कयामत के दिन जब हश्र के मैदान में पूरी मखलूका अपने अपने आमाल के हिसाब के लिए खड़ी होगी उस वक्त उम्मते मोहम्मददिया को भी बुलाया जाएगा। जब हमारी बारी आएगी तो हमारे प्यारे नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम अल्लाह ताला की बारगाह में अर्ज करेंगे। ऐ मेरे रब मेरी उम्मत का हिसाब मुझे सौंप दे। अल्लाह ताला फरमाएगा। ऐ मेरे महबूब तुम ऐसा क्यों चाहते हो? तो नबी सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम अर्ज करेंगे ऐ अल्लाह मैं खुद हिसाब ले लूं ताकि मेरी उम्मत को किसी और के सामने शर्मिंदगीगी ना उठानी पड़े। इस पर अल्लाह ताला फरमाएगा ऐ मेरे प्यारे नबी अगर तुम हिसाब लोगे तो मेरी उम्मत और ज्यादा शर्मिंदा हो जाएगी। इसीलिए बेहतर यह है कि मैं खुद उनका हिसाब लूं। फिर अल्लाह ताला अपनी रहमत से एक ऐसा पर्दा कायम फरमाएगा जिसके पीछे सिर्फ रब और उसका बंदा होगा। ना कोई देखने वाला ना कोई सुनने वाला। किसी को खबर नहीं होगी कि किस बंदे से कब और कैसी गलती हुई। उस लम्हे में सिर्फ अल्लाह जानता होगा अपने बंदे की कमजोरियां और उसकी तौबा की सच्चाई। सुभान अल्लाह। ए ईमान वालों अगर तुम चाहो तो समंदर की लहरें गिन सकते हो। आसमान के सितारे गिन सकते हो। बारिश की बूंदे गिन सकते हो। लेकिन हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैह वसल्लम और हमारे रब की जो रहमतें और एहसान हम पर हैं उन्हें तो पूरी जिंदगी भी गिना नहीं जा का
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