गीता उपदेश | Geeta Updesh | Part 3

Tilak1,831 words

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[संगीत] लुट हमारी संस्कृति हमारे संस्कार मैं सदा रहे हो कि भारत के महान ग्रंथों और काव्यों का संप को सब्सक्राइब करें तिलक कई तरह की ढिलाई आपके घर ऑफिस के लिए रिलाई इट्स इंडिया प्राइस क्या तुम बता सकते हो कि पिछले जन्म मैं तुम्हारे किस रिश्तेदार ने तुम्हारे लिए कितना विलाप किया था है वहीं के शव यह कैसे बता सकता मुझे तो यह तक याद नहीं कि वह कौन थे बस जिस तरह तुम अपने पिछले जन्म को भूल गए हो उसी तरह तुम अपने इस जन्म को भी भूल जाओगे इस जन्म के रिश्तो का अर्थ तुम्हारे आने वाले जम्मू में कुछ भी रह जाएगा अब कि आज अभिमन्य को तुम अपना पुत्र समझ रहे हो सकता है इसलिए जन्म में वह तुम्हारा पिता रहा हो कि जो आने वाले जन्म में तुम्हारा महाशत्रु बन जाए कि आज तुम दिन को अपना रिश्तेदार समझ रहे हो यह आदरणीय समझ रहे हो और इसी कारण उनके हत्या करने से संकोच कर रहे हो सकता है वह जैसे किसी ने तुम्हारे किसी पिछले जन्म में तुम्हारी हत्या की हो कर दो और मैं तुम्हें समझा रहा हूं सेट किए हुए शरीर मरते हैं आत्मा नहीं मिलती इसलिए उड़ शरीर का मोह त्याग तो उनकी मृत्यु अशोक त्यागी हों परंतु तुम्हारा मनुष्य को मारना नहीं चाहता हु और तुम ठीक कहते हो कि शपथ कि मैं तुम्हारी बात समझता तो परंतु मेरा मन उसे ग्रहण क्यों नहीं कर रहा है है इसका कारण क्या है इसका कारण हो जंजीर जो तुम्हारे मन में अपने ही गिर्द लपेट रखी है कौन सी जंजीर प्ले लिस्ट गाड़ी की जंजीर कि बिना तेरी का मुंह कि मेरा भाई है कि ब्रह्म है यह मेरा जरूर है कि पितामह है अ है कि रिश्ते नातों की जंजीरों में मुझे चारों तरफ से जकड़ रखा है परंतु मैं इस जंजीर को कैसे तोड़ मैंने मान लिया आज के सारे शरीर नाशवान पर दिन के साथ जो रिश्ते हैं वह नाश्ता नहीं है वह सच्चे हैं इस बीच मेरे पितामह है मैं अभी मंजू मेरा पुत्र है कि महाबली भीम मेरा सर उत्तर भाई है की दृष्टि तो सच्चे हैं कि भले इन सबके शरीफ मर जाए कि परंतु इन सबके साथ मेरे रिश्ते हों तो नहीं बनेंगे है जिससे आज मेरे पिता महाराज पांडु का शरीर नहीं है परंतु मेरे पिता आज भी महाराज पांडु है कि पिता-पुत्र का तो वह पवित्र रिश्ता समाप्त नहीं हुआ मैं इंग्लिश तो की पवित्रता पर मैं कैसे प्रहार करता कि शरीर तो भूल जाओ यहां पर अपने दादा के रिश्ते पति के से चलाओ मैं अपने भाई के नाते पतनवार कैसे उठाओ अर्जुन ई ई कि यह रिश्ते यह थे सब इस दिन के हैं और इस जन्मों से पहले या इस जन्म के पश्चात इन दिशाओं का कोई अस्तित्व नहीं रहता यह कहां का मामा भाई पुत्र पितामह पिछले जन्म में कहां थे [संगीत] और तुम्हारे क्या लगते थे थे है और अगले जन्म में ही क्या होंगे इस फोन कहां होंगे इसका उत्तर है तुम्हारे पास कि उनके शव कौन सी है इसीलिए कहता हूं कि जब शरीर नाशवान है तो रिश्ते भी आसान है क्या हुआ क्योंकि यह सब नाते शरीर के हैं है और यह जो तुमने अपने पिता का उदाहरण दिया कि उनका तुम्हारा पिता-पुत्र का नाता तो समाप्त नहीं हुआ तो यह भी तुम्हारा भ्रम है कि अज्ञान है तो फिर तुम्हारे मन में अभी तक पहुंचता जीवित है क्योंकि तुम अभी तक उसी जिम में हो परंतु तुम्हारे पिता श्री इस समय जिस योनी में भी होंगे उनके लिए वह रिश्ता समाप्त हो चुका है कर दो अपने पिता की बात छोड़ो अपनी बात करो कि पिछले जन्म में