घनश्याम जी गुणग्राम से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी शरणागति के लिए उच्चतम कोटि की अनन्यता आवश्यक बताई जाती है। जैसे कि रसना कटो जो अन रटो निरख अन्न फुटो नैन महाराज जी किंतु मेरे जैसा अभिवेकी को अनन्यता और कट्टरता के भेद को समझना चाहते हो कट्टरता नहीं कट्टरता और अनन्यता में अनन्यता सरस है कट्टरता नीरस है जो कट्टरता की निरसता है वो क्रोध लाएगी जो अनन्यता की सरसता है वो दया लाएगी करत जे अनुसहन निंदक तिहुप अनुग्रह भगवान तुम्हारा मंगल मंगल करें। भगवान तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें। भगवान तुम्हें स्वस्थ रखे। ऐसी जो कुबुद्धि आई है भगवान कृपा करके आपकी कुबुद्धि का त्याग करवा दे। ये अनन्यता में होगी। कट्टरता में क्रोध आएगा और अनन्यता में दया आएगी। करुणा आएगी। अनन्यता और कट्टरता में बहुत अंतर है। कट्टरवादी नहीं अनन्य बनो। अपने इष्ट के अनन्य बनो। अगर आप दूसरे को देखकर, किसी वैष्णव को देखकर जलते हैं, दूसरे की निंदा करते हैं तो आप अपने धर्म के कट्टरवादी हैं। अगर आप सबका सम्मान करते हैं, निंदा करने वाले के प्रति भी प्यार करते हैं तो आप अनन्य हैं। अनन्य वही जो सब पर अपने इष्ट की भावना करके प्रसन्न रहे। हर परिस्थिति में संतुष्ट केनवा और जो प्रति शोध की भावना प्रतिक्रिया की भावना प्रतिकूलता की भावना लिए फिर वो अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर अपने को श्रेष्ठ मानकर अपनी उपासना को श्रेष्ठ मानकर वो कट्टरता है जो दूसरे का नाश सोचे दूसरे की हानि सोचे दूसरे की दुर्गति सोचे अनन्यता में ऐसा नहीं अनन्यता सरस कट्टरता नीरस कट्टरता में क्रोध अनन्यता क्षमा दुष्यंत कुमार सिंह जी प्रयागराज से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी एक दोहा आता है कि जब मैं था तब हरी नहीं अब हरि है मैं नाही महाराज जी एक आध्यात्मिक व्यक्ति के जीवन में इसका क्या मायने है और ऐसी स्थिति में जीवन ये दोहा कब और कैसे आएगा जो देहाभिमान है ये मन सहित पांच इंद्रियों को शब्द स्पर्श रूप रस गंध इनहीं में आसक्त करता रहता है। अंतःकरण में जो मैं है वह दोष युक्त है। और जो स्वाभाविक स्वरूप का मैं है वो निर्दोष ब्रह्म है। जो स्वरूप का मैं है वो भगवदाकार है। ब्रह्माकार है। लेकिन जो अंतःकरण का मैं है वो देहाभिमान युक्त है। उसी में सारे के सारे दोष रहते हैं। तो जो देहाभिमान जनित मैं है वो गुरुदेव के चरणों की उपासना से जब भगवान में समर्पित हो जाता है तो स्वयं अनुभव होता है। ज्ञानी को अनुभव होता है। गुणानु वर्तते मनुष्य पार्थ सर्वसा ये गुणों के द्वारा शरीर संचलित होकर यंतु मम माया ये चल रहा है। और जो भक्त होता है वो देखता है मेरे भगवान मेरे हृदय में बैठकर मुझसे करवा रहे हैं। अब वो करता नहीं रहता। अहंकार विमूढ़ आत्मा कर्ता वनते जब तक ये मूढ़ता बनी रहती है अहंकार की तब तक वो अपने को कर्ता और भोगता मानता है। जब तक अपने को कर्ता और भोगता मानता है तो वह हरि की उपस्थिति होने पर भी वो हरि की उपस्थिति का अनुभव नहीं कर पाता। सबके हृदय में भगवान विराजमान है। और जब ये कर्ता और