किसी जमाने में एक छोटी सी मछेरों की बस्ती थी जो समंदर के किनारे बसी हुई थी। इस बस्ती में एक नौजवान मछेरा रहता था जिसका नाम यूसुफ था। यूसुफ बहुत ही खूबसूरत मेहनती और नेक सीरत इंसान था। उसके चेहरे पर हमेशा एक प्यारी सी मुस्कुराहट रहती थी और उसकी आंखों में एक खास चमक थी जो उसकी नेक नियत को जाहिर करती थी। यूसुफ के मां-बाप उसके बचपन में ही इंतकाल कर चुके थे। उसकी उम्र उस वक्त महज 5 छ साल की थी जब उसके वालिद एक दिन समंदर में मछलियां पकड़ने गए और एक भयानक तूफान में उनकी कश्ती डूब गई। उसके कुछ ही महीनों बाद उसकी वालिदा भी गम के मारे बीमार पड़ गई और अल्लाह को प्यारी हो गई। छोटा सा यूसुफ यतीम हो गया था। यूसुफ की परवरिश उसके चाचा इब्राहिम और चाची फातिमा ने की थी। इब्राहिम भी एक मछेरा था और बहुत नेक दिल इंसान था। उसने यूसुफ को अपने बेटों की तरह पाला और उसे मछली पकड़ने का हुनर भी सिखाया। फातिमा भी बहुत मेहरबान औरत थी जिसने यूसुफ को मां की कमी महसूस नहीं होने दी। यूसुफ के दो चचेरे भाई थे हसन और हुसैन जो उसके साथ खेलते और उसे अपना सगा भाई मानते थे। जैसे-जैसे यूसुफ बड़ा होता गया। उसकी मेहनत और ईमानदारी की शोहरत पूरी बस्ती में फैलने लगी। वह हमेशा अपने काम में पूरी लगन से जुटा रहता था और किसी से भी बेईमानी नहीं करता था। बाजार में जब वह अपनी मछलियां बेचने जाता तो सब लोग उसकी मछलियां खरीदना पसंद करते थे क्योंकि वह हमेशा ताजी और अच्छी मछलियां लाता था और कभी किसी को धोखा नहीं देता था। जब यूसुफ 20 साल का हुआ तो उसके चाचा इब्राहिम और बस्ती के बुजुर्गों ने मिलकर उसकी शादी की बात चलाई। पास की ही बस्ती में एक नेक दिल मछेरे का घर था जिसकी एक बेटी थी जिसका नाम आयशा था। आयशा बहुत ही खूबसूरत, नेक सीरत और समझदार लड़की थी। उसकी आंखें समंदर की गहराई की तरह गहरी थी और उसके बाल रेशम की तरह मुलायम थे। वह घर के सारे काम बहुत अच्छे से करती थी और अपने वालिदैन की बहुत फरमाबरदार थी। आयशा के वालिद का नाम अब्दुल्लाह था और वालिदा का नाम खदीजा। अब्दुल्लाह भी एक मेहनती मछेरा था और अपनी नेकी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। जब इब्राहिम ने अब्दुल्लाह के पास यूसुफ के लिए आयशा का रिश्ता भेजा तो अब्दुल्लाह बहुत खुश हुआ। उसने यूसुफ के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था और वह जानता था कि यूसुफ एक अच्छा इंसान है। दोनों खानदानों ने मिलकर यूसुफ और आयशा की शादी तय कर दी। शादी बहुत ही सादगी से हुई लेकिन पूरी बस्ती में खुशियां मनाई गई। लोगों ने कहा कि यह दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। दोनों बहुत खूबसूरत थे। दोनों नेक दिल थे और दोनों ही मेहनती थे। शादी के बाद यूसुफ और आयशा एक छोटे से घर में रहने लगे। घर बहुत छोटा था। सिर्फ दो कमरे और एक छोटा सा आंगन। लेकिन दोनों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनके दिल में एक दूसरे के लिए बहुत मोहब्बत थी और वह खुश थे। यूसुफ हर रोज सुबह की नमाज से पहले ही उठ जाता था। वह वजू करता, नमाज पढ़ता और फिर अपना जाल उठाकर समंदर के किनारे चला जाता था। आयशा भी सुबह जल्दी उठ जाती थी। वह नमाज पढ़ती, घर साफ करती और अपने शौहर के लिए खाना तैयार करती। जब यूसुफ मछलियां पकड़ कर वापस आता तो आयशा उसका इंतजार कर रही होती थी। वह अपने शौहर के लिए पानी लाती, उसके हाथ पैर धुलवाती और फिर दोनों साथ मिलकर नाश्ता करते। नाश्ते के बाद यूसुफ अपनी मछलियों को बाजार ले जाता और बेचता। वह हमेशा ईमानदारी से दाम लगाता था और कभी किसी को ठगने की कोशिश नहीं करता था। इसी वजह से बाजार के सारे लोग उससे मछलियां खरीदना पसंद करते थे। जो रकम उसे मिलती उससे वह अपने घर की जरूररियात पूरी करता था। शाम को जब वह घर वापस आता तो आयशा उसके लिए लजीज खाना बनाकर रखती। दोनों साथ बैठकर खाना खाते और एक दूसरे से अपने दिन की बातें शेयर करते। कभी-कभी यूसुफ समंदर की मजेदार कहानियां सुनाता और आयशा हंसते-हंसते लोटपोट हो जाती। कभी-कभी आयशा बाजार की बातें बताती कि आज क्या-क्या हुआ और कौन-कौन मिला। रात को खाने के बाद दोनों साथ मिलकर ईशा की नमाज पढ़ते। फिर यूसुफ कुरान शरीफ की तिलावत करता और आयशा चुपचाप सुनती रहती। यूसुफ की आवाज बहुत प्यारी थी और वह बहुत खूबसूरती से कुरान की तिलावत करता था। इसके बाद दोनों सो जाते और अगली सुबह फिर से अपना काम शुरू करते। इस तरह से दोनों मियां बीवी की जिंदगी बहुत खुशहाल थी। उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे लेकिन उनके पास एक दूसरे का साथ था। एक दूसरे की मोहब्बत थी और अल्लाह का फजलल था। वह दोनों अल्लाह के शुक्रगुजार थे और हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। बस्ती के लोग भी यूसुफ और आयशा से बहुत खुश थे। बुजुर्ग लोग उन्हें देखकर दुआएं देते और कहते अल्लाह इन दोनों को हमेशा खुश रखे। यह दोनों हमारे लिए मिसाल हैं। नौजवान लड़के लड़कियां उनसे रश्क करते और कहते काश हमारी भी इन जैसी जोड़ी हो। यूसुफ के चाचा इब्राहिम और चाची फातिमा तो खासतौर पर बहुत खुश थे। उन्होंने यूसुफ को पाला था और अब देख रहे थे कि उनकी मेहनत रंग ला रही है। यूसुफ एक अच्छा इंसान बन गया था और उसकी शादी भी बहुत अच्छे से हो गई थी। वह अक्सर कहते कि यूसुफ हमारे लिए गर्व की बात है। उसने हमें कभी शर्मिंदा नहीं किया। कुछ महीनों बाद यूसुफ ने सोचा कि अगर वह थोड़ा और मेहनत करें तो शायद उसकी हालत और बेहतर हो सकती है। वह हर रोज सुबह जल्दी उठने लगा और देर तक काम करने लगा। आयशा ने भी अपने शौहर का पूरा साथ दिया। वह उसके लिए खाना पैक करती ताकि यूसुफ को दोपहर में घर वापस आने की जरूरत ना हो और वह ज्यादा देर काम कर सके। आहिस्ता-आहिस्ता यूसुफ ने पैसे जमा करने शुरू कर दिए। वह बहुत ही किफायत से रहता था और फिजूल खर्ची बिल्कुल नहीं करता था। जो भी पैसे बचते वह उन्हें एक मिट्टी के घड़े में डाल देता था। आयशा भी बहुत समझदार थी। वह भी फिजूल खर्ची नहीं करती थी और हर चीज को बहुत सोच समझ कर खरीदती थी। कुछ महीनों की मेहनत और किफायत के बाद यूसुफ के पास इतने पैसे जमा हो गए कि वह एक बड़ा जाल खरीद सके। यह जाल पहले वाले जाल से कहीं ज्यादा बड़ा और मजबूत था। इस जाल से बहुत सारी मछलियां एक साथ पकड़ी जा सकती थी। जिस दिन यूसुफ ने यह जाल खरीदा, उस दिन वह बहुत खुश था। वह घर आया और आयशा को यह खुशखबरी सुनाई। आयशा भी बहुत खुश हुई। उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया और अपने शौहर के लिए दुआ की कि अल्लाह उसे और कामयाबी दे। अगले दिन सुबह युसुफ अपने नए जाल के साथ समंदर के किनारे गया। उसने अल्लाह का नाम लेकर जाल समंदर में डाला और इंतजार करने लगा। जब उसने जाल बाहर निकाला तो वह हैरान रह गया। जाल में इतनी सारी मछलियां थी कि उसने पहले कभी नहीं देखी थी। सब मछलियां बड़ी और तंदुरुस्त थी। यूसुफ बहुत खुश हुआ। उसने सारी मछलियों को बाजार ले जाकर बेचा और उसे बहुत अच्छी कीमत मिली। उस दिन जब वह घर वापस आया तो उसके हाथ में पहले से ज्यादा पैसे थे। आयशा ने जब यह देखा तो वह भी बहुत खुश हुई। इसके बाद तो हर रोज यूसुफ के जाल में बहुत