Ek Din ka Badshah aur Uska Insaaf | Urdu moral story | Emotional Islamic Moral Story#IslamicVideo

Anmol Qisse Kahani1,581 words

Full Transcript

बहुत पुराने जमाने की बात है जब दुनिया में बादशाहों की हुकूमत हुआ करती थी और लोग सादा मगर पुरमन जिंदगी गुजारा करते थे। एक बड़ी और खुशहाल सल्तनत थी जिसका नाम नूरिस्तान था। इस सल्तनत का बादशाह बादशाह सिकंदर शाह था। बादशाह सिकंदर शाह एक ताकतवर मगर बहुत इंसाफ [संगीत] पसंद हुक्मरान था। वह हमेशा अपनी रिया के हालात जानने की कोशिश करता था। मगर वक्त के साथ-साथ दरबार के वजीर और अमीर लोग बादशाह के गर्द इस तरह जमा हो गए थे कि आम लोगों की आवाज बादशाह तक पहुंचना मुश्किल हो गया था। शहर के बाजारों में लोग आहिस्ता-आहिस्ता शिकायत करने लगे थे कि कुछ अमीर लोग गरीबों पर जुल्म कर रहे हैं। मगर उनकी कोई सुनने वाला नहीं। इसी शहर के एक गरीब मोहल्ले में एक नौजवान रहता था जिसका नाम हमीद था। हमीद एक गरीब मगर ईमानदार नौजवान था। वह बाजार में एक छोटी सी दुकान पर मजदूरी करता था। सारा दिन मेहनत करता और शाम को थोड़े से पैसे लेकर अपनी बूढ़ी मां के पास घर लौट आता था। हमीद की मां अक्सर इससे कहा करती थी। बेटा दुनिया में सबसे बड़ी ताकत इंसाफ है। अगर इंसान इंसाफ करे तो अल्लाह उसकी मदद जरूर करता है। हमीद अपनी मां की बातें दिल में बिठा लेता था। एक दिन शहर के बाजार में एक अजीब वाकया पेश आया। बाजार में एक अमीर ताजिर मालिक कासिम आया। वह शहर का बहुत ताकतवर आदमी था। उसके पास बेशुमार दौलत थी और दरबार के कई वजीर भी उसके दोस्त थे। उस दिन एक गरीब किसान अपनी गंदुम बेचने बाजार आया। वह सारा साल मेहनत करके यह गंदुम उगाता था ताकि अपने बच्चों का पेट पाल सके। किसान ने गंदुम के थैले ताजिर के सामने रखे। ताजिर ने गंदुम को देखा और बोला यह गंदुम खराब है। इसकी कीमत बहुत कम मिलेगी। गरीब किसान परेशान हो गया। उसने कहा हुजूर मैंने सारा साल मेहनत की है। यह गंदुम बहुत अच्छी है। बराह करम इसकी मुनासिब कीमत दे दें। मगर ताजिर हंसने लगा। उसने कहा अगर तुम्हें कीमत पसंद नहीं तो कहीं और जाकर बेच दो। मगर बाजार के बाकी ताजिरों को ताजिर कासिम से डर लगता था। किसी ने भी किसान की गंदुम खरीदने की हिम्मत ना की। हमीद यह सब कुछ देख रहा था। उसका दिल गरीब किसान के लिए दुख से भर गया। हमीद आगे बढ़ा और बोला, मालिक साहब, किसी गरीब के साथ ऐसा जुल्म करना मुनासिब नहीं। यह सुनकर ताजिर कासिम का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो गया। वह जोर से बोला, "तुम कौन होते हो?" मुझे नसीहत करने वाले एक मामूली मजदूर। फिर उसने अपने नौकरों को हुक्म दिया। इस लड़के को यहां से निकाल दो। हमीद को धक्के देकर बाजार से बाहर निकाल दिया गया। मगर यह वाकया वहां मौजूद कई लोगों ने देखा। इसी वक्त शहर में एक अजीब खबर फैल गई। बादशाह सिकंदर शाह ने ऐलान करवाया था कि कल के दिन सल्तनत में एक अनोखा तजुर्बा किया जाएगा। ऐलान यह था कि कल के दिन एक आम आदमी को एक दिन के लिए बादशाह बनाया जाएगा ताकि