तारीख 20 अक्टूबर और साल 2006 जब दिल्ली के हरिनगर थाने में सुबह-सुबह फोन बजा। उधर से आवाज आई कि तिहाड़ जेल के गेट नंबर तीन के ठीक बाहर एक टोकरी में लाश रखी है। जाओ जाकर उठा लो। पहले तो पुलिस को कुछ अजीब लगा लेकिन जब हेड कॉन्स्टेबल तुरंत बताई गई जगह पर पहुंचे तो वहां उन्हें एक कंटेनर मिलता है। कंटेनर खोला तो उनके होश फाकता हो गए। एक आदमी की लाश वाकई उस कंटेनर में थी। कंटेनर को रस्सी से कसकर बांधा गया था। लाश का सिर गायब था। इसीलिए पुलिस उसे पहचान नहीं पाई और यह किस्सा सुलझ भी नहीं पाया। लेकिन सोचिए राजधानी का सबसे ज्यादा सुरक्षा वाला जेल यानी तिहाड़ जिसके सामने कोई लाश रखकर पुलिस को चुनौती दे गया और यह एक बार नहीं बल्कि कई बार हुआ। 18 हत्याएं कर कुछ इसी अंदाज में पुलिस को चैलेंज करने वाला आखिर दिल्ली का यह कसाई कौन था? क्यों और कैसे उसने इन हत्याओं को अंजाम दिया? नमस्कार, मेरा नाम है मेघना सचदेवा और आप मुझे देख रहे हैं लोकमत हिंदी पर। [संगीत] जुर्मोस्कोप के इस एपिसोड में आज बात होगी राजधानी दिल्ली के कोने-कोने में शव के टुकड़े रख पुलिस के हत्ते चढ़ने के बाद भी फरार हो जाने वाले चंद्रकांत झा की। बिहार के गोसाई में साल 1967 जब चंद्रकांत झा का जन्म हुआ। उसकी मां पेशे से टीचर थी। बड़ा होते हुए झा को अक्सर लगता कि मां स्कूल पर ध्यान देती है लेकिन चंद्रकांत पर नहीं और उम्र के साथ-साथ ऐसे ही मां से उसका लगाव कम होता चला गया। पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था इसलिए आठवीं के बाद पढ़ाई भी छोड़ दी। कुछ वक्त के बाद चंद्रकांत झा जब नौकरी करने लायक हुआ तो उसने सोचा बिहार छोड़कर दिल्ली जाया जाए। वहां पर नौकरी की जाए। जहां दिल्ली आ भी गया। आजादपुर में काम करने लगा। उसने यहां मंडी में सब्जी बेचने के साथ ही कुछ वक्त तक लेबर का काम किया। कुछ वक्त बाद वो यहां पर सेटल भी हो गया। उसकी शादी भी हुई। लेकिन यह शादी ज्यादा वक्त चली नहीं। अब उसने एक और शादी की। दूसरी शादी से पांच बेटियां हुई। अब उसका परिवार पूरा हो गया। सब कुछ एकदम सही था। एक आदमी रोजीरोटी कमा रहा था। उसका बड़ा परिवार था। वो उसमें काफी व्यस्त हो गया। लेकिन एक दिन आजादपुर मंडी में काम करते वक्त चंद्रकांत का अपने साथी सब्जी विक्रेता पंडित से झगड़ा हो जाता है। उसने चाकू से पंडित के हाथ को घायल कर दिया। पंडित ने पुलिस में शिकायत की जिसके बाद चंद्रकांत को पुलिस पकड़ कर ले गई। लेकिन कुछ वक्त बाद उसे रिहा भी कर दिया गया। हालांकि अब परिवार को पालने के लिए वो सब्जी नहीं बेच पा रहा था। गरीबी, घर में तवज्जो ना मिलना, मंडी में अक्सर पुलिस का वसूली करने आना, यह सब उसे खाए जा रहा था। वो एक-एक बात अपने मन में रखकर सोच रहा था। लेकिन एक चीज जरूर अलग हुई। जेल से बाहर आने के बाद उसकी पंडित से दोस्ती हो गई। जी हां, वही पंडित जिसके हाथ पर चाकू मारा था। कुछ दिन बाद पंडित का शव मिला। सिर कटा शव। इस मामले में 1998 में झाकू पकड़ा भी गया लेकिन 2002 में सबूत नहीं मिलने पर उसे रिहा कर दिया गया। किसी की समझ से परे था कि पंडित की हत्या