सारी मछलियां आने लगी। कभी-कभी तो इतनी ज्यादा मछलियां होती कि यूसुफ को दो-तीन दिन तक मछलियां पकड़ने की जरूरत नहीं होती थी। उसकी आमदनी बहुत अच्छी हो गई थी और घर में खुशहाली आने लगी थी। अब यूसुफ और आयशा के घर में नई-नई चीजें आने लगी। आयशा ने नए बर्तन खरीदे, नए कपड़े बनवाए और घर को भी थोड़ा सजाया। लेकिन दोनों का दिल अभी भी साफ था और वह अल्लाह के शुक्रगुजार थे। वह जानते थे कि यह सब अल्लाह की मेहरबानी है और उन्हें कभी घमंड नहीं करना चाहिए। बस्ती के दूसरे मछेरे भी यूसुफ की कामयाबी देखकर हैरान थे। कुछ लोग उससे रश्क करते थे लेकिन ज्यादातर लोग उसकी तारीफ करते थे। वह कहते यूसुफ मेहनती है और नेक दिल है। इसीलिए अल्लाह उस पर मेहरबान है। यूसुफ के चाचा इब्राहिम बहुत खुश थे। वह कहते मैंने हमेशा कहा था कि यूसुफ एक दिन कामयाब होगा। अल्लाह मेहनत करने वालों को जरूर फल देता है। इस तरह यूसुफ और आयशा की जिंदगी बहुत खुशहाल हो गई थी। दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे और अल्लाह के शुक्रगुजार थे। उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिंदगी में जल्द ही एक बहुत बड़ा मोड़ आने वाला है जो उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा। एक दिन की बात है। यूसुफ हमेशा की तरह फजर की नमाज़ पढ़कर समंदर के किनारे गया। उस दिन मौसम बहुत अच्छा था। आसमान साफ था और समंदर की लहरें बहुत प्यारी लग रही थी। यूसुफ ने बिस्मिल्लाह पढ़कर अपना जाल समंदर में डाला और इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद जब उसने जाल को बाहर खींचा तो उसे लगा कि आज तो बहुत ज्यादा वजन है। उसने सोचा कि शायद बहुत सारी मछलियां फंस गई होंगी। जब उसने जाल को पूरी तरह से बाहर निकाला और उसे देखा तो वह बहुत खुश हो गया। जाल में वाकई बहुत सारी मछलियां थी। बड़ी-बड़ी तंदुरुस्त और चमकदार मछलियां। यूसुफ ने शुक्राने में अल्हम्दुलिल्लाह कहा और मछलियों को निकालने लगा। जब वह मछलियों को एक-एक करके बाहर निकाल रहा था तो अचानक उसकी नजर एक अजीब मछली पर पड़ी। यह मछली बाकी सब मछलियों से बिल्कुल अलग थी। यह मछली सोने की तरह चमक रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे इसे सोने से बनाया गया हो। यूसुफ ने उस मछली को बहुत ध्यान से देखा। मछली की आंखें भी बहुत अजीब थी जैसे हीरे की तरह चमक रही हो। उसकी पूंछ और पंख भी बहुत खूबसूरत थे। यूसुफ ने ऐसी मछली अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखी थी। पहले तो यूसुफ के दिमाग में यह ख्याल आया कि अगर वह इस मछली को जिंदा रखकर बाजार में ले जाए तो उसे बहुत अच्छी कीमत मिल सकती है। शायद इतनी कीमत मिल जाए कि वह एक छोटी कश्ती खरीद सके। लेकिन फिर उसके दिल में एक और ख्याल आया। यूसुफ ने सोचा यह मछली बहुत नायाब है। अल्लाह ने इसे खास बनाया है। अगर मैं इसे मार दूंगा या बेच दूंगा तो शायद इस तरह की मछलियां खत्म हो जाएंगी। नहीं मुझे यह गलत काम नहीं करना चाहिए। इस मछली को समंदर में वापस छोड़ देना चाहिए ताकि इसकी नस्ल बढ़े और हमारा समंदर और भी खूबसूरत दो बने। यूसुफ ने फौरन उस सुनहरी मछली को बड़े प्यार से उठाया और समंदर में वापस छोड़ दिया। मछली पानी में गई तो कुछ देर तक वहीं ठहरी रही जैसे कुछ कह रही हो। फिर वह धीरे-धीरे गहरे पानी में चली गई। यूसुफ ने फिर बाकी मछलियों को निकालना शुरू किया। अभी उसने चारप मछलियां ही निकाली होंगी कि अचानक उसके कानों में एक बहुत ही मीठी और खूबसूरत आवाज आई। शुक्रिया ए नेक दिल मछेरे। यूसुफ चौंक गया। उसने इधर-उधर देखा लेकिन उसे कोई नजर नहीं आया। साहिल पर उसके अलावा कोई नहीं था। वह सोचने लगा कि शायद यह उसका वहम है या फिर हवा की आवाज है। लेकिन फिर से वही आवाज आई। ए रहम दिल यूसुफ यहां समंदर की तरफ देखो। मैं यहां हूं। यूसुफ ने घबराते हुए समंदर की तरफ देखा। वहां वही सुनहरी मछली थी जिसे उसने अभी-अभी छोड़ा था। मछली पानी की सतह पर तैर रही थी और यूसुफ की तरफ देख रही थी। यूसुफ के रोंगटे खड़े हो गए। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सब सच है। एक मछली इंसानी जुबान में बात कर रही है। उसने फौरन आयतुल कुर्सी पढ़ना शुरू कर दिया क्योंकि वह सोच रहा था कि शायद यह शैतान का कोई धोखा है। मछली ने जब यूसुफ को इतना डरा हुआ देखा तो बोली, डरो मत यूसुफ, मैं कोई शैतान या जिन नहीं हूं। मैं एक परी हूं जिसे अल्लाह ने खास ताकतें दी हैं। तुम अल्लाह का नाम लेते रहो। यह बहुत अच्छी बात है। यूसुफ ने हिम्मत करके पूछा, तुम तुम कौन हो और तुम इंसानी जुबान में कैसे बात कर सकती हो? मछली ने जवाब दिया, मेरा नाम नूरजहां है और मैं परियों की मलका हूं। अल्लाह ने हमें यह ताकत दी है कि हम अलग-अलग शक्लें बदल सकते हैं। मुझे समंदर में तैरना बहुत पसंद है। इसीलिए मैं कभी-कभी मछली की शक्ल में आ जाती हूं। आज मैं सुबह-सुबह समंदर में तैर रही थी और तुम्हारे जाल में फंस गई। यूसुफ ने पूछा, लेकिन जब तुम जाल में थी, तो तुमने मुझसे बात क्यों नहीं की? नूरजहां ने कहा जब मैं मछली की शक्ल में होती हूं तो मैं इंसानी जुबान में बात नहीं कर सकती। मुझे दोबारा अपनी असली शक्ल में आना पड़ता है और इसमें कुछ वक्त लगता है। जब तुमने मुझे पानी में छोड़ा तो मैं फौरन अपनी असली शक्ल में वापस आ गई। यूसुफ ने पूछा लेकिन तुम मुझसे बात क्यों करना चाहती हो? नूरजहां की आवाज में बहुत मोहब्बत थी। उसने कहा यूसुफ तुम बहुत नेक दिल इंसान हो। जब तुमने मुझे देखा तो तुम्हारे दिल में सबसे पहले यह ख्याल आया कि तुम मुझे बेचकर अच्छी कीमत हासिल कर सकते हो। यह सोचना गलत नहीं था क्योंकि तुम्हारी जरूरतें हैं और तुम मेहनत से कमाते हो। लेकिन तुमने फौरन अपने लालच पर काबू पा लिया और तुमने सोचा कि मुझ जैसी नायाब मछली को बचाना ज्यादा जरूरी है। नूरजहां ने आगे कहा, तुम्हारी इस नेकी ने मेरा दिल जीत लिया। मैंने बहुत से इंसान देखे हैं, लेकिन तुम जैसा कोई नहीं। ज्यादातर लोग लालच में अंधे हो जाते हैं। लेकिन तुमने अपनी फायदे से पहले समंदर और दूसरी मखलूकात के बारे में सोचा। यह बहुत बड़ी बात है। यूसुफ को बहुत शर्म आ रही थी। उसने कहा, नहीं मलका मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया। मैंने बस वही किया जो सही था। हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम ने सिखाया है कि हमें अल्लाह की हर मखलूक पर रहम करना चाहिए। नूरजहां बहुत खुश हुई। उसने कहा यूसुफ तुम सच में बहुत नेक हो। मैं तुम्हारी इस नेकी से बहुत खुश हूं और मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूं। मैं तुम्हें यह वादा करती हूं कि जब भी तुम्हें मेरी मदद की जरूरत होगी तुम यहां समंदर के किनारे आकर मुझे पुकार लेना। बस तीन बार मेरा नाम लो नूरज खान और मैं हाजिर हो जाऊंगी। यूसुफ ने कहा शुक्रिया मलका। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मुझे आपकी मदद की जरूरत पड़ेगी। अल्लाह ने मुझे दो हाथ और मेहनत करने की ताकत दी है। मैं अपनी मेहनत से ही कमाना पसंद करता हूं। नूरजहां मुस्कुराई। उसने कहा यूसुफ तुम सच में बहुत खास हो लेकिन याद रखना कि जिंदगी में कभी-कभी ऐसे हालात आ जाते हैं जब हमें मदद की जरूरत होती है। उस वक्त मुझे पुकार लेना। यूसुफ ने कहा ठीक है मलका मैं याद रखूंगा। नूरजहां ने कहा एक बात और यूसुफ तुम्हारी मेहनत और तुम्हारी नेकी देखकर मैंने फैसला किया है कि मैं तुम्हारी मदद करूंगी। मैं अपने एक खास जिन को मुकर्रर करती हूं जो तुम्हारे जाल में हमेशा अच्छी मछलियां फंसाएगा। लेकिन यह तुम्हारी मेहनत के बदले होगा ना कि कोई जादू। तुम्हें अब भी मेहनत करनी पड़ेगी। यूसुफ ने कहा लेकिन मलका नूरजहां ने उसे रोकते हुए कहा, नहीं यूसुफ, यह मेरा फैसला है। तुमने मुझ पर एहसान किया है और मैं इसका बदला देना चाहती हूं। अब मुझे जाना होगा। याद रखना जब भी जरूरत हो मुझे पुकार लेना। इतना कहकर नूर जहां पानी में गायब हो गई। यूसुफ कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अभी-अभी जो कुछ हुआ वह सच था। उसने अपने आप को चिमटी काटी। नहीं, यह सपना नहीं था। यूसुफ ने फिर अल्लाह का शुक्र अदा किया और बाकी मछलियों को इकट्ठा करके बाजार की तरफ चल पड़ा। आज उसके पास बहुत सारी मछलियां थी और वह सोच रहा था कि आज तो अच्छी कमाई होगी। बाजार में उसकी सारी मछलियां झट से बिक गई। लोग कह रहे थे कि आज यूसुफ की मछलियां और भी ज्यादा ताजी और बड़ी हैं। यूसुफ को बहुत अच्छी कीमत मिली। जब यूसुफ घर पहुंचा तो आयशा दरवाजे पर उसका इंतजार कर रही थी। उसने यूसुफ की खुशी देखी और पूछा क्या बात है? आज तो बहुत खुश लग रहे हो। यूसुफ ने सोचा कि क्या वह आयशा को सुनहरी मछली के बारे में बताएं। लेकिन फिर उसने सोचा कि फिलहाल यह जरूरी नहीं है। वह बोला बस अल्लाह का फजलल है। आज बहुत अच्छी मछलियां मिली और सब बिक गई। आयशा बहुत खुश हुई। उसने कहा, अल्हम्दुलिल्लाह चलो अंदर आओ। मैंने खाना बनाया है। उस दिन के बाद से यूसुफ के जाल में हर रोज बहुत अच्छी और ज्यादा मछलियां आने लगी। कभी-कभी तो इतनी ज्यादा मछलियां होती कि यूसुफ को कई दिनों तक मछली पकड़ने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसकी आमदनी बहुत अच्छी हो गई। आहिस्ता-आहिस्ता उनके घर में नई-नई चीजें आने लगी। आयशा ने नए बर्तन खरीदे। घर के लिए नए पर्दे बनवाए। यूसुफ ने भी कुछ नया फर्नीचर खरीदा। एक अच्छा पलंग, कुछ कुर्सियां और एक अलमारी। बस्ती के लोग देखकर हैरान थे। वह कहते यूसुफ की किस्मत खुल गई है। अल्लाह उस पर बहुत मेहरबान है। यूसुफ के चाचा इब्राहिम भी बहुत खुश थे। वह कहते देखा मैंने कहा था ना कि यूसुफ एक दिन कामयाब होगा। मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। दूसरे मछेरे भी हैरान थे कि यूसुफ के जाल में इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा मछलियां कैसे आ जाती हैं? कुछ लोग तो यूसुफ से पूछते भी थे यूसुफ भाई तुम्हारा जाल कहां से खरीदा है? हमें भी बताओ। यूसुफ हंसकर कहता भाई जाल तो वही पुराना है। बस अल्लाह का फजलल है। लेकिन यूसुफ खुद हैरान था। वह जानता था कि यह सब नूरजहां की मेहरबानी है। लेकिन उसने किसी को यह बात नहीं बताई। वह सोचता था कि अगर उसने यह बात बता दी तो लोग उस पर हंसेंगे या फिर उसे पागल समझेंगे। कुछ महीने इसी तरह गुजर गए। यूसुफ और आयशा की जिंदगी बहुत खुशहाल हो गई थी। उनके पास अब पहले से काफी ज्यादा पैसे थे और वह बहुत आराम से रह रहे थे। लेकिन दोनों अभी भी बहुत सादा जिंदगी जी रहे थे। वह फिजूल खर्ची नहीं करते थे और हमेशा अल्लाह के शुक्रगुजार रहते थे। एक दिन आयशा ने यूसुफ से पूछा सुनो मुझे एक बात पूछनी है। यूसुफ ने कहा हां पूछो। आयशा ने कहा आजकल तुम्हारे कारोबार में बहुत तरक्की हो रही है। हर रोज इतनी सारी मछलियां आ जाती हैं। यह सब कैसे हो रहा है? यूसुफ थोड़ा घबरा गया। उसने सोचा कि क्या वह आयशा को सच बता दे। लेकिन फिर उसने सोचा कि फिलहाल यह जरूरी नहीं है। वह बोला मुझे भी नहीं पता। शायद यह जाल बहुत अच्छा है या फिर अल्लाह की मेहरबानी है। आयशा ने कहा हां यह तो है। अल्लाह हम पर बहुत मेहरबान है। हमें हमेशा उसका शुक्र अदा करना चाहिए। यूसुफ ने कहा बिल्कुल और हमें कभी घमंड नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी हमारे पास है वह अल्लाह की देन है। आयशा मुस्कुराई और बोली तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। लेकिन आयशा के दिल में एक शक था। औरतों में एक खास हिस होती है। वह महसूस कर रही थी कि यूसुफ कुछ छुपा रहा है। लेकिन उसने फिलहाल कुछ नहीं कहा। कुछ और दिन इसी तरह गुजर गए। यूसुफ की कामयाबी दिन-बदिन बढ़ती जा रही थी। उसके जाल में हर रोज इतनी अच्छी मछलियां आती कि बाजार के सारे लोग उसे खरीदना चाहते थे। कभी-कभी तो ऐसा होता कि मछलियां बाजार पहुंचने से पहले ही रास्ते में ही बिक जाती। घर में अब बहुत सारी नई चीजें आ चुकी थी। नए कपड़े, नए बर्तन, नया फर्नीचर और घर की मरम्मत भी हो चुकी थी। पहले जो छोटा सा घर था वह अब और भी सुंदर लग रहा था। आयशा ने घर को बहुत प्यार से सजाया था। लेकिन आयशा के दिल में अभी भी वही शक था। वह हर रोज यूसुफ को देखती और सोचती कि जरूर कोई बात है जो उसका शौहर उससे छुपा रहा है। वह यूसुफ की आंखों में देखती तो उसे लगता कि यूसुफ कुछ कहना चाहता है लेकिन कह नहीं पा रहा। एक दिन शाम को जब यूसुफ घर आया तो आयशा ने उसे खाना परोसा और फिर उसके पास बैठ गई। उसने बहुत प्यार से यूसुफ का हाथ पकड़ा और कहा सुनो मुझे तुमसे कुछ कहना है। यूसुफ ने कहा हां बोलो। आयशा ने कहा मेरा दिल कहता है कि तुम मुझसे कोई बात छुपा रहे हो। हम मियां बीवी हैं। हमारे बीच कोई राज नहीं होना चाहिए। आखिर ऐसा क्या है जो तुम मुझे नहीं बताना चाहते। यूसुफ ने आयशा की आंखों में देखा। उसे अपनी बीवी की मोहब्बत नजर आई। उसने सोचा कि अब वक्त आ गया है कि वह सच बता दे। वह बोला तुम सही कह रही हो। मैं तुमसे एक बात छुपा रहा हूं। लेकिन यह बात इतनी अजीब है कि मुझे डर था कि तुम यकीन नहीं करोगी। आयशा ने कहा मैं तुम पर यकीन करती हूं। तुम जो भी कहोगे मैं मानूंगी। यूसुफ ने गहरी सांस ली और फिर उसने आयशा को पूरी कहानी सुनाई। उसने बताया कि कैसे एक दिन उसके जाल में एक सुनहरी मछली ठीक फंसी थी। कैसे उसने उस मछली को छोड़ दिया था और कैसे वह मछली असल में एक परी थी जिसका नाम नूरजहां था। उसने यह भी बताया कि नूरजहां ने उससे वादा किया था कि वह उसकी मदद करेगी और इसीलिए उसके जाल में अब इतनी अच्छी मछलियां आने लगी हैं। आयशा ने पूरी कहानी बहुत ध्यान से सुनी। जब यूसुफ ने कहानी खत्म की तो आयशा कुछ देर तक खामोश रही। फिर उसने एक लंबी सांस ली। यूसुफ ने पूछा क्या तुम्हें यकीन हो रहा है? आयशा ने कहा, हां मुझे यकीन हो रहा है। अब मुझे समझ आ गया कि आजकल इतनी तरक्की कैसे हो रही है। यूसुफ ने कहा लेकिन याद रखना कि यह सब अल्लाह की मर्जी से हो रहा है। नूरजहां भी अल्लाह की एक मखलूक है और वह भी अल्लाह के हुक्म से ही कुछ कर सकती है। आयशा ने कहा हां, यह तो सही है। फिर वह कुछ देर तक सोचती रही। यूसुफ देख रहा था कि उसकी बीवी के चेहरे पर अलग-अलग भाव आ रहे हैं। पहले हैरानी, फिर खुशी और फिर कुछ और। अचानक आयशा ने कहा सुनो अगर वह परी है और उसने तुम्हें मदद करने का वादा किया है तो तुम उससे और भी मदद क्यों नहीं