं। तो चाहे कितना भी अंदर से राजपिता जी का भी दिल करता था उस वक्त कि सद्गुरु माता जी के साथ ही रहूं। लेकिन फिर भी एक सद्गुरु को संतों से ऊपर कुछ भी नहीं होता। उन्होंने राज पिता जी को संगत के बीच भेजा और हम सब ने वो पांच महीने देखे। कैसे राजपिता जी ने दिन रात लगा दिया। इतने टूअर्स बैक टू बैक इंडिया में अब्रॉड और इतना हेक्टिक टूअर्स बनाए कि जल्दी से टूअर खत्म करें और सतगुरु माता जी के पास वापस आए और दासी ने हमेशा देखा कि हर टूअर पर जाने से पहले राजपिता जी पूरी चरणों में लेट के नमस्कार करते थे और यही अरदास करते थे कि माता जी आप आशीर्वाद दो कि दास जा रहा है आप जी का मैसेज पहुंचाने आपका प्यार पहुंचाने तो जैसे आप चाहते हो वैसे ही वह सब तक पहुंचे और वहां सतगुरु माता जी भी आप सब संतों के लिए राजपिता जी के साथ अपना प्यार आशीर्वाद भेजते थे और जब राजपिता जी के वापस आने का भी टाइम होना तो दासी ने कई बार बोलना कि आप जी प्लीज आराम करो कई बार थोड़ा लेट आते थे टूअर से वापस पर सतगुरु माता जी वेट करते रहते थे कि नहीं मैं मिलके ही सोऊंगी तो वही दासी को जहां एक आपस में राजपिता जी और माता जी का जो प्यार और जो साथ इतना वो एक्सपीरियंस भी किया कि सच्ची में जो एक गृहस्ती का एग्जांपल ये बन के दिखाते हैं जो प्यार आपस में और वही ये जो एक्सपीरियंसेस और ये जो लर्निंग हुई तो दासी ये कभी भी भूल नहीं सकती और जो सद्गुरु माता जी ने अपनी सेवा का मौका दिया दासी तो बिल्कुल इसके लायक नहीं है। दासी को कुछ भी नहीं आता। लेकिन थैंक यू माता जी। आप जी ने यह सेवा बक्शी अपनी अपने अपने पास रखा। और दासी यही अरदास करती है जी। दासी को पता है कि इन पांच महीनों में आप जी की सेवा में बहुत कमी दासी की तरफ से रही। और बहुत गलतियां हुई। जी, दासी को पता है कि बहुत कमियां और बहुत गलतियां की। आप जी प्लीज बक्श दो। आप बख्शहार हो जो भी इन महीनों में आप जी की सेवा या आपकी कोई शान के खिलाफ बात दासी की तरफ से हुई हो आप जी प्लीज बखश दो और आगे से यही आशीर्वाद दो कि आप जी की सेवा अच्छे से निभा पाए दासी कृपा करना सच्चे बादशाह जहां आपका हर एक पल हमारे लिए है। हमें इस हर एक पल की कीमत का अंदाजा हो। और हर एक पल सिर्फ इस ख्याल में बीते कि कहीं कोई ऐसा ख्याल तक ना आ जाए जो आपको कबूल ना हो। तो अभी यह महात्मा मिलजुलकर आशीर्वाद प्राप्त करें। सुमित वधवा जी महफिलें रूहानियत हम सभी जानते हैं। अभी भी हमने बहनों से गीत रचना सुनी। उसी लड़ी को आगे बढ़ाते हुए यह महात्मा भी मिलजुलकर भक्ति भरी इस धारा को और ज्यादा अपना योगदान देते हुए सबको आनंदित करते जाएंगे। सुमित वाधवा जी कृपा करें अपने साथियों से। चंडीगढ़ से यह महात्मा यह अभी आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। मुख गुरु तो ना मोड़ नहीं रुलगा। मुख गुरु तो ना मो नहीं रुगाई किस देनी जे तू भूल जाएगा कोई किस देनी जे तू भूल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ी नेता रुल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ ने रुल जाएगा। तेनु मिले सौदागर तेरा मुल पे गया मेरे को तू च मिल सौदागर तेरा मुल पे गया मेरे को तू च गया होके हीरा संग कोिया दे तुल जाएगा होके हीरा संग कोिया दे तुल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ी नहीं रुल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ी रुल जाएगा ये है रहमता दा साईं मैं तो प्यार मंग ले प्रीत अल नि श्रृंगार मंग ले है रहमता साईं तो प्यार मांग ले प्रीत अल नि श्रृंगार मांग ले तू भी प्यार दी हरी बन झूल जगा तू भी प्यार दी हरी बन झूल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ी नहीं रुल जाएगा मुख गुरु तो ना मोड़ी नहीं रुड़ जाएगा अब हम वहीं पर बढ़ रहे हैं और दास वहीं पर नतमस्तक हो रहा है आदरणीय और परम श्रद्धेय निरंकारी राजपिता जी के चरणों में प्रार्थना विनती करें कि हम सभी मिलजुलकर इनसे अब आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। सदगुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी महाराज की जय साध संगत जी प्रेम से कहना 78वा निरंकारी समागम आप सब संत इस समागम की शोभा बने हैं और जो सबसे बड़ी कृपा कि सबको अपने सदगुरु के दर्शन हो रहे हैं मुस्कुराहटें मिल रही हैं, दीदार हो रहे हैं। तो जो बार-बार अभी जिक्र के चार पांच महीनों बाद सतगुरु माता जी इस रूप में प्रार्थना दिवस वाले दिन हम सबके बीच शामिल हुए तो वो जो भाव है कि यह साकार रूप में तो बेशक प्रार्थना दिवस वाले दिन दर्शन हुए और गुरु सिख के जीवन में गुरु सिख के हर पहलू में सद्गुरु निरंतर प्रतिपल शामिल ही रहता है और फिर जहां शुक्राना बनता है कि यह जो प्रेम बखशा है दास भी सारी साध संगत को हृदय से शुक्राना ही कहना चाहेगा कि जो प्रेम आप सबसे इन पिछले चंद महीनों में मिला निरंतर मिलता आ रहा है। पर जब यह चार पांच महीनों का जिक्र हो रहा है तो आप सब जी ने इतना प्रेम दास को भी दिया कि किसी भी प्रकार की ऐसी महसूसियत नहीं हुई के कुछ भी फर्क है या दास अकेला है तो आपके प्रेम ने वह प्रेम दास को भी दिए रखा और यह जो प्रेम सद्गुरु