क्या आपको पता है कि चश्मा जमजम कैसे निकला था? अगर नहीं तो आज के इस वाक्य में आपको मालूम हो जाएगा। जब हजरत इब्राहिम अल्लाह सलाम ने अल्लाह के हुक्म से हजरत हाजरा और उनके छोटे बच्चे हजरत इस्माइल को मक्के की वीरान वादी में छोड़ा तो वहां ना पानी था, ना कोई पौधा, ना कोई इंसान। हजरत हाजरा के पास सिर्फ एक छोटी मशक पानी की और थोड़ा सा खाना था। कुछ दिनों के बाद जब सब कुछ खत्म हो गया तो उनका दूध बंद हो गया और हजरत इस्माइल भूख और प्यास की शिद्दत से जोरजोर से रोने लगे। हजरत हाजरा यह मंजर बर्दाश्त ना कर सके तो वह पहाड़ी सफा पर चढ़ गए। आसपास देखा मगर कुछ नजर ना आया। फिर वो मरवा की तरफ दौड़ी लेकिन वहां भी कुछ ना मिला। इसी तरह वो सफा और मरवा के दरमियान सात मर्तबा दौड़े। इस उम्मीद पर कि कहीं से मदद मिले, पानी मिले या कोई इंसान नजर आए। जब वह मरवा पर पहुंचे और पीछे देखा तो उन्होंने देखा कि हजरत इस्माइल अपने पैरों से जमीन को मार रहे हैं और जहां उन्होंने कदम रखा वहां से पानी का चश्मा फूट निकला। हजरत हाजरा दौड़ कर वहां गई और कहा जम जमजम यानी रुको रुको कहीं पानी बहकर जाया ना हो जाए। उन्होंने हाथों से मिट्टी जमा करके इस पानी को संभाला। अल्लाह ताला ने उस पानी में ऐसी बरकत डाल दी कि वह आज तक बह रहा है और कभी खत्म नहीं हुआ। रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम ने फरमाया कि चश्मा-ए जमजम का पानी जिस नियत से पिया जाए अल्लाह इस नियत को पूरा करता है। आज भी जो शख्स चश्मा-ए-मजम का पानी सच्ची नियत से पीता है अल्लाह उसकी हर दुआ कबूल फरमाता है। बस याद रखो जब तुम अल्लाह पर उसी यकीन के साथ भरोसा करोगे जिस तरह हजरत हाजरा ने किया था। तो जमजम सिर्फ मक्का में नहीं बल्कि तुम्हारी जिंदगी में भी फूट निकलेगा।
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