दूध वाला यह कहानी है एक गरीब और मेहनती लड़के की जो रात के अंधेरे में शहर के भूखे लोगों तक खाना पहुंचाने वाले डिलीवरी बॉय का काम करता था। उसका नाम था अर्जुन। जंगल के किनारे एक पुराने बरगद [संगीत] के पेड़ के पास रघुनाथ काका का एक छोटा सा ढाबा था। अर्जुन उसी ढाबे पर काम करता [संगीत] था। एक रात जब सूरज ढल चुका था और परिंदे अपने घोंसलों में लौट चुके थे तब अर्जुन काम पर निकलने के लिए तैयार हुआ और अपनी बूढ़ी मां से बोला मां मैं काम पे जा रहा हूं। तुम अपना ध्यान रखना। मैंने चूल्हे के पास खाना ढक कर रख दिया है। मैंने तो खा लिया है। पर तुम दवा लेना मत भूलना। रोज तुम दवाई खाए बिना ही सो जाती [संगीत] हो। लेकिन आज याद से खा लेना क्योंकि कल मैं तुम्हें शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर के पास दिखाने ले जाऊंगा। अब मुझे जल्दी निकलना होगा मां। पहले ही बहुत देर हो गई है। रात के 8:00 बज चुके हैं और रास्ते में बहुत अंधेरा है। बेटा अर्जुन तू रोज इस काली रात में काम करने जाता है। लेकिन तूने आज तक मुझे यह नहीं बताया कि तू आखिर काम क्या करता है। बेटा अर्जुन मेरी ममता की कसम। कहीं तू पैसे के चक्कर में मेरे पीछे कोई गलत काम तो नहीं कर रहा है। मां तुम भी ना। क्या कुछ भी अनापशनाप [संगीत] सोचने लगती हो? मैं कोई गलत काम नहीं कर रहा हूं। तुमको तो पता है मां आजकल दिन में काम कोई आसानी से देता नहीं। इसीलिए मुझे मजबूरी में रात के वक्त काम पर जाना पड़ रहा है। मां अगर मैं काम नहीं करूंगा तो घर का चूल्हा कैसे जलेगा और तेरी महंगी दवाइयां कहां से आएंगी? मां को इतना बोलकर और उसके पैर छूकर अर्जुन हाथ में एक पुरानी टॉर्च लेकर घर से बाहर निकल जाता है। आज रात हवा में एक अजीब सी सन्नाटे वाली सरसराहट थी। रास्ते से [संगीत] जाते-जाते अर्जुन को ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई साया उसका पीछा कर रहा हो। उसे [संगीत] महसूस हुआ कि आज की रात उसके लिए बहुत भारी होने वाली है। अर्जुन थोड़ा ही आगे गया था कि उसे गांव के शंकर [संगीत] काका मिलते हैं जो अपने घर के चबूतरे पर बैठकर गरमागरम चाय की चुस्की [संगीत] ले रहे थे। अरे अर्जुन बेटा इतनी रात को हाथ में टॉर्च लिए कहां भागे जा रहे हो? तुम रोज इसी वक्त काम करने जाते हो। ऐसा भी क्या गुप्त काम करते हो जो सिर्फ रात को ही होता है? लोग रात को चैन की नींद सोते हैं और तुम इस अंधेरे में काम करने जाते हो। शंकर काका दिन में काम ढूंढने निकलो तो कोई काम मिलता नहीं। अगर कहीं छोटा-मोटा काम मिल भी जाए तो उतने पैसों से मेरे घर का राशन और मां की बीमारी की दवाइयां पूरी नहीं पड़ती। इसीलिए मैं रात को काम करने जाता हूं काका। क्योंकि रात में काम करने के मुझे डबल पैसे मिलते हैं। बस मेहनत कर रहा हूं ताकि मां ठीक हो जाए। लेकिन अर्जुन बेटा क्या तुम भूल गए कि अपने गांव के पास जो वो घना और डरावना जंगल है वहां रात को क्या-क्या होता है? उस जंगल से आधी रात को ऐसी अजीब आवाजें आती हैं जैसे कोई रो रहा हो। और सुना है जंगल के पास जो ठाकुर बलवंत सिंह की जो पुरानी हवेली है उस रास्ते से रात को कोई जानवर तो छोड़ो बड़ा से बड़ा बहादुर इंसान भी ��ाने से डरता है वहां मौत का साया रहता