Underground Vs Overhead Transmission: Why Cables Are More Challenging?

LifeAda2,226 words

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11 लाख वोल्टेज तक की ओवरहेड एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन आज के टाइम में ऑपरेट कर रही है। लेकिन जब बात आती है अंडरग्राउंड ट्रांसमिशन की तो 11,000 वोल्ट से ही इंजीनियर्स के सामने चैलेंज आना स्टार्ट हो जाते हैं। लेकिन फिर भी जापान में आज के टाइम में 500 केवी की लाइन केबल के थ्रू ट्रांसमिट हो रही है। जैसे यह ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन स्विच यारार्ड में एंटर कर रही है। सेम ही तरीके से यहां पर हाई वोल्टेज केबल से लाइन एंटर कर रही है। लेकिन यदि आप नोटिस करोगे तो ओवरहेड लाइन में जो कंडक्टर लगे हुए हैं उनको अभी तक इंसुलेशन एयर की वजह से मिल रहा था। इसलिए डायरेक्ट लाइन स्विच यारार्ड के इस गेंट्री टावर पर आती है और यहां पर आकर टर्मिनेट हो जाती है। यहां से स्विचयार्ड में एंटर करती है और स्विच यारार्ड से अलग-अलग फीडर निकाले जाते हैं। लेकिन यहां पर दो डिवाइसेस को नोटिस करना। सबसे पहले लाइटिंग अरेस्टर लगा रहता है जो लाइन में और वोल्टेज स्पाइक्स को ग्राउंड करता है और साथ में लाइटिंग स्ट्राइक से भी बचाता है। इसके आगे सीवीटी लगा रहता है जो हाई वोल्टेज को मेजर करता है। अब सेम ही तरीके से लाइन केबल से आ रही है लेकिन केबल में अभी तक कंडक्टर को इंसुलेशन एक क्लोज्ड सरफेस में मिल रहा था और जैसे ही लाइन स्विचर्ड पर पहुंचती है तो अब कंडक्टर ओपन में आ जाता है। यानी अब उसके पास में एयर इंसुलेशन है। तो यहां पर इंसुलेशन का मीडियम चेंज हो रहा है और यही केबल टर्मिनेशन का एक बड़ा चैलेंज बनता है। दोस्तों लाइफ में चैलेंज तो तब भी आता है जब हमारे पास में कोई स्किल्स ना हो। सिर्फ हम डिपेंड हो किसी दूसरे पर किसी जॉब या काम के लिए। लेकिन एनिमेशन की स्किल से आप पार्ट टाइम अपनी 3D स्किल्स को इंप्रूव कर सकते हो। और यह कोई नॉर्मल स्किल नहीं है। इसमें जबरदस्त पोटेंशियल है। और इस स्किल को बहुत ही बेहतर तरीके से सीखने के लिए हमारा एडवांस 3D एनिमेशन कोर्स आपकी पूरी हेल्प करेगा। हमारी तरफ से प्रॉपर सपोर्ट रहेगा। प्राइवेट कम्युनिटी सपोर्ट मिलेगा। डिस्क्रिप्शन में डिटेल्स अवेलेबल है। जरूर से चेक आउट कीजिएगा। जब हम केबल के कंडक्टर को कट करते हैं तो इसकी जो शार्प कटिंग एजेज है वहां पर जबरदस्त इलेक्ट्रिक फील्ड कंसंट्रेट होने लगता है। और यदि इस फील्ड को हमने मैनेज नहीं किया तो केबल के अराउंड जो इंसुलेशन है वह डैमेज होने लगता है। जिसकी वजह से कंडक्टर ग्राउंड के कांटेक्ट में आ जाएगा और एक मेजर फौल्ट हो जाएगा। इसको थोड़ा डिटेल से समझते हैं। केबल की डिजाइन के साथ में केबल की कोर में इसका कंडक्टर होता है