क्या वाकई इंसान की तकदीर में अगर गुरबत लगती जाए तो वह कभी नहीं बदल सकती। क्या अल्लाह अपने बंदों को हमेशा के लिए भूल जाता है? आज की यह कहानी एक ऐसे गरीब लड़के की है जिसे लोगों ने ताना दिया कि तुम्हारी तकदीर में हमेशा गुर्बत ही है। मगर फिर ऐसा वाकया पेश आया जिसने सबको हैरान कर दिया। तो दोस्तों [संगीत] वीडियो को आखिर तक जरूर देखना क्योंकि इस कहानी में एक ऐसा राज छुपा है जो आपकी जिंदगी भी बदल सकता है और अगर आपको ऐसी सबक खामोश कहानियां पसंद है तो चैनल को अभी सब्सक्राइब कर लें। बहुत पुराने जमाने की बात है। एक वीरान सा गांव था जो शहर की हलचल से बहुत दूर रेगिस्तान के किनारे आबाद था। इस गांव के लोग खेतीबाड़ी करते और मवेशी पालते थे। मिट्टी के छोटे-छोटे घर, सूरज की तपिश से फटी हुई जमीन और गलियों में [संगीत] खेलते बच्चे। यही इस गांव की पहचान थी। इसी गांव के एक कोने में सलीम और उसकी बीवी ज़ैनब रहते थे। सलीम एक निहायत नेक और मेहनती इंसान [संगीत] था। लेकिन सख्त मेहनत के बावजूद गुर्बत उसका पीछा नहीं छोड़ती थी। उसका एक छोटा सा कच्चा घर था जिसमें सिर्फ एक कमरा और एक तंग [संगीत] सा सहन था। उसके पास एक बूढ़ा ऊंट और चंद भेड़े थी जिनसे वो बड़ी मुश्किल से गुजारा करता था। उसकी बीवी [संगीत] ज़ैनब बहुत साबिर और परहेजगार औरत थी। उसका चेहरा नेकी से रोशन था। चाहे उसके कपड़ों पर पैबंद ही क्यों ना लगे हो। सलीम और ज़ैनब की कोई [संगीत] औलाद नहीं थी। वो हर रोज अल्लाह से दुआ मांगते कि उन्हें एक नेक औलाद अता फरमाए। कई सालों की दुआ के बाद आखिरकार अल्लाह ने उनकी झोली भर दी और ज़ैनब के यहां एक बेटे ने जन्म लिया। उनकी खुशी की कोई हद ना रही। सलीम ने उस बच्चे का नाम इमरान रखा। इमरान बचपन से ही बहुत समझदार था और अक्सर अल्लाह का नाम लेता रहता था। मगर जैसे-जैसे इमरान बड़ा होने लगा, गुरबत के बादल उसके वालिदैन पर और ज्यादा गहरे होते गए। सलीम की आंखों की रोशनी कम होने लगी। कम उम्र में ही उसकी कमर झुक गई। उसका ऊंट भी बीमार रहने लगा और एक दिन मर गया। घर में अक्सर खाने को कुछ नहीं होता था। सलीम बस अल्लाह का नाम लेकर गांव की मस्जिद में बैठ जाता और कभी कभार लोगों की छोटी-मोटी मदद कर देता। दूसरी तरफ ज़ैनब पड़ोसियों के घरों में सिलाई करके कुछ पैसे कमा लाती। लेकिन हालात दिन-बदिन खराब होते जा रहे थे। अब इमरान 10 साल का हो चुका था। वो गांव के मदरसे में पढ़ने जाता था। मगर उसकी किताबें पुरानी और कपड़े फटे हुए थे। गांव के अमीर बच्चे अक्सर उसका मजाक उड़ाते थे। एक दिन गांव का सबसे अमीर ताजिर कासिम अपने बेटे काशिफ के साथ गली से गुजर रहा था। काशिफ ने इमरान को उसके फटे कपड़ों में देखा तो जोर से हंस पड़ा और बोला अबू जरा देखें तो इमरान को इसके कपड़े तो भिखारियों जैसे हैं। क्या यही हमारे मदरसे में पढ़ता है? कासिम ने नफरत से इमरान की तरफ देखा और मुंह बनाकर बोला, "इसे छोड़ो काशिफ। यह सलीम का बेटा है। इसकी तकदीर में तो गुर्बत ही लिखी है। ऐसी मेहनत का क्या फायदा जिसे अल्लाह ने ही मोहताज बना दिया हो। यह सुनकर इमरान के दिल पर ऐसा लगा जैसे किसी ने तीर मार दिया हो। वो भागता हुआ घर पहुंचा और अपनी मां ज़ैनब से लिपट कर रोने लगा। अम्मी, लोग कहते हैं हमारी तकदीर में गुर्बत लिखी है। क्या वाकई अल्लाह हमें भूल [संगीत] गया है? क्या हम हमेशा ऐसे ही मोहताज रहेंगे? ज़ैनब ने प्यार से इमरान के सर पर हाथ रखा। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे बल्कि एक [संगीत] अजीब सी रोशनी थी। उसने इमरान के आंसू पोछे और कहा बेटा इमरान लोगों की बातों पर ध्यान मत दो। अल्लाह किसी को भूखा नहीं सुलाता। उसकी रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए। जो इंसान अल्लाह पर भरोसा रखता है, अल्लाह उसकी जरूर मदद करता है। शाम को जब सलीम घर आया तो इमरान उदास बैठा था। ज़ैनब ने उसे सारी बात बताई। सलीम ने इमरान को अपने पास बिठाया और प्यार से उसके बाल सहलाते हुए बोला [संगीत] बेटा कासिम ने यह तो ठीक कहा कि अल्लाह ने उसे अमीर बनाया है। लेकिन यह कहना गलत है कि हमारी तकदीर में हमेशा गुरबत लिखी है। तकदीर बदल भी सकती है। अल्लाह अपने बंदों की दुआ से तकदीर बदल देता है। हम गरीब जरूर है मगर हमारा ईमान मजबूत है। अल्लाह हमें कभी नहीं भूलेगा। फिर सलीम ने इमरान को एक किस्सा सुनाया। एक बादशाह था जिसके पास सब कुछ था मगर वो नमाज नहीं पढ़ता था और अल्लाह का शुक्र अदा नहीं करता था। एक दिन उसकी बादशाहत छीन गई और वो भिखारी बनकर सड़कों पर फिरने लगा। आखिर वो एक बुजुर्ग के पास गया और बोला, "मैं तो बादशाह था। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?" बुजुर्ग ने जवाब दिया, "तुम अल्लाह को भूल गए थे।" इसलिए अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी हालत का एहसास दिलाया। बादशाह ने तौबा की, अल्लाह से माफी मांगी और कुछ अरसे बाद उसे फिर अपनी इज्जत और मकाम मिल गया। सलीम ने इमरान से कहा बेटा अल्लाह के नजदीक अमीरी और गरीबी की कोई कीमत नहीं। असल कीमत दिल की सफाई, नेकी और अल्लाह पर यकीन की है। हम अल्लाह से कभी दूर नहीं हुए। इसीलिए यकीन रखो वो हमारी जरूर मदद करेगा। इमरान ने अपने वालिद की बातें गौर से सुनी और उस रात उसने दिल में फैसला कर लिया कि वह कभी अल्लाह पर से भरोसा नहीं छोड़ेगा। मगर [संगीत] गुरबत का यह इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ था। एक दिन ऐसा आया कि घर में [संगीत] खाने को कुछ भी नहीं बचा था। सलीम बीमार पड़ गया था और उठ भी नहीं पा रहा था। ज़ैनब ने इमरान को आवाज दी और कहा बेटा बाजार जाकर देखो। शायद कोई अल्लाह का बंदा मदद कर दे या फिर कासिम की दुकान पर जाकर कुछ दिन के लिए कर्ज मांग लो। यह सुनकर इमरान के कदम रुक गए। क्योंकि कासिम वही शख्स था जिसने उसकी तकदीर का मजाक उड़ाया था। मगर मां का हुक्म और बाप की बीमारी उसे जाने पर मजबूर कर रही थी। इमरान ने अपने फटे हुए कपड़े दुरुस्त किए। मां से दुआ ली और आहिस्ता-आहिस्ता बाजार की तरफ चल पड़ा। बाजार में बड़ी रौनक थी। हर तरफ सामान बिक रहा था। आखिरकार वो कासिम की बड़ी सी दुकान के सामने जा खड़ा हुआ। जहां रेशमी कपड़े, कीमती मसाले और दूरदराज मुल्कों का सामान रखा था। कासिम अपने बेटे काशिफ के साथ बैठा हुक्का पी रहा था। उसने इमरान को देखा तो भें चढ़ा ली। क्या चाहिए तुम्हें सलीम के बेटे? इमरान ने अदब से हाथ जोड़े और कहा, हुजूर, मेरे अब्बा बीमार हैं। घर में खाने को कुछ नहीं। अगर आप कुछ दिन के लिए कर्ज दे दें या थोड़ी सी मदद कर दें तो बड़ी