28 फरवरी 2026 की तारीख इतिहास में दर्ज हो चुकी है। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामिनई को मार दिया है। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में वो जंग शुरू हो चुकी है जो शायद बीते कई सालों से दहलीज पर थी। लेकिन यह हमला अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे महीनों की खुफिया तैयारी थी। सीआईए ने खामिनई की हर हरकत पर नजर रखी और जब सही मौका मिला अमेरिका और इजराइल ने एक झटके में सुप्रीम लीडर को रास्ते से हटा दिया। 86 साल के खामन जो 1989 से ईरान की हर बड़ी नीति तय करते आ रहे थे अब नहीं रहे। 46 साल की शिया थियोक्रेसी को अब तक का सबसे बड़ा झटका लग चुका है। लेकिन यह हुआ कैसे? इसको लेकर बात करेंगे इस वीडियो में। नमस्कार, मेरा नाम है मेधा यादव और आप देख रहे हैं जस्ट। राइटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि सीआईए महीनों से खामिनई के पीछे थी। उनके ठिकाने, उनका रूटीन, उनकी मीटिंग्स सब कुछ ट्रैक हो रहा था। यह वही खुफिया नेटवर्क था जिसके बारे में जून 2025 में ट्रंप ने खुद कहा था कि अमेरिका जानता है खामिनई कहां है और उन्हें मारा जा सकता है। उस वक्त ट्रंप के बयान को शायद ईरान ने इतनी गंभीरता से नहीं लिया। खुफिया तंत्र को जो सबसे बड़ी सफलता मिली वो यह थी कि सीआईए को पक्की जानकारी मिल गई कि खामिनई अपने टॉप एडवाइज़र्स के साथ एक बैठक में है। इस कंफर्मेशन ने पूरे ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी। असल में खामिनई की मीटिंग शनिवार शाम तेहरान में तय थी। लेकिन इजरली खुफिया एजेंसी को पता चला कि मीटिंग सुबह ही हो रही है और लोकेशन भी मिल गई। तेहरान के एक हाई सिक्योरिटी कंपाउंड में। यह वो कंपाउंड था जो तेहरान के बीचों-बीच था और जहां ईरान की पॉलिटिकल और सिक्योरिटी लीडरशिप जमा थी। सीआईए को पक्की जानकारी मिली कि खामिनेई उस वक्त वहां मौजूद हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अमेरिका और इजराइल ने फौरन फैसला किया कि इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना। हमले के वक्त को आगे खिसका दिया गया। यह फैसला बेहद अहम था। खुफिया जानकारी का फायदा तभी होता है जब उस पर फौरन और सटीक तरीके से काम किया जाए। अमेरिका और इजराइल दोनों ने यही किया। वाशिंगटन में आधी रात के ठीक बाद ट्रंप ने हमले का आदेश दे दिया। यह वो वक्त था जब जिनेवा में ओमान की मध्यस्थता में हुई बातचीत के 2 दिन बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला था। बातचीत बेनतीजा रही और ट्रंप ने ऑपरेशन करने का मन बना लिया था। इजराइल में सुबह करीब 6:00 बजे फाइटर जेट्स अपने अड्डों से उड़े। इन जेट्स के पास लंबी दूरी की और बेहद सटीक मिसाइलें थी। 2 घंटे और कुछ मिनटों के बाद तेहरान में सुबह 9:40 पर मिसाइलें अपने निशाने पर गिरी। एनवाईटी ने एक इजरयली डिफेंस अधिकारी के हवाले से बताया कि यह हमला एक साथ कई जगहों पर हुआ। एक जगह वो कंपाउंड था जहां ईरान की सीनियर पॉलिटिकल और सिक्योरिटी लीडरशिप जमा थी। ईरान की पूरी तैयारी के बावजूद इजराइल ने टैक्टिकल सरप्राइज़ हासिल किया। मतलब ईरान को पता था कि हमला हो सकता है। लेकिन कब और कहां होगा यह नहीं पता था। सेटेलाइट इमेजरी ने कंफर्म किया कि खामिनई का हाई