है बेटा शंकर काका अगर हम डर के मारे घर में दुबक कर बैठ गए तो जिंदगी जीना मुश्किल हो जाएगी पेट की भूख और मां की बीमारी मुझे डरने की इजाजत नहीं देती अगर सम्मान से जीना है तो डर का मुकाबला करना ही पड़ता है। काका। इतना बोल के अर्जुन तेज कदमों [संगीत] से अपने काम पर निकल जाता है। थोड़ी देर बाद अर्जुन उस सुनसान ढाबे पर पहुंच जाता है जहां वो काम करता था। अरे अर्जुन बेटा आज तुझे आने में देर क्यों हो गई? क्या हुआ बेटा? मां की तबीयत तो ठीक है ना? अगर तुझे पैसों की तंगी है या कोई और परेशानी है तो तू मुझे बेझिझक बोल सकता है। शर्मा मत। नहीं रघुनाथ काका मां की तबीयत अब पहले से बेहतर है। मुझे देर इसलिए हो गई क्योंकि रास्ते में मुझे शंकर काका मिल गए थे। तो उनसे बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला और थोड़ी देर हो गई। कोई बात नहीं बेटा। देर हो गई तो क्या हुआ? तुम जरा अंदर जाओ। मैंने काउंटर पर एक खाने का पार्सल पैक करके [संगीत] रखा हुआ है। उसे उठाओ और फौरन डिलीवरी के लिए निकल जाओ। पार्सल पर घर का पता और मालिक का नाम लिखा है। अर्जुन खाने का पार्सल लेने अंदर चला जाता है। दूसरी तरफ जंगल के घने पेड़ों के बीच ठाकुर बलवंत सिंह की एक बहुत बड़ी और आलीशान हवेली थी। उस हवेली के [संगीत] जंग लगे लोहे के गेट के पास एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर चौकीदार हरिदयाल बैठा हुआ था। वो पिछले 25 सालों से [संगीत] उस हवेली की वफादारी से रखवाली कर रहा था। हवेली के अंदर ठाकुर बलवंत सिंह भूख के मारे तिलमिला रहे थे। उनका मिजाज बहुत कड़क था। अगर उन्हें समय पर खाना नहीं मिलता था तो वह गुस्से में आग बबूला होकर नौकरों पर चिल्लाने लगते थे। अबे ओ रामलाल के बच्चे कहां मर गया बे? सो गया क्या कामचोर कहीं का? जल्दी इधर आ बे। अबे ओ रामलाल बहरा हो गया है क्या? जल्दी [संगीत] इधर आ। ठाकुर साहब की यह कड़क और डरावनी आवाज सुनकर रामलाल थर-थर कांपते हुए दौड़कर ठाकुर साहब के कमरे में आता है। रामलाल जब कमरे में आया तो उसका पूरा शरीर डर के मारे बुरी [संगीत] तरह कांप रहा था और ��सके माथे से पसीना टपक रहा [संगीत] था। जी जी मालिक आपने मुझे बुलाया। हुकुम कीजिए मालिक। अरे ओ रामलाल के बच्चे [संगीत] मैंने तुझे कितनी बार आवाज दी। कहां मर गया था तू? क्या मेरे घर में मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए रखा है तुझे? मालिक, दिन भर काम करते-करते मैं बहुत थक गया था। इसीलिए बिस्तर पर लेटते ही मेरी आंख लग गई थी। आंख लगने की वजह से मुझे आपकी आवाज बराबर सुनाई नहीं दी। माफ कर दीजिए मालिक। अबे ओ रामलाल। तू मेरी हवेली में सोने आता है या काम करने। त���झे मैं काम करने की तनख्वाह देता हूं ना कि चादर तान के सोने की। अब जबान मत लड़ा और जल्दी मेरे लिए गरमा गरम खाना लेकर आ। मुझे पेट में चूहों की तरह जोरों की भूख लगी [संगीत] है। मालिक वो खाना तो खत्म हो गया है। आप थोड़ी देर रुक जाइए। मैं रसोई में जाकर आपके लिए अभी गरमा गरम खाना बनाकर लेकर आता हूं। क्या? [संगीत] खाना खत्म हो गया है। रामलाल तुझे अच्छी तरह पता है ना कि मुझे रात को ठीक 9:00 बजे खाना चाहिए। फिर तू यह कैसे कह रहा है कि खाना ���त्म हो चुका