ने बख्शा है। दास अक्सर कहता है कि यही प्रमाण है भक्ति का यही प्रमाण है जीवन में ब्रह्म ज्ञान के होने का। तो इन पांच महीनों में जिन भी स्थानों पर जाने को मिला। तो बहुत प्रेम पूर्वक भावों से स्थान स्थान पर महापुरुषों ने दास को कहा कि सद्गुरु माता जी को कहना के आई मिस यू। सद्गुरु माता जी को कहना कि आई लव यू। तो दास भाव तो सबके समझ पा रहा था कि सब अपना भाव पहचाना चाह रहे हैं। पर दास के मन में आया। दास तो रोज फोन करके कह देता है कि आई मिस यू। आई लव यू। और जब भी किसी महापुरुष ने यह कहना तो दास को यही लगता था कि चलो अपने साथ वाले के मैसेज के साथ आपका मैसेज भी दास दे देगा। और फिर जब भी कहीं से रवानगी होनी तो प्रेम भाव से भोले भाव से महापुरुषों ने कहना कि अगली बार सतगुरु माता जी को साथ लाना अगली बार सतगुरु माता जी को साथ लाना तो दास आज के दिन का ही इंतजार कर रहा था इस बात का जवाब देने के लिए क्योंकि सबने कहा तो अब सबको उस मोमेंट में तो जवाब नहीं दिया गया पर क्योंकि आज सारा ही परिवार शामिल है, समागम है, सद्गुरु साथ बैठे हैं। तो दास ने यही कि जब सब ने कहा कि अगली बार सतगुरु माता जी को साथ लाना तो दास यही कहना चाहेगा कि लाने वाले यह हैं। यह दास को साथ लाएंगे। आपके अपने भेजने वाले भी आप सबके पास ये और आगे आप सबके बीच अपने साथ लाने वाले भी तो सतगुरु माता जी दास को साथ जरूर ले जाना तो ये जो प्रेम है ये जो मौके हैं ये जो पल हैं इनकी कीमत कीमत नहीं डाली जा सकती। एक-एक पल इतना कीमती, जीवन इतना कीमती और निरंतर यह जो बात हो रही है आत्म मंथन की बात हो रही है भक्ति वाले भावों की। बात हो रही है। इस अविनाशी सत्ता को प्राप्त करने की। बात हो रही है। परोपकारों की बात हो रही है नर सेवा नारायण पूजा वाले भावों की तो संत युगों युगों से यही संदेश दे रहे हैं कि यह समय जो है बहुत कीमती है एक-एक पल बहुत कीमती है और समय रहते जिसने इसकी कदर डाल समय रहते इस धरा पर आने का मकसद पूरा कर लिया तो वह जीवन मुबारक हो जाते हैं। वो जीवन फिर अमर हो जाते हैं। क्योंकि इस अमर अविनाशी से नाता जोड़ लेते हैं अपना समय रहते रहते। अक्सर बात की जाती है जब भी धर्म या धार्मिक भावनाओं की बात होती है कि कुछ किसी के हिसाब से धार्मिक होना कोई विधियां करना है। किसी के मुताबिक धार्मिक होना किसी प्रकार के कपड़े पहनना है। किसी के मुताबिक धार्मिक होना कोई ग्रंथ वेद शास्त्र पढ़ना है। किसी के मुताबिक धर्म की परिभाषा यह किसी के मुताबिक धर्म की परिभाषा वो जैसे-जैसे स्थान स्थान पर जाते हैं। संस्कृतियां देखते हैं। कल्चर देखते हैं। रिलीजंस ऑफ द वर्ल्ड देखते हैं। सबके अपने-अपने भाव हैं। और फिर सब कह यह देते हैं कि मंजिल तो एक ही है। जाना तो एक ही जगह है। हम ऐसे जा रहे हैं। आप ऐसे जा रहे हैं। पर आत्मा मंथन करने वाली बात यह है जीवन के छोटे से छोटे पहलू में भी अगर देखें जो सबका अपना-अपना है। पर्सपेक्टिव जिसे कहा जाता है। यह मेरा पर्सपेक्टिव है। यह मेरा दृष्टिकोण है। यह मेरा हिसाब है। जो सबका अपना-अपना है। मेल नहीं खाता। वो सत्य कैसे हो सकता है? सत्य तो सिर्फ और सिर्फ उसे कहा जा सकता है जो सबका एक जैसा है। ऐसी सत्ता ऐसी बात जिसके लिए कहा गया है आद सच जुगाद सच है भी सच नानक होसी भी सच अनादि काल से जो सत्य है किसी के हिसाब किताब से उसमें फर्क नहीं पड़ता मेरे हिसाब से क्या सत्य है जिसे मैं यह बात की तरह सत्य घोषित करता हूं कि मेरे हिसाब से यह सच्चाई है वो मेरा हिसाब हो सकता है वो सत्य नहीं हो सकता क्योंकि सत्य एक है अक्सर पढ़ने को मिलता है, देखने को मिलता है कि दो लोग जब बात करते हैं और किसी तीसरे से पूछो कि सच क्या है? तो वह कहता है तीन सत्य हैं। एक इसका सत्य, एक उसका सत्य और जो एक सच में बात हुई जो सत्य है। अब छोटे-छोटे एग्जांपल्स लेकर देखें। इस वक्त रात्रि है। हम सबके लिए भार रात्रि है। कोई यह नहीं कह सकता कि मेरे हिसाब से रात्रि है। सत्य है। इस वक्त का इस जगह पर यह सत्य है। अमेरिका में टाइम ज़ोंस की वजह से वहां का सत्य यह होगा कि वहां सूरज चढ़ चुका है। ये तो मायावी सत्यों की दास बात कर रहा है। तो जब सृष्टि में भी कुछ यूनिवर्सल ट्रुथ डाले गए हैं कि सूर्य उदय कहां से होता है? सन राइज इन द ईस्ट। पूरब से उगता है। सत्य है। सबके लिए ही सत्य है। जब इस सृष्टि में भी इस परमात्मा ने यह झलक दी है। यह जो मेरी बनाई हुई सृष्टि है। उसमें प्यास सबकी पानी से ही बुझती है। यह सत्य है। कोई बात या हिसाब नहीं है कि मेरी प्यास पानी से बुझती है। आपकी प्यास किसी और चीज से बुझती है। मेरा जीवन ऑक्सीजन से चल रहा है। हवा में है। हम सबका ही जीवन हम सबके लिए सत्य है। यह संकेत दिए इस परमात्मा ने कि मेरी बनाई हुई चीज सबके लिए सत्य है। एक जैसा है तो फिर परमात्मा कैसे मेरा तेरा मेरे हिसाब वाला तेरे हिसाब वाला हो गया जब बनाई हुई रचनाएं जिसे माया कहा गया है इस प्रभु की बनाई हुई रचना कहा गया है उसमें भी यूनिवर्सल ट्रुथ डाले हैं तो यह नहीं कि मेरा सूरज पश्चिम से उगता है। किसी का दक्षिण से उगता है। सबके लिए सूर्य का उदय पूरब से हो रहा है। से तो बनाने