मेहरबानी होगी। यह सुनकर कासिम जोर से हंस पड़ा और उसकी हंसी पूरे बाजार में गूंजने लगी। कर्ज और तुम ऐसे वापस कैसे करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं। कासिम ने हकारत से इमरान की तरफ देखते हुए कहा, तुम लोग तो भिखारी हो। बस अल्लाह का नाम लेकर बैठे रहते हो। अगर अल्लाह ने तुम्हें गरीब बनाया है तो उसी से मांगो। यह सुनकर [संगीत] उसका बेटा काशिफ भी जोर-जोर से हंसने लगा। इमरान की आंखों में आंसू आ गए। मगर उसने खुद को संभालने की कोशिश की। उसने दिल में सोचा अगर अल्लाह ने मुझे इस इम्तिहान से गुजारा है तो मुझे सब्र करना चाहिए। वो खामोशी से वहां से वापस लौट आया। घर पहुंचकर उसने अपनी मां ज़ैनब [संगीत] को सारी बात बताई। ज़ैनब ने उसे अपने सीने से लगा लिया और नरमी से बोली, कोई बात [संगीत] नहीं बेटा। इंसानों की नजर में हम भिखारी होंगे। मगर अल्लाह की नजर में हम उसके बंदे हैं। आओ मैं दाल में थोड़ा सा और पानी मिला देती हूं। हम वही पी लेंगे। अल्लाह का शुक्र [संगीत] है उसने हमें सब्र की नेमत दी है। इस रात इमरान भूखा ही सो गया। मगर उसके दिल में एक नया जज्बा पैदा हो चुका था। वो इस गुर्बत से निकलना चाहता था। मगर नेकी के रास्ते पर चलते हुए ना कि किसी गलत रास्ते से। रात के वक्त जब पूरा गांव सो चुका था, तो सलीम ने अपनी बीवी ज़ैनब से कहा, "नो ज़ैनब, आज इमरान को कासिम ने बहुत तकलीफ दी है। मगर मुझे यकीन है यह लड़का एक दिन कासिम से भी बड़ा आदमी बनेगा। तुम देखना अल्लाह की मेहरबानी जरूर होगी। ज़ैनब ने एतमाद से कहा, हां, मुझे भी यकीन है। मैं रोज दुआ करती हूं कि अल्लाह इमरान को ऐसा मकाम दे कि जो आज उसे भिखारी कहते हैं। कल इसी के सामने हाथ फैलाएं। सलीम और ज़ैनब की यह दुआएं आसमान तक पहुंच रही थी। उन्हें यकीन था कि अल्लाह की रहमत से कोई चीज दूर नहीं होती। बस वक्त का इंतजार करना पड़ता है। अगली सुबह गांव के मदरसे के मौलाना साहब सलीम के घर आए। वो सलीम की नेकी और ज़ैनब के सब्र से बहुत मुतासिर थे। उन्होंने कहा, सलीम [संगीत] भाई, मैंने सुना है आप बीमार हैं और हालात भी अच्छे नहीं। इसलिए मैं मदरसे की तरफ से थोड़ा सा राशन ले आया हूं। यह लीजिए और अल्लाह का नाम लेकर इस्तेमाल कीजिए। सलीम ने अदब से हाथ जोड़कर कहा, "मौलाना साहब, आपकी बड़ी मेहरबानी है। मगर हमें किसी चीज की कमी नहीं। हमें अल्लाह पर पूरा भरोसा है। मौलाना मुस्कुराए और बोले मैं जानता हूं सलीम भाई मगर यह हमारा फर्ज भी है। और हां इमरान की तालीम में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। वो बहुत जहीन और सलीकामंद बच्चा है। मौलाना के जाने के बाद इमरान ने अपने वालिद से पूछा अब्बा मौलाना साहब कह रहे थे हमें किसी चीज की कमी नहीं मगर हमारे पास तो कुछ भी नहीं है। सलीम ने मुस्कुरा कर कहा। बेटा कमी और जरूरत में फर्क होता है। हमें जो मिला है वो अल्लाह की तरफ से है। हम जरूर जरूरतमंद हैं मगर हमारे दिल खाली नहीं है। असल कमी तो उन [संगीत] लोगों में होती है जिनके पास सब कुछ हो मगर दिल खाली हो। हमारा दिल अल्लाह की याद से भरा हुआ है। इसलिए हम किसी से कम नहीं। यह बात इमरान के दिल में बैठ गई। उसने दिल में ठान लिया कि अगर वह अल्लाह पर भरोसा रखे और मेहनत करे तो एक दिन जरूर कुछ बन सकता है। इसी दिन से इमरान की जिंदगी में नया जोश आ गया। वो मदरसे में पहले से ज्यादा दिल लगाकर पढ़ने लगा। रात को जब सब सो जाते तो वह मिट्टी के दिए के सामने बैठकर कुरान की तिलावत करता और अल्लाह से दुआ मांगता कि उसके वालिदैन को सुकून और आसानी अता हो। गांव के कुछ लोग सलीम की हालत पर तरस खाते थे। मगर कासिम और उसके कुछ दोस्त उनका मजाक उड़ाते थे। वो कहते देखो इन फकीरों को अल्लाह पर भरोसा रखते हैं मगर भूखे मर रहे हैं। अगर अल्लाह को देना होता तो कब का दे देता। लेकिन सलीम और ज़ैनब इन बातों से बिल्कुल बेपरवाह थे। उनका ईमान पत्थर की तरह मजबूत था। उन्हें यकीन था कि अल्लाह की मदद जरूर आएगी। चाहे देर से ही क्यों ना आए। एक दिन सलीम ने इमरान को अपने पास बुलाया और कहा, बेटा तुम अब बड़े हो रहे हो। मैं तुम्हें एक नसीहत करना चाहता हूं। जिंदगी में कभी भी अल्लाह पर से भरोसा मत खोना। चाहे कितने ही तूफान क्यों ना आ जाए। [संगीत] चाहे जमीन और आसमान एक क्यों ना हो जाए। हमेशा यकीन रखना कि अल्लाह तुम्हारे साथ है। और मां-बाप की दुआएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी। इमरान ने [संगीत] अपने वालिद के पांव छुए और कहा, "अब्बा, आपकी बातें मेरे दिल में बस गई हैं। मैं वादा करता हूं [संगीत] कि मैं कभी अल्लाह से दूर नहीं होऊंगा, चाहे कुछ भी हो जाए।" यह इमरान का वो वादा था जो एक दिन उसकी तकदीर बदलने वाला था। और इस तकदीर के बदलने का सिलसिला शुरू हुआ एक [संगीत] अनजान मुसाफिर के गांव में आने से। वो एक बूढ़ा दरवेश था। सफेद लिबास पहने, हाथ में लाठी लिए वो गांव में दाखिल हुआ और मस्जिद में ठहर गया। उसके चेहरे से नूर झलक रहा था। उसने गांव वालों से सलीम के घर का रास्ता पूछा। लोग हैरान हो गए और बोले हुजूर आप इस गरीब के घर क्यों जाना चाहते हैं? वहां तो खाने को भी कुछ नहीं है। दरवेश मुस्कुरा कर बोला। जहां अल्लाह का जिक्र हो और सब्र की नेमत हो वहां खाने से बढ़कर भी बहुत कुछ होता है। फिर वो सलीम के घर पहुंचा। उसने देखा कि घर तो मिट्टी का छोटा सा है मगर साफ सुथरा है। सलीम बीमार बिस्तर पर लेटा था मगर उसके चेहरे पर सुकून और नूर था। ज़ैनब ने अदब से दरवेश का इस्तकबाल किया। दरवेश ने कहा, "मैं एक मुसाफिर हूं। अल्लाह का बंदा हूं। मुझे चंद दिन ठहरने की जगह चाहिए।" सलीम ने फौरन जवाब दिया, हुजूर, यह घर आपका है। हमारे पास सिर्फ दाल और रोटी है, मगर वह भी आपकी है। दरवेश उनकी सादगी और ईमान देखकर बहुत खुश हुआ। उसने सलीम को दुआ दी। रात को जब इमरान मदरसे से वापस आया, तो उसने दरवेश को देखा। उनके चेहरे के नूर ने उसे बेइख्तियार उनके कदमों में बिठा दिया। दरवेश ने इमरान के सर पर हाथ रखा और फौरन महसूस कर लिया कि इस लड़के में कुछ खास बात है। उसने सलीम से पूछा, क्या यह तुम्हारा बेटा है? सलीम ने फखर से कहा, "जी हुजूर, यह हमारा इमरान है। हमारी आंखों की रोशनी।" दरवेश ने गौर से इमरान को देखा और कहा, "इसके चेहरे पर तकदीर की रोशनी नजर आ रही है। मगर यह रोशनी अभी छुपी हुई है। एक दिन यही लड़का पूरे इलाके को रोशन करेगा। यह सुनकर सलीम और ज़ैनब की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्हें [संगीत] यकीन हो गया कि उनकी दुआएं कबूल होने वाली हैं। कुछ दिन दरवेश