सिक्योरिटी कंपाउंड पूरी तरह तबाह हो गया। ईरानी स्टेट टेलीविजन ने 1 मार्च की सुबह खामिनई की मौत की पुष्टि कर दी। स्क्रीन पर काला बैनर था। पुरानी तस्वीरें चल रही थी। तेहरान ने आधिकारिक तौर पर माना कि उनका सुप्रीम लीडर नहीं रहा। खामिनई अकेले नहीं मारे गए। उनके साथ उनकी बेटी, दामाद और पोती भी इस हमले में मारे गए हैं। ईरान की जुडिशरी ने पुष्टि कर दी कि खामिनई के टॉप एडवाइजर अली शमखानी और आईआरजीसी के जनरल मोहम्मद पाकपुर भी इस हमले में मारे गए। यह कहना गलत नहीं होगा कि इजराइल अमेरिका के एक हमले में ईरान की लगभग पूरी लीडरशिप खत्म हो गई। एक अहम नाम जो इस हमले में बच गया वो है अली लारेजानी। ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख लारीजानी ने हमले के बाद बयान देते हुए कहा ईरान के बहादुर सैनिक और जनता इन अंतरराष्ट्रीय जालिमों को सबक सिखाएगी। वहीं खामिनई की मौत की खबर आते ही आईआरजीसी ने अपने आधिकारिक टेलीग्राम पेज पर बयान जारी किया। बयान में लिखा था ईरान की जनता का बदला लेने वाला हाथ खामनई के हथियारों को नहीं छोड़ेगा। यह इतिहास का सबसे जबरदस्त जवाबी हमला होगा। आईआरजीसी ने इसे अमेरिका और इजराइल दोनों के खिलाफ सबसे बड़े आक्रामक ऑपरेशन का नाम दिया। इधर ट्रंप ने खामिनई को इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक बताया है। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर खामिनई की मौत का ऐलान किया। सीबीएस न्यूज़ को दिए एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि ईरान की अगली लीडरशिप के लिए उनके पास कुछ अच्छे नाम हैं। लेकिन अभी नहीं बताएंगे। लौटते हैं खामिनेई पर। इजराइल अमेरिका का यह ऑपरेशन अचानक नहीं बन गया। यह पूरा ऑपरेशन करीब 89 महीने की तैयारी का नतीजा था। शनिवार से दो दिन पहले जिनेवा में ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत हुई थी। लेकिन वह बातचीत बेनतीजा रही। रूस के पूर्व राष्ट्रपति मेद्वदेव ने कहा कि यह बातचीत एक दिखावा थी। कोई असल में कुछ हल नहीं करना चाहता था और शनिवार को जो हुआ उसे देखकर लगता है कि बातचीत के दौरान भी ऑपरेशन की तैयारी जारी थी। खामिनई 1989 से ईरान के सुप्रीम लीडर थे। उनसे पहले इस्लामिक क्रांति के जनक अयातुल्लाह रूहुल्ला खुमैनी थे। जिनकी मौत के बाद खामिनई इस कुर्सी पर बैठे थे। 36 साल तक उन्होंने ईरान की हर बड़ी नीति तय की। परमाणु कार्यक्रम से लेकर एक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस तक, हिजबुल्लाह से लेकर हूतियों तक हर चीज पर उनकी मंजूरी थी। आईआरजीसी को उन्होंने ही इतना ताकतवर बनाया। उनकी मौत के साथ 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बनीशिया थियोक्रेसी को उसका सबसे बड़ा झटका लगा है। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति आई थी जब शाह की राजशाही खत्म हुई और एक बिल्कुल नई तरह की सत्ता व्यवस्था बनी। उस क्रांति में एक नाम था जो धीरे-धीरे ऊपर उठता गया अली खामेनई। 