वाला कैसे किसी का पहाड़ में बस सकता है। किसी का गुफा में बस सकता है। किसी का मंदिर में बस सकता है। किसी का मस्जिद में बस सकता है। अलग कैसे हो गया? हिसाब कैसे बन गए? तो पहली बात तो आत्म मंथन करने की सारी मानवता के लिए है। कि जितनी चीजें हमने अपने हिसाब किताब से बनाई हैं वो परम सत्य नहीं हो सकती। क्योंकि परम सत्य जिसको भी बोध हुआ है एक ही तभी जब कोई ग्रंथ खोलते हैं वेद खोलते हैं किसी भी युग में हो किसी भी संस्कृति में हो जहां सद्गुरु ने जिस भी रूप में जिस रूप में धरा पर आए हो बात इस एक ही सत्य की की है। भाषा कोई भी हो समा कोई भी हो युग कोई भी हो यूनिवर्सल ट्रुथ एंड रियलाइजिंग दिस यूनिवर्सल ट्रुथ इज व्हाट इज कॉल्ड एज एनलाइटनमेंट रियलाइजिंग दिस गॉड वन फॉर्मलेस। तो आत्म मंथन की शुरुआत अगर करें तो यह करें कि बेशक मैं पढ़ रहा हूं, लिख रहा हूं। देख रहा हूं। सीख रहा हूं। पर जितनी चीजें मेरे हिसाब से सच हैं, वह मेरे सच हो सकते हैं। मेरे जीवन को चलाने के लिए वह सच्चाइयां हो सकती हैं। पर जो परम सत्य है, वह हर एक जीव के लिए सत्य है। यह परमात्मा बराबर है। सब में बराबर बस रहा है। सबके लिए बराबर बस रहा है। एक एक मानव हकदार है इसकी प्राप्ति का। एक एक मानव यह संभावना रखता है कि इस प्रभु परमात्मा के दर्शन कर ले इसको प्राप्त कर ले और यही कारज यही कृपा यही अनुकंपा करने सद्गुरु धरा पर आते हैं। निरंतर महापुरुषों के वचन हम सुन रहे हैं। प्रेरणा ले रहे हैं। भक्ति के भावों की। दास भावना, भक्ति भावना। के सद्गुरु के चरणों में आए। शीश झुकाया। ब्रह्म ज्ञान मिला। जीवन रोशन हो गया। मैं दास बन गया। गुरु का दास बन गया। दास ने पहले भी कुछ महीनों पहले बात कही कि शब्द ही कितना मीठा है। गुरुदास। कितनी मिठास है। शब्द बोलते हैं पर कितनी मिठास गुरुदास। जब नाम में इतनी मिठास तो फिर गुरु के दास के जीवन में मिठास कितनी होनी चाहिए? अब मैं खुद को दास कह तो रहा हूं। सद्गुरु का दास तो कह रहा हूं। पर जीवन क्या दर्शा रहा है? यह आत्मा मंथन करना। यह मेरी अपनी जिम्मेवारी है। यह मेरा अपना फर्ज है। आज सुबह सेवा दल रैली के दौरान सवाल पूछा एक स्किट के दौरान नौजवान ने कि मिला ही क्या है सेवा से? तो दास के मन में यही भाव आया कि सतगुरु शुक्र है आपका कि आपने इन सवालों को बाहर आने की इजाजत दी। प्रेरणा दी क्योंकि जो हिचकिचाहट में दब जाती है बात वह जिंदगी भर संदेह बन के ही रह जाती है क्योंकि वह किसी डर के मारे हिचकिचाहट के मारे पूछा नहीं बस मान लिया तो फिर पूरी उम्र वो कशमकश चलती रहती है वो खेल चलता रहता है कभी मेरा संदेह ऊंचा हो जाता कभी मेरा विश्वास ऊंचा हो जाता है पर स्थिरता नहीं आती और आत्म मंथन करना है तो यह सवाल तो पूछने होंगे सवाल चाहे कठिन हो चाहे कड़वे हो पर पूछने तो होंगे खुद से पूछने होंगे प्रश्न करना होगा पर जब भी प्रश्न करें तो उत्तर प्राप्त हो सके उतनी जगह बनाकर प्रश्न किया जाए। यही फर्क है प्रश्न करने में और जिज्ञासा पूर्वक प्रश्न करने में। जो व्यक्ति जिज्ञासा जिसे जिज्ञासु कहा जाता है जो ढूंढ रहा है कुछ भी जीवन में कोई भी कला सीखना चाह रहा है। कोई भी बात या फिर भक्ति के मार्ग में बात करें। परमात्मा को चाह रहा है, भक्ति चाह रहा है। अगर वह जिज्ञासा पूर्वक मांगता है, जिज्ञासा पूर्वक पूछता है, तो इस बात का मतलब यह है कि वह मान रहा है। जो मैं पूछ रहा हूं, इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। तभी जिज्ञासा है। तभी वह भावपूर्ण है। पहले अपनी अज्ञानता को एक्सेप्ट किया, स्वीकार किया। कि यह जो सवाल मैं पूछ रहा हूं जिज्ञासा पूर्वक तभी हो सकता है जब मैं इस बात को मान लूं एक्सेप्ट कर लूं कि जिस बात का जवाब ढूंढ रहा हूं वो मेरे पास नहीं है। बहुत कठिन हो जाता है। जीवन में देखिए छोटी सी बात किसी को पूछनी बड़ी मुश्किल लगती है क्योंकि ऐसे लगता है कि ऐसा लगेगा कि मुझे इतनी सीधी सी बात नहीं आती। कैसे पूछूं? Google कर लेंगे। ज्यादा आसान है। निरंतर करते हैं। सर तो हिला दिया। जब सामने से वह व्यक्ति गया तो Google चैट जीपीटी एवरीथिंग इज हियर फॉर आवर रेस्क्यू नाउ। पर जिस पल में मैंने इस बात को स्वीकार किया कि इस बात का जवाब मेरे पास नहीं है। फिर पूछा तो वह प्रश्न जिज्ञासा भरा प्रश्न हो जाता है। वह बात जिज्ञासा बन जाती है। और प्रश्न सिर्फ इसलिए पूछा कि सामने वाले को बताना है कि हमारे पास सारे ही जवाब हैं। फिर तो दुनियादारी में भी सारे प्रश्न पूछे जा रहे हैं। तो यह आत्म मंथन करना है। संतों की शरण में मैं जाता हूं। संगत में मैं जाता हूं। सद्गुरु के पास मैं आता हूं। यहां समागम में मैं आया हूं। संगत में मैं जाता हूं। तो क्या खाली होकर जा रहा हूं? खाली होऊंगा। तो अवश्य भरूंगा। यह भी संकेत परमात्मा ने अपनी सृष्टि में बखूबी दिया हुआ है। किसी नदी में जाते हैं एक मटका पानी खाली मटका पानी भरने के लिए उस नदी में डालें। जैसे ही मटका जाता है पानी उस तरफ नीचे हो जाता है। खाली स्थान बनता है और पूरी नदी उस खाली स्थान को भरने के लिए एक क्षण में आ जाती है। इसलिए हमारा मटका भरा जाता है। दस्तूर है। परमात्मा ने