भोक्ता अहंकार भगवान के चरणों में भक्ति से लीन हो जाता है या ज्ञान के द्वारा अविद्या जनित जितना भी इसका प्रभाव है वो सब नष्ट हो जाता है। तो शुद्धमय ब्रह्म स्वरूप बचता है। उस समय वो परमानंद में निमग्न अकर्ता अभोक्ता एक रस रहता है और शरीर से गुणों के अनुसार चेष्टाएं होती रहती है। तो जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं ना प्रेम गली सा तामे दो न समाए ये प्रेम या ज्ञान इसमें एक को ब्रह्म द्वितीय नास्त एक ही रहता है जो अंतःकरण का मैं है यही द्वैत फैला रहा है यही नानात्म का भ्रम पैदा कर रहा है साधना इसी मैं को शुद्ध करने की है भक्ति के द्वारा समर्पण ज्ञान के द्वारा इसका नाश मधु जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी क्या भक्ति में लगाव और प्रेम में फर्क होता है क्या? नहीं किससे लगाव होना? व्यक्ति से लगाव होना, शरीरों से लगाव होना, हां भगवान से लगाव होना ये प्रेम की प्रथम भूमिका है। अपनापन होना मेरे प्रभु ये प्रथम भूमिका है। जब मैं प्रभु से प्यार करता हूं। इसका भी स्मरण हो जाए। समय का केवल प्रभु रहे उसे प्रेम कहते हैं। ब्रह्म नहीं माया नहीं जीव नहीं काल अपनी हूं सुधि ना रही एक रहो नंदलाल एकमात्र सच्चिदानंद प्रभु के सिवा मैं प्रभु का भजन कर रहा हूं। मैं प्रभु की आराधना कर रहा हूं। इसका भी विस्मरण हो गया। केवल आराधना हो रही। वो स्थिति का नाम प्रेम है। प्राण भय कान में कान भय प्राणम में ही में ना जाने पर कान है कि प्राण है। इसे इस स्थिति का नाम प्रेम है। और जब तक मैं प्रभु की आराधना कर रहा हूं तब तक ये भक्ति की प्रथम भूमिका है। भक्ति की अंतिम भूमिका जो प्रेम है वो तभी है जब मैं का विस्मरण हो गया। अपनी सुधि ना रही एक रहो नंदलाल जैसे गोपी जन दही बेचने जाती हैं विक्रेतु कामाल गोप कन्या मुरारी पादारित वत्त द्यादिकम मोह वसाद गोविंद दामोदर माधवेती वो बोलना चाहती है दही ले ले दही लेकिन निकलता है कोई गोविंद ले ले कोई माधव ले ले कोई दामोदर ले ले क्योंकि भगवान की रति को प्राप्त हो गई है प्रेम को प्राप्त हो हो गई है। प्रेम में अपनी शुद्धि नहीं रहती। प्रेम में केवल प्रीतम रहता है। वाणी से लेकर समस्त इंद्रियां प्रीतम के ही आनंद में डूबी रहती है। श्रवणेंद्र प्रीतम की बात नितेंद्र प्रीतम का रूप रस्द प्रीतम का प्रसाद घेंद्र प्रीतम का प्रसाद रूप पुष्प तुलसी इत्र तग्द्री प्रीतम और प्रीतम के धनों के स्पर्श का सुख अन्य भौतिक सुखों का त्याग करके भागवतिक सुख में पांचों ज्ञानेंद्रियों का मन सहित पूर्ण रूप से लग जाना यही भक्ति का स्वरूप है। यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। प्रतििक्षण वर्धमानम जो प्रेम है वो प्रति क्षण नवीन नवीन भगवान का अनुभव कराता है। ऐसा नहीं लगता कल जो कथा सुनी थी आज वही है। नवम नवम क्योंकि प्रेम प्रक्षण वर्धमानम प्रेम में कोई कामना नहीं रहती। कामना रहितम सूक्ष्मतरम अनुभव स्वरूपम वो अनुभव में रहता है। बड़ा सूक्ष्म विषय प्रेम है। प्रतक्षण बढ़ता रहता है। जब अपनी भी सुधि का विस्मरण होकर केवल भगवान रह जाए उसे प्रेम कहते हैं। महामंडलेश्वर आत्मानंद