क्यों, कैसे, कब कहां पर हुई और यह झा की पहली हत्या का मामला था। लेकिन कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। पहली हत्या के बाद झा की दोस्ती हुई अमित मंडल से। एक दिन अमित उसकी बेटी को बिना उसकी परमिशन के बाहर ले गया। इन बातों के बाद चंद्रकांत ने यह फैसला कर लिया कि अमित को इस दुनिया में रहने का हक नहीं। इसीलिए उसने अमित को मारने की भी योजना बनाई। उसने एक बार अमित को अपने घर पर खाने के लिए जलाया। उसके साथ बैठकर शराब पी। फिर मौका मिलते ही उसे रस्सी से बांधा, गला घोटा और मार डाला। उसके बाद उसने सब्जी काटने वाले चाकू से ही उसका सिर काट दिया और सिर को यमुना नदी में फेंक दिया। इस लाश को उसने तिहाड़ के बाहर छोड़कर पुलिस को चुनौती दी कि मुझे पकड़ सको तो पकड़ [संगीत] लो। पुलिस को लाश तो मिली लेकिन लाश का सर नहीं मिला और यह मामला ऐसे ही अनसुलझा रहा। अब उसके बाद एक बार फिर चंद्रकांत का निशाना एक और दोस्त बना। साल 2007 की बात है। वैसे तो उपेंद्र चंद्रकांत का काफी अच्छा दोस्त था। लेकिन एक बार दोनों के बीच लड़ाई हो गई। इसलिए चंद्रकांत ने अपनी वही वाली प्लानिंग अपनाई। उपेंद्र को हैदरपुर में अपने घर ले गया। लेकिन इस बार उसने ना सिर्फ शिकार का सिर काटा बल्कि उसके दो हाथ, दो पैर और प्राइवेट पार्ट भी काट दिया। इन अंगों को अलग-अलग जगहों पर फेंक दिया। अप्रैल महीने में ही यह सब करने के बाद मई महीने में चंद्रकांत का एक और निशाना बना दिलीप। उसे भी पहले चंद्रकांत ने घर पर बुलाया। शराब पिलाई, उसके साथ खाना खाया और फिर उसे मार दिया। दिलीप की लाश तिहाड़ जेल के पास मिली थी। उसके हाथ और प्राइवेट पार्ट 30 हजारी कोर्ट के पास मिले थे। उसके पैर और सिर किशनगंज नाला और गाजियाबाद में मिले थे। लगातार लाशें मिल रही थी, लेकिन दिल्ली पुलिस के हाथ खाली थे। गौर करने वाली बात यह है कि इन लाशों के साथ एक लेटर भी होता था। जिसमें दिल्ली पुलिस का बाप या दिल्ली पुलिस का जीजा जैसे शब्द लिखे हुए थे। इससे पुलिस की और ज्यादा किरकिरी हो रही थी। अपराधियों से भरी एक सुरक्षित जेल के बाहर जब इस तरह से लाशें मिलने लगे तो जाहिर तौर पर पुलिस प्रशासन पर तो सवाल उठेंगे ही। लेकिन अब पुलिस ने ठान ली कि कैसे भी हत्यारे को पकड़ा जाए। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक सीरियल किलर के इस मामले के जांच अधिकारी रहे सुंदर सिंह यादव बताते हैं उन दिनों इतने कैमरा नहीं थे। लाशों के सिर ना होने की वजह से यह पहचान पाना मुश्किल हो रहा था कि मृतक कौन है। मृतक को जाने बिना उसकी हत्या के मकसद हत्यारे का पता लगाना बहुत मुश्किल काम हो रहा था। दिल्ली पुलिस ने इस केस को क्रैक करने के लिए कई लोगों से जानकारी ली। मुखबिरों से खूब मदद ली। इधर-उधर पूछताछ की। आखिरकार इस मामले में कई कड़ियों को जोड़कर सुंदर सिंह यादव और उनकी बाकी टीम ने चंद्रकांत झा को दिल्ली के एक इलाके से मई 2007 में ही गिरफ्तार कर लिया। लेकिन चंद्रकांत पुलिस से दो कदम आगे था। जैसे वो यह जानता था कि किसी को मारकर बचना कैसे है। उसे पकड़ने के बाद जब भी कोर्ट में उसे पेश किया जाता तो वो पुलिस के सामने जो बोलता उस सबसे कोर्ट में मुकर जाता। वो बहुत शातिर था। उसे पता था मुझे कब कहां क्या बोलना है। शुरुआत में चंद्रकांत की इस चालाकी से पुलिस की काफी ज्यादा किरकिरी हुई। उनका मजाक बना। 