हर जगह संकेत दिया है। खाली होगा तुरंत मैं भरता हूं। खाली होने को तो तैयार हो। नदी के अंदर दुनिया के कोने कोने में यह जो यूनिवर्सल ट्रुथ परमात्मा ने संकेत की तरह दिए हुए हैं। खाली तो हो भरने के लिए तो मैं हर जगह हूं। एयर प्रेशर वहां भी यही नियम तो भाव यह है कि खाली होकर प्रश्न पूछे जा रहे हैं। तो जिज्ञासा मान लिया कि नहीं आता। यह आत्म मंथन करना है तो जीवन में अध्यात्म में भी और जीवन के हर पहलू में कुछ तभी सीख सकते हैं। ऐसा ही एक सवाल दास से किसी टूर पर एक बच्ची ने आकर पूछा। कहती दासी का एक सवाल है। संगत में सुनते हैं कि निंदा नहीं करनी। पर अगर दिल हल्का करने के लिए किसी से बात करनी हो तो क्या कर सकते हैं? कोई चीज भारी लग रही है। किसी ने कुछ ऐसा किया है जिससे मेरे दिल को ठेस पहुंची है। मैं बहुत ज्यादा सोच रहा हूं उसके बारे में। अब दिल हल्का करने के लिए बात करूंगी तो जिक्र होगा तो क्या वो निंदा हो जाएगी? आत्मा मंथन का विषय दिया। तो दास ने सहज में यही कहा अगर तो दिल हल्का करने के लिए बात करनी है। बेशक करें जरूरी है। सुनते हैं कि हाउ इंपॉर्टेंट इट इज टू एक्सप्रेस आवरसेल्व्स। तो दास ने ये कहा कि दिल हल्का करने के लिए कोई एक मित्र या कोई एक ही परिवार का जन्म हो सकता है। आपका ब्रदर, आपकी सिस्टर, आपके फादर, आपके मदर या बेस्ट फ्रेंड, बॉयफ्रेंड हु एवर तो दिल हल्का तो एक ही बारी होगा। दिल हल्का करने के बाद फिर तो आगे बढ़ सकते हैं या दिल हल्का करने के लिए भी अगर मैं 100-100 लोगों के पास जा रहा हूं दिल हल्का यहां भी थोड़ा सा दिल हल्का वहां भी थोड़ा सा तो वो निंदा का रूप बन जाता है। अगर भाव दिल हल्का करने का है करना है इंसान है। पर भाव किसी को नीचा दिखाने का है कि इसकी बात मैंने इसलिए की है ताकि मैं यह दिखा सकूं कि मैं इससे बेहतर हूं। जगह जगह जाकर दिल हल्का करने का लेबल लगा के अगर इस प्रकार का व्यवहार कर रहा हूं तो वह निंदा है। यह भाव समझने वाला है। यह भाव देखने वाला है। अभी महापुरुष जिक्र कर रहे थे कि एक समागम दो तीन बारी करने का अवसर मिला। तो वह समागम मुक्ति पर्व का जो इस वर्ष तीन स्थानों पर दास को करने का अवसर मिला। तो वहीं दूर देशों में एक भाव दास ने रखा। सारा परिवार बैठा है और एक मिसाल मुक्ति पर्व पर हम वर्षों वर्षों से सुन रहे हैं। एक मिसाल प्रधान लाभ सिंह जी की कि एक बार प्रधान लाभ सिंह जी शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी के साथ उनकी गाड़ी में सफर कर रहे थे। संगत जा रहे थे या जहां भी जा रहे थे। शहंशाह जी पीछे बैठे हैं। प्रधान लाभ सिंह जी को आगे वाली सीट पर बिठा रखा है। और गाड़ी चलते हुए स्थान जहां जा रहे थे गाड़ी रोकी। सड़क पर कोई और महापुरुष दिखा और प्रधान लाभ सिंह जी को कहा कि अब रास्ता ज्यादा दूर नहीं है। आप पैदल चले जाइए। इस महापुरुष को गाड़ी में अपनी जगह बिठा दीजिए। प्रधान लाभ सिंह जी ने कहा सत वचन महाराज उतर गए और वह महात्मा जिसे शहंशाह जी ने अपने साथ बिठाना था उनको बिठाया और गाड़ी आगे चली गई तो जो मिसाल सुनते हैं कि प्रधान लाभ सिंह जी को सड़क पर चलता देख पीछे से एक महापुरुष आया एक संत आया और उसने कहा आप मिशन के प्रधान संत निरंकारी मंडल के प्रधान आपको गाड़ी से उतार दिया। आप पैदल चल रहे हैं और वो आम सा सेवादार उसे साथ बैठा लिया गाड़ी में। क्या प्रधान का चलना शोभा देता है? अब जो सीखने वाली बात जो हर साल मुक्ति पर्व पर कोई ना कोई जिसका जिक्र करता है वो यह कि प्रधान लाभ सिंह जी ने जवाब दिया कि तू खुद तो डूबेगा और मुझे भी डूबाएगा। तेरे यह जो भाव हैं तू खुद तो डूबेगा और मुझे भी डूबाएगा। वह सतगुरु हैं। वह जो कर रहे हैं हमारे लिए भला है। मिसाल हम सुन रहे हैं सुना रहे हैं। अब आत्म मंथन करने का विषय क्या है? मैं किस श्रेणी में हूं? प्रधान लाभ सिंह जी वाली या वह जो महापुरुष जो इंतजार कर रहा था कि यह गाड़ी से उतरे और मैं उनके मन में यह भाव डालूं आपको उतार दिया। मेरी श्रेणी क्या है? जब मेरे पास आकर कोई मुझे यह कहता है आपको पीछे बिठा दिया। अंतक सेवादार हैं आप भक्त हैं आप आपको पीछे बिठा दिया मेरी अवस्था क्या है उस वक्त क्या यह चेतनता क्या यह भाव आता है कि महापुरुषों आप खुद तो डूबोगे मुझे भी डूबाओगे या मैं भी कह देता हूं बात तो ठीक है बात तो बिल्कुल ठीक है आज संगत में वो को एग्जांपल दिया के थड़ा बना दो, थड़ा तोड़ दो। तो गाड़ी हटाने को ही जरा कह दिया। क्या मेरी गाड़ी कोई हटाने को कह दे तो मेरे साथ चलने वाला यह कह देता है। अरे आपकी गाड़ी को नहीं पहचाना। आपकी गाड़ी हटाने को कह दी? मेरी अवस्था क्या है? क्या मैं उस पल में जवाब दे पाता हूं? कि महाराज मुझे बखशो। आप तो डूबोगे मुझे भी डूबाओगे। मेरी अवस्था क्या है? आत्म मंथन इस बात का करना है। इस बात का होना है। पास नहीं मिला। एक ही पास मिला। साथ वाले को 10 पास दिए हैं। मैंने किसके साथ अपने आप को घेरा हुआ है? जो यह सवाल पूछने के लिए हमेशा मेरे आसपास घूमते रहते हैं। किस श्रेणी का संत मैं अपने साथ लेकर चल रहा हूं। जो वेट कर रहा है पास नहीं मिला। आपको नहीं जानते। आप तो परिवार हैं। आप तो अंतक