गिरी जी महाराज जूना अखाड़ा से महाराज जी महाराज जी पूछ रहे हैं कि पूर्व का कर्म कब तक जीव भोगता है? महाराज जी प्रारब्ध और कर्म में भेद क्या है? संचित कर्मों से जो शुभ और अशुभ कर्म निकाल के शरीर का निर्माण किया गया उसे प्रारब्ध कहते हैं। अनेक जन्मों के किए हुए एकत्रित कर्म को संचित कर्म कहते हैं। जो इस जन्म में हमारे द्वारा कर्म बंद है उन्हें क्रमाण कहते हैं। जब तक ब्रह्म साक्षात्कार नहीं हो जाता तब तक पूर्व कृत जो संचित कर्म है वो भस्म नहीं होते और क्रमा निष्फल नहीं होते तो उसका पुनर्जन्म होता है। जब ब्रह्म बोध हो जाता है या भगवत साक्षात्कार हो जाता है तो उसके समस्त संसार के बंधन कराने वाले कटे कर्म बंधन संसारी समस्त छिन्न भिन्न संचित कर्म हो जाते हैं और जो क्रियमाण है वो अकर्ता भाव होने के कारण कर्म फल की आसक्ति ना होने के कारण वो निष्प्रभावित हो जाते हैं और प्रारब्ध को भोग लेता है खत्म कर्म परंपरा ही खत्म हो जाती उसकी कर्म परंपरा ही खत्म हो जाती है। प्रारब्ध भोगना पड़ता है। बड़े-बड़े सिद्धों को भोगना पड़ता है। जी महाराज जी राधे-धे राधेधे। एक साधारण व्यक्ति को वर्तमान में सुख दुख जब आता है तो उसे ये अनुभव कैसे हो कि ये प्रारब्ध का फल भोग रहे हैं या वर्तमान में हमारी कर्मों का फल है। वर्तमान के कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता। वर्तमान के फल का जो क्रियमाण है उसका फल तुरंत नहीं देखा जाता। जैसे वर्तमान में कोई बहुत धर्मात्मा है लेकिन पीड़ा को प्राप्त हो रहा है। और वर्तमान में कोई बहुत पापत्मा है वो बहुत सुखी देखा जा रहा है। वो वर्तमान का नहीं है। उसका पूर्व पुण्य है। वर्तमान में पाप कर रहा है। पूर्व पुण्य के प्रभाव से वह अभी सुख को भोग रहा है। लेकिन जब वर्तमान का किया हुआ कर्म आगे जाकर फल देगा तो उसका नाश हो जाएगा। धर्मात्मा पुरुष वर्तमान में धर्म से चल रहा है। लेकिन दुखी देखा जाता है। वर्तमान में उसका पाप कर्म का संयोग चल रहा है। जिस समय पाप कर्म नष्ट हुआ और वर्तमान का जो पुण्य है धर्म है और आगे जाकर के उसे महा सुख प्रदान कर देगा तो ये पूर्व प्रारब्ध का ही होता है। वर्तमान का नहीं होता। वर्तमान का केवल एक है कर्म। जो तुरंत सारे पुण्य को नष्ट करके दुख प्रदान करेगा वो है संत अपराध। साधु अवज्ञा तुरंत भवानी कर कल्याण अजीत रंजन दास जी बनवीर पुरुष राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरी श्रद्धा यह अनुभव करती है कि प्रभु सीताराम जी श्री राधेश्याम जी एवं गुरुदेव भगवान ये सभी एक ही परम चैतन्य तत्व की अभिन्न एवं अखंड दिव्य अभिव्यक्तियां हैं। महाराज जी कृपा करके उस परम एकत्व के साक्षात्कार एवं प्रभु दर्शन की प्राप्ति हेतु उपयुक्त साधन भाव एवं जीवन पथ का कृपा मा हमारे भक्ति भाव में पांच भाव है। पहला है शांत भाव जिसको आप दर्शा रहे हैं कि वही सियाराम है, वही राधेश्याम है, वही ब्रह्म है। योगी जन जिसे परमात्मा कहते हैं। ज्ञानी उसे ब्रह्म कहते हैं। भक्त उसे भगवान कहते हैं। प्रेमी उसे लाडले कहते हैं। ये शांत भाव है। सब में एक परम तत्व को देख के द्वंदातीत अवस्था को