है? [संगीत] तेरी हिम्मत कैसे हुई मालिक लेकिन खाना बनाने वाला रसोईया आज अपने गांव गया हुआ है। आपने ही तो उसे कल काम से छुट्टी दी थी। इसीलिए आज समय पर खाना नहीं बन पाया। मैं अभी बस 10 मिनट में आपके लिए कुछ तैयार कर लाता हूं। अबे रामलाल तू कब खाना बनाएगा और मैं कब खाना खाऊंगा? तेरे हाथ की रसोई खाते-खाते तो सुबह हो जाएगी। तू रहने दे। हमारे गांव के जंगल के पास जो रघुनाथ का ढाबा है, मैं [संगीत] उसी ढाबे से फोन करके खाना ऑर्डर कर देता हूं। अब तू जल्दी यहां से निकल और अपना मनहूस मुंह मत दिखा। ठाकुर की ये कड़वी और अपमानजनक बातें सुनकर बेचारा रामलाल सिर झुका कर वहां से चला जाता है। ठाकुर साहब अपना फोन उठाते हैं और उस जंगल के पास वाले ढाबे [संगीत] पे फोन मिलाते हैं। हेलो रघुनाथ। मुझे अभी के अभी खाना ऑर्डर करना है। मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है और आज मेरे रसोइए ने खाना नहीं बनाया है। तो तुम जल्दी से किसी को मेरे हवेली पर खाना लेकर भेज दो। [संगीत] देरी नहीं होनी चाहिए। लेकिन ठाकुर साहब इस वक्त खाने का आर्डर मैं ले नहीं सकता। रात के 10:00 बज रहे हैं। और उस खौफनाक जंगल के रास्ते से इस वक्त खाना लेकर कौन आएगा? और जो लड़का मेरे ढाबे पर काम करता था वह भी एक ऑर्डर लेकर पहले ही बाहर गया हुआ है। रघुनाथ मुझे फालतू की बातें सुनने की आदत नहीं है। मुझे खाना चाहिए मतलब चाहिए। तू कुछ भी कर लेकिन मेरे लिए अभी खाना लेकर किसी को भेज या फिर तू खुद खाना लेकर [संगीत] मेरी हवेली में आ। ठाकुर साहब आज अमावस्या की काली रात है और ऊपर से रात के 10:00 बज रहे हैं। वो जंगल का रास्ता बिल्कुल सुनसान और खतरनाक है। उस रास्ते से अभी आना मतलब अपनी मौत को दावत देने जैसा होगा। नहीं मालिक मैं इस वक्त आपके खाने का आर्डर नहीं ले सकता। रघुनाथ तू मुझे ना कह रहा है। अगर तूने मेरा खाना मेरी हवेली में अभी नहीं पहुंचाया तो तेरी खैर नहीं। कल सुबह तेरे ढाबे की क्या हालत होगी यह तू अच्छी तरह सोच [संगीत] लेना। जल्दी मेरे लिए खाना भेज वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। अब मैं फोन रखता हूं। आधे घंटे के अंदर खाना मेरी मेज पर होना [संगीत] चाहिए। ठाकुर साहब की यह धमकी भरी बातें सुनकर रघुनाथ काका बुरी तरह डर जाते हैं और पसीना पोंछने लगते हैं। तभी सामने से दो शहरी लोग ढाबे पे आने लगते हैं। काका क्या यहां खाने के लिए कुछ मिलेगा? हम शहर से आए हैं और बहुत दूर जाना है। बेटा खाना तो सब खत्म हो चुका है क्योंकि रात के 10:30 हो गए हैं। इसीलिए मैंने ढाबे की रसोई बंद कर दी है। तुम लोगों [संगीत] को खाना तो नहीं मिलेगा। लेकिन हां अगर चाहो तो मैं तुम लोगों के लिए चाय बनाकर दे सकता हूं। ठीक है काका। अगर खाना खत्म हो गया है तो कोई बात नहीं। आप हमारे लिए चाय ही बना दीजिए। अगर हमें आगे जाकर कोई और होटल या ढाबा दिखेगा तो हम वहीं खाना खा लेंगे। आप बस कड़क चाय बना दीजिए। ठीक है बेटा बस 10 मिनट रुक जाओ। मैं अभी तुम दोनों के लिए गरमागरम [संगीत] चाय बना देता हूं। दूसरी तरफ अर्जुन अपना पिछला आर्डर पहुंचाकर [संगीत] अपनी पुरानी बाइक लेकर सुनसान रास्ते से ढाबे की तरफ लौट रहा था। रात के करीब 10:30 हो चुके थे। रास्ते में झाड़ियों