आज हम आपको राजस्थान के महान लोक देवता की अद्भुत कथा सुनाने जा रहे हैं जिनका नाम है बाबा रामदेव जी। राजस्थान ही नहीं बल्कि गुजरात और भारत के अन्य क्षेत्र में भी इनकी पूजा बड़े श्रद्धा भाव से होती है। यही नहीं बाबा रामदेव जी को हिंदू समाज के साथ-साथ मुस्लिम समाज भी उतनी ही आस्था से पूजता है। इसी कारण इन्हें कई नामों से जाना जाता है। रामसा पीर, रामदेव पीर, पीरों के पीर इत्यादि। तो आइए देवलोक ज्ञान के माध्यम से सुनते हैं उनकी यह पवित्र कथा। बहुत समय पहले राजस्थान के पोकरण क्षेत्र पर राजा अजमाल जी और उनकी पत्नी रानी मेनाद शासन करते थे। यद्यपि उनका राजपाट समृद्ध था। फिर भी उनके जीवन में एक बड़ी कमी थी। उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ था। इसी कारण उनके मन में कहीं ना कहीं पीड़ा और निराशा रहती थी। एक वर्ष बरसात का मौसम आया। सुबह-सुबह किसान हल बैल लेकर खेत जोतने निकले थे। रास्ते में अचानक उनकी भेंट राजा अजमाल जी से हुई। राजा को देखकर सभी किसान वापस लौट पड़े। यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा, अरे भाइयों, भगवान इंद्र की कृपा से इस वर्ष समय पर वर्षा हुई है। यह तो बोवाई का शुभ समय है। खेत में जाकर फसल तैयार क्यों नहीं कर रहे? तभी किसानों में से एक ने झिझकते हुए कहा, महाराज, हम खेत तो जा ही रहे थे। परंतु आज सुबह-सुबह हमने आपका मुख देख लिया। कहते हैं कि यदि प्रातः किसी निरऔलाद जिसके संतान ना हो का दर्शन हो जाए तो कार्य सफल नहीं होता। इसलिए हम आज खेतों में नहीं जाएंगे। यह वचन सुनकर राजा अजमाल जी के हृदय पर गहरा आघात हुआ। उनकी आंखों में पीड़ा भर आई। अब वे और भी अधिक संतानहीन होने के धूख से व्याकुल रहने लगे। राजा अजमाल जी भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। उन्होंने निश्चय किया मैं स्वयं द्वारका जाऊंगा और प्रभु श्री कृष्ण से ही संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मांगूंगा। उन्होंने यह बात रानी मेना दे को बताई। रानी ने स्नेह पूर्वक सहमति दी और भगवान के भोग के लिए लड्डू बनाकर राजा को दी। राजा अजमाल जी द्वारका की यात्रा पर निकल पड़े। कई दिन की कठिन यात्रा के बाद वे अंततः द्वारकाधीश श्री कृष्ण के मंदिर पहुंचे। मंदिर के द्वार पर उन्हें एक पुजारी मिले। राजा ने उनसे प्रार्थना की। मुझे प्रभु श्री कृष्ण के दर्शन करने हैं। पुजारी ने कहा महाराज अभी मंदिर के पठ बंद हो चुके हैं। आप कल प्रातः आकर दर्शन कर लीजिए। परंतु राजा अजमाल जी की व्याकुलता बढ़ चुकी थी। वे बार-बार पुजारी से निवेदन करने लगे। अंततः पुजारी को दया आई और उन्होंने उन्हें मंदिर के भीतर प्रवेश की अनुमति दे दी। राजा अजमाल जी मंदिर में प्रवेश कर भगवान श्री कृष्ण की दिव्य प्रतिमा के सामने खड़े हो गए। उन्होंने भाव विभोर होकर प्रणाम किया और आर स्वर में प्रार्थना करने लगे। हे द्वारकाधीश मुझसे ऐसी क्या भूल हो गई कि आज तक संतान सुख से वंचित रहा हूं। यह कौन सा पाप है जिसकी सजा मैं भुगत रहा हूं। आज तो लोग मेरा और मेरी रानी का मुख देखना तक अपशकुन