1989 में जब क्रांति के जनक अयातुल्ला खोमेनी की मौत हुई तो खामेनई सुप्रीम लीडर बने और फिर अगले 36 साल तक उन्होंने ईरान की हर बड़ी नीति तय की। राष्ट्रपति आए गए सरकारें बदली लेकिन खामिनई की कुर्सी नहीं हिली। सुप्रीम लीडर के तौर पर उनके पास सरकार, सेना और न्यायपालिका तीनों पर आखिरी अधिकार था। कोई भी बड़ा फैसला खासतौर पर अमेरिका से जुड़ा उनकी मंजूरी के बिना नहीं हो सकता था। चुने हुए नेता रोजमर्रा के काम संभालते थे। लेकिन असली ताकत हमेशा खामिनई के पास रही। ईरान की जो जटिल व्यवस्था थी जिसमें धर्म और सीमित लोकतंत्र दोनों थे उस पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि कोई भी उन्हें चुनौती नहीं दे सकता था। पश्चिम से दुश्मनी उनकी पहचान थी। उन्होंने अंदरूनी विरोध को कुचला और मिडिल ईस्ट में प्रॉक्सी ग्रुप्स को पाला ताकि ईरान को एक ताकतवर और खौफनाक देश के तौर पर स्थापित किया जा सके। हिजबुल्लाह, हूती, हमास यह सब उसी रणनीति के हिस्से थे। लेकिन आखिरी कुछ सालों में खामिनेई का घेरा सिकुड़ता जा रहा था। अक्टूबर 2023 में हमास ने इजराइल पर हमला किया। उसके बाद जो हुआ वो ईरान के लिए एक के बाद एक झटकों की कहानी है। गजा में जंग छिड़ी। इजराइल ने हमास को कमजोर कर दिया। फिर लेबनान में हिजबुल्ला पर भी भारी हमले हुए। इधर सीरिया में बशर अल असद की सत्ता पलट गई। खामिनई का मिडिल ईस्ट में जो असर था वह तेजी से घटने लगा। जून 2025 में इजराइल और फिर अमेरिका ने 12 दिन तक ईरान पर हवाई हमले किए। उन हमलों में खामिनई के करीबी साथी और आईआरजीसी के कई कमांडर मारे गए। परमाणु और मिसाइल ठिकाने तबाह होने की खबरें सामने आई। खामिनई को उस वक्त छुपना पड़ा था। वो 36 साल के शासन का सबसे बुरा दौर था। उसी दौर में अमेरिका ने ईरान से मांग की थी कि वह अपने बैलेस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को बंद कर दे। लेकिन खामिनई ने मिसाइलों पर बात करने से भी मना कर दिया। ईरान इन मिसाइलों को इजरैली हमले के खिलाफ अपनी आखिरी ढाल मानता था। इस रवैया ने शायद उन हमलों को और करीब ला दिया जो आखिरकार उनकी जान ले गए। इस साल यानी 2026 में भी खामिनेई देश के अंदर भारी दबाव में रहे। ईरान में महंगाई के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन बड़े हो गए थे। लोग सड़कों पर तानाशाह मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। खामनई ने इन प्रदर्शनों को बंदूकों और गोलियों के दम पर दबाने की कोशिश की। सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलियां चला दी। 1979 की क्रांति के बाद यह सबसे खूनी दमन था। बाहर से दुश्मन, अंदर से विरोध, परमाणु बातचीत का दबाव और मिडिल ईस्ट में सिकुड़ता असर सब कुछ खामिने के खिलाफ था। शनिवार को तेहरान के एक कंपाउंड में जब मिसाइलें गिरी तो वह दौर खत्म हो गया। जिसने मिडिल ईस्ट की राजनीति को दशकों तक अपने हिसाब से चलाया था। अब ईरान के सामने तीन रास्ते हैं। या तो असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स किसी नए सुप्रीम लीडर पर सहमत हो या आईआरजीसी सत्ता पर सीधे काबिज हो जाए या बाहर से कोई विपक्षी नेता उभरे। इनमें से कौन सा रास्ता चुना जाएगा यह तेहरान की गलियों से लेकर वाशिंगटन के दफ्तरों तक तय होगा। लेकिन एक बात तय है। खामिनेई के जाने के बाद ईरान वो नहीं रहेगा जो पहले था। इस बारे में आप क्या राय रखते हैं? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। देश और दुनिया से जुड़ी ऐसी तमाम खबरों के लिए देखते रहिए जस्त।
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