जो तुम्हारी मृत्यु हुई होगी कि उस समय तुम्हारे सब संबंधी रिश्तेदार रोए होंगे तुम्हारे पति ने तुम्हारे पुत्रों ने बहुत विलाप किया होगा परंतु आज इस भ्रम में तुम्हें याद नहीं कि किस किस ने तुम्हारी मृत्यु पर विलाप किया था मैं आज तुम्हारे लिए उनका यह के रूप में होने का कोई मोल नहीं इसलिए समझा रहा हूं कि ना किसी के मरने का शोक करो 19 किसी के साथ नाता टूटने का दुख मानो वैसे भी मेरी माया इतनी प्रबल है अर्जुन की जगह तू समझता है कि तेरी नृत्य के बाद शो करेंगे सारा जीवन रोते रहेंगे वह भी असत्य है कि मेरी माया के प्रभाव से थोड़े ही दिनों के बाद उन्होंने वालों को तो फिर हंसता-खेलता देखे काया अपने मित्र चार दिन रोता है भाई 10 दिन रोता है की पत्नी उस अधिक होती है माता सबसे अधिक समय तक रोती है है परंतु सब के आंसू धीरे-धीरे सूख जाते हैं और उन आंखों में फिर से नए सपनों की रोशनी चमकने लगती है तो क्या तुम बता सकते हो कि पिछले जन्म मैं तुम्हारे किस रिश्तेदार ने तुम्हारे लिए कितना विलाप किया था वहीं के शव यह मैं कैसे बता सकता मुझे तो यह तक याद नहीं कि वह कौन थे बस जिस तरह तुम अपने पिछले जन्म को भूल गए हो उसी तरह तुम अपने इंजन को भी भूल जाओगे तो कि इस जून के रिश्तो का अर्थ तुम्हारे आने वाले जम्मू में कुछ भी रह जाएगा कि आज अभिमन्य को तुम अपना पुत्र समझ रहे हो भी हो सकता है पिछले जन्म में वह तुम्हारा पिता रहा हो है कि आने वाले जन्म में तुम्हारा महर्षि अत्रि बन जाए कि आज तुम इनको अपना रिश्तेदार समझ रहे हो कि मैं आदरणीय समझ रहे हो और इसी कारण उनकी हत्या करने से संकोच कर रहे हो सकता है उनमें से किसी ने तुम्हारे किसी पिछले जन्म में तुम्हारी हत्या की हो की मृत्यु अगले जन्म मे उनकी हत्या कर दो कि जून के रिश्ते शरीर के जन्म के साथ पैदा होते हैं और शरीर के नृत्य के साथ मर जाते हैं है इसलिए इन रिश्ते-नातों के चक्रव्यूह से बाहर आ जाओ आत्मा अमर है इस अमरसत्य को पहचानो के रिश्ते को बदलते रहते हैं में ही अर्जुन इसलिए तुम्हें फरिश्तों से मुक्त करना चाहिए ना रिश्ते के टूटने का शोक करना चाहिए का हिस्सा उनकी योग का ज्ञान है कि मनुष्य को एक संन्यासी की भांति सोचना चाहिए कि यह सब रिश्ते नाते मुंह को उत्पन्न करते हैं है और मुंह इंग्लिश तुमको इतनी दूर से पकड़ लेता है जैसे कि लोग भी पुरुष यदि टूटते हुए यदि डन की गठरी को नहीं छोड़ता है [संगीत] है और आखिर में उसी कट में के बोझ से खुद भी टूट जाता है इसलिए उसे अपने मन को संन्यासी बनाओ और इस मुंह के बंदरों को छोड़ो एक और इस बात पर ध्यान दो के इस समय तुम्हारा कर्तव्य क्या है तुम्हारा धर्म क्या है और उसी के अनुसार कर्म करो में होनी रैलित जो कर्म प्रयोग बाद चरण करें इन इंद्रियों द्वारा जिसने मंजे इंद्रियां ज्योति इंद्रियों से जो पुरुष न हारा तरफ तरह परिचय जदयू के निर्मित पंच इंद्रियों से तरह का या कर्मों के ऐसे योगी को चाहा तूने नरोत्तम कहकर पुकारा कर्मों से ऐसे योगी को शोन रुस्तम कहकर पुकारा तो धन को निभाते हुए मनुष्य करूं तो करेगा ही अ है और कर्म करेगा तो संन्यास को कैसे निभाई है कि देवी यदि आप समझती हैं कि संन्यासी होने के बाद कर्म छुट जाता है तो आपने भगवान श्री कृष्ण के उद्देश को समझा ही नहीं हां प्रकोप बात स्पष्ट रूप से मेरी समझ में नहीं आ रही है इसीलिए मैं आपसे समझना चाहती हंसा आप समझ रही है [संगीत] इस संसार में जीने के