मानते हैं। राजा अजमाल जी भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा के सामने खड़े होकर पुत्र प्राप्ति के लिए आर्त भाव से रोने लगे। उनकी आंखें अश्रुपूरित थी और हृदय पीड़ा से भरा हुआ। अचानक उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा मुस्कुरा रही हो। यह दृश्य देखकर राजा के मन में क्रोध उमड़ आया। उन्होंने कहा हे प्रभु मैं आपके चरणों में संतान सुख के लिए प्रार्थना कर रहा हूं और आप मुझ पर हंस रहे हो। क्रोध में भरकर राजा ने अपने साथ लाए लड्डुओं का थाल जोर से प्रतिमा की ओर फेंक दिया। यह देखकर पुजारी आश्चर्यचकित रह गया। उसने राजा को रोकते हुए कहा, महाराज यह क्या कर रहे हैं? प्रभु इस समय यहां नहीं है। रात के इस पहर वे सागर में निवास करते हैं। पुजारी की बात सुनते ही राजा का हृदय और भी व्याकुल हो उठा। वे तत्काल मंदिर से बाहर निकले और सागर की ओर दौड़ पड़े। बिना देर किए उन्होंने सागर में छलांग लगा दी। सागर का रहस्य कुछ दूर भीतर जाते ही अचानक दो दिव्य द्वारपाल प्रकट हुए। उन्होंने राजा अजमाल जी से कहा महाराज चलिए। प्रभु श्री हरि ने आपको अपने पास बुलाया है। राजा के नेत्रों में आश्चर्य और हृदय में उत्साह भर उठा। वे उन द्वारपालों के साथ आगे बढ़े और शीघ्र ही उन्होंने देखा। भगवान विष्णु स्वयं शेषनाग पर विराजमान हैं। परंतु राजा की दृष्टि तुरंत भगवान के मस्तक पर गई। वहां एक सफेद पट्टी बंधी हुई थी। राजा ने विनम्र स्वर में पूछा प्रभु आपके मस्तक पर यह पट्टी क्यों? क्या हुआ है? भगवान श्री हरि मुस्कुराए और बोले राजन अभी-अभी मेरे किसी भक्त ने मुझ पर लड्डू दे मारा था। यह सुनकर राजा का हृदय कांप उठा। वे रोते हुए प्रभु के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगने लगे। राजा की प्रार्थना राजा बोले प्रभु मुझे क्षमा करें। मेरे जीवन में कोई संतान नहीं है। लोग मेरा मुख देखना भी अशुभ मानते हैं। कृपा कर मुझे संतान का सुख दें। भगवान श्री हरि प्रसन्न हुए और बोले राजन चिंता मत करो तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। राजा ने हाथ जोड़कर विनती की हे प्रभु मुझे केवल एक पुत्र ही नहीं बल्कि दो पुत्र चाहिए और उनमें से एक पुत्र आप जैसे दिव्य हो भगवान श्री हरि ने कृपा पूर्वक उत्तर दिया राजन तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूं। मैं स्वयं तुम्हारे घर पुत्र रूप में जन्म लूंगा। जब मेरा जन्म होगा तो मंदिरों की घंटियां अपने आप बज उठेंगी और चारों ओर भक्ति का प्रकाश फैल जाएगा। यह सुनकर राजा अजमाल जी का हृदय प्रसन्नता से भर गया। वे उत्साहित होकर अपने महल लौटे और यह शुभ समाचार रानी मेना देवी को सुनाया। दंपत्ति के हृदय में नवजीवन का संचार हो गया। अवतरण का क्षण कुछ समय बाद वह शुभ दिन आ ही गया। विक्रम संवत 10409 लगभग 10352 ईसवी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दूज को राजस्थान के बाड़मेर जिले के उंडू गांव में संतान सुख प्राप्त हुआ। सबसे पहले जन्म हुआ वीरमदेव का और उसी झूले में प्रकट हुए बाबा रामदेव जी। उनके जन्म के साथ ही