उनके घर रहा। उसने देखा कि इमरान कितना जहीन और नेक दिल है। उसने इमरान को कुरान की आयात के गहरे माने समझाए और उसे जिंदगी का असल इल्म सिखाया। उसने कहा बेटा इमरान इल्म सिर्फ किताबों में नहीं होता। अल्लाह की बनाई हुई हर चीज में इल्म होता है। [संगीत] जब तुम दुनिया देखोगे, लोगों की मदद करोगे, तब तुम्हें असल इल्म मिलेगा। यह बात इमरान के दिल में उतर गई। दरवेश के जाने के बाद इमरान ने फैसला कर लिया कि वो सिर्फ मदरसे [संगीत] तक महदूद नहीं रहेगा। वो बाहर निकलेगा, मेहनत करेगा और कुछ बनकर दिखाएगा। लेकिन गांव में उसके लिए कोई [संगीत] बड़ा मौका मौजूद नहीं था और शायद यही वो लम्हा था जब उसकी जिंदगी एक नए मोड़ लेने वाली थी। गांव में इमरान के लिए कोई काम मौजूद नहीं था और कासिम जैसे अमीर लोग उसे काम देने से कतराते थे। इसी दौरान एक दिन गांव के चौराहे पर ताजिरों का एक बड़ा काफिला आकर रुका। वो दूरदराज मुल्कों से सामान लेकर आए थे और उन्हें चंद [संगीत] मजदूरों की जरूरत थी। इमरान ने मौका देखा और फौरन उनके सरदार के पास पहुंच गया। उसने अदब से कहा, हुजूर, मुझे काम चाहिए। मैं मेहनत करने के लिए तैयार हूं। काफिले के सरदार ने उसके चेहरे की तरफ देखा और पूछा, "क्या नाम है तुम्हारा बच्चे?" इमरान ने जवाब दिया, "मेरा नाम इमरान है।" फिर सरदार ने पूछा, और तुम क्या-क्या काम कर सकते हो? इमरान ने एतमाद से कहा, "मैं पढ़ लिख सकता हूं, हिसाब किताब रख सकता हूं और जानवरों की देखभाल भी कर सकता हूं।" सरदार ने कुछ लम्हे सोचा। उसे लगा कि एक मेहनती और पढ़ा लिखा लड़का उनके काम आ सकता है। चुनांचे उसने अमरान को चंद दिन के लिए अपने साथ रख लिया। अमरान ने पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया। वो ताजिरों के ऊंटों की देखभाल करता, सामान की गिनती रखता और कभी कभार हिसाब किताब में भी मदद कर देता। ताजिर उससे बहुत खुश हुए। चंद दिन बाद उन्होंने उसे उसकी मजदूरी दी। यह पहली बार था जब अमरान ने अपनी मेहनत से पैसे कमाए थे। वो खुशी से झूम उठा। वो पैसे लेकर सीधा घर पहुंचा और अपनी मां ज़ैनब को देते हुए बोला, "अम्मी, यह लीजिए। यह मेरी मेहनत की कमाई है। अब हम किसी के मोहताज [संगीत] नहीं रहेंगे।" ज़ैनब ने वो पैसे हाथ में लिए, उन्हें चूम कर आंखों से लगाया और अल्लाह का शुक्र अदा किया। सलीम ने इमरान को दुआ दी और कहा बेटा यह सिर्फ पैसे नहीं है। यह तुम्हारे इरादे की [संगीत] ताकत है। यकीन रखो अल्लाह तुम्हें इससे भी ज्यादा देगा। उसी रात इमरान ने एक अजीब ख्वाब देखा। उसने ख्वाब में देखा कि वो एक बड़े शहर में है और एक बड़ा ताजिर बन चुका है। उसके सामने कासिम और काशिफ खड़े हैं और उससे कर्ज मांग रहे हैं। ख्वाब देखकर जब उसकी आंख खुली तो वह मुस्कुरा दिया। [संगीत] उसने सोचा यह तो सिर्फ ख्वाब है। मगर कभी-कभी ख्वाब भी हकीकत बन जाते हैं अगर अल्लाह चाहे। चंद दिन बाद ताजिरों का काफिला वापस जाने लगा। [संगीत] काफिले के सरदार ने इमरान को बुलाया और कहा, "इमरान, हम तुमसे बहुत खुश हैं। अगर तुम चाहो तो हमारे साथ शहर चल सकते हो। वहां तुम मजीद सीख सकते हो और बड़ा आदमी बन सकते हो। इमरान के दिल में उम्मीद की एक लहर दौड़ गई। मगर उसने अदब से जवाब दिया, हुजूर, मुझे पहले अपने मां-बाप से इजाजत लेनी होगी। वो बूढ़े और बीमार हैं। मैं उन्हें बगैर इजाजत छोड़ नहीं सकता। यह सुनकर काफिले का सरदार और भी मुतासिर हुआ। वो मुस्कुरा कर बोला, "तुम वाकई नेक और सच्चे इंसान हो इमरान। जाओ [संगीत] अपने वालिदैन से पूछो। अगर वह राजी हो, तो हम तुम्हारा इंतजार करेंगे।" इमरान फौरन घर की तरफ दौड़ पड़ा और अपने वालिदैन को सारी बात बता दी। सलीम और ज़ैनब एक दूसरे की तरफ देखने लगे। उनकी आंखों में आंसू थे। मगर यह आंसू गम के नहीं बल्कि खुशी के थे। उन्हें महसूस हुआ कि शायद उनकी दुआएं कबूल होने लगी हैं। सलीम ने इमरान को अपने पास बिठाया और कहा बेटा हम तुम्हें नहीं रोकेंगे। जाओ [संगीत] अल्लाह के रास्ते पर आगे बढ़ो। हम हमेशा तुम्हारे लिए दुआ करते रहेंगे। बस याद रखना अल्लाह पर भरोसा कभी मत छोड़ना और नेकी के रास्ते से कभी ना हटना। जैनब ने इमरान को गले लगाया और एक पुरानी ताबीज उसके गले में डाल दी जिस पर कुरान की आयत लिखी हुई थी। उसने कहा बेटा यह हमारी दुआओं [संगीत] की निशानी है। इसे हमेशा अपने पास रखना। इमरान ने अपने मां-बाप के पांव छुए। उनसे माफी मांगी और अल्लाह से दुआ की कि वो उनकी हिफाजत [संगीत] करें। फिर वह ताजिरों के काफिले के साथ शहर की तरफ रवाना हो गया। उस दिन गांव वालों ने हैरत से देखा कि वही सलीम का बेटा जिसे कल तक भिखारी कहा जाता था। आज एक बड़े काफिले के साथ शहर जा रहा है। कासिम ने जब यह मंजर देखा तो उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरें नमूदार हो गई। अब उसे महसूस होने लगा था कि यह लड़का वाकई कुछ खास है। मगर यह तो सिर्फ शुरुआत थी। असल इम्तिहान, असल मंजिल और असल कामयाबी अभी बाकी थी। इमरान ताजिरों के काफिले के साथ शहर की तरफ रवाना हुआ तो उसके दिल में अजीब सी कैफियत थी। एक तरफ मां-बाप को छोड़ने का गम और दूसरी तरफ एक नई जिंदगी शुरू करने का जज्बा। रेगिस्तान के सुनहरी टीलों के दरमियान से गुजरता हुआ काफिला आगे बढ़ रहा था। ऊंटों की घंटियों की आवाज और ताजरों की गुफ्तगू के दरमियान इमरान खामोश बैठा अपने वालिदैन की बातें याद कर रहा था। बेटा अल्लाह पर भरोसा रखना। वो कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाता। यह अल्फाज उसके कानों में गूंज रहे थे। उसने अपने गले में लटकी तावीज को हाथ लगाया और दिल ही दिल में दुआ की। ऐ अल्लाह मुझे कामयाबी अता फरमा ताकि मैं अपने वालिदैन का नाम रोशन कर सकूं। तकरीबन 10 दिन के सफर के बाद काफिला बसरा शहर के करीब पहुंच गया। यह एक बहुत बड़ा और मशहूर शहर था। यहां बंदरगाह थी, बड़े-बड़े बाजार थे, अमीरों की हवेलियां भी थी और गरीबों की झोपड़ियां भी। इमरान ने पहली बार इतना बड़ा शहर देखा था। ऊंची इमारतें, रंगरंगे कपड़ों में लोग, मुख्तलिफ ज़बाने बोलते हुए ताजिर और अजीबोगरीब चीजों की दुकानें। [संगीत] वो हैरान रह गया। उसे लगा जैसे वह किसी और दुनिया में आ गया हो। काफिले के सरदार का नाम अबू तालिब था। वो एक बुजुर्ग और निहायत मेहरबान इंसान था। उसने इमरान की मेहनत और सादगी को पसंद किया था। उसने इमरान से कहा, बेटा यह शहर बहुत बड़ा है। यहां हर तरह के लोग रहते हैं। कुछ नेक [संगीत] हैं और कुछ बदनियत। यहां कामयाब होना आसान नहीं। [संगीत] लेकिन अगर तुम अल्लाह पर भरोसा रखो और सच्ची मेहनत करो तो एक