से अजीब-अजीब डरावनी आवाजें आ रही थी। लेकिन घर में बीमार मां की दवाई के लिए अर्जुन निडर होकर काम कर रहा था। कुछ देर बाद अर्जुन बाइक लेकर [संगीत] ढाबे पर पहुंच जाता है। लेकिन वो देखता है कि रघुनाथ काका ढाबे के बाहर बहुत उदास और दुखी होकर बैठे हुए थे। अर्जुन उनके पास गया और बोला क्या हुआ काका? आप इतने दुखी और परेशान क्यों लग रहे हो? क्या बात है काका? कोई परेशानी है क्या? अगर कोई समस्या है तो मुझे बताइए। मैं आपकी मदद करूंगा। बेटा अर्जुन अब तुमको क्या बताऊं? जब तुम पिछला आर्डर लेके यहां से गए तो उसके तुरंत बाद हवेली से ठाकुर साहब का फोन आया था। उन्होंने खाने का आर्डर दिया है। लेकिन बेटा उस भयानक जंगल के रास्ते से इस खौफनाक रात में खाना लेकर हवेली कौन जाएगा? [संगीत] रात को उस हवेली की तरफ जाने वाला रास्ता बिल्कुल ठीक नहीं है बेटा। वहां बुराइयों का साया है। लेकिन काका हमारा काम ही तो यही है कि भूखे लोगों तक खाना पहुंचाना। हम अपने काम से पीछे कैसे हट सकते हैं? लेकिन अर्जुन बेटा रात के 11:00 बज रहे हैं और उस जंगल से खाने का आर्डर ले जाना मतलब अपनी मौत को [संगीत] खुद बुलावा देना होगा। वहां जो कुछ होता है तुम नहीं जानते। काका आप उसकी बिल्कुल टेंशन मत लो। मैं ठाकुर साहब की हवेली में खाना लेकर जाऊंगा। अगर डर के मारे काम करना बंद कर दिया तो जीना वैसे भी मुश्किल हो जाएगा। मैं अभी खाना लेकर ठाकुर साहब की हवेली की ओर निकलता हूं। इतना बोल के अर्जुन ने अपने बाइक के पीछे खाने का थैला रखा और उस सुनसान डरावने जंगल के रास्ते से ठाकुर साहब की हवेली की तरफ बिना डरे बाइक स्टार्ट कर दी। रास्ते में घने [संगीत] पेड़ों की छाया ऐसी लग रही थी जैसे कोई हाथ उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे हो। जाते-जाते अर्जुन को अचानक महसूस होने लगा कि उसकी बाइक के पीछे कोई उसका पीछा कर रहा है। लेकिन अर्जुन अपनी नजरें सामने टिकाए [संगीत] बाइक चलाता रहा। अचानक पीछे से उसे किसी के जोर-जोर से हंसने की आवाज सुनाई [संगीत] दी। आवाज सुनते ही अर्जुन के रोंगटे खड़े हो गए और उसने बाइक रोक दी। वो नीचे उतरा और हिम्मत जुटाकर बोला, "कौन है यहां? जो भी हो अगर मुझे डराने की कोशिश करोगे तो भी मैं डरने वाला नहीं हूं क्योंकि [संगीत] मेरे साथ मेरी मां का आशीर्वाद है। अगर कोई है तो कायरों की तरह छुपो मत सामने आओ। लेकिन उसके पीछे [संगीत] कोई भी नहीं दिखा। सिर्फ सन्नाटा था। तभी अचानक झाड़ियों के पीछे से एक इंसान अर्जुन की तरफ धीरे-धीरे आने लगता है। दूर होने की वजह से अर्जुन को उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे ही वो इंसान अर्जुन के करीब आया तो अर्जुन ने देखा कि वो एक भिखारी के लिबास में था। उसके शरीर पर फटे पुराने कपड़े थे। उसका चेहरा पीला और सूखा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि बहुत दिनों से उसने एक निवाला भी नहीं खाया है। उसका शरीर बिल्कुल अधमरा सा दिख रहा था। चाचा कौन हो आप? और इतनी डरावनी रात को आप इस सुनसान जंगल में अकेले क्या कर रहे हो? आपकी हालत देखकर [संगीत] ऐसा लगता है कि आपने बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है। बेटा, मैं इसी जंगल में रहता हूं। यह जंगल