अद्भुत चमत्कार घटित हुए। महल में रखे सभी पात्रों का पानी दूध में परिवर्तित हो गया। मंदिरों की घंटियां अपने आप बजने लगी। कुमकुम से सजे पद चिन्ह पालने तक बन गए और पूरा नगर दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा। यह सभी संकेत स्पष्ट कर रहे थे कि स्वयं भगवान विष्णु अवतरित हुए हैं। राजा अजमाल और रानी मैना देवी का हृदय अपार आनंद से भर उठा। उन्हें विश्वास हो गया कि प्रभु ने उनकी प्रार्थना सुन ली और स्वयं उनके घर पुत्र रूप में पधारे हैं। ध्यान दें ध्यान दें। मेघवाल समाज की एक परंपरा यह भी मानती है कि बाबा रामदेव जी के वास्तविक माता-पिता सायर जी मेघवाल और मंगनी देवी थे और बाद में बाबा रामदेव जी को राजा के महल में पहुंचाया गया। दोनों आख्यान श्रद्धा से जुड़े हैं। धीरे-धीरे समय बीता और बाबा रामदेव जी बाल्यावस्था में प्रवेश करने लगे। बालपन से ही उनके भीतर दिव्य तेज और अद्भुत शक्तियां झलकने लगी थी। एक दिन बालक रामदेव जी ने अपने पिता राजा अजमाल जी से घोड़ा मांगने की जिद की। राजा ने सोचा यह अभी छोटा है। घोड़े पर चढ़ेगा तो कहीं चोट ना खा ले। इसलिए उनकी ज़िद पूरी करने के लिए एक दर्जी से कपड़े का घोड़ा बनवाकर उन्हें दे दिया। परंतु जब रामदेव जी उस कपड़े के घोड़े पर बैठे तो सभी की आंखें विस्मय से खुली रह गई। वह कपड़े का घोड़ा अचानक आकाश में उड़ने लगा और बादलों के बीच दौड़ने लगा। राजा अजमाल जी ने आश्चर्यचकित होकर दर्जी से पूछा, अरे इसमें कैसा जादू कर दिया तूने? दर्जी हाथ जोड़कर बोला, महाराज, यह मेरी कारीगरी नहीं। यह तो आपके पुत्र की दिव्य माया है। यह देखकर सभी लोग हैरान रह गए। उसी उड़ान के दौरान बालक रामदेव जी ने एक वृक्ष पर बैठी एक बालिका को देखा। वे उसे अपने साथ महल ले आए और बाद में उसे अपनी धर्म बहन बनाया। उसका नाम था डालीबाई। डालीबाई ने जीवन भर सेवा पथ अपनाया और बाबा रामदेव जी की परम भक्त बनी रही। आज भी रुणिचा धाम में उनकी समाधि और स्थान स्थित है जिसे डाली बाई की जाल कहा जाता है। यह स्थान आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए पवित्र तीर्थ है। बचपन की एक और अद्भुत लीला अत्यंत प्रसिद्ध है। एक बार खेलतेखेलते बाबा रामदेव जी मसूरिया की पहाड़ी पर पहुंचे। वहां एक आश्रम था जिसमें महान संत बाबा बाली तपस्या कर रहे थे। यही बाबा बाली आगे चलकर रामदेव जी के गुरु बने। बालक रामदेव जी को देखकर बाबा बालीनाथ ने कहा बेटा यहां आना उचित नहीं। यह स्थान बहुत भयानक है। पास ही भैरव नामक राक्षस रहता है। उसकी ग्रहण शक्ति इतनी तीव्र है कि कई कोस दूर से भी मनुष्य की गंध पा लेता है और उन्हें मारकर खा जाता है। मेरी तपस्या के प्रभाव से वह मुझ पर आक्रमण नहीं कर पाता। परंतु यहां और कोई नहीं टिक सकता। इतना कहते ही अचानक वही राक्षस प्रकट हुआ और आश्रम की ओर बढ़ा। बाबा बाली ने तुरंत रामदेव जी को कुटिया में एक कंबल के नीचे छुपा दिया। राक्षस गरजा यहां इंसान की गंध आ रही है। बाबा बाली ने शांत भाव से कहा, यहां कोई नहीं है। लेकिन राक्षस ने कंबल को हिलते देखा और समझ गया कि भीतर