दिन जरूर कामयाब हो जाओगे। अबू तालिब ने इमरान को अपने कारवान सराय में ठहराया। [संगीत] यह एक बड़ा सहन था जिसके चारों तरफ कमरे बने हुए थे। दरमियान में ऊंट और दूसरे जानवर बांधे जाते थे। इमरान को एक छोटा सा कमरा दिया गया जिसमें सिर्फ एक चारपाई और एक मिट्टी का दिया था। यह एक गांव के घर से बेहतर तो था मगर इसे अपने मां-बाप की बहुत याद आने लगी। अगले ही दिन इमरान ने काम शुरू कर दिया। अबू तालिब ने उसे गोदाम की जिम्मेदारी सौंप दी। वहां मसाले, कपड़े, खुश मेवे और कई कीमती सामान के ढेर लगे हुए थे। इमरान का काम था हिसाब किताब लिखना, आने जाने वाले सामान की फहरिस्त बनाना और गोदाम की निगरानी करना। यह काम आसान नहीं था। मगर इमरान ने पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम शुरू कर दिया। वो फजर की नमाज से पहले उठता, वज़ू करता, नमाज पढ़ता और फिर सीधा गोदाम पहुंच जाता। रात देर तक वो हिसाब किताब में लगा रहता। अबू तालिब उसकी मेहनत और दयानतदारी से बहुत मुतासिर होने लगे थे और उन्हें महसूस होने लगा था कि यह लड़का एक दिन बहुत बड़ा ताजिर बनेगा। अबू तालिब इमरान की मेहनत और ईमानदारी से बहुत खुश थे। एक दिन उन्होंने इमरान को अपने पास बुलाया और उसके हाथ में पांच सोने के सिक्के रखते हुए कहा, बेटा इमरान यह तुम्हारी मेहनत की मजदूरी है। इमरान की खुशी की कोई हद ना रही। उसने [संगीत] पहली बार अपनी जिंदगी में इतने सोने के सिक्के देखे थे। उसने फौरन उनमें से दो सिक्के एक कासिद के जरिए अपने वालिदैन को भेज दिए और एक खत भी लिखा कि वो खैरियत से है और हमेशा उनकी दुआओं को याद करता है। लेकिन शहर की चमकदमक [संगीत] इमरान के लिए आजमाइशों से खाली नहीं थी। वहां कुछ लोग बहुत चालाक और [संगीत] मक्कार भी थे। गोदाम में एक और मुलाजिम था जिसका नाम राशिद था। वो उम्र में इमरान से बड़ा था मगर काम में बेईमान था। वो अक्सर थोड़ी बहुत चोरी [संगीत] कर लेता और सामान की तोल में भी हेरफेर कर देता था। अबू तालिब को उस पर शक तो था मगर सबूत ना होने की वजह से वह कुछ नहीं कर सकते थे। राशिद ने जब देखा कि इमरान ईमानदारी से काम करता है तो उसे इससे हसद होने लगा। उसने सोचा कहीं यह नया लड़का उसकी चोरी पकड़वा ना दे। एक दिन उसने इमरान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया और कहा इमरान भाई तुम शहर में नए हो। आओ मैं तुम्हें बाजार की सैर कराता हूं। यहां के बाजार बहुत रंगीन है। तुम्हें मजा आएगा। इमरान ने सोचा कि शहर देखना अच्छा होगा। वो राशिद के साथ बाजार चला गया। राशिद ने उसे मुख्तलिफ दुकानें दिखाई, मिठाइयां खिलाई और फिर उसे एक शराब की दुकान के सामने ले गया। वो बोला देखो इमरान यहां बड़ी मजे की चीज मिलती है। जरा पी कर तो देखो सारे गम भूल जाओगे। यह सुनकर इमरान चौंक गया। उसने फौरन कहा राशिद भाई यह तो हराम है। हमारा दीन इससे मना करता है। मैं यह नहीं पी सकता। राशिद हंस पड़ा और बोला, अरे भाई, यहां सब पीते हैं। यही तो मजा है। अल्लाह ने यह चीज बनाई है, तो पीने के लिए ही बनाई होगी। थोड़ी सी पी लो, किसी को पता भी नहीं चलेगा। इमरान के दिल में एक खटक सी हुई। उसे अपने वालिद सलीम की नसीहत याद आई। बेटा कभी हराम की तरफ कदम मत बढ़ाना। [संगीत] चाहे दुनिया में कोई ना देखे अल्लाह सब देख रहा होता है। इमरान ने मजबूत लहजे में कहा। माफ करना राशिद भाई मैं यह नहीं कर सकता। मुझे अपने अल्लाह का खौफ है। राशिद ने उसे बेवकूफ समझा। मगर इमरान अपने उसूलों पर कायम रहा। वो वहां से खामोशी से वापस कारवान सराय आ गया। इस रात उसने बहुत रोकर अल्लाह से दुआ की कि वो उसे गुमराही से बचाए। कुछ दिन बाद राशिद की हकीकत सबके सामने आ गई। वो [संगीत] एक बड़ी चोरी करते हुए पकड़ा गया। अबू तालिब ने उसे फौरन नौकरी से निकाल दिया और हुकाम [संगीत] के हवाले कर दिया। इसके बाद उन्होंने इमरान को और ज्यादा जिम्मेदारी दे दी। अब इमरान गोदाम [संगीत] का निगरान बन चुका था। एक दिन अबू तालिब ने इमरान को बुलाया और कहा, [संगीत] बेटा इमरान, मैं तुमसे बहुत खुश हूं। तुम ईमानदार और मेहनती हो। मैं तुम्हें एक और बड़ी जिम्मेदारी देना चाहता हूं। कुछ महीनों बाद हमारा एक बड़ा काफिला हिंदुस्तान जाने वाला है। मुझे एक ऐसे आदमी की जरूरत है जो इस काफिले की कयादत करें। और मैं चाहता हूं कि तुम यह जिम्मेदारी संभालो। यह सुनकर इमरान हैरान रह गया। वो बोला हुजूर मैं तो अभी नया हूं। मैं इस काबिल कहां? अबू तालिब मुस्कुरा कर बोले तुम में काबिलियत है। बस तुम्हें अपने आप पर यकीन नहीं। अल्लाह पर भरोसा रखो और हिम्मत से काम लो। मैं तुम्हारे साथ कुछ तजुर्बाकार लोग भी भेजूंगा। इमरान ने सोचा कि शायद यह अल्लाह की तरफ से दिया हुआ मौका है। उसने यह जिम्मेदारी कबूल कर ली। लेकिन अबू तालिब ने एक शर्त रखी। इस सफर से पहले तुम्हें तिजारत के तमाम उसूल सीखने होंगे। बाजार के तरीके, लोगों से मामलात और सौदेबाजी के उसूल भी। इमरान ने सर झुका कर कहा, हुजूर, मैं पूरी कोशिश करूंगा। इसके बाद के महीने इमरान के लिए बहुत मुश्किल थे। वो सुबह से शाम तक अबू तालिब के साथ रहता और तजारत के गिर सीखता। वो मसालों की कीमतें याद करता, कपड़ों की किस्में पहचानता और दौलत तराजू के पैमाने समझता। रात को जब वो अपने कमरे में आता तो थका हुआ होता और अक्सर अपने वालिदैन को याद करके आंसू बहाता क्योंकि उसके भेजे हुए पैसों का अभी तक कोई जवाब नहीं आया था। एक दिन उसकी मुलाकात अपने गांव के एक आदमी से हुई जो शहर में सामान बेचने आया था। उसने इमरान को पहचान लिया। इमरान ने बेचैनी से पूछा, चाचा, मेरे अब्बा और अम्मी कैसे हैं? उस आदमी ने जवाब दिया, बेटा, तुम्हारे अब्बा की तबीयत कुछ ठीक [संगीत] नहीं रहती। वो अक्सर तुम्हें याद करते हैं और तुम्हारी अम्मी ने तुम्हारे लिए यह खत दिया है। उसने इमरान को एक पुराना [संगीत] खत दिया जो मोम से बंद था। इमरान ने कांपते हाथों से खत खोला। उसमें उसकी मां ज़ैनब की तहरीर [संगीत] थी। मेरे प्यारे बेटे इमरान अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है कि तुम खैरियत से हो और अपनी मेहनत से कमा रहे हो। तुम्हारे भेजे हुए पैसे हमें मिल गए। उनसे हमने तुम्हारे अब्बा का इलाज करवाया और कुछ खाने का सामान लिया। तुम्हारे [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब्बा को तुम पर बहुत फक्र है। वो कहते हैं कि मुझे मालूम था मेरा बेटा एक दिन जरूर कामयाब होगा। बेटा हमेशा अल्लाह पर भरोसा रखना। दुनिया में चाहे कितने ही धोखेबाज क्यों ना हो, सच्चाई और ईमानदारी हमेशा जीतती है। हम तुम्हारे