मांगते? यूसुफ को यह सवाल अच्छा नहीं लगा। उसने कहा क्या मतलब? आयशा ने कहा, "मेरा मतलब है कि तुम उससे कह सकते हो कि वह हमें एक बड़ा घर दे दे। देखो, यह घर कितना छोटा है। हमें एक बड़े घर की जरूरत है। यूसुफ हैरान रह गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही आयशा है जो हमेशा शुक्रगुजार रहती थी। वह बोला आयशा यह तुम क्या कह रही हो? हमारे पास जो है उसी में हमें खुश रहना चाहिए। अल्लाह ने हमें इतना दिया है। हमें और क्या चाहिए? आयशा ने कहा लेकिन अगर हमें और मिल सकता है तो हमें मांगना चाहिए। तुमने खुद कहा कि परी ने तुम्हें मदद करने का वादा किया है। यूसुफ ने कहा। देखो आयशा मांगना सिर्फ अल्लाह से चाहिए। मैंने कभी नूर जहां से कुछ नहीं मांगा। वह खुद ही मेरी मदद कर रही है और मुझे इसकी भी जरूरत नहीं थी। मैं अपनी मेहनत से ही खुश था। आयशा ने कहा लेकिन यूसुफ ने उसे रोकते हुए कहा सुनो आयशा हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम ने सिखाया है कि हमें अपनी जरूरत के मुताबिक ही मांगना चाहिए और हमारी सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। हमारे पास खाने के लिए हैं, पहनने के लिए है और रहने के लिए घर है। अल्लाह का शुक्र है। उसने आगे कहा और देखो हमारे कितने दोस्त हैं जिनकी दो वक्त की रोटी भी पूरी नहीं होती। कुछ दिन पहले हमारी भी ऐसी ही हालत थी। अब हम उनसे सैकड़ों गुना बेहतर हैं। तुम देखना कुछ ही रोज में हम एक कश्ती भी खरीद लेंगे और फिर गहरे पानी में जाकर और भी ज्यादा मछलियां पकड़ सकेंगे। यूसुफ ने प्यार से आयशा का हाथ पकड़ा और कहा जो इज्जत मेहनत करने और अपनी कमाई से खाने में है वह मांगने में नहीं है। अल्लाह ने मुझे हाथ पैर दिए हैं और मेहनत करने की ताकत दी है। मुझे अपने बाजू के जोर पर कमाना पसंद है। यही असली मर्द की निशानी है। लेकिन यूसुफ की बातों का आयशा पर कोई असर नहीं हुआ। बल्कि वह गुस्से में आ गई। उसने कहा तुम बस यही सोचते रहोगे तो हम हमेशा इसी तरह रहेंगे। तुम्हें पता नहीं कि पड़ोस की बीवियां क्या कहती हैं। वह कहती हैं कि उनके पास बड़े घर हैं, नौकर चाकर हैं और मेरे पास क्या है? यह छोटा सा घर। यूसुफ को बहुत दुख हुआ। उसने कहा आयशा तुम दूसरों से अपने आप को क्यों कंपेयर कर रही हो? हमें अपनी जिंदगी में खुश रहना चाहिए। दूसरों को देखकर लालच करना गलत है। आयशा और गुस्से में आ गई। उसने कहा, लालच तुम मुझ पर लालच का इल्जाम लगा रहे हो। मैं तो बस अच्छी जिंदगी चाहती हूं। इसमें गलत क्या है? अब यूसुफ और आयशा के बीच बहस होने लगी। आयशा जिद पकड़े बैठी थी कि यूसुफ को नूरजहां से एक बड़ा घर मांगना चाहिए। यूसुफ कह रहा था कि यह गलत है और उन्हें अपनी मेहनत पर यकीन रखना चाहिए। बहस काफी देर तक चलती रही। आखिर में आयशा रोने लगी। उसने कहा तुम मुझसे प्यार नहीं करते। अगर करते तो मेरी खुशी के लिए यह छोटा सा काम कर देते। यूसुफ का दिल पिघल गया। वह अपनी बीवी से बहुत प्यार करता था और उसे रोता हुआ नहीं देख सकता था। उसे अपने मां-बाप की याद आई जिन्होंने उसे बचपन में प्यार दिया था। उसे अपने चाचा इब्राहिम और चाची फातिमा की याद आई जिन्होंने उसे पाला था। उन सब ने उसे सिखाया था कि औरत का दिल रखना बहुत जरूरी है। उसे यह भी याद आया कि जब उसकी शादी हुई थी तो सबने कहा था कि यूसुफ और आयशा एक दूसरे के लिए बने हैं। अगर अब उनके बीच लड़ाई होगी तो लोग क्या कहेंगे। बस्ती में तमाशा हो जाएगा। यूसुफ ने बहुत सोचा। आखिर में उसने फैसला किया कि वह आयशा की यह एक बात मान लेगा। शायद इससे आयशा खुश हो जाएगी और फिर सब पहले जैसा हो जाएगा। उसने आयशा के आंसू पोंछे और कहा, ठीक है। मैं कल समंदर के किनारे जाऊंगा और नूरजहां को बुलाऊंगा। मैं उससे एक अच्छा घर मांग लूंगा। आयशा की आंखों में खुशी आ गई। उसने यूसुफ को गले लगाया और कहा, शुक्रिया तुम बहुत अच्छे हो। लेकिन यूसुफ के दिल में बहुत भारीपन था। वह जानता था कि वह गलत कर रहा है। लेकिन उसने अपनी बीवी की खुशी के लिए यह फैसला किया था। उस रात यूसुफ को नींद नहीं आई। वह सोचता रहा कि कल क्या होगा। वह नूरजहां से क्या कहेगा। वह बार-बार अल्लाह से दुआ कर रहा था कि सब ठीक हो जाए। अगली सुबह यूसुफ बहुत दुखी दिल और ओझल मन के साथ समंदर के किनारे गया। उसने फजर की नमाज पढ़ी थी। लेकिन उसका दिल नमाज में नहीं लग रहा था। वह सोच रहा था कि वह क्या करने जा रहा है। समंदर के किनारे पहुंचकर यूसुफ बैठ गया। वह बहुत देर तक वहीं बैठा रहा। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह नूरजहां को बुलाए। वह सोच रहा था कि यह गलत है। उसे अपनी मेहनत पर भरोसा रखना चाहिए ना कि किसी से मांगना चाहिए। लेकिन फिर उसे आयशा की रोती हुई शक्ल याद आई और उसने फैसला किया कि वह यह काम करेगा। उसने गहरी सांस ली और धीरे से कहा नूरजहां नूरजहां नूरजहां कुछ देर बाद पानी में हलचल हुई और वही सुनहरी मछली पानी की सतह पर आ गई। फिर एक मीठी आवाज आई ए नेक दिल यूसुफ मैं जानती हूं कि आज तुम यहां क्यों आए हो और तुम इतने परेशान क्यों हो? यूसुफ ने हैरानी से कहा आप कैसे जानती हैं? नूरजहां ने कहा यूसुफ जब से तुमने मुझे बचाया है मैंने अपने एक खास जिन को तुम्हारी देखभाल के लिए मुकर्रर किया है वह जिन हर वक्त तुम्हारी खबर रखता है उसी ने मुझे बताया कि कल रात तुम्हारे और आयशा के बीच क्या हुआ यूसुफ को बहुत शर्म आई वह बोला मलका मुझे माफ कर दीजिए मैं अपनी बीवी की खुशी के लिए नूरजहां ने उसे रोकते हुए कहा यूसुफ तुम्हें माफी मांगने की जरूरत नहीं मैं समझती हूं तुम अपनी बीवी से प्यार करते हो और उसकी खुशी चाहते हो। यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन याद रखना कि असली खुशी मेहनत से आती है ना कि मांगने से। उसने आगे कहा तुम पूरे परस्तान में मशहूर हो। सब परियां और जिन तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी ईमानदारी और तुम्हारी दियातदारी की बात करते हैं। तुमने मुझे बचाने के बाद भी कभी मुझसे कुछ नहीं मांगा। यह तुम्हारी बहुत बड़ी खूबी है। यूसुफ ने कहा, शुक्रिया मलका। नूरजहां ने कहा, अब तुम अपने घर वापस जाओ। आयशा ने जो मांगा है वह हो चुका है। तुम्हें एक आलीशान घर मिल गया है। लेकिन यूसुफ याद रखना मेहनत से कभी जी मत चुराना। असली इज्जत मेहनत में है। यूसुफ ने कहा शुक्रिया अमल का मैं याद रखूंगा और मैं अब भी मेहनत करूंगा। नूरजहां ने कहा मुझे तुम पर पूरा यकीन है। अब जाओ। इतना कहकर नूरजहां पानी में गायब हो गई। यूसुफ उठा और बोझल कदमों के साथ अपनी बस्ती की तरफ चल पड़ा। उसका दिल बहुत भारी था। वह सोच रहा था कि क्या उसने सही किया। जब यूसुफ अपनी बस्ती के करीब पहुंचा तो उसने देखा कि बस्ती के बीचोंबीच एक बहुत बड़ा और खूबसूरत घर बना हुआ है। नहीं घर नहीं यह तो एक छोटा महल था। इसकी दीवारें सफेद संगमरमर की थी जो सूरज की रोशनी में चमक रही थी। छत पर सुनहरे रंग की नक्काशी की गई थी। सामने एक बड़ा दरवाजा था जिस पर खूबसूरत डिजाइन बने हुए थे। बस्ती के लोग इस नए घर को देखने के लिए इकट्ठा हो गए थे। सब हैरान थे कि यह घर रातोंरात कैसे बन गया। कुछ लोग कह रहे थे कि यह कोई जादू है। कुछ कह