वह सल्तनत का हाल देख सके और इंसाफ कायम करें। यह सुनकर पूरा शहर हैरान रह गया। हर कोई सोचने लगा कि आखिर वह खुशनसीब कौन होगा। अगले दिन दरबार में कुरा अंदाजी हुई। सल्तनत के कई आम लोगों के नाम लिखे गए और एक नाम निकाला गया। जब वजीर ने वह पर्ची खोली तो वह खुद भी हैरान रह गया क्योंकि उस पर नाम लिखा था हमीद वही गरीब नौजवान जिसे कल बाजार से धक्के देकर निकाल दिया गया था। सिपाही फौरन उसे ढूंढने निकल पड़े। जब वह हमीद के छोटे से घर पहुंचे तो हमीद अपनी मां के साथ बैठा रोटी खा रहा था। सिपाहियों को देखकर वह घबरा गया। उसने सोचा शायद ताजिर कासिम ने उसकी शिकायत कर दी है। मगर सिपाही एहतराम से बोले हमीद तुम्हें फौरन महल चलना होगा। हमीद हैरान रह गया। जब वह महल पहुंचा तो वजीर ने ऐलान किया आज के दिन तुम इस सल्तनत के बादशाह हो। यह सुनकर हमीद की आंखें हैरत से फैल गई। उसे शाही लिबास पहनाया गया और तख्त पर बिठा दिया गया। मगर हमीद के दिल में एक ही बात गूंज रही थी। उसे अपनी मां की बात याद आ रही थी। बेटा इंसाफ सबसे बड़ी ताकत है। हमीद ने दिल में अहद किया कि अगर अल्लाह ने उसे एक दिन का बादशाह बनाया है तो वह उस दिन में ऐसा इंसाफ करेगा जिसे लोग हमेशा याद रखेंगे। मगर उसे यह नहीं मालूम था कि इसी दरबार में एक ऐसा मुकदमा आने वाला है जो उसकी अक्ल, हिम्मत और इंसाफ सबका इम्तिहान लेगा और वह मुकदमा था। इसी जालिम ताजिर कासिम का जब दरबार लगा तो सिपाहियों ने ताजिर कासिम और उस गरीब किसान को दरबार में पेश किया। दरबार में बड़े-बड़े वजीर, अमीर और दरबारी बैठे हुए थे। सबके चेहरों पर हैरत थी क्योंकि आज तख्त पर एक आम नौजवान बैठा था। हमीद ने संजीदा लहजे में कहा मुकदमा पेश किया जाए। वजीर ने आगे बढ़कर कहा बादशाह सलामत यह गरीब किसान शिकायत लेकर आया है कि ताजिर कासिम ने उसकी गंदुम सस्ती कीमत पर खरीदने की कोशिश की और बाजार के बाकी ताजिरों को भी डरा दिया कि कोई उसकी गंदुम ना खरीदे। हमीद ने किसान की तरफ देखा। तुम अपनी बात बताओ। गरीब किसान ने कांपती हुई आवाज में कहा, बादशाह सलामत मैं गरीब आदमी हूं। सारा साल मेहनत करके यह गंदुम उगाई है। अगर मुझे उसकी मुनासिब कीमत ना मिली तो मेरे बच्चे भूखे रह जाएंगे। फिर हमीद ने ताजिर कासिम की तरफ देखा। ताज़िर कासिम गुरूर से बोला, बादशाह सलामत। बाजार में हर ताजिर को हक है कि वह अपनी मर्जी की कीमत लगाए। अगर मुझे गंदुम पसंद नहीं तो मैं कम कीमत ही दूंगा। दरबार में बैठे कई वजीर ताज़िर कासिम के दोस्त थे। इसलिए वह भी सर हिलाकर उसकी बात की ताईद करने लगे। मगर हमीद खामोशी से सबको देखता रहा। फिर उसने कहा, गंदुम के थैले दरबार में लाए जाए। सिपाही फौरन गंदुम के थैले ले आए। हमीद तख्त से उठा और खुद गंदुम को देखने लगा। उसने मुट्ठी में गंदुम लेकर गौर से देखी। गंदुम साफ और उम्दा थी। हमीद समझ गया कि ताजिर झूठ बोल रहा है। मगर वह सिर्फ बातों पर फैसला नहीं करना चाहता था। हमीद ने दरबार में ऐलान किया शहर के तीन दयांतदार ताजिरों को फौरन दरबार में बुलाया जाए। कुछ देर बाद तीन