लिए दुआ करते हैं। जल्दी वापस आना। तुम्हारी मां ज़ैनब। खत पढ़कर इमरान की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे महसूस हुआ जैसे उसकी मां उसके पास खड़ी उसे दुआ दे रही हो। इसी लम्हे उसने दिल में अहद कर लिया कि वह इतना कामयाब बनेगा कि उसके मां-बाप को कभी किसी के सामने हाथ ना फैलाना पड़े। कुछ ही दिनों में हिंदुस्तान के सफर की तैयारियां शुरू हो गई। इमरान ने अबू तालिब की मदद से बेहतरीन सामान खरीदा। रेशमी कपड़े, खुशबूदार मसाले, कीमती जवाहरात और कई कीमती चीजें जो हिंदुस्तान में बिक सकती थी। उसने ऊंटों की लंबी कतार तैयार की और 20 आदमियों की एक टीम बनाई। रवाना होने से पहले अबू तालिब ने उसे बुलाया और आखिरी नसीहत की। बेटा इमरान यह सफर बहुत लंबा है। रास्ते में डाकू भी है, तूफान भी और बीमारियां भी। हमेशा होशियार रहना। कभी किसी के साथ बदसलूकी मत करना। गरीबों और मुसाफिरों की मदद करना। और सबसे अहम अपने वालिदैन की दुआओं को हमेशा अपने साथ रखना। इमरान ने एहतराम से अबू तालिब के कदम छुए और दुआ [संगीत] मांगी। फिर उसने काफिले को हिंदुस्तान की तरफ रवाना कर दिया। रेगिस्तान का सफर बहुत मुश्किल था। दिन [संगीत] में तेज धूप, रात में सर्द हवाएं और कई बार रास्ता भटक जाने का खौफ। इमरान हर वक्त ऊंटों और सामान की निगरानी [संगीत] करता। वो अपने साथियों के साथ भाइयों जैसा सलूक करता। कई बार वो खुद भूखा रह जाता मगर अपने साथियों को खाने में कमी नहीं आने देता था। लेकिन एक दिन रेगिस्तान के बीचों-बीच ऐसा वाकया पेश आने वाला था जो इमरान की जिंदगी का सबसे [संगीत] बड़ा इम्तिहान बनने वाला था। रेगिस्तान के दरमियान अचानक एक खौफनाक आंधी उठ खड़ी हुई। रेत के बादलों ने पूरा आसमान ढांप लिया। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। ऊंट बदकने लगे और काफिले के लोग घबरा कर चीखने लगे। हम बर्बाद हो गए। लेकिन इमरान ने बुलंद आवाज में कहा, डरो मत, अल्लाह पर भरोसा रखो। सब लोग जमीन पर बैठ जाओ। ऊंटों को मजबूती से बांध लो और अल्लाह का नाम लो। उसने सबको इकट्ठा किया। ऊंटों को एक दूसरे से बांधा और खुद तूफान के सामने डट कर खड़ा हो गया। वो दिल ही दिल में दुआ कर रहा था। या अल्लाह हमें इस मुसीबत से बचा ले। अगर हम सलामत बच गए तो मैं हमेशा तेरे बंदों की मदद करूंगा। तूफान कई घंटों तक चलता रहा। फिर अचानक रुक गया। जब रेत हटी तो सबने हैरत से देखा कि ऊंट और सामान तकरीबन महफूज़ है। इमरान के साथियों ने उसे गले लगा लिया। इमरान तुमने हमारी जान बचा ली। इमरान ने आजजी से कहा, "यह सब अल्लाह की मेहरबानी है। मेरी कोई खास बात नहीं।" इस वाक्य के बाद इमरान का हौसला और मजबूत हो गया। उसे यकीन हो गया कि अल्लाह उसके साथ है। कई दिनों के सफर के बाद उन्होंने एक बड़ी दरिया पार की और हिंदुस्तान की सरजमी पर कदम रखा। यहां की हरियाली, दरिया और घने जंगल देखकर इमरान हैरान रह गया। रेगिस्तान के बाद यह जगह उसे जन्नत से कम नहीं लग रही थी। काफिला एक बड़े शहर की तरफ बढ़ा जिसका नाम था कन्नौज। इस जमाने में यह हिंदुस्तान का एक मशहूर तजारती मरकज था। यहां के राजे, [संगीत] अमीर और बड़े लोग रेशम, खुशबू और कीमती जवाहरात के शौकीन थे। इमरान ने शहर के बाहर अपना कारवा सराय कायम किया और सबसे पहले राजा से मुलाकात की इजाजत मांगी। उसने सोचा कि अगर राजा को इसका सामान पसंद आ गया तो बहुत [संगीत] बड़ा फायदा होगा। चंद दिन के इंतजार के बाद उसे शाही दरबार में बुलाया गया। शाही महल देखकर इमरान हैरान रह गया। सोने चांदी से सजे सततून रंगीन कालीन हाथी दांत का बना हुआ फर्नीचर और दरमियान में तख्त पर बैठा हुआ राजा [संगीत] उसके गले में मोतियों का हार और सर पर सोने का ताज था। इमरान ने अदब से सलाम किया और कहा जहां पनाह मैं बसरा से आने वाला एक ताजर हूं। मैं आपके लिए बेहतरीन रेशम नायाब मसाले और कीमती जवाहरात लाया हूं। अगर इजाजत दें तो अपना सामान पेश करूं। राजा को इमरान की शायस्तगी और साफ गुफ्तगू पसंद आई। उसने कहा, बहुत अच्छा पेश करो। जब इमरान के साथी सामान लेकर आए तो दरबार हैरान रह गया। नाजुक रेशमी कपड़े देखकर राजा की आंखें चमक उठी। खुशबूदार मसालों की महक से पूरा दरबार महक गया और जवाहरात की चमक देखकर सब हैरान रह गए। राजा ने कहा, "यह वाकई कीमती सामान है। इसकी कीमत क्या है?" इमरान ने ईमानदारी से मुनासिब कीमत बताई। वह ज्यादा लालच नहीं करना चाहता था। राजा इसकी ईमानदारी से बहुत खुश हुआ। उसने सारा सामान खरीद लिया और इमरान को इनाम में मजीद सोने के सिक्के भी दिए। इमरान ने फौरन अल्लाह का शुक्र अदा किया। राजा ने पूछा तुम्हारा नाम क्या है? इमरान ने जवाब दिया इमरान हुजूर। राजा मुस्कुरा कर बोला। [संगीत] इमरान तुम ना सिर्फ एक अच्छे ताजिर हो बल्कि एक नेक इंसान भी लगते हो। मेरे दरबार के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा खुले हैं। अगर कभी मदद चाहिए हो तो बिला झिचकाना। इमरान की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे महसूस हुआ कि उसकी मेहनत और अल्लाह पर यकीन रंग लाने लगा है। मगर जिंदगी के इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुए थे। शहर में एक बहुत अमीर ताजिर था जिसका नाम था सेठ धर्मपाल। वो इलाके का सबसे बड़ा सूदखोर था और किसी नए ताजिर को कामयाब [संगीत] होते देखना उसे पसंद नहीं था। जब उसे इमरान के बारे में पता चला तो वह हसद से भर गया। उसने अपने आदमियों को इमरान पर नजर रखने के लिए लगा दिया। जब उसे मालूम [संगीत] हुआ कि इमरान के पास कीमती सामान भी है और राजा से भी अच्छे ताल्लुकात बन गए हैं तो उसने उसे बर्बाद करने की साजिश [संगीत] कर डाली। एक रात जब इमरान कारावान सराय में सो रहा था। उसके गोदाम में आग लगा दी गई। आग ने चंद लम्हों में खौफनाक शक्ल इख्तियार कर ली। हर तरफ चीखोपकार मच गई। जब इमरान ने देखा कि उसकी पूरी मेहनत जल रही थी तो उसका दिल बैठ गया। मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। वो फौरन अपने साथियों को बचाने लगा और ऊंटों को आग से दूर ले जाने लगा। काफी सामान जलकर खाक हो गया मगर कुछ बच भी गया। सुबह हुई तो इमरान मलबे के दरमियान बैठा सर पकड़े सोच रहा था। क्या यह अल्लाह की तरफ से इम्तिहान है? उसे अपने वालिद सलीम की बात याद आई। बेटा जब मुसीबत आए तो घबराना नहीं। सब्र करना और अल्लाह से दुआ मांगना। इमरान ने वज़ू किया और नमाज पढ़ी। फिर हाथ उठाकर दुआ की। या अल्लाह मैं तुझ पर यकीन रखता हूं। इस मुसीबत से निकलने की ताकत दे। इस आग ने मेरा सामान जलाया है। मगर मेरा ईमान नहीं। इसी