लिए हर प्राणी को कुछ ना कुछ कर्म तो करना ही पड़ता है जो उसके लिए अनिवार्य है आवश्यक है [संगीत] मैं यह प्लेट के भूख मिटाना कि हर जीव के लिए अत्यावश्यक है हैं यहां तक कि अपने पेट की आग बुझाने के लिए संन्यासी भी भिक्षा मांगकर गुजारा करता है अर्थात यह कि कोई भी कर्म से मुक्त नहीं हो सकता है हुआ था परंतु यदि भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा को समझ ले है तो मनुष्य कर्म करते हुए भी कर्म से मुक्त हो सकता है कि प्रभु कर्म करते हुए उठकर हमसे कोई कैसे मुक्त हो सकता है जैसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण [संगीत] जी हां देवी तो मानो अवतार में भगवान श्रीकृष्ण का जीवन और आचरण समस्त मानव जाति के लिए संसार में रहते हुए संन्यास से होने का एक उत्तम उदाहरण है कि उन्हें संसार में रहते हुए कि हम समझकर कर्म किया जाए पर आ जाए है अथवा फल की चिंता कभी नहीं कि है इसलिए जब आवश्यक हुआ युद्ध भी किया है तो कभी हारे कभी जीते कि तुम के चेहरे पर मुस्कान है और उनके हृदय में वहां शांति रही [संगीत] कि वह चाहते तो विजय श्री की माला हर बार उनके गले में होती है [संगीत] कि उन्हें कर्म करते हुए भी लाभ-हानि के उसके परिणाम की चिंता करें क्योंकि और अपने कर्तव्य पथ से कभी नहीं हटे यह संसार रिश्ते से कंचन का मामा था हैं परंतु धर्म की रक्षा के लिए उन्हें उसका संघार करें संभव नहीं हो रहा है सोते ईद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को इसलिए उपदेश दे रहे हैं कि 13 धर्म युद्ध करना है हैं परंतु यदि तू इस भावनाओं की नदी में बहता रहा है और मन को अपने वश में ना कर सकता है है तो अपने धर्म का पालन नहीं कर सकेगा आ है इसलिए मन को संन्यासी बना था हैं और अपने क्षत्रिय धर्म का पालन कर हुआ है कि शव एक तरफ तुम संन्यास की बात करते हो संन्यासी की भांति इस अपनाते पृष्ठों के बंधनों को तोड़ने को कह रहे हो और दूसरी ओर पुण्य कर्म करने को कह रहे हो कि यह दोनों बातें विरोधी हैं कि तुम जानते कि मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उस करने का कोई कारण होता है कोई प्रेरक होता है जिसकी प्रेरणा से मनुष्य कर्म करता है कि कोई भावना तो होती है इस भाग में की पूर्ति के लिए मनुष्य अच्छा बुरा कोई भी कर्म करता है 178 अंक की जड़ में भावना होती है और भावना कीचड़ में कि कोई दूसरा कोई रिश्ता होता है क्योंकि किसी ना किसी रिश्ते की जड़ से ही तो भावना पैदा होती है कि इस पर यदि मनुष्य साथ रिश्ते तोड़ देगा मैं अपनी भावना को त्याग देगा हैं तो फिर वह कर्म किसके लिए करेगा अपने धर्म के लिए धर्म के लिए हां अपने धर्म के लिए अर्थात धर्म के लिए भूमि की आवश्यकता नहीं होती नहीं धन के लिए भावना की नहीं बल्कि अपने कर्तव्य के ज्ञान की आवश्यकता है वह प्रभु व वह तेरा ए आर रहमान की धारा भक्तिधारा अर्जुन निकेतन गुयस गंगादयाल में करता रहा आत्मानुशासित कि सारा झाला कि गर्भ का निर्माण निषेध दिन भुला के एक मेरा शरणागत हुआ था कि मैं लुटी भिगोया हुआ था जो कि नगर मे जहर बुझा लो हर उधर मुद्दों से श्याम प्यारे की कर दो [संगीत] ए प्लेस इन थे झालरे मे हुआ था वह आगे भी विद्यमान धुंध तथा हमारे मां जुबानी तथा हमारे हे नाथ नारायण बासुदेव हे कृष्ण गोविंद हरे हरे अच्छी तरह कर दो श्री कृष्णा हुआ है [संगीत] लुट लो [संगीत]

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