मौतबर ताज़िर दरबार में हाजिर हो गए। हमीद ने उनसे कहा इस गंदुम को देखकर बताओ कि उसकी असल कीमत क्या होनी चाहिए। तीनों ताजिरों ने गंदुम देखी और एक दूसरे की तरफ देखकर बोले बादशाह सलामत यह बहुत आला दर्जे की गंदुम है। उसकी कीमत तो बाजार में बहुत ज्यादा मिलनी चाहिए। दरबार में खामोशी छा गई। अब सबको समझ आ गया कि ताज़िर कासिम झूठ बोल रहा था। हमीद ने सख्त लहजे में कहा ताजिर कासिम तुमने ना सिर्फ एक गरीब के साथ जुल्म किया बल्कि बाजार के दूसरे ताजिरों को भी डराया यह इंसाफ के खिलाफ है ताजिर कासिम घबरा गया मगर वह फिर भी बोला बादशाह सलामत मैं तो सिर्फ कारोबार कर रहा था हमीद ने कहा कारोबार और जुल्म में फर्क होता है फिर उसने फैसला सुनाया पहला हुक्म यह है कि ताजिर कासिम इस गंदुम की असल कीमत से दोगुनी कीमत अदा करेगा। दरबार में सरगोशियां होने लगी। हमीद ने मजीद कहा और दूसरा हुक्म यह है कि आइंदा अगर उसने किसी गरीब के साथ जुल्म किया तो उसकी सारी दौलत जब्त कर ली जाएगी। यह सुनकर ताजिर कासिम के चेहरे का रंग उड़ गया। गरीब किसान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। वह बार-बार कहने लगा बादशाह सलामत। अल्लाह आपको खुश रखे। मगर हमीद ने कहा मुझे नहीं अल्लाह का शुक्र अदा करो। उस दिन हमीद ने सिर्फ यही एक मुकदमा नहीं सुना। पूरे दिन दरबार में कई लोग अपनी शिकायतें लेकर आए। किसी ने कहा कि उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया गया है। किसी ने कहा कि एक अमीर आदमी उसका हक छीन रहा है। हमीद हर मुकदमा बड़े गौर से सुनता और इंसाफ के साथ फैसला करता। शाम तक पूरे शहर में एक ही बात फैल गई। आज एक दिन के बादशाह ने ऐसा इंसाफ किया है जो कई सालों में नहीं हुआ। जब सूरज गुरूब होने लगा तो बादशाह सिकंदर शाह दोबारा दरबार में आए। हमीद तख्त से नीचे उतर गया। बादशाह ने मुस्कुरा कर पूछा हमीद आज तुमने क्या सीखा? हमीद ने अदब से जवाब दिया। बादशाह सलामत। मैंने सीखा कि तख्त पर बैठना आसान है मगर इंसाफ करना बहुत मुश्किल है। बादशाह उसकी बात सुनकर बहुत मुतासिर हुए। उन्होंने ऐलान किया आज से हमीद को दरबार का मुशीर बनाया जाता है ताकि वह हमेशा हमें इंसाफ की याद दिलाता रहे। पूरा दरबार हैरान रह गया। एक गरीब मजदूर अब बादशाह का मुशीर बन चुका था। हमीद ने आजजी से कहा बादशाह सलामत मैं तो एक मामूली आदमी हूं। बादशाह मुस्कुरा कर बोले नहीं हमीद जो इंसाफ करना जानता है वह मामूली नहीं होता। उस दिन के बाद हमीद हमेशा बादशाह को सच और इंसाफ का मशवरा देता रहा और पूरे शहर में यह बात मशहूर हो गई। एक दिन का बादशाह आया था। मगर उसका इंसाफ हमेशा के लिए मिसाल बन गया। प्यारे दोस्तों, इस कहानी से हमें यह सबक मिलता है कि इंसाफ करने के लिए ताकत नहीं बल्कि सच्चा दिल और साफ नियत चाहिए। अगर आपको यह [संगीत] कहानी पसंद आई हो तो कमेंट में जरूर बताएं और ऐसी मजीद खूबसूरत और सबक आमोज कहानियां सुनने के लिए हमारे चैनल अनमोल खियासखानी को जरूर सब्सक्राइब

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