ही मेरा घर है। बेटा, मैंने पिछले 10 दिनों से अन्न का एक दाना भी नहीं चखा है। आज तक इस जंगल के पेड़ों से जो फल मिलते थे, वो खाकर गुजारा कर लेता था। लेकिन अब तो वह भी नहीं मिलते। अगर मुझे अभी खाना नहीं मिला, तो [संगीत] मैं भूख से तड़प-तड़प कर मर जाऊंगा। अगर तुम्हारे पास थोड़ा भी खाना हो तो खुदा [संगीत] के वास्ते मुझे खिला दो। चाचा मेरे पास खाना तो है लेकिन यह खाना मैं ठाकुर साहब की हवेली में देने जा रहा हूं। अगर मैं यह खाना लेकर नहीं गया तो ठाकुर साहब बहुत गुस्सा करेंगे और काका की नौकरी पर बात आ जाएगी। आप एक काम करिए थोड़ा आगे चले जाइए। वहां आपको रघुनाथ काका का ढाबा दिखाई देगा। वहां आपको भरपेट खाना मिल जाएगा। बेटा मुझे तो अभी खाना चाहिए। मेरा शरीर बहुत कमजोर हो गया है। मैं अब ढाबे तक चलकर नहीं जा सकता। मेरी जान निकल रही है बेटा। ठीक है चाचा। मैं आपकी हालत देख नहीं पा रहा। मैं आपको इसमें से थोड़ा खाना निकाल कर देता हूं। इसमें दाल और रोटी है। आप जल्दी से खा लीजिए। नहीं बेटा, मुझे दाल रोटी पसंद नहीं है। मुझे तो इंसान का ताजा मांस पसंद है। क्या तुम अपना मांस मुझे खाने के लिए दे सकते हो? ये क्या बोल रहे हो आप? आप क्या पागल हो गए हो? कोई इंसान किसी इंसान का मांस कैसे खा सकता है? मैं आपकी दयनीय हालत देख के आपको अपना खाना दे रहा हूं और आप मेरा ही मांस मांग रहे हो। तभी अचानक वो भिखारी जो एक लाचार इंसान लग रहा था। एक भयानक आदमखोर राक्षस के रूप में बदलने लगा। उसका चेहरा विकृत हो गया। आंखें खून की तरह लाल हो गई। वह इतना डरावना ��ग रहा था कि अर्जुन उसे देख के कांपने लगा। उसके दांत भेड़िए की तरह लंबे हो गए और नाखून किसी जंगली जानवर की तरह बड़े-बड़े और नुकीले [संगीत] हो गए। अर्जुन अब तुम यहां से जिंदा नहीं भाग सकते। मुझे तुम्हारा ताजा मांस खाना है। मुझे इस जंगल में बहुत दिनों से किसी इंसान का मांस खाने को नहीं मिला है। आज तुम्हारी इन जवान हड्डियों और मांस से मेरी बरसों की भूख मिट जाएगी। यह भयानक दृश्य देख के अर्जुन पीछे हटने लगा। वो आदमखोर धीरे-धीरे अर्जुन की ओर बढ़ने लगा। तभी अचा��क [संगीत] झाड़ियों को चीरते हुए गांव के बुजुर्ग शंकर काका अपने हाथ में एक जलती हुई मशाल लिए वहां पहुंच जाते हैं। जैसे ही शंकर काका मशाल ले वहां आए आदमखोर रुक गया। रुक जा आदमखोर इस मासूम बच्चे को छोड़ [संगीत] दे वरना मैं इस जलती हुई मशाल से तेरे पूरे शरीर को जलाकर राख कर दूंगा। जल्दी यहां से भाग जा वरना अंजाम बुरा होगा। जैसे ही शंकर काका ने जलती हुई मशाल उस आदमखोर की आंखों के सामने लहराई आग की गर्मी और रोशनी देख के वो आदमखोर डर के मारे जंगल के अंधेरे में कहीं गायब हो गया। शंकर काका अगर आज आप सही वक्त पर ना आते तो वो आदमखोर मुझे जिंदा ही खा गया होता। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद काका। आपने मेरी जान बचा ली। बेटा अर्जुन मैंने तुमको और गांव वालों को पहले ही बोला था कि इस जंगल से रात को गुजरना मतलब अपनी मौत को बुलावा देना है। आज तो मैं पास ही था पर रोज ऐसा नहीं होगा। हां शंकर काका आपकी बात बिल्कुल सही है। यह जंगल बहुत ही भयानक और डरावना है। लेकिन काका मैं ठाकुर साहब को खाना देने जा रहा था। मुझे किसी भी हाल में यह खाना [संगीत] ठाकुर साहब की हवेली में पहुंचाना ही होगा। वरना वो ढाबे वाले काका को बहुत परेशान करेंगे। ठीक है अर्जुन बेटा अगर तुझे यह खाना पहुंचाना इतना ही जरूरी है तो मैं भी तुम्हारे साथ हवेली तक चलता हूं ताकि रास्ते में तुम्हारे ऊपर फिर कोई मुसीबत ना आए। नहीं शंकर काका आप अब अपने घर वापस चले जाइए। मैं यहां से अकेला चला जाऊंगा। अब जंगल का रास्ता लगभग खत्म होने वाला है। मैं बस 5 मिनट में हवेली के पास पहुंच जाऊंगा। अब मुझे डर नहीं लग रहा। इतना बोलकर शंकर काका अपने घर वापस जाने लगे और अर्जुन भी अपनी बाइक स्टार्ट करके [संगीत] हवेली की तरफ पड़ गया। कुछ ही दूर जाने के बाद वो सुनसान जंगल का रास्ता खत्म हो गया और एक बड़ा सा मैदान आया। थोड़ी ही दूर पर उसे ठाकुर साहब की विशाल हवेली दिखाई दी। जब अर्जुन बाइक ले गेट पर पहुंचा तो चौकीदार हरिदयाल वहीं अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठा हुआ था। कौन हो तुम और इस वक्त इस हवेली के पास क्या कर रहे हो? क्या तुमको पता नहीं कि रात को इस हवेली के आसपास भटकना सख्त मना है? फिर तुम यहां क्यों आए हो? काका, मैं एक डिलीवरी बॉय हूं। पास में जो रघुनाथ काका का ढाबा है, वहीं से मैं आया हूं। ठाकुर साहब ने खाने का आर्डर दिया था। उसी को लेकर मैं यहां तक आया हूं। क्या ठाकुर साहब ने खाना आर्डर किया था? लेकिन बेटा इस वक्त ठाकुर साहब के कमरे में जाना मतलब अपने आप को गालियां खिलाने और मुसीबत मोल लेने जैसा होगा। मेरी बात सुनो बेटा। तुम यह खाना मुझे दे दो। [संगीत] मैं सावधानी से इसे ठाकुर साहब के कमरे तक पहुंचा दूंगा। नहीं काका खाना मुझे ही लेकर जाने दीजिए। मालिक ने कहा था कि ठाकुर साहब ने मुझे ही खाना लेकर बुलाया है और मुझे यह पार्सल उन्हीं के हाथ में देना है। ठीक है बेटा जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन जब तुम अंदर जाओ और ठाकुर साहब के कमरे के पास पहुंचो तो याद रखना कमरे के अंदर पैर मत रखना। बाहर से ही ठाकुर साहब को आवाज देना। चौकीदार की यह रहस्यमई बातें सुनके अर्जुन ने हवेली के बाहर ही अपनी बाइक खड़ी कर दी। उसने खाने का पैकेट कस के पकड़ा और हवेली के बाहरी दरवाजे को धकेल कर अंदर चला गया। जब अर्जुन हवेली के मुख्य हॉल में गया तो उसे अजीब और डरावनी फुसफुसाहटें [संगीत] सुनाई देने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे हवेली की दीवारें [संगीत] उसे पुकार रही हो। अर्जुन डरते-डरते हवेली के बीचोंबीच [संगीत] पहुंचा। तभी अंधेरे से रामलाल बाहर आया। कौन हो तुम? और तुम हवेली के अंदर इस तरह कैसे घुस आए? क्या तुम्हें पता नहीं है कि ठाकुर साहब की हवेली के अंदर रात को किसी भी बाहरी इंसान का आना मना है? तुम अंदर कैसे आए? और तुम्हारे हाथ में यह क्या है? काका, मैं तो ठाकुर साहब के लिए खाना लेकर आया हूं। मैं जंगल [संगीत] के उस पार जो रघुनाथ काका का ढाबा है, वहीं से आया हूं। मैं एक डिलीवरी बॉय हूं। और यह खाना पहुंचाना मेरी जिम्मेदारी है। अच्छा। अच्छा तो तुम वही हो जो ठाकुर साहब के लिए खाना लेकर आए हो? हां, ठाकुर साहब ने वाकई खाना आर्डर किया था। चलो मेरे साथ मैं तुमको ठाकुर साहब के कमरे तक ले चलता हूं। दोनों