2023 में चंद्रकांत झा ने दिल्ली की हाई कोर्ट में 90 दिन के लिए पेरोल की मंजूरी मांग थी। कोर्ट से मंजूरी मिलने के बाद झा जेल से बाहर आया। जी हां, दिल्ली का यह कसाई जेल से बाहर आया लेकिन इसके बाद वो वापस जेल नहीं गया था। फरवरी 2024 में झा ने सुप्रीम कोर्ट में आजीवन कारावास को लेकर एक याचिका दाखिल की। चंद्रकांत झा ने अपनी इस याचिका में कोर्ट से पूछा कि क्या आजीवन कारावास की सजा पाने के बाद उसके बिहेवियर यानी व्यवहार के आधार पर छूट ली जा सकती है? हालांकि जब उसे लगा कि इस याचिका का तो कुछ नहीं होने वाला और उसे जेल जाना पड़ेगा तो वह पैरोल के दौरान ही भागने की फिराक में था। लेकिन उससे पहले की ट्रेन आते ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर चंद्रकांत यानी दिल्ली का कसाई पकड़ा गया। क्राइम ब्रांच के हत्ते चढ़ गया। जहां से उसे एक बार फिर जेल भेज दिया गया। रिपोर्ट्स कहती है कि चंद्रकांत झा ने तीन या चार नहीं बल्कि कई ज्यादा हत्याएं की हैं। कुछ 18 आंकड़ा बताते हैं। कुछ 18 से भी ज्यादा। चंद्रकांत के गांव वालों ने यह बताया था कि उसने बहुत से लोगों को सिर्फ बदला लेने और न्याय पाने के लिए मारा। उसका तरीका था कि वह ऐसे शिकार को चुनता था जो उसकी नजर में बुरा हो। फिर वो उससे दोस्ती करता और उसे अपने घर बुलाता, भाई की तरह मानता और घर पर ही शराब पिलाकर खाना खिलाकर गला घोटता और मार डालता। उसके बाद वह अपने शिकार के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देता और शरीर को अलग-अलग जगहों पर फेंक देता। उसके गांव वालों में से एक जो चंद्रकांत का शिकार बनने से बच गया। उसने बताया कि वह हमेशा शिकार को मारने से पहले उसकी फोटो अपने कैमरे में लेता था। पुलिस ने चंद्रकांत का कैमरा बरामद कर लिया था और उसके घर से कई तस्वीरें मिली। रिसर्च गेट पर लिखी एक रिसर्च केस स्टडी चंद्रकांत शाह द बुचर ऑफ दिल्ली में क्रिमिनोलॉजिस्ट आकाश पॉल लिखते हैं कि पूरे मामले के एनालिसिस से पता लगता है कि चंद्रकांत अपने पेरेंट्स के बुरे बर्ताव की वजह से ऐसा बना। पुलिस ने भी उसे टॉर्चर किया जब वो पहली बार जेल गया इसीलिए पुलिस के लिए वो भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया करता था। साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि उसमें खुद को भगवान समझने की बीमारी हो गई थी। यानी गॉड कॉम्प्लेक्स और इसीलिए उसने खुद को न्याय देने के लिए भगवान का प्रतिनिधि मान लिया था। इसीलिए जो उसके साथ बुरा बर्ताव करता या जो उसकी नजरों में बुरा बन जाता उसे मारने के लिए वो एक जैसा पैटर्न अपनाता और पकड़े ना जाने के लिए शरीर के टुकड़े कर अलग-अलग जगह पर फेंक देता। फिलहाल के लिए जर्मोस्कोप के इस एपिसोड में इतना ही। [संगीत]
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