रहे थे कि शायद कोई अमीर आदमी यहां आया है। यूसुफ ने जब यह देखा तो उसका दिल और भी भारी हो गया। वह इस महल में नहीं जाना चाहता था। वह अपने छोटे पुराने घर में जाना चाहता था। जहां उसने और आयशा ने इतनी खुशियां देखी थी। उस छोटे घर में जो सुकून था, वह इस बड़े महल में नहीं हो सकता। वह अपने पुराने घर की तरफ कदम बढ़ाने लगा। लेकिन तभी एक आदमी ने उसे रोका। यह आदमी बहुत लंबा और ताकतवर था। उसने महंगे कपड़े पहने हुए थे। उसने बहुत अदब से कहा, हुजूर, आप कहां जा रहे हैं? मालकिन आपका इंतजार कर रही हैं। यूसुफ ने पूछा, "तुम कौन हो?" उस आदमी ने कहा, हुजूर, मेरा नाम सलीम है और मैं इस घर का खादिम हूं। मालकिन ने मुझे हुक्म दिया है कि आप आए तो आपको फौरन महल में ले जाऊं। यूसुफ कुछ कहना चाहता था, लेकिन सलीम ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे महल की तरफ ले जाने लगा। बस्ती के लोग यह देखकर और भी हैरान हो गए। वह आपस में फुसफुसाने लगे। यह यूसुफ है तो यह महल यूसुफ का है। महल के दरवाजे पर पहुंचकर यूसुफ ने देखा कि आयशा बहुत खूबसूरत कपड़ों में खड़ी है। उसने रेशमी लिबास पहना हुआ था जिस पर सोने की कढ़ाई की गई थी। उसके गले में सोने का हार था और कानों में हीरे की बालियां थी। उसके बाल बहुत अच्छे से संवारे हुए थे। आयशा ने जब यूसुफ को देखा तो उसकी आंखों में खुशी आ गई। वह दौड़कर यूसुफ के पास आई और उसका हाथ पकड़ कर अंदर ले गई। अंदर का मंजर और भी शानदार था। फर्श पर महंगे कालीन बिछे हुए थे। दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग्स लगी थी। कमरे बहुत बड़े और हवादार थे। हर कमरे में महंगा फर्नीचर रखा हुआ था। रसोई में हर तरह के बर्तन थे। सोने चांदी के बर्तन। गुसलखाने में संगमरमर लगा था। आयशा यूसुफ को पूरा घर दिखाने लगी। वह बहुत खुश थी। वह कह रही थी देखो मैंने कहा था ना कि हमें नया घर मिल जाएगा। देखो कितना बड़ा है। यहां पांच कमरे हैं। एक बड़ा हॉल है। एक रसोई है जो हमारे पुराने पूरे घर जितनी बड़ी है। वह आगे बोली और देखो यहां नए कपड़े भी हैं। नए जेवरात भी हैं, नए बर्तन भी हैं। और सबसे अच्छी बात यहां नौकर चाकर भी हैं। सलीम के अलावा तीन और खादिम हैं। रहीम, करीम और नदीम। और तीन कनी भी हैं जो मेरे काम करती हैं। फातिमा, खदीजा और आमना। यूसुफ चुपचाप सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। आयशा ने यह देखा और पूछा, "क्या बात है? तुम खुश क्यों नहीं लग रहे?" यूसुफ ने गहरी सांस ली और कहा, आयशा, यह सब गलत है। मेहनत करके जो झोपड़ी बनाई जाती है, उसमें जो सुकून है, वह मांग तांग कर मिले महलों में नहीं होता। हमारा पुराना घर कितना अच्छा था। वहां हम दोनों मिलकर सब काम करते थे। तुम खाना बनाती थी। मैं मछलियां पकड़ता था। हम साथ बैठकर खाते थे। साथ बातें करते थे। यहां तो सब नौकर चाकर हैं। यह हमारी जिंदगी नहीं है। आयशा को यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। वह गुस्से में आ गई और बोली, तुम हमेशा ऐसे ही रहोगे। तुम हमेशा एक गरीब मछेरे की तरह ही जीना चाहते हो। देखो कितना अच्छा घर मिला है और तुम शिकायत कर रहे हो। यूसुफ ने कहना चाहा कुछ लेकिन आयशा ने उसे रोकते हुए कहा नहीं अब बस मैं नहीं सुनना चाहती तुम्हारी बकवास तुम जाओ और नहा धोकर आओ मैंने नौकरों को हुक्म दे दिया है कि वह तुम्हारे लिए नए कपड़ों का इंतजाम करें। यूसुफ का दिल बहुत दुखी था लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह सोच रहा था कि शायद कुछ दिनों में आयशा समझ जाएगी कि असली खुशी इन चीजों में नहीं है। अगले दिन सुबह जब यूसुफ अपना जाल उठाकर मछली पकड़ने जाने लगा तो आयशा ने उसे रोक दिया। वह बोली तुम कहां जा रहे हो? यूसुफ ने कहा मछली पकड़ने मुझे अपना काम करना है। आयशा ने कहा काम अब तुम्हें काम करने की क्या जरूरत है? हमारे पास इतना सब कुछ है। तुम अब आराम से रहो। यूसुफ ने कहा, नहीं आयशा मैं बिना काम किए नहीं रह सकता। मेहनत करना मेरी फितरत है। नबी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम ने भी मेहनत करने की तालीम दी है। आयशा गुस्से में आ गई। उसने कहा खुदा के लिए अब भूल जाओ कि तुम कभी मछेरे थे। लोग क्या कहेंगे कि इतने बड़े महल के मालिक अभी भी मछलियां पकड़ने जाते हैं। यूसुफ ने कहा मुझे परवाह नहीं कि लोग क्या कहते हैं। मैं जो सही समझता हूं वही करूंगा। तुम जिस हाल में चाहो रहो। लेकिन मुझे मेरी मर्जी से चलने दो। आयशा को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। लेकिन यूसुफ जाल लेकर निकल गया। वह पूरे दिन समंदर में रहा और मछलियां पकड़ी। शाम को जब वह वापस आया तो आयशा ने उससे बात नहीं की। कुछ दिन इसी तरह गुजरे। यूसुफ हर रोज मछलियां पकड़ने जाता और आयशा तीन नाराज रहती। घर में नौकर चाकर थे लेकिन वह माहौल नहीं था जो पहले था। यूसुफ को वह पुराना घर और वह पुरानी जिंदगी बहुत याद आती थी। यूसुफ ने यह भी देखा कि घर के नौकर चाकर आयशा को मलका की तरह मानते हैं। वह उसकी हर बात मानते हैं। जैसे उसका हुक्म ना मानने पर उनकी जान चली जाएगी। और आयशा भी उनके साथ बहुत सख्ती से पेश आती थी। वह छोटी-छोटी बातों पर उन्हें डांटती थी। एक दिन यूसुफ ने देखा कि आयशा ने एक कनीज को बहुत बुरी तरह डांटा क्योंकि उसने खाने में नमक कम डाल दिया था। यूसुफ को यह बहुत बुरा लगा। उसने आयशा से कहा, "यह तुम क्या कर रही हो?" यह लोग भी इंसान हैं। इनके साथ अच्छे से पेश आओ। लेकिन आयशा ने कहा, तुम मेरे काम में दखल मत दो। यह मेरे नौकर हैं और मैं जानती हूं कि इनके साथ कैसे पेश आना है। यूसुफ को बहुत दुख हुआ। उसे लग रहा था कि आयशा बदल गई है। वह वही आयशा नहीं रही जिससे उसने शादी की थी। वह नेक दिल मेहरबान आयशा कहां चली गई थी? कुछ हफ्ते और गुजर गए। एक दिन आयशा ने यूसुफ के हाथ से जाल छीन लिया और नौकरों को हुक्म दिया। इस जाल को और इसके सारे पुराने सामान को ले जाओ और इसके पुराने घर में रख दो। और ध्यान रहे कि साहब कभी भी यह सामान इस महल में लाना चाहें तो उन्हें रोक देना। यूसुफ हैरान रह गया। उसने कहा आयशा यह तुम क्या कर रही हो? आयशा ने कहा मैं बस इतना चाहती हूं कि तुम उस पुरानी जिंदगी को भूल जाओ। अब हम अमीर लोग हैं। हमें अमीरों की तरह रहना चाहिए। यूसुफ ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन आयशा नहीं मानी। नौकरों ने यूसुफ का सारा सामान उठाकर पुराने घर में रख दिया। यूसुफ बेबस होकर देखता रहा। उस रात यूसुफ को बिल्कुल नींद नहीं आई। वह सोच रहा था कि यह सब कैसे हो गया। उसकी प्यारी बीवी इतनी बदल कैसे गई? वह तो सिर्फ आयशा को खुश करना चाहता था। लेकिन यह क्या हो गया? कुछ दिन और गुजरे। एक दिन शाम को आयशा ने यूसुफ को बहुत प्यार से अपने पास बुलाया। यूसुफ को हैरानी हुई क्योंकि पिछले कई दिनों से आयशा उससे ढंग से बात नहीं कर रही थी। आयशा ने बहुत मीठे लहजे में कहा, "सुनो मेरे प्यारे शौहर, मुझे तुमसे कुछ कहना है।" यूसुफ ने सोचा कि शायद आयशा को अपनी गलती का एहसास हो गया है। उसने उम्मीद से पूछा, हां बोलो। आयशा ने कहा देखो इंसान एक जैसी जिंदगी जीतेजीते थक जाता है। यह महल, यह नौकर चाकर यह सब