धीरे-धीरे ठाकुर साहब के कमरे की ओर बढ़े। हवेली में अजीब सी ठंडक थी। जैसे ही दोनों कमरे के दरवाजे के पास पहुंचे, रामलाल ने अर्जुन को रुकने का इशारा किया। बेटा तुम यहीं कमरे के बाहर खड़े रहो। मैं अभी अंदर जाकर ठाकुर साहब से पूछ कर आता हूं कि उन्हें खाना अभी लेना है या बाद में। रामलाल ठाकुर साहब के कमरे के अंदर गया। लेकिन जैसे ही उसने अंदर का नजारा देखा, उसकी चीख निकल गई। ठाकुर साहब जमीन पर [संगीत] बेहोश और नीले पड़े थे। यह देख के रामलाल बुरी तरह डर गया और भागता हुआ बाहर आया। उसके चेहरे [संगीत] पर मौत जैसा डर था। क्या हुआ काका? आप इतना क्यों डर गए? ठाकुर साहब ने क्या कहा? क्या अब मैं [संगीत] खाना देने के लिए कमरे के अंदर जा सकता हूं? बेटा अनर्थ हो गया। ठाकुर साहब कमरे में नीचे बेहोश पड़े हैं। लगता है उन्हें कुछ बहुत बुरा हो गया है। शायद वो अब नहीं रहे। यह सुनकर अर्जुन और रामलाल हिम्मत जुटाकर फिर से कमरे में गए। लेकिन जैसे ही उन्होंने कमरे में कदम [संगीत] रखा उनके होश उड़ गए। कमरे में ठाकुर साहब की लाश या शरीर कहीं नहीं [संगीत] था। काका आप तो अभी बोले थे कि ठाकुर साहब यहां बेहोश पड़े हैं। लेकिन यहां तो कोई भी नहीं है। अगर ठाकुर साहब इस कमरे में ही थे तो इतनी जल्दी कहां गायब हो गए? तभी अचानक [संगीत] पूरे कमरे में जोर-जोर से हंसने की आवाज गूंजने लगी। वो आवाज इतनी भारी और भयानक थी कि दीवारें कांपने लगी। वो आवाज किसी और की नहीं बल्कि ठाकुर साहब की ही थी। अरे ओ रामलाल इस लड़के ने खाना लाने में बहुत देर कर दी। भूख के मारे तड़प-तड़प कर मेरी जान चली [संगीत] गई। और मेरी आखिरी इच्छा अधूरी रह गई। लेकिन अब मुझे [संगीत] इस खाने की जरूरत नहीं है। अब मैं इसी लड़के का गर्म खून पीकर अपनी भूख मिटाऊंगा। यह [संगीत] देख के अर्जुन और रामलाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। दोनों अपनी जान बचाने के लिए कमरे से बाहर भागे। जैसे ही वो हवेली के गेट की तरफ दौड़ रहे थे, ऊपर की बालकनी [संगीत] से ठाकुर साहब की रूह चौकीदार को चिल्ला कर बोली। अरे ओ हरिदयाल उस लड़के को हवेली के गेट के बाहर कदम नहीं रखने देना। उसे वहीं पकड़ के रख। मैं नीचे आकर उसका शिकार करूंगा। बेटा अर्जुन तू यहां से जल्दी भाग जा। अपनी बाइक की चिंता [संगीत] मत कर। बस अपनी जान बचा। मैं इस दुष्ट चौकीदार को रोक के रखता हूं। जब तक तू इस जंगल की सीमा के बाहर नहीं चला जाता। ठाकुर साहब की रूह तुझे छू नहीं सकती। भाग बेटा भाग। मैं इसे ज्यादा देर तक नहीं रोक पाऊंगा। रामलाल की यह बात सुनकर अर्जुन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और [संगीत] अपनी बाइक वहीं छोड़कर पागलों की तरह जंगल के रास्ते भागने लगा। भागते-भागते उसे फिर से वही अजीब आवाजें सुनाई दी। पर आज उसे वो आदमखोर नहीं दिखा। वो बिना रुके भागता रहा और आखिर में उसी ढाबे के पास [संगीत] पहुंच गया जहां रघुनाथ काका बदहवास खड़े थे। अरे क्या हुआ अर्जुन बेटा? तुम इस तरफ बदवास क्यों भाग रहे हो और तुम्हारी बाइक कहां गई? तुम तो ठाकुर साहब की हवेली पर खाना देने गए थे ना। वहां आखिर ऐसा क्या हुआ जो तुम इस हाल में हो? रघुनाथ काका हवेली पे जो भयानक मंजर मैंने देखा है अगर वो मैंने आपको बताया तो आप भी डर के मारे यहां से भागने लगेंगे और दोबारा कभी उस तरफ नहीं देखेंगे। ऐसा भी क्या हुआ उस हवेली पर जो तुम इतने डरे हुए हो और पसीने-पसीने हो रहे हो। काका जब मैं ठाकुर साहब के कमरे में गया तो वहां ठाकुर साहब जिंदा नहीं थे बल्कि उनकी रूह थी। समय पर खाना नहीं मिलने की वजह से भूख से उनकी मौत हो गई थी और अब वो एक प्रेत बन चुके हैं। वो मेरे पीछे पड़ गए थे। जैसे तैसे रामलाल काका ने मुझे बचाया और मैं अपनी जान बचाकर यहां तक भागा हूं। यह क्या अनर्थ बोल रहे हो तुम अर्जुन बेटा? अगर ऐसा है तो अब यहां रुकना ठीक नहीं है। जल्दी हमें यह ढाबा बंद करके यहां से निकल जाना चाहिए। वरना ठाकुर साहब की प्यासी रूह तुम्हारा पीछा करते [संगीत] हुए यहां भी आ सकती है। रघुनाथ काका ने अपना ढाबा बंद किया और दोनों तेज कदमों से अपने घर की ओर निकल पड़े। रास्ते भर अर्जुन का दिल जोर-जोर से धलक रहा था। लेकिन काका के साथ होने से उसे थोड़ी हिम्मत मिल रही थी। जैसे ही दोनों गांव में पहुंचे रघुनाथ काका [संगीत] ने उसे संभलकर घर जाने को कहा। बेटा अर्जुन अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। अब हम दोनों गांव में [संगीत] पहुंच गए हैं। तुम अब अपने घर चले जाओ और आराम से सो जाना। और हां यह बातें अपने मां को मत बताना। रघुनाथ काका की यह बातें सुनके अर्जुन अपने घर के और निकल जाता है। जब अर्जुन घर पहुंचा तो अर्जुन को [संगीत] सामने देखकर उसकी मां हैरान रह गई। अरे अर्जुन बेटा आज तू [संगीत] काम से इतनी जल्दी घर वापस कैसे आया? अभी तो रात के 12 भी नहीं बजे और तू आज इतनी जल्दी काम से घर लौट आया। सब ठीक तो है ना बेटा? और तेरा चेहरा इतना उतरा हुआ और सफेद क्यों पड़ा है? हां मां सब ठीक है। बस आज ढाबे पर काम जल्दी खत्म हो गया और काका ने कहा कि आज अमावस्या की रात है तो जल्दी घर चले जाओ। मां आज मेरा मन बहुत घबरा रहा है। बस तू मेरे पास बैठ। तू चिंता [संगीत] मत कर बेटा। जब तक मैं हूं तुझे कुछ नहीं होगा। लगता है तुझे बाहर की हवा लग गई है। और हां तूने जो कहा था मैंने आज याद से अपनी दवाई खा ली है। मां को उस डरावनी हवेली और ठाकुर के बारे में बताकर मैं उन्हें डराना नहीं चाहता। जो बीत गया वो एक बुरा सपना था। लेकिन अब मुझे अपनी मां को इस खतरे से दूर ले जाना होगा। क्या हुआ बेटा? तुम किस सोच में दुबे हुए हो? तेरे साथ आज कुछ हुआ है क्या? मैं तेरी मां हूं और मुझे पता है कि आज तेरे [संगीत] साथ कोई अनर्थ जरूर हुआ है। क्या हुआ बेटा? मैं तेरी मां हूं। क्या तुम मुझे नहीं बता सकता? मां, मैंने फैसला किया है कि हम कल सुबह ही यह गांव छोड़ देंगे। शहर में मेरे एक दोस्त ने मेरे लिए अच्छे काम की बात की है और वहां अस्पताल भी पास है। हम कल सुबह की पहली बस पकड़ कर शहर चले जाएंगे। जैसा तू ठीक समझे बेटा। जहां तू खुश वहीं मेरा घर है। तू सो जा। कल सुबह हमें जल्दी निकलना है। अगले दिन सुबह का सूरज निकलते ही अर्जुन और उसकी मां ने अपना थोड़ा बहुत सामान बांधा और गांव के कच्चे रास्ते से निकल पड़े। अर्जुन ने हमेशा के लिए वह गांव और वह डरावना काम छोड़ दिया और अपनी मां को साथ लेकर शहर के ओर निकल पड़ा।
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