जो स्मॉल थिन कंडक्टर से बना होता है। अब यहां पर छोटे-छोटे थिन कंडक्टर इसलिए यूज़ नहीं होते कि केबल को हम फ्लेक्सिबल बना सकें। उसके पीछे रीजन है करंट का बिहेवियर। यदि हम एक सॉलिड रोड जैसा कंडक्टर बनाएं तो करंट हमेशा कंडक्टर के आउटर सरफेस पर ही फ्लो करता है। और फ्रीक्वेंसी जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे करंट और ज्यादा आउटर सरफेस में फ्लो होने लगेगा। तो हाई फ्रीक्वेंसी पर कंडक्टर का लगभग एरिया अनयूज्ड रह जाता है। इस प्रॉब्लम को स्किन इफेक्ट बोलते हैं। तो यूनिफॉर्म करंट को फ्लो करवाने के लिए पूरे कंडक्टर को छोटे-छोटे स्ट्रैंड्स में बदल दिया जाता है। स्किन इफेक्ट की प्रॉब्लम को और बेटर तरीके से सॉल्व करने के लिए हाई वोल्टेज केबल्स में कंडक्टर दो डिजाइन में यूज किए जा सकते हैं। एक यह जिसको राउंड स्टैंडर्ड कंडक्टर बोलते हैं और दूसरा मिल्किन कंडक्टर। यह कंडक्टर एलुमिनियम और कॉपर दोनों के हो सकते हैं। अब इस कंडक्टर में जब हाई वोल्टेज फ्लो करता है तो इसके अराउंड इलेक्ट्रिक फील्ड जनरेट होता है और यह इलेक्ट्रिक फील्ड अनइवन भी हो सकता है। फॉर एग्जांपल यदि हम एक कंडक्टर स्टैंड को देखें तो इसके चारों तरफ इलेक्ट्रिक फील्ड एकदम यूनिफॉर्म है। लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में इस छोटे से डिफेक्ट की वजह से यहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड कंसंट्रेट हो जाता है। जो एक बड़ी प्रॉब्लम क्रिएट करता है। जिसको अभी हम आगे समझेंगे। लेकिन इस फील्ड को यूनिफॉर्म बनाने के लिए कंडक्टर स्क्रीन कंडक्टर के अराउंड सेट की जाती है जो एक सेमीकंडक्टर होता है जो इलेक्ट्रिक फील्ड को यूनिफॉर्म बना देता है। आपको एक इंटरेस्टिंग फैक्ट बताता हूं। कंडक्टर से कितना वोल्टेज फ्लो करेगा यह कंडक्टर डिसाइड नहीं करता है। इसके अराउंड जो इंसुलेशन होता है, वह डिसाइड करता है। ओवरहेड लाइन में जैसे-जैसे वोल्टेज बढ़ता है, वैसे-वैसे उसको ग्राउंड से हाइट पर लेकर जाते हैं ताकि एयर ग्राउंड और कंडक्टर के बीच में अच्छे से एक इंसुलेटर का काम कर सके। सेम ही तरीके से केबल के अंदर एक्स एलपीई इंसुलेटर कंडक्टर स्क्रीन के ऊपर किया जाता है। 400 केB केबल में अराउंड 26 एमm थिकनेस का इंसुलेशन होता है। अब यदि हम कंडक्टर स्क्रीन को रिमूव कर दें तो फिर से हमारा इलेक्ट्रिक फील्ड नॉन यूनिफॉर्म हो जाएगा और यह नॉन यूनिफॉर्म फील्ड लॉन्ग टाइम में अपने कंस्ट्रक्शन की वजह से इंसुलेशन को डैमेज कर देगा और इंसुलेशन हटते ही केबल में फौल्ट आ जाएगा। लेकिन यह इलेक्ट्रिक फील्ड इस इंसुलेशन को क्रॉस कर जाता है और उसको टर्मिनेट करना बहुत जरूरी है। तो इसके लिए एक इंसुलेशन स्क्रीन और एक्सl पीई इंसुलेशन के अराउंड सेट की जाती है जो इस इलेक्ट्रिक फील्ड को स्मूथली एंड करने का काम करती