देखतेदेखते मेरा जी उगता गया है। हर रोज वही चीजें वही माहौल मेरा दिल नहीं लग रहा। यूसुफ को खुशी हुई। उसने सोचा कि आयशा को समझ आ गई है कि असली खुशी साधारण जिंदगी में है। वह बोला मैं समझ रहा हूं तो क्या तुम चाहती हो कि हम अपनी पुरानी जिंदगी में वापस चले जाएं? लेकिन आयशा ने जो अगली बात कही उससे यूसुफ को झटका लग गया। आयशा ने कहा नहीं मैं यह कह रही हूं कि मुझे इससे भी बड़ा महल चाहिए। मुझे बादशाहों की तरह रहना है। मुझे ऐसा महल चाहिए जिसमें सैकड़ों नौकर चाकर हो, गुलाम हो, कनी हो। मैं एक चुटकी बजाऊं तो सब मेरे सामने हाजिर हो जाए। मुझे तख्त पर बैठना है और मलका की तरह रहना है। यूसुफ को यकीन नहीं हो रहा था कि यह सब सुन रहा है। उसने कहा आयशा यह तुम क्या कह रही हो? हमारे पास पहले से ही इतना कुछ है। पूरा गांव हैरान है कि हमारे पास इतना सब कैसे आ गया। लोग हमसे बहुत खुश हैं। फिर तुम्हें और क्या चाहिए? आयशा ने कहा मुझे और चाहिए। मैं इस छोटे से महल में नहीं रहना चाहती। मैं बादशाहों की तरह रहना चाहती हूं। यूसुफ ने कहा लेकिन आयशा यह तो लालच है। अल्लाह लालच को पसंद नहीं करता। हमें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने हमें इतना दिया है। आयशा गुस्से में आ गई। उसने कहा मुझे तुम्हारे वाज़ पसंद नहीं। तुम जाओ और उस परी से कहो कि मुझे बादशाहों जैसा महल चाहिए। अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं नौकरों को हुक्म दूंगी कि वह तुम्हें जबरदस्ती ले जाएं। यूसुफ हैरान था। क्या आयशा सच में ऐसा कर सकती है? उसने आयशा की आंखों में देखा और उसे डर लगा। आयशा की आंखों में एक अजीब सी चमक थी लालच और गुरूर की चमक। यूसुफ ने पहले तो सोचा कि वह इस मगरूर और लालची औरत को अपने से दूर कर दे। उसने सोचा कि वह आयशा को तलाक दे दे और अपनी पुरानी जिंदगी में वापस चला जाए। लेकिन फिर उसे अपने मां-बाप की याद आई। उसे अपने चाचा इब्राहिम और चाची फातिमा की याद आई जिन्होंने उसे पाला था। उन सब ने उसे सिखाया था कि शादी एक पवित्र बंधन है और इसे आसानी से नहीं तोड़ना चाहिए। उसे यह भी याद आया कि शादी से पहले आयशा कितनी नेक दिल थी। शायद यह सब लालच ने उसे बदल दिया है। शायद अल्लाह कोई रास्ता निकाल देगा और आयशा को समझ आ जाएगी। यूसुफ ने सब्र करते हुए कहा ठीक है मैं जाता हूं। आयशा की आंखों में खुशी चमक उठी। उसने कहा शुक्रिया। मुझे पता था कि तुम मेरी बात मानोगे। यूसुफ बहुत भारी मन से समंदर के किनारे की तरफ चल पड़ा। रास्ते में उसे बस्ती के लोग मिले। उन्होंने प्यार से सलाम किया और कहा, यूसुफ भाई, अल्लाह ने आप पर बहुत मेहरबानी की है। आप बहुत खुशनसीब हैं। यूसुफ ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसका दिल रो रहा था। वह सोच रहा था कि अगर इन लोगों को पता चलता कि यह सब किस कीमत पर मिला है, तो वह क्या सोचते? समंदर के किनारे पहुंचकर यूसुफ बैठ गया। उसने अपना सर झुका लिया और रोने लगा। वह अल्लाह से दुआ कर रहा था। या अल्लाह मुझे राह दिखा। मैं बहुत परेशान हूं। मेरी बीवी लालच में अंधी हो गई है। मुझे नहीं पता कि क्या करूं। तभी उसे वही मीठी आवाज सुनाई दी। ए नेक दिल यूसुफ, मैं जानती हूं कि तुम बहुत परेशान हो। यूसुफ ने देखा कि वही सुनहरी मछली पानी की सतह पर तैर रही है। नूरजहां ने कहा, यूसुफ, मेरा जिन मुझे सब कुछ बता रहा है। मुझे पता है कि आयशा की ख्वाहिशें बढ़ती ही जा रही हैं। मुझे यह भी पता है कि तुम बहुत दुखी हो। यूसुफ ने कहा, मलका, मुझे माफ कर दीजिए। मुझे यह सब नहीं मांगना चाहिए था। मैं अपनी मेहनत से खुश था, लेकिन मैं अपनी बीवी को खुश देखना चाहता था। नूरजहां ने कहा, यूसुफ, तुमने कोई गलती नहीं की। तुम सिर्फ अपनी बीवी से प्यार करते हो और उसे खुश देखना चाहते हो। यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन कभी-कभी जो चीजें हम प्यार में करते हैं, वह सही नहीं होती। यूसुफ ने कहा, अब आयशा और चाहती है, वह बादशाहों की तरह रहना चाहती है। नूरजहां ने कहा, "मुझे पता है और मैं उसकी यह ख्वाहिश भी पूरी कर दूंगी। लेकिन यूसुफ, याद रखना असली खुशी महलों में नहीं, दिल के सुकून में है। और दिल का सुकून तभी मिलता है जब हम मेहनत करें। ईमानदारी से जिए और अल्लाह के शुक्रगुजार रहें। उसने आगे कहा अल्लाह ताला ने हम परियों और जिन्हों को बहुत ताकत दी है। हम पलक झपकते ही महल बना सकते हैं। खजाने जमा कर सकते हैं। लेकिन हमारी यह ताकत इंसानों की अक्ल और मेहनत के आगे कुछ भी नहीं। इंसान अपनी अक्ल और मेहनत से वह कर सकता है जो हम कभी नहीं कर सकते। यूसुफ ने कहा शुक्रिया मलका। नूरजहां ने कहा अब तुम घर जाओ। आयशा की ख्वाहिश पूरी हो चुकी है। लेकिन याद रखना मेहनत कभी मत छोड़ना। यही तुम्हारी असली ताकत है। यूसुफ उठा और घर की तरफ चल पड़ा। जब वह बस्ती के पास पहुंचा तो उसने देखा कि पहले वाला महल गायब हो चुका है और उसकी जगह एक बहुत बड़ा और शानदार महल खड़ा है। यह महल पहले वाले से 10 गुना बड़ा था। इसके चारों तरफ ऊंची दीवारें थी। सामने बहुत बड़े दरवाजे 10 थे जिन पर सोने की नक्काशी थी। महल के अंदर बड़े-बड़े बाग थे, फव्वारे थे, तालाब थे। बस्ती के लोग फिर से इकट्ठा हो गए थे। वह और भी ज्यादा हैरान थे। कुछ लोग कह रहे थे, यह तो बादशाहों का महल है। यूसुफ को क्या हो गया है? महल के दरवाजे पर बहुत सारे गुलाम खड़े थे। उन्होंने यूसुफ को देखा तो फौरन सलाम किया और कहा, हुजूर, मालकिन आपका इंतजार कर रही हैं। यूसुफ को अंदर ले जाया गया। महल के अंदर का मंजर देखकर यूसुफ हैरान रह गया। यह तो किसी बादशाह का महल था। बहुत बड़ा हॉल था जिसमें सोने का तख्त रखा था। तख्त के चारों तरफ कनीजें खड़ी थी और तख्त पर आयशा बैठी थी। आयशा ने बहुत शानदार लिबास पहना हुआ था। उसके सर पर एक छोटा ताज था। उसके गले में हीरे जवाहरात का हार था। वह सच में किसी मलका की तरह लग रही थी। आयशा ने यूसुफ को देखा तो मुस्कुराई। उसने कहा। आओ देखो कितना शानदार महल है। अब मैं सच में मलका की तरह रह रही हूं। यूसुफ चुपचाप खड़ा रहा। उसे कुछ कहना नहीं था। वह सोच रहा था कि यह सब कब खत्म होगा। कुछ दिन इसी तरह गुजरे। आयशा अपनी नई जिंदगी में मस्त थी। वह तख्त पर बैठती और अपने गुलामों और कनीजों को हुक्म देती। यूसुफ उस महल में एक अजनबी की तरह रहता था। वह कोशिश करता था कि जितना हो सके महल से बाहर रहे। लेकिन जब भी वह अपने जाल के साथ मछली पकड़ने जाना चाहता। आयशा के गुलाम उसे रोक देते। आयशा ने हुक्म दे रखा था कि यूसुफ को मछली पकड़ने नहीं जाने देना है। यूसुफ बहुत परेशान था। वह बिना काम किए नहीं रह सकता था। एक दिन सुबह जब सूरज उगा तो उसकी रोशनी बहुत तेज थी। आयशा अपने तख्त पर बैठी थी। उसने बाग में जाने की सोची लेकिन सूरज की तेज धूप उसे अच्छी नहीं लग रही थी। अचानक आयशा को एक अजीब ख्याल आया। वह चिल्लाई। यूसुफ, यूसुफ फौरन आओ। यूसुफ भाग कर आया। उसने पूछा क्या हुआ? आयशा ने गुस्से में कहा, अभी और इसी वक्त उस सुनहरी मछली के पास जाओ। उससे कहो कि वह सूरज से कहे कि मेरे सामने से हट जाए। मैं बाग में जाना चाहती हूं, लेकिन यह सूरज बहुत तेज चमक रहा है। यूसुफ को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसने कहा, आयशा, यह तुम क्या कह रही हो? यह तो खुदाई मामला है। सूरज अल्लाह ने बनाया है। कोई परी या जिन इसमें कैसे दखल दे सकता है? आयशा चीख कर बोली, "मुझे तुम्हारी बकवास नहीं सुननी।" या तो तुम जाते हो या मैं अपने गुलामों को हुक्म देती हूं कि वह तुम्हें जबरदस्ती खींच कर ले जाए। यूसुफ ने देखा कि आयशा के गुलाम उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। यह गुलाम बहुत ताकतवर थे और यूसुफ जानता था कि यह असल में जिन है जो इंसानी शक्ल में है। यूसुफ ने सोचा कि अब बहुत हो गया। आयशा की हद हो गई है। वह खुदाई मामलों में भी दखल देने लगी है। लेकिन फिर उसने सोचा कि शायद अल्लाह अब कोई रास्ता निकाल देगा। शायद अब आयशा को सबक मिल जाएगा। यूसुफ फिर से समंदर के किनारे गया। उसने नूरजहां को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ी। वह पहले से ही वहां थी। नूरजहां ने दुखी आवाज में कहा, ए यूसुफ, काश कि तुम्हारी बीवी गुरूर की इस हद तक ना जाती कि वह खुदाई मामलात में भी दखल देने लगी। यूसुफ ने कहा, "मुझे माफ कर दीजिए।" नूरजहां ने कहा, यूसुफ, तुम्हें माफी मांगने की जरूरत नहीं। तुमने कुछ गलत नहीं किया। तुम तो बस अपनी बीवी से प्यार करते हो। लेकिन अब बहुत हो गया। उसने आगे कहा जब तुमने मुझे बचाया था तो परस्तान की सारी परियों ने मिलकर फैसला किया था कि हम तुम्हारी मदद करेंगे। हमने सोचा था कि तुम्हारी बीवी की कुछ ख्वाहिशें पूरी कर देंगे और फिर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन आयशा की ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं है। नूरजहां ने कहा और अब जो उसने मांगा है वह ना सिर्फ नाकाबिल कबूल है बल्कि अल्लाह की नाफरमानी भी है। कोई भी परी या जिन खुदाई मामलों में दखल नहीं दे सकता। सूरज, चांद, सितारे यह सब अल्लाह के हुक्म से चलते हैं। यूसुफ ने पूछा, तो अब क्या होगा? नूरजहां ने कहा, अब परस्तान ने फैसला किया है कि सब कुछ वापस पहले जैसा कर दिया जाए। तुम्हें तुम्हारी पुरानी जिंदगी में लौटा दिया जाएगा। वह महल, वह दौलत, वह सब गायब हो जाएगा। यूसुफ को राहत मिली। उसने कहा, शुक्रिया मलका। मैं तो पहले से ही अपनी पुरानी जिंदगी में लौटना चाहता था। नूरजहां ने कहा हमें पूरा यकीन है कि तुम एक मेहनतकश इंसान हो और तुम अपनी मेहनत से फिर से अच्छे दिन देखोगे और हमें यह भी यकीन है कि आयशा इस सबक से बहुत कुछ सीखेगी। शायद वह फिर से वही नेक दिल आयशा बन जाएगी जो पहले थी। उसने आगे कहा और हां यूसुफ हम अब भी तुम्हारे जाल में अच्छी मछलियां फंसाने में तुम्हारी मदद करेंगे। लेकिन बाकी तुम्हारी मेहनत पर निर्भर है। तुम जितनी मेहनत करोगे उतना ही फायदा होगा। यूसुफ ने कहा शुक्रिया मलका। आपने मुझ पर बहुत एहसान किया। नूरजहां ने कहा, नहीं यूसुफ, एहसान तो तुमने किया था जब तुमने मुझे बचाया था। अब जाओ अल्लाह हाफिज। इतना कहकर नूरजहां पानी में गायब हो गई। यूसुफ उठा और घर की तरफ चला। जब वह बस्ती में पहुंचा तो देखा कि वह बड़ा महल गायब हो चुका है। वहां फिर से वही खाली मैदान था जहां धूल उड़ रही थी। उसका पुराना छोटा घर वापस आ गया था। यूसुफ जल्दी-जल्दी अपने घर की तरफ भागा। घर का दरवाजा खुला था। वह अंदर गया तो देखा कि आयशा वहीं पुराने कपड़ों में उदास बैठी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। यूसुफ ने प्यार से आयशा के सर पर हाथ रखा और कहा यकीन मानो जो सुकून इस जिंदगी में है वह किसी महल में नहीं है। आयशा ने यूसुफ की तरफ देखा। उसकी आंखों में शर्म थी। वह बोली मुझे माफ कर दो। मैं बहुत गलत थी। मैं लालच में अंधी हो गई थी। मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया। यूसुफ ने कहा सब माफ है। अब हम फिर से अपनी पुरानी जिंदगी शुरू करेंगे। मैं मेहनत करूंगा और हम साथ मिलकर अपना घर बसाएंगे। आयशा ने कहा हां और इस बार मैं हमेशा शुक्रगुजार रहूंगी। यूसुफ ने अपना जाल निकाला और अपने मछेरे वाले कपड़े पहने। फिर वह समंदर की तरफ चल पड़ा। आज वह बहुत खुश था। वह फिर से एक मेहनतकश की हैसियत से अपनी जिंदगी शुरू कर रहा था। कुछ ही दिनों में पूरी बस्ती ने देखा कि यूसुफ का कारोबार फिर से तरक्की करने लगा। उसके पास पहले से भी ज्यादा मछलियां आने लगी और वह उन्हें बेचकर अच्छी कमाई करने लगा। आहिस्ता-आहिस्ता यूसुफ ने एक छोटी कश्ती खरीदी। फिर उसने एक बड़ी कश्ती खरीदी। फिर कुछ और कश्तियां खरीदी। अब वह गहरे समंदर में जाकर मछलियां पकड़ता था। बस्ती के कई नौजवान यूसुफ के साथ काम करने लगे। यूसुफ उनके साथ बहुत अच्छा बर्ताव करता था। वह उन्हें अपने भाइयों की तरह मानता था और उनकी देखभाल करता था। कुछ सालों में यूसुफ ने एक अच्छा घर बना लिया। यह घर बड़ा था, लेकिन शाहों जैसी शानो शौकत नहीं थी। यह एक साधारण लेकिन आरामदायक घर था। आयशा ने भी इस घर को बहुत प्यार से सजाया, लेकिन फिजूल खर्ची नहीं की। यूसुफ पूरी बस्ती का सरदार बन गया। लेकिन उसने कभी किसी पर रोब नहीं जमाया। वह सबके साथ प्यार से पेश आता था। बस्ती के लोग उससे बहुत प्यार करते थे। और उसकी एक आवाज पर दौड़े चले आते थे। यही असली बादशाहत थी दिलों पर राज करना। एक दिन शाम को आयशा और यूसुफ साथ बैठे थे। आयशा ने यूसुफ का हाथ पकड़ा और कहा, "अल्लाह मुझे माफ करे। मैं उसकी नाशुक्री करने लगी थी और तुम्हारी नाफरमान बन गई थी। यकीन मानो उस पूरे वक्त में मुझे एक दिन भी हकीकी सुकून नहीं मिला। मेरे अंदर लालच की ऐसी आग भड़क रही थी जो हर ख्वाहिश पूरी होने के बावजूद और ज्यादा भड़कती जाती थी। यूसुफ ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं तो तुम्हें बहुत पहले माफ कर चुका हूं और शायद अल्लाह ने मुझे इसी का सिला दिया है। देखो अब हम कितने खुश हैं। आयशा ने शर्म से अपना चेहरा छुपाया और फिर मुस्कुराते हुए कहा और एक बात है जो मैं तुम्हें बताना चाहती थी। यूसुफ ने पूछा क्या? आयशा ने कहा मुझे यकीन है कि अल्लाह जल्द ही हमारे घर में एक छोटे मेहमान की खुशखबरी देगा। यूसुफ ने हैरानी से पूछा सच आयशा ने मुस्कुराते हुए कहा हां मैं उम्मीद से हूं यूसुफ की आंखों में खुशी के आंसू आ गए उसने फौरन सजदे में गिर गया और शुक्राने के आंसू बहाने लगा अल्हम्दुलिल्लाह अल्हम्दुलिल्लाह आयशा भी उसके साथ बैठ गई और दोनों ने साथ मिलकर अल्लाह का शुक्र अदा किया उस दिन के बाद से यूसुफ और आयशा की जिंदगी और भी खुशहाल हो गई। कुछ महीनों बाद उनके घर में एक प्यारे से बेटे ने जन्म लिया। उन्होंने उसका नाम इब्राहिम रखा यूसुफ के चाचा के नाम पर जिन्होंने उसे पाला था। पूरी बस्ती में खुशियां मनाई गई। लोगों ने कहा यूसुफ और आयशा सच में बहुत खुशनसीब हैं। अल्लाह उन पर बहुत मेहरबान है। साल गुजरते गए। छोटा इब्राहिम बड़ा होने लगा। यूसुफ का कारोबार और भी ज्यादा बढ़ गया। वह अब पूरे इलाके का सबसे बड़ा मछेरा था। उसकी कई कश्तियां थी और कई लोग उसके साथ काम करते थे। लेकिन यूसुफ ने कभी अपनी जड़े नहीं भूली। वह आज भी खुद रोज समंदर में जाता था और मछलियां पकड़ता था। वह कहता मेहनत मेरी पहचान है। मैं कभी मेहनत नहीं छोडूंगा। आयशा भी अब पहले जैसी नेक दिल और