सेवादार हैं। आप तो गुरु के परिवार से हैं। आप तो जोनल इंचार्ज हैं। आप तो फलानी कमेटी के मेंबर हैं। मैंने किससे अपने आप को घेरा हुआ है। यह आत्म मंथन मुझे करना है। प्रधान लाभ सिंह जी वाली अवस्था भी नहीं है तो कम से कम इतनी आत्म मंथन की आवश्यकता है कि कहीं आसपास ऐसे ही कंपनी ऐसी संगति में लेकर चल रहा हूं जो पल-पल यही सवाल पूछ रही है। आपको नहीं जानते आपको पास नहीं दिया। आपकी गाड़ी नहीं पहचानी आपको नहीं देखा तो यह आत्म मंथन मुझे करना है। कि कहीं मैं तो नहीं डूब रहा या खुद भी जो डूबने वाले हैं उन्हीं के साथ तो नहीं घेरा हुआ मैंने। जिस कश्ती में तरना है कहीं उसी में खुद छेद तो नहीं कर रहा। यह भाव, यह चिंतन, यह मंथन शुरुआत क्योंकि इस दर पर आ गए तो आज दास थोड़ी उस रूप की बात ही कर रहा है कि यहां आ गए और फिर यह बात फिर यह भाव तो क्या ही बात बनेगी मिसाले दे देना, बातें धरा देना, चीजें कह देना बहुत आसान है। पर जो कहता हूं क्या जीवन चल रहा है या जरा सी कोई बात हुई और सामने से मैं कहता हूं मेरा एना भी हक नहीं बनता मेरा यह भी नहीं बनता संगति भाव मिसाल सलाने वाले ना हो जीवन मिसाल बने दातार ऐसी मेहर आप करो ये जीवन हर गुरुसख का मिसाल बने ये भक्ति जो आपने दी है इसकी संभाल हाल बखशो। एक कहानी पीछे पढ़ने को मिली। एक इंसान था गांव में रहने वाला। गांव में जो चीजें बनती थी कोई कुम्हार कुछ बनाता या कोई और चीजें वो उनसे इकट्ठी करता था और अपने गधे पर लादकर एक शहर में बेचने जाता था। यही उसका व्यवसाय है। बढ़िया जिंदगी चल रही। शहर में भी सब उसको जानते हैं। चार पांच दुकानदार जिनके पास जाकर सब कुछ बेच आता था। अब एक दिन ऐसे ही शहर में गया तो सामने से एक आदमी चलता हुआ आ रहा और उसने देखा कि आज इसके गधे के गले में कुछ बंधा हुआ है। चमकता हुआ पत्थर एक बंधा हुआ है। गधे के गले में कुछ अनोखा सा चमकता हुआ बांध के घूम रहा है। अब जिस इंसान ने देखा उसकी नजर परखने वाली थी उसने देख लिया कि यह हीरा है जो इसने गधे के गले में बांधा हुआ है। जाता है उससे सहज में ही पूछता है कि गधे के गले में क्या बांधा है आपने? कहता है पता नहीं आज शहर की तरफ आ रहा था। रास्ते में कुछ पड़ा हुआ दिखा। चमक रहा था। पसंद आ गया तो मैंने इसके गले में बांध दिया। कहता अच्छा चल ये मुझे दे दे। तुझे ₹10,000 दिए। यह मुझे दे दे। अब वो गधे का मालिक जो था उम्मीद तो नहीं कर रहा। उसे लगा पत्थर 10,000 में मिल रहे हैं। पर कहता नहीं 20,000 दोगे तो मैं यह देता हूं। वो सामने से कहता है नहीं 10,000 पत्थर दे दे। वो कहते नहीं 20,000 में ही दूंगा और आगे चला जाता है। अब जो हीरा पहचानने वाला था वह जानता था कि कीमत लाखों की है। शायद करोड़ों की कीमत है। सोच रहा है मन में कि किस मूर्ख को यह पत्थर मिल गया है। गधे के गले में बांध के घूम रहा है। थोड़ी देर में जाता है कि चलो 20,000 दिए बात खत्म करते हैं। पहुंचता है उसके पास और देखता है गधे के गले में वो पत्थर नहीं है। पूछता है उससे अरे वो पत्थर कहां गया? ले 20,000 देता हूं। गधे का मालिक कहता है वो तो मैंने बेच दिया। पिछली दुकान पर पूरे 500 में बेचा है। वो जो हीरे को परखने वाला था कहता गधे मूर्ख लाखों करोड़ों की चीज तूने 500 में बेच दी। अकल नहीं है तुझे? गधे का मालिक कहता है के साहब। होऊंगा मैं गधा होऊंगा मैं मूर्ख पर फिर उस हिसाब से आप क्या हुए जो 10,000 के पीछे करोड़ों की चीज छोड़ दी मुझे तो नहीं पता था कि वह करोड़ों का है। आपने जानते हुए 10,000 के पीछे करोड़ों रुपए की चीज छोड़ दी। लाखों की चीज छोड़ दी। तो अगर मैं गधा हूं आप क्या हैं? जिसके पास तो कीमत नहीं है। उसकी तो फिर माफी है। अनजान है। हमारा क्या होगा? अगर सब कुछ जानते हुए किसी बात के लिए यह हीरे वाला सौदा छोड़ दिया। कहीं यह नहीं मिला। कहीं यह नहीं पूछा। कहीं किसी ने जरा सा कुछ कह दिया। उसने 10,000 के पीछे करोड़ों का हीड़ा छोड़ा। मैंने छोटी सी बात के लिए यह अनमोल रतन राम रतन धन छोड़ दिया। सद्गुरु का दर छोड़ दिया। मंथन यह करना है। प्रधान लाभ सिंह जी की भक्तों की गुरुसखों की मिसाल मैं दे रहा हूं। और अपना आनंद किसी ने गाड़ी रोक दी या नहीं पहचानी। अपना आनंद इसलिए छोड़ दिया। अमृत इसलिए छोड़ दिया। उसमें विष इसलिए घोल दिया जबकि जानता हूं बचपन से सुन रहा हूं तो हमें क्या कहा जाएगा आत्म मंथन इस बात का करना है जिसके पास तो पहचान नहीं उसे तो कुछ नहीं कहा जा सकता मुझे किसी ने वहां बिठा दिया यहां बिठा दिया ये कर दिया वो कर दिया दो की जगह चार पास दे दिए चार की जगह एक पास दे दिया एक भी नहीं दिया कौड़ियों के बदले राम रतन धन सद्गुरु के चरण इनसे मैं दूर तो अगर वह गधे वाला मालिक गधा है मूर्ख है तो हम सबको क्या कहा जाएगा आत्मा मंथन इस बात का करना है तो क्योंकि समय हो रहा है और इस बार क्योंकि एक दिन बड़ा है तो दास को भी कल एक अवसर दोबारा मिलेगा तो बाकी भाव दास अपने कल रख देगा। पर तब तक के लिए यह आत्म मंथन करें कि इस आनंद के समुद्र में आए हुए हैं। समागम चल रहा है। यहां भी अगर मैं आनंद नहीं ले पा रहा। यहां भी मैं खुश नहीं रह पा रहा। यहां भी कमियां देख रहा