है। इंसुलेशन स्क्रीन के अराउंड मैटेलिक स्क्रीन सेट किया जाता है। तो फाइनली जो कुछ भी इंसुलेशन स्क्रीन में इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से वोल्टेज इंड्यूस होता है उसको पाथ प्रोवाइड करवाता है। मैटेलिक स्क्रीन को मैटेलिक सेथ भी बोला जाता है और इसके अलावा इसको आर्मड भी बोलते हैं। फाइनली पीवीसी प्रोटेक्टिव सेथ की लेयर सेट की जाती है जो एक्सटर्नल फिजिकल प्रोटेक्शन प्रोवाइड करवाती है। जब भी केबल सबस्टेशन पर पहुंचती है तो इस मैटेलिक स्क्रीन को ग्राउंड कर दिया जाता है। तो इलेक्ट्रिक फील्ड या कोई भी फौल्ट केबल में होता है तो उस हाई वोल्टेज को यह ग्राउंड कर देगी। जब इन केबल में हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन किया जाता है तो इंजीनियरिंग लेवल पर इनमें बड़े चैलेंज आते हैं। यदि हम ओवरहेड लाइन में एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज लाइन की बात करें जैसे 765 केवी की लाइन तो इन लाइन में आप नोटिस करोगे आपको हमिंग नॉइज़ सुनाई देती है ग्राउंड पर। एक्चुअल में ट्रांसमिशन लाइन का कंडक्टर अपने पास में एक इलेक्ट्रिक फील्ड जनरेट करता है। अब कंडक्टर के आसपास में एयर होती है और जनरली हम एयर को एक इंसुलेटर मानते हैं जिससे करंट फ्लो नहीं होता। लेकिन हाई वोल्टेज के फील्ड की वजह से एयर पार्टिकल चार्ज होने लगते हैं। जिसकी वजह से हमिंग नॉइस आती है। यदि आप कंडक्टर से 1 फीट की दूरी पर हो तो भी आपको जबरदस्त इलेक्ट्रिक शॉक लग सकता है इस फील्ड की वजह से और जैसे-जैसे हम कंडक्टर से ग्राउंड पर आते जाएंगे वैसे-वैसे यह इलेक्ट्रिक फील्ड रिड्यूस होता जाएगा। लेकिन फिर भी कुछ वोल्टेज जमीन पर जरूर पहुंचेगा। अब यदि आप ध्यान से देखोगे तो ट्रांसमिशन लाइन और ग्राउंड के बीच में एयर चार्ज हो गई है इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से। तो लाइन का कंडक्टर पॉजिटिव की तरह और ग्राउंड नेगेटिव की तरह काम करेगा। यदि हम थोड़ा ध्यान से नोटिस करें तो यहां हमें एक चार्ज कैपेसिटर दिखाई दे रहा है और यह चार्ज कैपेसिटर कैपेसिटिव इंटरफेरेंस को बढ़ा देता है। जिसकी वजह से रिसीविंग एंड पर जितना वोल्टेज हमने सेंड किया था उससे ज्यादा रिसीव होगा। वो ज्यादा मिल रहा है तो अच्छी बात है। लेकिन एक बार थोड़ा केबल को देखते हैं। केबल में कंडक्टर और मैटेलिक स्क्रीन के बीच में एक्स एलपीई इंसुलेटर का काम करता है। सेम जिस तरीके से ओवरहेड लाइन में एयर इंसुलेटर का काम कर रही थी। लेकिन केबल में इन दोनों के बीच में गैप बहुत कम है। तो कंडक्टर पॉजिटिव और मैटेलिक स्क्रीन नेगेटिव का काम करती है और यहां पे लगा इंसुलेशन एक डइलेक्टिक मीडियम का काम करता है। तो फिर से यहां पर कैपेसिटिव इंटरफेरेंस आ गया। अब यदि हम इन दोनों केस को कंपेयर करें तो केबल के अंदर