कोई है। वह अंदर घुसा और कंबल को खींचने लगा। परंतु जैसे ही उसने खींचा उसे लगा कि कंबल कभी समाप्त ही नहीं होता। यह देखकर राक्षस विचलित हो गया और भयभीत होकर भागने लगा। तभी बालक रामदेव जी बाहर आए और अपनी दिव्य शक्ति से उसका पीछा कर उसे पकड़ लिया। उनके तेज के आगे राक्षस टिक ना सका और वहीं उसका अंत हो गया। इस चमत्कारिक घटना के बाद पूरे पोखरण क्षेत्र को भैरव राक्षस के आतंक से मुक्ति मिल गई। लोगों के हृदय में बाबा रामदेव जी की महिमा गूंज उठी। सामाजिक सुधारों की नींव बाल्यकाल से ही बाबा रामदेव जी ने लोगों की सेवा की। जातपात का विरोध किया और छुआछूत जैसी कुरीतियों को मिटाने का प्रयास किया। वे सदैव दुखियों के दुख दूर करते और सबको समान दृष्टि से देखते और जब रामदेव जी किशोरावस्था में आए तो माता-पिता ने उनका विवाह निश्चित कर दिया। विक्रम संवत 10426 में उनका विवाह अमरकोट वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रानी नैतलदे से हुआ। परंतु रानी नैतलदे जन्म से ही विकलांग थी। उनके हाथपांव काम नहीं करते थे। जब विवाह के पवित्र फेरे शुरू हुए बाबा रामदेव जी ने उनका हाथ थाम कर कहा उठो और तभी चमत्कार हुआ। रानी नैतलदे के अंग स्वस्थ हो गए। वे सबके सामने खड़ी हो गई। पूरा अमरकोट रामदेव जी की जय के नारों से गूंज उठा। इसके बाद बाबा रामदेव जी ने अपनी धर्मपत्नी के साथ मिलकर अनेक सामाजिक सुधार कार्यों की नींव रखी और लोकहित में अपना जीवन समर्पित कर दिया। अब आइए जानते हैं आखिरकार क्यों बाबा रामदेव जी को हिंदुवा पीर और रामसा पीर कहा जाता है। जब बाबा रामदेव जी की कीर्ति दूर-दूर तक फैलने लगी तो उनकी चर्चा मक्का मदीना तक पहुंच गई। वहां बैठे पांच पीरों ने सुना कि रामदेव नाम का कोई महापुरुष अंधों को आंखें देता है। विकलांगों को अंग देता है और संतानहीनों को संतान का आशीर्वाद देता है। पीरों ने सोचा चलो जाकर देखते हैं यह सच है या केवल लोक कथा। पांचों पीर राजस्थान की ओर चल पड़े। रास्ते में ही बाबा रामदेव जी उनसे मिले। आदर पूर्वक प्रणाम किया और बोले पधारिए बताइए आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? पीरों ने कहा हमें बाबा रामदेव जी से मिलना है। बाबा मुस्कुराए और बोले तो फिर महल की ओर जाइए। जब पीर महल पहुंचे तो देखकर अचंभित रह गए। वहां बाबा रामदेव जी पहले से विराजमान थे और उनका स्वागत कर रहे थे। पीर एक दूसरे को देखने लगे। मानो सोच रहे हो यह कैसे संभव है? अभी तो यह हमें रास्ते में मिले थे। फिर बाबा ने आग्रह किया। मेरे घर आए हैं। कृपया भोजन करके ही जाइए। पीरों ने उत्तर दिया, हम तो अपने विशेष बर्तनों में ही भोजन करते हैं। और वे बर्तन तो हमने मक्का में ही छोड़ दिए हैं। बाबा हल्के से मुस्कुराए और अगले ही क्षण वे पांचों बर्तन हवा में उड़ते हुए सीधे पीरों के सामने आ गिरे। यह चमत्कार देखकर पांचों पीर नतमस्तक हो गए और बोले, अब तक लोग हमें पीर कहते थे। पर आज से आप पीरों के पीर रामसा पीर कहलाएंगे। इसीलिए आज भी बाबा रामदेव जी को हिंदुवा पीर और रामसा पीर कहा जाता है। यही कारण