प्राप्त होना। इसमें प्रेम का प्रकाश नहीं होता है। इसमें ज्ञान का प्रकाश होता है। तत्व ज्ञान प्रधान रहता है। इसलिए भगवान की मधुर लीलाएं जब होती है तो उसको ये ज्ञान रहता है कि ये ब्रह्म परम तत्व है तो वो डूब नहीं पाता है। फिर इसके आगे जब इसको क्रॉस करे गुरु कृपा से तब दास्य भाव आता है। दास्य भाव में प्रियता बढ़ती है। यह मेरे स्वामी दास्य भाव में अनन्यता भी बढ़ती है। देखो गोस्वामी तुलसीदास जी को ज्ञान है जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जान बंधनो सबके पद कमल सदा जोर जुग पान सबको भगवत स्वरूप देख रहे हैं लेकिन जब अनन्यता की बात आती है तो कहते बने तो रघुवर ते बने और बिगड़े तो भरपूर तुलसी औरन ते बने ता बनवे पे धुर तो क्या अभी और बचा क्या कोई ये तत्व ज्ञान यहां काम नहीं करेगा यहां प्रेम काम करता है। यहां प्रेम प्रकट हो जाता है। और जब भाव बढ़ता है तो शक्य भाव आता है। भगवान हमारे दोस्त भगवान हमारे मित्र। इसमें दास्य भाव से भी ज्यादा प्रेम का प्रकाश होता है। दास्य में तो जब स्वामी आदेश करे तभी सेवा कर सकते हैं। इसमें तो मनमानी है। तुम हमारे कांधे पर चढ़ो तो हम तुम्हारे कांधे पर चढ़ेंगे। बराबर का भाव रहता है। तुम एक बोलोगे तो हम दो बोलेंगे। साथ खेलेंगे, साथ खाएंगे, साथ हसेंगे, साथ भय खत्म हो जाता है। इससे भी बढ़कर के वात्सल्य में सुख है। क्योंकि पूर्ण अपने भाव के द्वारा भगवान को स्नान कराना, दुलार कराना, खवाना, पियाना। इससे भी बढ़कर के सुख कांता भाव में है। गोपी भाव में। देखो क्या गोपियों को ज्ञान नहीं है कि ये ब्रह्म हमारे प्रीतम है। वो कह रहे नखल गोपिका नंदनो भवा नखिल देना मंत्र आत्म देख आप केवल यशोदा नंदन नहीं हो आप सबके हृदय में विराजमान परम तत्व हो लेकिन जिन गोपी जनों ने यह अनुभव किया कि सर्वत्रित देखो तित श्याममई है वही गोपी जनों की निष्ठा है कि उद्धव मन न भय द बीस एक हो तो सो गयो श्याम पे अब को आरा यह बेकार का उपदेश ब्रह्म ज्ञान का हमारे सामने क्यों कर रहे हो? अब हमारे ऊपर रंग नहीं चढ़ने वाला तो क्या उनको ब्रह्म ज्ञान नहीं है? इससे बड़ा क्या ब्रह्म ज्ञान होगा? जित देखो तित श्याम सर्वम कलम ब्रह्म ने किंच लेकिन प्रेम में एक ऐसी अनन्यता जागृत होती है जिसमें अपने प्रीतम के सिवा और किसी को देखने की इच्छा ही नहीं होती। तो क्या और कोई बचता है? नहीं। वो तत्व ज्ञान होती है। समता सब संसार में लेकिन ममता अपने इष्ट में जब इष्ट में ममता जागृत हो जाती है तो देखो हमारे हरिवंश महाप्रभु कहते हैं जिन्होंने ये उपदेश किया ये क्रूरा पापिनो नसता संभा सर्त निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धिम जो क्रूर है दुष्ट है पापी है संतो से संभाषण करने योग्य भी नहीं है वो भी साक्षात राधा वल्लभ लाल है ऐसी मेरी दृढ़ मति है वही कह रहे हैं रसना ना कटो जो अन रटो रसना कटो जो अन रटो निरख अन फटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जस किशोरी जी के सिवा और कुछ देखूं तो मेरी आंखें फूट जाए किशोरी जी के सिवा कुछ सुनू तो हमारे कान फूट जाए किशोरी जी के सिवा कुछ बोलूं तो मेरी जुबान