मेहरबान हो गई थी। वह बस्ती की औरतों की मदद करती थी और गरीबों को खाना खिलाती थी। उसने अपने लालच के दिनों से बहुत कुछ सीखा था। एक दिन जब छोटा इब्राहिम 7 साल का हो गया तो उसने अपने अब्बू से पूछा अब्बू हम इतने अमीर हैं फिर भी आप रोज मछलियां पकड़ने क्यों जाते हैं? यूसुफ ने अपने बेटे को गोद में उठाया और कहा बेटा मेहनत ही इंसान की असली पूंजी है। अल्लाह मेहनत करने वालों को पसंद करता है। इज्जत महलों में नहीं मेहनत में है। छोटे इब्राहिम ने कहा तो मैं भी बड़ा होकर मछेरा बनूंगा। यूसुफ और आयशा दोनों मुस्कुरा दिए। बरसों बाद जब यूसुफ बूढ़ा हो गया तो वह अपने बेटे को समंदर के किनारे ले गया। उसने उसे मछली पकड़ने का हुनर सिखाया और सारी कहानी भी सुनाई। सुनहरी मछली की कहानी, नूरजहां की कहानी और लालच के खतरों की कहानी। इब्राहिम ने बहुत ध्यान से सुना। उसने कहा, अब्बू, अम्मी ने गलती की, लेकिन आपने उन्हें माफ कर दिया। यह बहुत बड़ी बात है। यूसुफ ने कहा, बेटा माफ करना इस्लाम की तालीम है और तुम्हारी अम्मी ने अपनी गलती से सबक सीखा। वह अब बहुत नेक दिल है। इब्राहिम ने पूछा, क्या वह सुनहरी मछली अब भी आती है? यूसुफ ने मुस्कुराते हुए कहा, "पता नहीं।" लेकिन मैंने कब बड़े होने के बाद फिर कभी उसे नहीं बुलाया। मुझे उसकी जरूरत नहीं पड़ी। मेरी मेहनत ही मेरी सबसे बड़ी ताकत रही। इब्राहिम ने कहा अब्बू अगर मुझे कभी वह मछली मिली तो मैं भी उसे वापस छोड़ दूंगा और मैं कभी उससे कुछ नहीं मांगूंगा। यूसुफ ने अपने बेटे को गले लगाया और कहा मुझे तुम पर गर्व है बेटा। उस रात घर वापस आकर यूसुफ, आयशा और इब्राहिम तीनों ने साथ मिलकर खाना खाया। खाने के बाद उन्होंने नमाज पढ़ी और अल्लाह का शुक्र अदा किया। बरसों गुजर गए। यूसुफ और आयशा दोनों अब बहुत बूढ़े हो चुके थे। उनके बाल सफेद हो गए थे। लेकिन उनके दिल अभी भी जवान थे। एक दिन यूसुफ और आयशा समंदर के किनारे बैठे सूरज को डूबते देख रहे थे। यूसुफ ने आयशा का हाथ पकड़ा और कहा तुम्हें याद है वह दिन जब मुझे वह सुनहरी मछली मिली थी। आयशा ने कहा कैसे भूल सकती हूं? उस दिन से हमारी जिंदगी बदल गई थी। लेकिन असली बदलाव तो तब आया जब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। यूसुफ ने कहा मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं। अगर तुम्हें फिर से वह मौका मिले तो क्या तुम वही गलती दोहराओगी? आयशा ने फौरन जवाब दिया, कभी नहीं। उस लालच ने मुझे तकरीबन बर्बाद कर दिया था। मैंने तुम्हें दुख दिया, अल्लाह की नाशुक्री की और अपने आप को भी खो दिया था। नहीं अगर मुझे हजार बार भी मौका मिले, मैं वह गलती नहीं दोहराऊंगी। यूसुफ मुस्कुराया। उसने कहा, "मुझे पता था कि तुम यही कहोगी और इसीलिए मैं तुमसे इतना प्यार करता हूं। तुमने अपनी गलतियों से सीखा और बेहतर इंसान बनी। तभी अचानक पानी में हलचल हुई। यूसुफ और आयशा दोनों ने देखा कि वही सुनहरी मछली पानी की सतह पर आई है। नूरजहां की आवाज आई। ए यूसुफ कैसे हो तुम? यूसुफ ने हैरानी से कहा। मलका आप इतने सालों बाद नूरजहां ने कहा, हां यूसुफ, मैं हमेशा तुम्हारी खबर रखती रही हूं। मेरा वह जिन आज भी तुम्हारी देखभाल करता है। मैं देख रही थी कि तुम दोनों कितने खुश हो। मैं बस यह कहने आई थी कि मुझे तुम दोनों पर गर्व है। आयशा ने शर्म से सर झुकाते हुए कहा, मलका मैंने बहुत गलती की थी। मुझे माफ कर दीजिए। नूरजहां ने कहा, आयशा तुमने अपनी गलती से सीखा। यही सबसे बड़ी बात है। अल्लाह ने इंसान को अक्ल इसीलिए दी है कि वह अपनी गलतियों से सीखे और बेहतर बने। तुमने वही किया। यूसुफ ने कहा, मलका आपका शुक्रिया। आपने हमें बहुत बड़ा सबक सिखाया। नूरजहां ने कहा नहीं यूसुफ तुमने खुद ही सीखा। मैंने तो बस एक आईना दिखाया था। असली सबक तो तुम दोनों ने अपनी मेहनत और अपनी समझदारी से सीखा। उसने आगे कहा और अब मैं तुम्हें अलविदा कहने आई हूं। अल्लाह ने मुझे एक और जगह भेजा है जहां मुझे किसी और की मदद करनी है। लेकिन जाने से पहले मैं तुम्हें एक तोहफा देना चाहती हूं। यूसुफ ने कहा मलका हमें किसी तोहफे की जरूरत नहीं। आपने हमें पहले ही बहुत कुछ दिया है। नूरजहां ने कहा, यह तोहफा तुम्हारे बच्चों और तुम्हारी आने वाली नस्लों के लिए है। मैं दुआ करती हूं कि तुम्हारी औलाद हमेशा मेहनती ईमानदार और नेक दिल रहे। मैं दुआ करती हूं कि वह कभी लालच में ना आए और हमेशा अल्लाह के शुक्रगुजार रहें। यूसुफ और आयशा दोनों की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा आमीन। नूरजहां ने कहा और हां तुम्हारे जाल में अब भी अच्छी मछलियां आती रहेंगी। लेकिन याद रखना यह तुम्हारी मेहनत का नतीजा है ना कि कोई जादू। अल्लाह मेहनत करने वालों को जरूर फल देता है। इतना कहकर नूर जहां ने अलविदा कहा और पानी में गायब हो गई। इस बार शायद हमेशा के लिए। यूसुफ और आयशा बहुत देर तक वहीं बैठे रहे। फिर धीरे-धीरे उठे और घर की तरफ चल पड़े। रास्ते में आयशा ने कहा, जानते हो आज मुझे लगा कि हमारी कहानी पूरी हो गई। यूसुफ ने कहा, "हमारी कहानी अभी पूरी नहीं हुई।" यह तो बस एक नया बाप शुरू हुआ है। अब हमें अपने बच्चों और पोतेपोतियों को यह सब सिखाना है। आयशा ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। और इस तरह यूसुफ और आयशा की कहानी आगे बढ़ती रही। उनके बच्चों ने उनसे मेहनत का सबक सीखा। उनके पोते पोतियों ने शुक्रगुजार रहने का सबक सीखा। और उनकी औलादें हमेशा लालच से दूर रही और अल्लाह की राह पर चलती रही। बस्ती के लोग आज भी यूसुफ और आयशा की कहानी सुनाते हैं। वह अपने बच्चों को बताते हैं कि कैसे एक मछेरे ने अपनी मेहनत और अपनी नेकदिली से सब कुछ हासिल किया। वह यह भी बताते हैं कि कैसे लालच इंसान को बर्बाद कर सकता है और कैसे शुक्र अदा करना हमें खुश रख सकता है। और जब भी कोई बच्चा समंदर के किनारे जाता है और मछलियां देखता है तो बुजुर्ग उसे कहते हैं बेटा अगर तुम्हें कभी कोई सुनहरी मछली मिले तो उसे वापस छोड़ देना। क्योंकि असली खजाना मेहनत में है मांगने में नहीं। और यूं यूसुफ और आयशा की कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही। एक ऐसी कहानी जो सिखाती है कि मेहनत से बढ़कर कोई इबादत नहीं। शुक्र से बढ़कर कोई दौलत नहीं। सब्र से बढ़कर कोई ताकत नहीं और लालच से बड़ा कोई दुश्मन नहीं। इस कहानी से हमें कई अहम सबक मिलते हैं। मेहनत की अहमियत। यूसुफ ने हमें सिखाया कि मेहनत से कमाई हुई रोटी में जो मजा है, वह मुफ्त में मिली दौलत में नहीं। शुक्रगुजारी अल्लाह ने जो दिया है उसी में खुश रहना चाहिए और हमेशा शुक्र अदा करना चाहिए। लालच का नुकसान लालच इंसान को कभी खुश नहीं रहने देता। आयशा की ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं था और इसी वजह से वह कभी सुकून से नहीं रह सकी। माफी की ताकत यूसुफ ने आयशा को माफ कर दिया और इसी वजह से उनकी शादी बच गई। माफ करना एक बहुत बड़ी खूबी है। गलतियों से सीखना आयशा ने अपनी गलतियों से सीखा और बेहतर इंसान बनी। हम सबको अपनी गलतियों से सीखना चाहिए। सादगी की अहमियत असली खुशी महलों में नहीं दिल के सुकून में है।
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