है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय बाबा को समान श्रद्धा से मानते हैं। बाबा रामदेव जी ने अपने जीवन काल में अनेक चमत्कार किए। किसी मृत व्यक्ति को जीवन दान देना, कटा हुआ सिर जोड़ देना, अंधों को आंखें और विकलांगों को अंग देना। उनकी ऐसी दिव्य लीलाएं अपरंपार थी। पर उनका मुख्य उद्देश्य था समाज से भेदभाव मिटाना, छुआछूत और जातिवाद का अंत करना और दुखियों की सेवा करना। बाबा रामदेव जी ने एक नगर का निर्माण किया जिसका नाम था रुणिच्छा। आज वही नगर पूरे विश्व में रामदेवरा के नाम से जाना जाता है। उस समय रुणिचा एक सूखा और बंजर क्षेत्र था। पानी की भारी कमी रहती थी। लोगों की परेशानी देखकर बाबा रामदेव जी ने यहां एक विशाल तालाब बनवाया जिसे आज हम रामसरोवर या रामसागर के नाम से जानते हैं। समय बीता। विक्रम संवत 1442 भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बाबा रामदेव जी ने जीवित समाधि लेने का निश्चय किया। उन्होंने उसी तालाब के पास समाधि हेतु एक गहरा खड्डा खुदवाया। जब उनकी धर्म बहन डाली बाई को यह समाचार मिला तो वे व्याकुल होकर दौड़ी चली आई और बोली भैया ये आप क्या कर रहे हो? बाबा ने शांत स्वर में उत्तर दिया। बहन मेरा कार्य पूरा हो चुका है। अब मेरा समय आ गया है। डाली बाई बोली यह भूमि मेरी है। आप यहां समाधि नहीं ले सकते। बाबा ने कहा बहन यह स्थान मैंने स्वयं अपने लिए बनवाया है। डाली बाई ने शर्त रखी यदि इस जगह की खुदाई से मेरा कंगन, कंघी और डोरी निकले तो यह भूमि मेरी सिद्ध होगी। थोड़ी देर बाद खुदाई हुई और सचमुच वही वस्तुएं धरती से निकल आई। फिर डाली बाई बोली यह स्थान और यह दिन मेरे लिए है। अब मैं यहां पर जीवित समाधि लूंगी। बाबा रामदेव जी की आज्ञा पाकर उन्होंने खड्डे में उतरकर समाधि ले ली। तब बाबा रामदेव जी ने अपनी समाधि पास ही दूसरी जगह खुदवाई। फिर बाबा रामदेव जी ने अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने संदेश दिया। यह स्थान सभी के लिए है। यहां जातिपाति या भेदभाव का कोई स्थान नहीं होगा। जो भी सच्चे मन से यहां आएगा उसकी मनोकामना मैं अवश्य पूर्ण करूंगा। यह कहकर और लोगों को आशीर्वाद देकर बाबा रामदेव जी ने उस स्थान पर जीवित समाधि ली। आज भी डाली बाई का वह कंगन मंदिर में सुरक्षित है और रामदेवरा धाम हर वर्ष लाखों करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र बनता है। वैसे तो बाबा रामदेव जी से जुड़ी अनेकों चमत्कारी कथाएं हैं। हम उन्हें एक ही वीडियो में समेट नहीं सकते। उनकी लीलाएं और महिमा इतनी विशाल है कि हर कथा अपने आप में एक अलग ग्रंथ है। इसलिए हम समय-समय पर उनके चमत्कारों पर अलग से वीडियो बनाते रहेंगे। यदि हमारे द्वारा प्रस्तुत इस कथा में कहीं कोई त्रुटि रह गई हो तो हमें क्षमा करें। हमारा उद्देश्य केवल बाबा रामदेव जी की महिमा का प्रसार करना है। यदि यह वीडियो आपको पसंद आई हो तो कृपया लाइक करें। चैनल को सब्सक्राइब करें। मैं नरेंद्र सिंह आपका हृदय से धन्यवाद करता हूं इस वीडियो को देखने के
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