वक्त वहां एक बूढ़ा दरवेश आ पहुंचा। वही दरवेश जो बरसों पहले इमरान के गांव आया था। उसने इमरान के सर पर हाथ रखा और कहा बेटा इस आग में तुम्हारा सामान जला है। मगर तुम्हारी किस्मत नहीं जली। अल्लाह ने तुम्हें बड़ा बनाना है। यह सिर्फ एक इम्तिहान था। उठो और आगे बढ़ो। इमरान की आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा बाबा अब मेरे पास कुछ नहीं बचा। मैं क्या करूं? दरवेश मुस्कुराया और उसे एक छोटी सी थैली दी। उसमें चंद पत्थर थे। वो बोला, "यह आम पत्थर नहीं, यह कीमती याकू और नीलम है। इन्हें बेचकर तुम दोबारा शुरू कर सकते हो। मगर याद रखो असल दौलत तुम्हारा अल्लाह पर यकीन है। इमरान हैरान रह गया। उसने कहा, बाबा, यह तो बहुत कीमती है। मैं यह कैसे ले सकता हूं?" दरवेश ने जवाब दिया, जब अल्लाह देता है तो हिसाब से देता है। आज तुमने वो काम किया है जो हर कोई नहीं कर सकता। आग में भी अल्लाह को याद रखा। यही तुम्हारी असल कामयाबी है। यह कहकर वो दरवेश वहां से चला गया। इस वाक्य ने इमरान के ईमान को और मजबूत कर दिया। उसने दरवेश के दिए हुए जवाहरात बेचे और अच्छी खासी रकम हासिल कर ली। फिर उसने दोबारा तजारत शुरू की। मगर इस बार पहले से ज्यादा समझदारी के साथ [संगीत] राजा की सरपरस्ती में उसने शहर के सबसे बड़े बाजार में अपनी दुकान कायम कर ली। और कुछ ही वक्त में इमरान का नाम पूरे इलाके में एक ईमानदार और कामयाब ताजिर के तौर पर मशहूर होने लगा। मगर तकदीर अभी उसे एक और हैरानकुन मोड़ देने वाली थी। वो मोड़ जिसके बाद एक दिन वही इमरान अपने गांव वापस लौटेगा और वहां उसका सामना कासिम और कासिफ से होगा और उस दिन सबको पता चलेगा कि अल्लाह पर यकीन रखने वाले की तकदीर कैसे बदलती है। लेकिन सेठ जगदीश की नजर अभी भी इमरान पर थी। वो उसे कामयाब होते देखकर अंदर ही अंदर जल रहा था। एक दिन उसने इमरान को अपने पास बुलाया। बजाहिर तो वह दोस्ताना गुफ्तगू करना चाहता था। मगर हकीकत में वह एक नई चाल चलने वाला था। मगर इमरान भी अब वो सादा लड़का नहीं रहा था। उसने फौरन उसकी नियत भांप ली। लेकिन उसने सीधा मुकाबला करने के बजाय अल्लाह पर भरोसा किया। उसे यकीन था कि आखिरकार सच ही जीतता है। और फिर एक दिन ऐसा आया जिसने इमरान की तकदीर हमेशा के लिए बदल दी। उस दिन राजा के दरबार में एक मुश्किल मुकदमा पेश हुआ। दो बड़े ताजिरों के बीच में एक बहुत बड़े सौदे पर झगड़ा हो गया था। दोनों अपनी बात पर अड़े हुए थे और दरबार के किसी शख्स से भी इंसाफ नहीं हो पा रहा था। राजा ने फौरन हुक्म दिया इमरान को बुलाया जाए क्योंकि उसकी ईमानदारी और दानाई की शोहरत अब पूरे शहर में फैल चुकी थी। जब इमरान दरबार में पहुंचा तो राजा ने कहा इमरान तुम एक परदेसी हो। इसलिए यहां किसी से तुम्हारा कोई जाती ताल्लुक नहीं। तुम नेक भी हो और समझदार भी। इसीलिए इस मुकदमे का फैसला तुम ही करो। [संगीत] इमरान ने दिल ही दिल में अल्लाह का नाम लिया। फिर उसने दोनों ताजिरों की बात गौर से सुनी। गवाहों से सवाल किए, हर पहलू को समझा और आखिर में ऐसा इंसाफ पर मबनी फैसला सुनाया कि पूरा दरबार हैरान रह गया। उसका फैसला इतना वाज़ह और मुंसफाना था कि दोनों फरीक मुतमईन हो गए। राजा बहुत खुश हुआ। वो अपने तख्त से उठा। इमरान को गले लगाया और कहा। इमरान मुझे तुम जैसे नेक और इंसाफ पसंद इंसान की सख्त जरूरत थी। आज से [संगीत] तुम मेरे खास मुशीर हो और मैं तुम्हें इस शहर का काजी मुकरर करता हूं। यह सुनकर इमरान को यकीन ही नहीं आ रहा था। जो लड़का कभी गुरबत और बेइज्जती के दिन देख [संगीत] चुका था, आज वह एक बड़े शहर का काजी बन चुका था। उसने फौरन अल्लाह का शुक्र अदा किया और सजदे में गिर पड़ा। इसी दिन उसने अपने गांव एक कासिद भेजा। उसके साथ उसने अपने वालिदैन के लिए बहुत से तोहफे भेजे और एक खत लिखा। अब्बू और अम्मी अल्लाह ने मुझे कामयाबी दी है। मैं जल्द आपसे मिलने आ रहा हूं। मगर इमरान की आजमाइश अभी खत्म नहीं हुई थी। काजी बनने के बाद उसके सामने कई ऐसे मुकदमे आए जिनमें सेठ जगदीश का नाम शामिल था। सेठ ने सोचा अगर इमरान को दोस्त बना लिया जाए तो मुश्किलों से बचा जा सकता है। उसने इमरान के पास बड़ी रकम बतौरे रिश्वत भेजी। मकसद यह था कि एक मुकदमे में फैसला उसके हक में हो जाए। जब इमरान ने वो रकम देखी तो उसे शदीद गुस्सा आया। उसने उस आदमी को बुलाया जो पैसे लाया था और कहा जाओ सेठ से कह दो कि इमरान रिश्वत नहीं लेता। मेरा अल्लाह मुझे इससे कहीं ज्यादा रिस्क देने वाला है। दुनिया की कोई ताकत इंसाफ को खरीद नहीं सकती। जब सेठ जगदीश ने यह जवाब सुना तो वो हैरान रह गया। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि कोई इंसान इतनी बड़ी रकम ठुकरा सकता है। अगले ही दिन वो खुद इमरान के पास आया। उसने कहा इमरान मैं तुमसे बहुत मुतासिर हुआ हूं। तुमने मुझे सिखाया कि असल ताकत रिश्वत में नहीं बल्कि ईमानदारी में है। मैं अपने गुनाहों की माफी मांगता हूं। आज के बाद मैं भी सच की राह पर चलूंगा। यूं इमरान की ईमानदारी ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को भी दोस्त बना लिया। अब पूरे शहर में इमरान की मिसाल दी जाने लगी। लोग कहते देखो इस ताजिर को जो कभी गरीब था और आज काजी है। इसकी कामयाबी का राज क्या है? और जवाब मिलता वालिदैन की दुआएं, अल्लाह पर यकीन और ईमानदारी। कुछ अरसे बाद इमरान ने सोचा कि वो अपने वालिदैन से मिलने जाए। उसने राजा से इजाजत ली और एक बड़ा काफिला लेकर अपने गांव की तरफ रवाना हो गया। उसके साथ बहुत से तोहफे थे। रेशमी कपड़े, कीमती जवाहरात, नायाब खाने और गांव वालों के लिए भी बहुत सी सौगात थी। रास्ते में उसे अपने बचपन की यादें आने लगी। उसे [संगीत] वो दिन याद आया जब वो कासिम के सामने मदद मांगने गया था और उसे जलील होना पड़ा था। आज वही इमरान एक अमीर काजी बनकर वापस लौट रहा था। मगर उसके दिल में जरा सा भी गुरूर नहीं था। वो सिर्फ अल्लाह का शुक्र अदा कर रहा था। जब वो गांव पहुंचा तो उसने देखा कि उसके वालिदैन का छोटा सा घर वैसा ही है। वो दौड़ कर गया और अपने अब्बू अम्मी के कदमों में झुक गया। उन्होंने उसे दुआएं दी और गले से लगा लिया। उसकी अम्मी ज़ैनब की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। इमरान ने उन्हें बताया कि कैसे अल्लाह ने उसकी मदद की। कैसे उसने मुश्किलात का सामना किया और कैसे उसका ईमान कभी कमजोर नहीं हुआ। यह सुनकर उसके वालिद सलीम ने कहा, बेटा, हमें मालूम था कि एक दिन ऐसा जरूर होगा। मां-बाप की दुआ और अल्लाह पर भरोसा। यह दो चीजें तकदीर बदल देती हैं। गांव वालों ने इमरान का