हूं। तो अगर उस गधे वाले को गधा कहा जाएगा तो हमें क्या कहा जाएगा? प्रेम से कहना धन्य अभी मंगलाचरण में हम सभी मिलजुलकर बहन समीपता जी के साथ जुड़ जाते हैं। प्यार से कहिए धन्यवाद। हे समर परमात्मा हे निर्गुण निरंकार तू करता है जगत का। तू सबका आधार कण कण में है बस रहा तेरा रूप अपार तीन काल है सत्य तू मिथ्या है संसार घट घट वासी हे प्रभु अविनाशी करता दया से तेरी हो सभी भवसागर से पार निराकार कार साकार तू जग के पालनहार है अंत महिमा तेरी दाता अपरमार परमपिता परमात्मा त्मा सब तेरी संतान भला करो सबका प्रभु सबका हो कल्याण भला करो सबका प्रभु सबका हो कल्याण साध संगत जी प्यार से कहना धन निरंकार जी आज 78 निरंकारी संत समागम के दूसरे दिन जहां सभी ने सुबह सेवा दल की रैली रूप जहां सेवा भाव का जोेंस होता है महत्व यह अनेकों रूपों में चाहे वह स्किप्स द्वारा थी चाहे वो उस भाव को दर्शाना कि इस परमात्मा ने अगर यह शरीर दिया है तो यह स्वस्थ रखते हुए ही हम जहां इस शरीर का कद्र डाल सकते हैं वहीं फिर भागदौड़ के या किसी रूप में पूरी मानवता की सेवा कर सकते हैं। तो कैसे यह तोहफे को हमने स्वस्थ रखना है। इस भाव और अनेकों मन की अवस्था के ऊपर फोकस करते हुए भी कि कैसे एक सेवा का मतलब यह नहीं कि बस हम दिखे नजर आए। कुछ नजरों ने देखा और वाहवाही हुई कि यह तो थकते नहीं। यह तो बस एक अपनी नींद आराम का परवाह नहीं करते हैं और बस सेवा करते हैं या फिर एक फाइनशियल कंट्रीब्यूशन इतनी देते हैं यह कुछ भी मन पे ऐसी बात आनी तो मन की यह अवस्था बिगड़ जाती है। कैसे यह सेवा तो समर्पित होकर होती है। इस निराकार इस प्रभु परमात्मा के प्रति के कर्ता यह निराकार है। एक अगर बल भी बख्शा तो यह कृपा है और कैसे एक अपने अंदर करता भाव लाते ही यह अहंकार मन में जन्म ले लेता है। और फिर अहंकार के आते ही यह सीरीज ऑफ थॉट्स या ऐसे भाव आने लग जाते हैं कि जहां हम खुद ही अपने आप को सबसे श्रेष्ठ ऐसा मानना शुरू कर देते हैं कि हमसे ज्यादा अच्छा कोई सोच नहीं सकता। यह कार्य तो हमसे ज्यादा कोई अच्छा नहीं कर सकता। यह चीज जो एक कोई दिक्कत थी कितनी जल्दी इतनी कुछ ही देर में इस प्रॉब्लम का स्यूशन मेरी बुद्धि ने निकाल दिया। तो ऐसे अनेक भाव चाहे वह सूक्ष्म रूप से या फिर कोई बड़ी बात से यह फिर मन में उतरते रहते हैं। और बात वही कि यह जो आत्म मंथन शब्द पिछले दो दिनों से या वो थीम कितनी बारी हर कोई यही जिक्र कर रहा है कि अपने मन के भीतर जाना कितना जरूरी है। यह एक सोच विचार की बात नहीं मन के अंदर यह एनालाइज करना कि हम किस तरह की ही सोच को पकड़े बैठे हैं। हम किस तरह एक अपने आप को बदलने के लिए चाहे बातें करते हैं, सोचते हैं, पर कहीं अच्छाइयों को अपनाने में फिर टाल तो नहीं देते। जैसे अक्सर हमें पता भी होता है एग्जांपल कि सुबह जल्दी उठना है और अलार्म जिस टाइम का है और फिर दो-तीन अलार्म लगा ही लेते हैं कि चलो पहला वाला तो ऐसे ही बंद कर देंगे वापस सो जाएंगे तो कैसे एक भाव आ जाते हैं जब उस तरह से लॉजिकली अगर सोचें तो सिर्फ एक ही अलार्म काफी है कि बस वह एक ही बार बजे उससे पहले कंटीन्यूअस सो जाए और वही एक फाइनल वार्निंग की तरह हमें उठा रहा है और बात वहां पर भी बन सकती है। पर कैसे हम यह डिले करना चाहते हैं चीजों को और उस तरह से कि यह पहला अलार्म इसलिए कि दूसरे से पहले एक संतुष्टि मिल जाएगी कि अभी 5 मिनट और सोने को हैं। तो कैसे मन हम छोटी-छोटी चीजों से भी अपना बहला लेते हैं। कैसे मन में खुद ही एक कॉम्प्लिकेशन जो इतना सिंपल स्यूशन भी है तो खुद ही डाल देंगे फिर उसके बारे में सोचेंगे और फिर अंत में वो स्यूशन इतना सिंपल लगेगा वैसे ही यह आत्म मंथन से कंक्लूजंस भी यही निकलती हैं कि दुनिया के सारे रंग हमने अपने अंदर डाल लिए हैं। इतना एक हर एक बात का असर इस तरह कभी-कभी बांध लेते हैं कि बस किसी एक ने एक बार कुछ ऐसा बोल दिया तो वो मन उस इंसान के लिए हमेशा के लिए ही मैला हो गया। तो यह जब निराकार प्रभु को आधार लेते हैं तो वाक्य ही फिर वह हमारा एक कंफर्ट का जोन जितना होता है उससे बाहर भी चले जाते हैं और मन फिर बहुत ही चीजों को सिंपलीफाई भी कर लेता है कि यह दातार का अब आधार लिया है इस निराकार प्रभु परमात्मा का तो अब जब मन के भीतर अपने ही एक अंदर अंदर की तरफ की यात्रा यह जर्नी विद इन आत्म मंथन करेंगे तो फिर यह बहुत ही चीजें जो खुद ही हमने कॉम्प्लिकेट की हैं वो लेयर बाय लेयर एक खुद ही वो हमें समझ आता है कि एक सरलता से भी चीज का एक समाधान निकल सकता है। जहां हम इतने थॉट्स को इतने भाव को इतने इमोशंस को कंटेन भी नहीं कर पाते वो एक टर्मल सा आता है मन में वहीं यह सहजता आते ही इस निराकार का एहसास होते ही यह सुमिरनम रूप हो तो कैसे फिर सारी चीजें स्वयं ही अपने भीतर भी शांत लगती हैं कि एक कारण मिले ना मिले कोई वजह मिले ना मिले फिर भी यह विश्वास जहां आ जाता है कि हर पल में जब निराकार है और निराकार ऐसा कुछ नहीं करेगा जो हमारे लिए उचित ना हो। तो एक बुरी सी बुरी चीज भी जो एक मिनट पहले हमारे अकॉर्डिंगली थी वही मन शांत हो जाता है। वहीं एक ये भाव आ जाते हैं कि यह अगर कोई चीज है तो