कैपेसिटिव इंटरफेरेंस बहुत हाई होगा क्योंकि एयर और ग्राउंड में इतनी दूरी है। फिर भी यहां पर कैपेसिटिव इंटरफेरेंस आ रहा है। तो केबल में तो कंडक्टर और मैटेलिक स्क्रीन में सिर्फ कुछ ही एमएम की दूरी है और यह कैपेसिटिव इंटरफेरेंस केबल को सीवियरली इफेक्ट करता है। इसके रिसीविंग एंड के वोल्टेज को काफी ज्यादा बढ़ा देता है। जिसकी वजह से केबल का टेंपरेचर बढ़ता है तो फिर इसकी प्रॉपर कूलिंग भी जरूरी है। यदि केबल नो लोड कंडीशन पर है तो कैपेसिटिव इंटरफेरेंस और भी जबरदस्त होगा। लेकिन हमने केबल के इंसुलेशन की डिज़ाइन एक स्पेसिफिक वोल्टेज रेंज पर करी है तो फिर वोल्टेज बढ़ाने के केस में इंसुलेशन डैमेज हो जाएगा और फौल्ट होने के हाई चांस रहेंगे। जो एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन होती है, जब वह हजारों किलोमीटर तक जाती है, तब उसमें कैपेसिटिव इंटरफेरेंस आता है। जिसको कंट्रोल करने के लिए लाइन में हम एक सन रिएक्टर लगाते हैं, जो लाइन के पैरेलल में लगा रहता है और यह इस कैपेसिटिव इंटरफेरेंस को कंट्रोल करता है। जनरली सन रिएक्टर स्विचयार्ड में लगा रहता है, लेकिन यह डायरेक्ट लाइन के पैरेलल में ही होता है। केबल के केस में हमें 30 से 40 कि.मी. की दूरी पर ही कैपेसिटिव इंटरफेरेंस इतना हाई हो जाएगा कि हमें सन रिएक्टर लगाना ही पड़ता है। अब यह बात हो गई ट्रांसमिशन की। लेकिन केबल को स्विच यारार्ड पर टर्मिनेट करना भी एक बहुत बड़ा चैलेंज है। अभी हमने बात की थी कि केबल की यह जो शार्प एजेज होती है इन पर हैवी इलेक्ट्रिक फील्ड की वजह से इंसुलेशन डैमेज हो सकता है। तो फिर एक्सएलपी इंसुलेशन पर स्ट्रेस कोन लगाया जाता है जो सिलिकॉन रबर का होता है। लेकिन स्ट्रेस कोन एकदम परफेक्टली एक्सएलपी इंसुलेशन पर सेट होना चाहिए। यदि इन दोनों के बीच में सिंगल एयर पार्टिकल या डस्ट रह गई तो फिर से यहां पर इलेक्ट्रिक फील्ड नॉन यूनिफॉर्म हो जाएगा जो एक बड़ी प्रॉब्लम का कारण बनता है। अब यहां पर जो फील्ड लाइंस है स्ट्रेस कोन के इस पॉइंट पर जहां पर कोन इंसुलेशन को टच करता है वहां पर लगभग 100% होगी और जैसे-जैसे हम दूर जाते जाएंगे वैसे-वैसे फील्ड लाइन रिड्यूस होती जाएगी। तो एक तरीके से कोई भी इंसुलेशन जो होता है वह वोल्टेज ग्रेडियंट बनाते हुए धीरे-धीरे इस फील्ड को कंट्रोल करता है। यहां पर मैटेलिक से को सक्सेसफुली ग्राउंड करके फाइनली कंडक्टर स्क्रीन को रिमूव करके कंडक्टर को कनेक्टर में कनेक्ट किया जाता है। अब फाइनली स्ट्रेस कोन और कंडक्टर असेंबली के ऊपर एक्सटर्नल इंसुलेटर हाउसिंग को सेट किया जाता है। इंसुलेटर के अराउंड कोरोना रिंग होती है। अब देखा जाए तो इस टर्मिनल का भी यहां पर एंड हो रहा है और इसकी भी कुछ एजेज है। तो यहां पर भी फील्ड कंसंट्रेशन होता है जिसकी वजह से रात के टाइम में आप नोटिस