शानदार इस्तकबाल किया। जब वह कासिम की दुकान के सामने से गुजरा तो कासिम और कासिफ घबरा गए। वो दुकान के अंदर छुपने लगे। मगर इमरान मुस्कुराया और बोला, "डरो मत। मैं यहां बदला लेने नहीं आया। मैं तो सिर्फ अपने अल्लाह का शुक्र अदा करने आया हूं।" उसने कासिम के लिए भी एक तोहफा भेजा। यह देखकर कासिम को बहुत शर्मिंदगीगी हुई और उसने इमरान से माफी मांग ली। उस रात पूरा गांव रोशनियों से जगमगा रहा था। इमरान ने गांव के तमाम गरीबों को खाना खिलाया। उन्हें कपड़े दिए और उनकी मदद की। ऐसा लग रहा था जैसे उसके वालिदैन की दुआएं इंसानी शक्ल इख्तियार करके उनके सामने खड़ी हो। मगर इमरान जानता था यह उसकी मंजिल का आखिरी पड़ाव नहीं था। उसने अहद किया कि वह हमेशा नेकी की राह पर चलेगा और जो कुछ उसने सीखा है वो दूसरों को भी सिखाएगा। कुछ दिन बाद उसने अपने वालिदैन से कहा, अब्बू अम्मी मैं चाहता हूं कि आप दोनों मेरे साथ शहर चलें। मगर उसके वालिद सलीम ने मुस्कुराकर कहा, बेटा हमने इसी मिट्टी में जन्म लिया है और इसी मिट्टी में रहना चाहते हैं। हमें शहर की चमकदमक नहीं चाहिए। हमारी दुआएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं। तुम जाओ [संगीत] और लोगों की भलाई करते रहो। यही हमारी खुशी है। उसकी मां ज़ैनब ने उसके सर पर हाथ रखा और कहा, बेटा हमेशा ऐसे ही रहना। कभी गुरूर [संगीत] ना करना। हमेशा गरीबों और बेसहारा लोगों का ख्याल रखना। याद रखो अल्लाह ने तुम्हें जो दिया है वो सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं बल्कि उसके बंदों की मदद के लिए है। यह सब दरअसल अल्लाह का एक इम्तिहान था। इमरान की आंखें नम हो गई। उसने अपने वालिदैन से वादा किया कि वो उनकी हर नसीहत को हमेशा अपने दिल में बसाए रखेगा। [नाक से की जाने वाली आवाज़] गांव में रहते हुए उसने एक बड़ा फैसला किया। उसने सोचा कि यहां एक मदरसा और एक मस्जिद बनवाई जाए ताकि गरीब बच्चों को तालीम मिल सके और लोगों को इबादत की जगह भी मुयस्सर आए। चुनांचे उसने फौरन इस काम का आगाज करवा दिया। मदरसे और मस्जिद की जिम्मेदारी उसने गांव के मौलाना साहब को सौंपी और कहा इस काम में जितना भी खर्च आएगा मैं बर्दाश्त करूंगा। गांव छोड़ने से पहले इमरान कासिम के घर गया। कासिम उसे देखते ही शर्मिंदगीगी से पानीपानी हो गया। उसने हाथ जोड़कर कहा इमरान मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें और तुम्हारे वालिदैन को बहुत तकलीफ दी थी। आज मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। इमरान मुस्कुरा दिया। उसने कहा कासिम चाचा मैंने कभी दिल में कोई बुराई नहीं रखी बल्कि आप ही की बातों ने मुझे सब्र और अल्लाह पर यकीन सिखाया। आपकी वजह से मैं और मजबूत हो गया। मैं दुआ करता हूं कि अल्लाह आपको भी सीधी राह दिखाए। यह सुनकर कासिम की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने इमरान को गले लगा लिया और कहा, बेटा आज मुझे यकीन हो गया कि असल अमीर वो नहीं जिसके पास सोना चांदी हो। असल अमीर वो है जिसके दिल में अल्लाह का खौफ और इंसानियत हो। कुछ दिन बाद इमरान वापस शहर आ गया। अब वो सिर्फ एक [संगीत] काजी नहीं था बल्कि राजा का सबसे करीबी मुशीर भी बन चुका था। हर मुश्किल मामले में उसकी अक्ल, दयानत और इंसाफ पसंदी काम आती। उसने कई ऐसे कवानीन बनवाए जिनसे गरीबों और कमजोरों को इंसाफ मिलने लगा। एक दिन राजा ने उसे दरबार में बुलाया। राजा ने गहरी सांस ली और कहा इमरान अब मैं बूढ़ा हो चुका हूं। [संगीत] मेरा कोई बेटा भी नहीं है। मैं चाहता हूं कि मेरे बाद तुम इस सल्तनत को संभालो। मैं तुम्हें अपना वारिस बनाना चाहता हूं। यह सुनकर इमरान हैरान रह गया। उसने आजीजी से कहा। महाराज यह तो बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मैं तो एक परदेसी हूं। लोग क्या कहेंगे? राजा मुस्कुरा कर बोला, [संगीत] परदेसी या देसी होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। असल फर्क इंसानियत और नेकी का होता है। मैंने तुम्हें परखा है और मुझे यकीन है कि तुम एक अच्छे बादशाह बनोगे। इमरान ने फौरन सजदा किया और अल्लाह से दुआ मांगी। फिर उसने कहा, महाराज, मैं यह जिम्मेदारी कबूल करता हूं। लेकिन एक शर्त पर मैं हमेशा अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलूंगा, इंसाफ करूंगा, गरीबों की मदद करूंगा और किसी पर जुल्म नहीं होने दूंगा। राजा बहुत खुश हुआ और उसे दुआ दी। चंद महीनों बाद राजा का इंतकाल हो गया और इमरान को सल्तनत की बागडोर सौंप दी गई। पूरे शहर में खुशी की लहर दौड़ गई। लोगों को यकीन था कि इमरान एक नेक और इंसाफ पसंद साबित होगा। बादशाह बनने के बाद भी इमरान ने अपनी सादगी नहीं छोड़ी। वो आज भी जमीन पर सोता, सादा खाना खाता और फजर की नमाज के लिए खुदबेदार होता। उसके दरबार में सब बराबर थे। अमीर और गरीब हिंदू और मुसलमान सबके लिए एक ही कानून था। उसने ऐलान किया मेरी सल्तनत में कोई इंसान भूखा नहीं सोएगा और किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होगी। उसने खास दिन मुकर्रर किया जिसे दीवानआम कहा जाता था। इस दिन वह खुद बैठता और लोगों की शिकायतें सुनता। उसके इंसाफ की मिसालें दूर-दूर तक फैलने लगी। एक दिन उसे गांव से खबर मिली कि उसके वालिद सलीम की तबीयत बहुत खराब है। [संगीत] इमरान फौरन गांव के लिए रवाना हो गया। जब वो पहुंचा तो देखा कि उसके वालिद बहुत कमजोर हो चुके थे। आंखों की रोशनी तकरीबन जा [संगीत] चुकी थी। मगर चेहरे पर वही नूर था। इमरान उनके कदमों में बैठ गया और रोने लगा। सलीम ने उसके सर पर हाथ रखा और कहा बेटा रो मत। मुझे खुशी है कि मैंने तुम्हें [संगीत] इस मुकाम पर देखा। मेरी आंखें नहीं देखती मगर मेरा दिल देख रहा है कि तुम एक नेक बादशाह हो। यही मेरी कामयाबी है। इमरान ने कहा, अब्बू, यह सब आपकी दुआओं का नतीजा है। सलीम ने ज़ैनब को आवाज दी। दोनों ने इमरान के सर पर हाथ रखा और दुआ की। या अल्लाह हमारे बेटे को हमेशा नेकी की राह पर रखना। इसके जरिए हमेशा इंसाफ और रहमत फैलाना। इसी रात सलीम इस दुनिया से रुखसत हो गए। इमरान बहुत गमगीन हुआ मगर उसने सब्र किया। उसने अपने वालिद को उसी गांव में दफन किया जहां उन्होंने सारी जिंदगी गुजारी थी। उसने उनकी कब्र के पास एक छोटी सी मस्जिद भी बनवाई। अब उसकी वालिदा ज़ैनब अकेली रह गई थी। इमरान चाहता था कि वो उसके साथ शहर चलें। मगर ज़ैनब ने भी इंकार कर दिया। उन्होंने कहा बेटा मैं इसी मिट्टी में रहूंगी अपने सलीम के पास। तुम जाओ और अपनी जिम्मेदारी निभाओ। मैं तुम्हारे लिए दुआ करती रहूंगी। इमरान वापस शहर