कट जाए कैसा कैसा रसना कटो ज्वाल रटो मतलब प्रेम में जो ऐश्वर्य ज्ञान है वह दब जाता है। ऐश्वर्य ज्ञान में प्रेम दब जाता है। जब लालजू महाराज शिव प्रियाजू को एकांत में ले जाकर बेड़ी गथते हैं तो जब रसिक जन गान करते हैं तो सुन लो और सुखदेव जी गान करते हैं तो सुन लो बड़ा अंतर मिलेगा और यहां अरे यहां पदों में देखो महाधुर्य रस में छिपके हुए रसिक जन जब बेली गूंथने की लीला का वर्णन करते तो आप डूब जाओगे क्योंकि ईश्वर किंचन मात्र नहीं शुद्ध माधुर जी तो जब हम भगवान की उपासना करते हैं तो हमारी उपासना के अनुसार सिद्धि होती है। यदि हम सर्वम खलमिदम ब्रह्म की सिद्धि करना चाहेंगे तो शांत भाव में ही रहेगा। हमारी स्थिति द्वंदातीत स्थिति अखंड में लेकिन जब हम प्रेम करना चाहेंगे तो भगवान से हमारा कोई संबंध होगा। फिर हमें द्वैत से अद्वैत और अद्वैत से द्वैत ये द्वैत से अद्वैत स्थिति आती है और अद्वैत में जो स्थित हो गया वो मोक्ष को प्राप्त होता है। लेकिन भक्त फिर भावा द्वैत स्थिति लाते हैं। यह मानते हुए कि सब में मेरे प्रभु है पर अपने प्रभु के नाम रूप में अनन्यता होती है। यह मानते हुए जैसे भक्त को ज्ञान होता है। ऐसा नहीं कि उसे ज्ञान ना हो। हनुमान जी महाराज जी से एक बार वशिष्ठ जी ने पूछा कि हनुमान तुम कौन हो? तो उनका देह भाव से दास हूं। जीव भाव से मैं अंश हूं। ये अंशी है। और तत्व स्वरूप से एक जो सिंहासन में बैठे हैं वो यहां है। तो भक्त को ज्ञान होता है। ऐसा नहीं कि तत्व ज्ञान नहीं होता। पर वो ज्ञान प्रेम दबा देता है और अपने प्रेम में मस्त हुआ सुने ना काहू की कही कहे ना अपनी बात नारायण हुआ रूप में मगन रहे दिन रात वो अपने प्रीतम के प्रेम में छका रहता है तो इसके लिए गुरु की शरण में जाकर के निरंतर भगवत चिंतन करने का अभ्यास करें। पहले संसार का चिंतन छोड़े और फिर अगर तत्व बोध आत्म स्वरूप में आना है तो फिर सब चिंतन छोड़े। चिंतन शून्य हो गया तो जो बचा वही आत्म स्वरूप है और अगर प्रेम मार्ग में जाना है तो भगवान के नाम रूप लीला गुण धाम का चिंतन करते हुए आगे बढ़ता चला जाए राज बहादुर यादव जी जौनपुर से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं अहंकार से कैसे बचूं गुरु की शरण में जाओ वैद्य है बहुत बढ़िया औषधि कर देंगे बिना गुरु की शरण में गए अहंकार नष्ट नहीं हो सकता तो अगर अगर मैं का नाश करना है तो गुरुदेव की शरण में जाओ। गुरुदेव ही ऐसे सदैद्य हैं जो अहंकार रूपी फोड़े का ऑपरेशन कर सकते हैं। दूसरा कोई नहीं है। सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा संयम यह न विषय के आशा। गुरु भगवान की कृपा से ही अहंकार का नाश होता है। सृष्टि में दूसरा और कोई ऐसा नहीं जो हमारे अहंकार को रद सके। वो केवल गुरुदेव ही हैं। गुरुदेव कृपा करते हैं। ज्ञान दृष्टि प्रकट करते हैं। मलिन अहंकार नष्ट हो जाता है। गुरुदेव कृपा करते हैं। आज्ञा उपदेश डांट फटकार के द्वारा हमें बिल्कुल ठीक कर लेते हैं। जैसे कुम्हार अपनी मटकी को अंदर हाथ लगाकर ऊपर ठोकता रहता है। ऐसे गुरुदेव हमको ठोक बजा के अपने लायक बना लेते हैं। तो प्रथम हम गुरुदेव का वरण करें। द्वितीय उनकी आज्ञा का पालन करें। तृतीय शास्त्र और संतों का संग करें तो फिर हमें चाहे हम ब्रह्म बोध की तरफ बढ़े या भगवत प्रेम की तरफ बढ़े दोनों में बाधक जो अभिमान है उसका त्याग हो जाता है। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी इस मन ने मेरा जीना हराम कर रखा है महाराज जी मुझे बचा लो। यह हर समय गंदी चेष्टाएं, गंदी क्रियाएं, गंदा चिंतन इसी में रहता है। महाराज जी मैं ठीक होना चाहता हूं। यार यह आपका ही केवल नहीं पूरे विश्व का प्रश्न है। सबका प्रश्न है। किसी एक का प्रश्न नहीं है। यह जब जो चाहता है वो करवा लेता है। बड़ा बलवान है। क्यों बलवान है? क्योंकि बहुत बड़े से इसको बल मिला है। और बल क्या मिला है? ये स्वयं वही है। इंद्रिय नाम मनस इंद्रियों में मैं मन हूं। भगवान कह रहे हे बिना भगवान की शरण गए और बिना भगवान का भजन किए मन को नहीं संभाला जा सकता। मन में गलत चेष्टाओं के करने का उत्साह रहता है। गलत बातों के देखने का, गलत क्रिया करने का उत्साह रहता है और भगवान की तरफ निरोत्साहित रहता है। इसका स्वभाव है पतन। स्वाभाविक छोड़ दो तो पतन कर देगा। अगर उन्नति करनी है तो नाम और मंत्र इन दो के द्वारा उन्नति होती है। जैसे जल का स्वभाव है छोड़ दो तो नीचे की तरफ ही जाएगा। ऊपर की तरफ नहीं जाएगा। ऐसे मन का स्वभाव छोड़ दो तो नीचे की तरफ ही जाएगा। जैसे जल को ऊपर चढ़ाना है तो यंत्र की आवश्यकता है। मशीन ऐसे ही मन को यदि उर्धगामी बनाना है परमात्मा में लगाना है। इसको पवित्र करना है तो नाम जप करो। मंत्र की आवश्यकता है। गुरु मंत्र जपो नाम जप करो। मन लगे चाहे ना जपे नाम जपत मंगल दसहु चिंता मत करो। अगर ये तुमसे कुछ गलत भी करा देता है तो नाम भगवान तुम्हारी गलती को भी सुधारेंगे। तुम्हारे पाप को भी भस्म करेंगे और आगे गलती ना हो पाए ऐसी सामर्थ्य भी देंगे। इसलिए खूब नाम जप करो। नाम के बिना मन को नहीं संभाला जा सकता। नाम पाहू दिवस रात्र दिन अगर कोई पहरा दे सकता है हमारी रक्षा का तो नाम है जितना नाम जप करोगे नाम बहुत बढ़िया पहरेदार हो आपको काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर से बचा लेगा नाम जप के बिना आप कुछ भी उपाय कर लो मन को नहीं रोका जा सकता नाम जप ही एक है जो मन को रोक सकता है ये प्रतिपल मन के ऊपर डंडे सा लगता है इसीलिए सब काम में मन लगेगा नाम जप में नहीं लगेगा और नाम जप में लग गया तो फिर मन ठीक हो जाएगा पवित्र हो जाएगा निर्मल हो जाएगा और नाम जप में तभी लगेगा जब सत्संग करोगे भजन ना हो संग बिन भजन बिना नहीं प्रेम चिनहु भजन न छािए धरिए या ध्रु नेम बिना भजनंदी संतो के दर्शन संभाषण और सेवा के भजन में मन नहीं लगता और बिना भजन में मन लगे प्रेम नहीं होता और बिना प्रेम के भगवत साक्षात्कार नहीं होता इसलिए मूल में नाम है प्रेम मूल यह नाम है प्रेमी रसिक जपत यह नाम प्रेम मगन निज बन विश्राम श्री हरिवंश जहां काम मगन मन को ठीक करके प्रेम मगन करना है तो नाम जप करो जितना नाम जप करोगे उतना ही मन पवित्र होता चला जाएगा श्री राधा वल्लभ लाल की जय
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