करोगे हल्के स्पार्क जनरेट होते हैं जिसको कोरोना डिस्चार्ज बोला जाता है। तो कोरोना रिंग इस इलेक्ट्रिक फील्ड को अपने अंदर रिस्ट्रीब्यूट करके इस इलेक्ट्रिक फील्ड को खत्म करती है। अब यहां से लाइन कनेक्ट होती है स्विच यारार्ड के इक्विपमेंट में। लेकिन आप नोटिस करोगे ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन में हमने एक इक्विपमेंट लगाया था लाइटिंग अरेस्टर जो लाइटिंग स्ट्राइक को ग्राउंड करने का काम करता है। लेकिन केबल ट्रांसमिशन में तो ऐसी कोई प्रॉब्लम ही नहीं है। फिर भी यहां पर एलए केबल के अंदर सर्च आते हैं उनको ग्राउंड करने का काम करता है। बाकी आगे की डिवाइसेस सभी सेम रहते हैं। जनरली केबल ट्रांसमिशन में वेव ट्रैप कम ही यूज करते हैं। क्योंकि हमने इस ट्रांसमिशन लाइन वाले वीडियो में बात की थी कि हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन पावर के साथ में कुछ लिमिट तक डाटा भी ट्रांसफर करती है और डाटा ट्रांसमिशन के लिए हमें हाई फ्रीक्वेंसी की नीड होती है और जैसे-जैसे फ्रीक्वेंसी बढ़ेगी वैसे-वैसे स्किन इफेक्ट भी बढ़ेगा। तो हाई वोल्टेज के केस में केबल से डाटा कम ही ट्रांसफर करते हैं। इसके लिए सेपरेट मीडियम यूज किया जाता है। अंडरग्राउंड ट्रांसमिशन में केबल्स को राउट करना भी बहुत बड़ा चैलेंज होता है। कहीं पर ऐसे बड़े-बड़े ट्रेंच बनाए जाते हैं। पर हम ऐसे शार्प टर्न नहीं दे सकते केबल को। अदरवाइज फिर से केबल के इंसुलेशन पर स्ट्रेस आएगा। तो इनको भी प्रॉपर्ली टर्निंग आर्क के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। कहीं पर केबल्स को इन पाइप हाउसिंग में डालकर भी ट्रांसमिट किया जाता है। थ्री फेज ट्रांसमिशन में हर फेज के लिए एक केबल कंडक्टर होता है जिसको सिंगल कोर केबल बोलते हैं। लेकिन 11,000 वोल्टेज तक हम थ्री कोर केबल भी यूज करते हैं। यदि हाई वोल्टेज को हजारों किलोमीटर तक ट्रांसमिट करना है केबल के थ्रू तो हमारे पास में एक अल्टरनेट ऑप्शन और अवेलेबल है जिसका नाम है डीसी ट्रांसमिशन। इसमें कैपेसिटिव इंटरफेरेंस जैसी कोई प्रॉब्लम नहीं होती। लेकिन इसके कुछ अपने अलग चैलेंज है। दोनों ही टाइप के केबल ट्रांसमिशन काफी कॉस्टली होते हैं। लेकिन डिपेंड करता है हमारी नीड कैसी है। यदि दो सिटीज के बीच में बहुत बड़ी रिवर आ रही है या ओशियन में से लाइन लेकर जानी पड़ेगी या फिर कुछ वीआईपी कॉलोनीज होती है। वहां पर केबल ट्रांसमिशन यूज़ होता है। अब आपसे एक छोटा सा निवेदन है। यदि आप हमारे रेगुलर सब्सक्राइबर हो तो चैनल की मेंबरशिप के थ्रू हमें जरूर से सपोर्ट कीजिएगा। हमारा टेक्निकल कंटेंट आज के टाइम में स्ट्रगल कर रहा है। बाकी और भी ऐसे बेहतरीन वीडियोस हम लाते रहेंगे। चैनल को सब्सक्राइब जरूर से कीजिएगा।

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