इसमें ऐसे हमने सीखना क्या है? यह सिर्फ कुछ सिखाने के लिए ही आई है। और वह चीज सीख लिया जाए। कैसे अपने मन में हम धीरे-धीरे इस तरह छोटी-छोटी चीजों से ही पवित्रता डालनी शुरू कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि अगर सड़क पर चल रहे हैं तो वह कचरा उठा के अपने हैंड बैग में अपने बैग पैक में हमें डालना है। नहीं वह कचरा उठा के डस्टबिन में भी डाला जा सकता है। वह अनवांटेड चीज एक अगर है हमारे पास तो उसका हम क्या कर रहे हैं जीवन में वह जरूरी है। उस चीज का ही आत्म मंथन करना है। जैसे हम जितना कुछ भी दिन में देख रहे हैं। सब कुछ तो हम नहीं एक अब्सॉर्ब करते। हम हमारा दिमाग उस तरह से चीजों को फिल्टर करता है कि जो प्रायोरिटी लगे वो दिन के एंड तक भी चीज याद रहती है और कितनी चीज तो हमने चाहे दिन में अनेकों थॉट सोचे भी अगर हम गिनती करने आए तो आधे से ज्यादा तो कॉन्शियसली याद भी नहीं होंगे क्या-क्या आज सोच लिया। तो बात वही कि क्या चीज को अपनानी है और कितनी देर के लिए अपनानी है। कुछ तो संत महात्मा किस पल में ऐसे अनमोल बात बोल देते हैं जो वाक्य ही सुन के लगता है कि यह तो जीवन प्रवर्तित करने वाली बात है और वो वाकई ही बात जीवन भर के लिए टिक जाती है और वहीं हम अक्सर कुछ ऐसी छोटी हल्की बात कि कुछ हम कह देते हैं या हमारे साथ घट जाती है अगर घटना तो उसको चाहे वो लिटरली इनसिग्निफिकेंट होती है। फिर भी उसको हम बस उसको पकड़ लेते हैं और वह भार बना के जीवन भर वह भार को ढोते ही रहते हैं। तो यहां वही बात कि कैसे हम अगर कुछ कर भी रहे हैं तो वह शुरुआत कहां से हुई? वो हमारे अंदर से ही शुरुआत हुई। एक उदाहरण यह एग्जांपल जभी भी हम कहीं अगर पहाड़ी इलाके किसी हिल स्टेशन में आते हैं तो अक्सर ऐसे पॉइंट्स होते हैं जहां से हमें लगता है हम अगर कुछ जोर से बोल रहे हैं तो वो एकको करके वापस आता है हमारे कान में वही बात हमारे शब्द ही तो हम जो संसार में डाल रहे हैं वही घूम के आ रहा है और उसी तरह तरह कैसे हम अगर कोई अच्छी बात बोल देंगे घूम के अगर आ भी रही है तो यह उन पेड़ों को उन पत्थरों को कुछ उस अच्छी बात का असर हुआ नहीं वहीं हम अगर कोई बुरी बात कोई गाली गलौज भी जोर से बोल देंगे और वो हर जगह से हमारी यह साउंड फ्रीक्वेंसी यह छूती हुई वापस एकको करके हमारे पास वापस शब्द अपने ही अपनी आवाज में आ जाएंगे। वो बुरे तो भी क्या चीजों को जिनसे वह आवाज हमारी टकराई फर्क पड़ा नहीं वो अभी भी वैसी की वैसी तो एक बात वही कि अक्सर हम यह सोचते हैं कि हम अगर किसी को कुछ बुरा बोलेंगे तो अगला कितना परेशान होगा और यह उसको एक सबक मिलेगा कि कैसा महसूस होता है बुरे शब्द सुनना उसके लिए बोल भी दें हम तो उस इंसान को उसी पत्थर और पेड़ की तरह हो सकता है कोई फर्क भी ना पड़े हमारे शब्दों का। पर वह वापस हम पर जब घूम कर आई, रात की नींद हमने खुद अपनी खराब कर लेनी थी उससे एक रात पहले जो तैयारी कर रहे थे कि कल तो मौका मिलेगा। वह व्यक्ति मिलेगा, यह पॉइंटर्स बना लिए हैं। इसको बहुत सािकली उसके आगे रख दिएंगे, तो उसका मन कितना खराब हो जाएगा। तो कैसे अक्सर एक हम अपना ही जैसे दासी वो एग्जांपल देती है कि अपना खुद का हम हाथ कितनी बार जला लेते हैं सिर्फ ऐसी कोई गर्म चीज पकड़ने के लिए जो नियत रखते हैं वह गर्म चीज सामने वाले पर फेंकेंगे अगला जल जाएगा और वह निशाना हमारा लगे उस इंसान को वह चीज ना लगे पर जितनी देर वह चीज हमारे हाथ में है हमारा हाथ तो कंपलसरी यह एक जलेगा ही जलेगा वो तो कोई दूसरा उसमें ऑप्शन ही नहीं है। तो चीजें क्या अपने पास रखनी है मन में क्या नहीं और सिर्फ यह कोई एक वो बात नहीं कि समाज में एक बिहेवियरल बात की ही ऐसी नहीं हो रही कि अच्छे कर्म या बुरे कर्म वो भी एक ब्रॉडर अगर आत्म मंथन की जहां बात हो रही है सब बातें उसमें आती हैं। पर असल में तो यह अपनी खुद पे काम करने वाली बात है। यह अपने सुधार की बात है। वह चाहे हर तरीके का हो, पर जिन्होंने यह स्पिरिचुअल ग्रोथ को ही प्राथमिकता दी है। आध्यात्मिक पहलू को अपने अंदर इतना आत्म मंथन करके पक्का कर लिया। यह प्रभु परमात्मा से अपना नाता और गहरा जोड़ लिया। तो अक्सर हम खुद यह महसूस भी करते हैं कि जब भी हम ऐसे फील करते हैं कि हम स्पिरिचुअली ग्रो कर रहे हैं तो बाकी सोशल पहलू बिहेवल पहलू संसार के अपने व्यवहार अपने सामाजिक रिश्ते सब खुद ब खुद बेहतर हो जाता है क्योंकि मन हमारा एक टिक रहा है सही जगह वो एक पॉजिटिविटी की शुरुआत होते हुए वो हर पहलू में जीवन के फिर एक रिपल इफेक्ट से पहुंचती है तो मन ही हमारा अशांत हो तो वह अशांत हम खुद भी अंदर से महसूस करेंगे अशांति और हम एक जिस तरह एग्जांपल दासी ने यह दिया कि जो शब्द बोलेंगे अगर हम कुछ इरिटेट होके एक चिड़चिड़ हो के शब्द ऐसे बोलेंगे तो वो एक अंदर की स्थिति ही बाहर आई है और वही ही हम पहुंचाएंगे और वही वापस मन को तंग करेंगे शब्द हमारे अपने खुद के हमें भी तो यह अंदर ही इस तरह परमात्मा को एक हमेशा के लिए अगर धारण कर ले 24ों घंटे के लिए तो फिर वाकई ही इस एहसास में कि यह परमात्मा की जीवन में मौजूदगी है। यह परमात्मा तो हर समय ही अंगस संग