लौट आया। मगर अब उसकी जिम्मेदारियां और बढ़ गई थी। उसने अपनी वालिदा के लिए गांव में पक्का घर बनवाया। खादिम रखे और हर महीने खुद जाकर उनकी खैरियत पूछता। उसकी नेकी और इंसाफ की शोहरत बसरा से लेकर बगदाद तक फैल गई। एक दिन अबू तालिब भी उससे मिलने आए। वही शख्स जिसने उसे जिंदगी में पहला मौका दिया था। इमरान उन्हें देखकर फौरन उनके कदमों में झुक गया। उसने कहा, "आप वो इंसान हैं जिन्होंने मुझ पर यकीन किया। आपकी वजह से मैं यहां तक पहुंचा हूं।" अबू तालिब ने उसे उठाया और कहा, बेटा, मैंने सिर्फ एक मौका दिया था। [संगीत] असल कामयाबी तुम्हारी मेहनत और अल्लाह पर यकीन की है। एक दिन इमरान के दरबार में एक बूढ़ी औरत आई। उसके कपड़े फटे हुए थे और हाथ में लाठी थी। पहरेदार उसे रोकने लगे। मगर वो जोर से बोली, "मुझे बादशाह से मिलना है। [संगीत] मेरे बेटे पर झूठा इल्जाम लगाया गया है।" इमरान ने उसकी आवाज सुन ली। उसने फौरन कहा, "उसे अंदर आने दो।" बूढ़ी औरत दरबार में आई और कांपती आवाज [संगीत] में बोली, बादशाह सलामत, मैं एक गरीब बेवा हूं। मेरे बेटे पर चोरी का झूठा इल्जाम लगा दिया गया है। मुझे इंसाफ चाहिए। इमरान ने उसे एहतराम से बिठाया और पानी पिलाया। फिर उसने फौरन इस मामले की तहकीकात का हुक्म दिया। तहकीक से पता चला कि एक अमीर आदमी ने खुद ही चोरी करवाई थी और इल्जाम उस गरीब औरत के बेटे पर लगा दिया था ताकि उसकी जमीन हथियाई जा सके। इमरान ने खुद इस मुकदमे की समात शुरू की। उसने सबूत इकट्ठे किए, गवाहों से सवालात किए और फिर ऐसा फैसला सुनाने वाला था जिससे पूरी सल्तनत में इंसाफ की एक नई मिसाल कायम होने वाली थी। इमरान [संगीत] ने इंसाफ और सच्चाई को कायम रखकर एक गरीब औरत के बेटे को बचाया। औरत ने उसके कदम पकड़े और कहा, बेटा, अल्लाह तुम्हें हमेशा खुश रखे। तुमने मेरा भरोसा नहीं तोड़ा। इमरान ने उसे उठाया और मुस्कुरा कर कहा, "अम्मी, यह मेरा फर्ज है। मैं सिर्फ अल्लाह के हुक्म पर अमल कर रहा हूं।" उस रात इमरान ने सोचा, "मेरी मां भी अकेली है। शायद उसे भी कभी मदद की जरूरत हो।" उसने फैसला किया कि वह अब हर हफ्ते गांव जाया और जब भी मौका मिला अपनी मां से मिलेगा। इमरान ने अपनी रियासत में कई इस्लाहात की। एक बड़ा अस्पताल बनाया जहां गरीबों का मुफ्त इलाज होता। एक बड़ी सराय बनवाई ताकि मुसाफिर खा सकें और सो सकें। हिदायत [नाक से की जाने वाली आवाज़] दी कि कोई भी ताजिर गरीबों से ज्यादा मुनाफा ना लें। उसके इंसाफ और नेकी की वजह से रियासत में खुशहाली छा गई। लोग उसे हमजा-ए आदिल कहकर पुकारने लगे। कई साल गुजर गए। एक दिन उसे खबर मिली कि उसकी मां ज़ैनब की तबीयत बहुत खराब है। वो फौरन गांव पहुंचा। ज़ैनब बिस्तर पर थी। मगर जब उन्होंने इमरान को देखा तो उनका चेहरा खिल उठा। इमरान ने उनका हाथ पकड़ा और कहा अम्मी मैं आ गया। ज़ैनब [संगीत] ने कमजोर आवाज में कहा बेटा मुझे पता था तुम आओगे। मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी। उन्होंने अपना हाथ इमरान के सर पर रखा और कहा बेटा मुझे जाना है अपने सलीम के पास मैं तुमसे एक वादा चाहती हूं। इमरान ने आज से कहा बोले अम्मी [संगीत] मैं हर वादा पूरा करूंगा। ज़ैनब ने कहा बेटा हमेशा नेकी की राह पर चलो। कभी किसी पर जुल्म ना करो। गरीबों की मदद करना और सबसे जरूरी अल्लाह पर भरोसा रखना। यही चीज तुम्हें इस मुकाम तक ले आई। इस भरोसे को कभी ना टूटने देना। इमरान रो दिया। उसने कहा, "अम्मी, मैं वादा करता हूं मैं आप और अब्बू के सिखाए हुए रास्ते से कभी नहीं भटकूंगा।" ज़ैनब ने आखिरी बार उसे देखा, मुस्कुराई और फिर हमेशा के लिए आंखें बंद कर ली। इमरान ने मां को भी अपने वालिद सलीम के साथ दफनाया। उन्होंने उनके कब्र के पास एक बाग लगवाया और हमेशा चिराग जलाने का इंतजाम किया। शहर वापस जाकर इमरान ने अपनी मां की याद में एक बड़ा मददसा बनाया जिसका नाम रखा आमीना अल मदरसा। यहां गरीब बच्चों को मुफ्त तालीम दी जाती थी। एक और मस्जिद बनवाई जिसका नाम रखा फकीरों की मस्जिद। अब इमरान बूढ़ा हो चुका था। उसकी दाढ़ी सफेद हो गई थी। मगर चेहरे पर वही नूर और मुस्कान थी जो वालिदैन के चेहरों पर थी। उसने कभी शादी नहीं की। कहा मेरी शादी तो इस रियासत के लोगों के साथ हो चुकी है। मेरी औलाद यहां के लोग हैं। एक दिन इमरान ने अपने सबसे करीबी मुशीर उमर को बुलाया। उमर एक यतीम नौजवान था जिसे इमरान ने पाला और इंसाफ की तालीम दी थी। इमरान ने उसे कहा बेटा मैं बूढ़ा हो गया हूं। मैं चाहता हूं कि तुम मेरी जगह लो। लेकिन याद रखो लायक वही [संगीत] है जिसके दिल में अल्लाह का खौफ और लोगों से मोहब्बत हो। मैंने तुम्हें देखा है। तुम ऐसा ही हो। इमरान ने उमर को अपनी जिंदगी की हर कहानी सुनाई। कैसे वो गुर्बत [संगीत] में पलकर बड़ा हुआ। कैसे वालदैन ने उसको अल्लाह पर यकीन सिखाया। कैसे मुश्किलात का सामना [संगीत] किया और कैसे अल्लाह ने उसको कामयाबी दी। उसने कहा उमर जिंदगी में सबसे बड़ी चीज अल्लाह पर यकीन है। चाहे तूफान आए या जमीनो आसमान पलट जाए [संगीत] यकीन ना खो मां-बाप की दुआएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी। बशर्ते के तुम उन्हें याद रखो और नेकी की राह पर चलो। उमर ने इमरान के पांव छूकर कहा, हुजूर, मैं आपकी हर बात दिल में बसाऊंगा। [संगीत] चंद दिन बाद इमरान दुनिया से रुखसत हो गया। वो अपने महल में नहीं बल्कि उसी सादा कमरे में सोया था जहां से उसकी शुरुआत हुई थी। चेहरे पर वही नूर और मुस्कान थी। खबर सुनकर पूरा शहर गम में डूब गया। अमीर, गरीब, बूढ़े और जवान सब रो रहे थे। इमरान को उस कब्रिस्तान में दफन किया गया जहां उसके वालदैन थे। उसकी कब्र पर लिखा गया यहां हमजाए आदिल आराम फरमा है जिसे वालदैन की दुआओं और अल्लाह के फजलल ने बुलंद किया। उमर ने सल्तनत संभाली और इमरान के बताए हुए रास्ते पर चलता रहा। उसने भी इमरान की तरह इंसाफ किया। गरीबों की मदद की और नेकी की राह पर अमल किया। अब इमरान की कहानी सिर्फ एक दास्तान नहीं रही बल्कि एक जिंदा मिसाल बन गई। वालदैन अपने बच्चों को यही नसीहत देते। अल्लाह पर यकीन रखो, नेकी करो और अपने वालदैन की दुआओं को दिल में बसाओ। यही जिंदगी बदल देने वाला राज है। अगर आपको इमरान की कहानी पसंद आई हो तो सब्सक्राइब करें और बेल दबाएं ताकि आपको ऐसी मजीद सबक आमोज और दिल छू लेने वाली कहानियां मिलती रहे। कमेंट में बताएं [संगीत] आपकी जिंदगी में कौन सा लम्हा ऐसा था जिसने आपका हौसला बढ़ाया। [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत]
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