है। सिर्फ हम ही इससे दूर होते हैं। वह पल जब यह हमेशा आंखों के सामने होने के बावजूद भी हम ही अपनी आंखें इससे चुरा लें तो यह फैक्चुअली परमात्मा को तो फर्क नहीं पड़ेगा कि हम इसको देख रहे हैं कि नहीं। यह तो हमारी ही बेहतरी के लिए है कि हम वाकई ही अपना सुधार तब तक ही कर पाएंगे जब जब परमात्मा को मन में एक पक्की तरह विराजित कर लें। तो एक भाव यही हर किसी का रहता है और पिछले दो दिनों और आगे आने वाले दिनों में भी यही भाव आत्म मंथन का जो यह एक एक्टिविटी की बात नहीं हो रही। एक इंटेलेक्ट की बात नहीं हो रही। पर यह वही बात कि कैसे चाहे हम अवगुणों को छोड़े, गुणों को अपनाएं। एक अपना विश्वास किस तरह परमात्मा पे कायम रखें। क्या चीजों को एक नजरअंदाज कर दें? किस चीजों को एक पक्का मन में बांधे? ऐसे अनगिनत पहलू यह सब फिर निराकार के ऊपर आधारित है। तो स्पिरिचुअल ग्रोथ तो होगी ही। साथ में पल-पल हम एक उस पहलू को भी अपने मानवीयता जो होती है, एक ह्यूमन वैल्यूस की बात होती है, देवीय गुण वो भी और जीवन में मजबूत होते हुए सभी पहलू हमारे एक हमको ही एक हमारी ही बेटरमेंट के लिए है। हमारा ही सुधार हो रहा है। और यह सुधार सिर्फ इसलिए नहीं कि कोई दिखाने के लिए किसी को यह तो उतना ही सुधार हम एकांत में अपने कमरे में अकेले बैठे भी तो भी या फिर 500 लोगों के बीच में बैठे तो भी तो बात यही कि जहां सुधार की बात है वहां एक आत्म मंथन जरूरी है। वरना तो ऐसे भी व्यक्ति है संसार में कि जिनका खुद को तो यह रियलाइज करना बहुत दूर की बात कि किसी को चोट पहुंचाई है अगर कोई बोल भी दे तो उल्टा उसी इंसान को और क्रोधित होकर जवाब देते हैं तो ऐसे बात ऐसे भाव भक्तों संतों के नहीं होते। यह तो हमेशा क्षमाशील ही रहते हैं। एक गलती हो ना हो एक भाव मन में यही आता है कि सुधार अपना हमेशा हो। अगर किसी ने पॉइंट आउट की है कोई कमी तो एक हमारा ही भला किया है उस व्यक्ति ने ताकि हम और बेटर हो सके। अपने मन में यह भाव तो संत आने ही नहीं देते कि अगर किसी ने कुछ गलत किया है तो उसको पलट के बोले कि हां आप तो बिल्कुल ही परफेक्ट हो जो हमको इतना सुना रहे हो। नहीं संत तो उस व्यक्ति के मन से इतना शुक्राना करते हैं कि शुक्र है आपने हमारी यह कमी हमारे सामने रख दी और इसी समय यह हम चेतन हो गए। इसका सुधार करना है और फिर वह सुधार कोई डिलेड नहीं होता। वह उसी पल सुधार शुरू होता है। तो बात वही कि जीवन में यह आत्म मंथन हर समय हो और किस चीज का हो। कहीं हम ऐसा ना करें कि सिग्निफिकेंट ये जो जरूरी चीजें हैं उनके बारे में तो आत्म मंथन करें ना। और छोटी-छोटी चीजें जो एकदम जिन पर वैसे ही कोई तवज्जो देने की जरूरत ही नहीं है। उसको पकड़ के अपने कितने दिन खुद भी खराब कर दें और लेबल दे दें कि हम तो अभी इस एक बात पर इतना इंट्रोस्पेक्ट कर रहे हैं। तो वह कंटेंट किस बात को अंदर डालना है और उस पर आत्म मंथन करना है वह भी बहुत जरूरी है। जिस तरह थोड़ी देर पहले दासी ने कहा कि यह अगर हम दिन में कुछ भी देख रहे हैं, तो सारी की सारी चीजों को एक नहीं वह चुनिंदा अच्छाइयों को ही अपने अंदर धारण करें कि हर बात जो आंख के आगे आ रही है। हर एक को ही अटेंशन ना दें। वह ही चीजें जो वाकई ही चुनकर अपना और औरों का सुधार हो सकता है। उन चीजों को ही चुने। तो दासी और अधिक समय नहीं लेगी। आने वाले दिनों में अपने मन के भाव और आपके चरणों में रखती रहेगी। तो इस तरह आज का भी दिन वो सुबह का चाहे सेवाद दल रैली रूप और अभी भी यह सत्संग रूप और हर कोई यही सेवा भाव को अपनाते हुए यह अपना मन निराकार से लगाते हुए सिमिरन रूप और यह सत्संग के प्रति की संतों की जितनी भी वाणी सुनने मिले उसको सिर्फ कान तक नहीं जीवन में उतारे अच्छी बातों को अपना के उन पर आत्म मंथन करते रहे साध संगत जी ध्यान अलंकार जी सतगुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी महाराज की जय तो यह महात्मा मिलजुलकर धनि में आशीर्वाद प्राप्त करें प्रेम से कहिए तेरी ओ सहारा तेरा तन मन गोवा कहे अवतार तेरे ही दाता मैं दिन रात गुण गावा कहे अवतार तेरे ही दाता दिन रात गुण गावा तू ही निरंकार एक तू तू ही निरंकार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार मैं हां सदा बुलनहार मैं हां सदा बुलनहार तू है दाता बखशनहार तू है दाता बखशनहार मेरे अवगुण ना जीता मेरे अवगुण ना चीता तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार तेरा रूप है ये संसार तेरा रूप है ये संसार सबदा भला भला करो करतार सब भला करो करतार मेरी मांग है ये दातार मेरी मांग है ये दातार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार मेरा डोले ना एतबार मेरा डोले ना एतबार बशो श्रद्धा भक्ति प्यार बशो श्रद्धा भक्ति प्यार करा मैं संता सत्कार करा मैं संता सत्कार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार तू ही निरंकार एक तू ही निरंकार तू ही निरंकार तू ही निरंकार सतगुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरिदेव जी महाराज की जय निरंकारी माता गुरु वचन अवतार की जय प्यार से कहिए निरंकार जी
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